आलेख: सुरक्षाकर्मी की अनुशासनहीनता अपराध है

 

चंडीगढ़ हवाई अड्डे पर 6 जून, 2024 के दिन मंडी, हिमाचल प्रदेश की नव-निर्वाचित सांसद कंगना रनौत पर एक सी.आई.एस.एफ. महिला सुरक्षा कर्मी कुलविंदर कौर द्वारा कथित तौर पर थप्पङ मारे जाने और अभद्र व्यवहार की घटना चर्चा का विषय बनी हुई है. सुरक्षा कर्मी के अनुसार दिल्ली में किसान आंदोलन के समय कंगना रनौत ने धरने पर बैठे किसानों के लिए कहा था कि वे 100-200 रूपये लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. उस धरने में उसकी माँ भी थी. स्पष्ट है इस बात की टीस और गुस्सा कंगना रनौत के साथ हवाई अड्डे पर हुई बदसलूकी का सबब बना.

 लेकिन उन दोनों के बीच केवल बहस हुई या थप्पङ भी मारा गया? यह अभी स्पष्ट नहीं है. इसी बीच कुलविंदर के समर्थन में संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा समेत कई संगठनों ने 9 जून, 2024 को  मोहाली में मार्च निकाला. मामले के तूल पकङने पर उनका पूरा गाँव भी उसके समर्थन में उतर आया है, गाँव वालों और उनके घर वालों का कहना है कि कुलविंदर कौर द्वारा कंगना रनौत को थप्पङ मारते हुए कोई वीडियो सामने नहीं आया है. यद्यपि वे मानते हैं कि उन दोनों के बीच बहस जरूर हुई थी. यही तर्क किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का भी है-वे मामले की निष्पक्ष जाँच चाहते हैं.

 'जाने-माने गायक और संगीत निर्देशक विशाल ददलानी ने कुलविंदर कौर की नौकरी चले जाने की स्थिति में नौकरी का आश्वासन दे दिया तो एक बुजुर्ग कृषि कार्यकर्ता मौहिंदर कौर ने भी कुलविंदर कौर का समर्थन किया है. खबर यह भी है कि खालिस्तानी आतंकवादी गुरपंत सिंह पन्नू ने कुलविंदर कौर को दस हजार डॉलर तो जीरकपुर के एक व्यापारी शिवराज सिंह बैंस ने एक लाख रूपये देने की घोषणा की है. हरियाणा के जींद जिले के उचाना में धरने पर बैठे किसानों के संयोजक आजाद मालवा ने भी कुलविंदर कौर को सम्मानित करने की घोषणा की है. इन सबके बर-अक्स अनेक फिल्मी हस्तियों, नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों ने सुरक्षा कर्मी के इस कृत्य की भर्त्सना की है और कंगना रनौत का पक्ष लिया है. हवाई अड्डों पर सुरक्षा प्रदान करने का काम करने वाली सी.आई.एस.एफ. ने घटना की ‘कोर्ट ऑफ इंक्वायरी’ का आदेश दे दिया है.

एक सुरक्षाकर्मी द्वारा एक सांसद के साथ दिन दहाङे बदसलूकी की गई फिर भी उसे राजनैतिक रंग देकर उसके कृत्य की सराहना और समर्थन हमारे राजनैतिक और नागरिक बोध का दिवालियापन नहीं तो और क्या है

 नेताओं पर स्याही फेंकना, जूते-चप्पल-कुर्सी चलाना, अपमानजनक टिप्पणी करना, यहाँ तक की भरी सभा में शारीरिक हमले, पिटाई, लात-घूँसे, थप्पङ-मुक्के आदि हमारे देश में नए नहीं है. इसका ताजातरीन उदाहरण है 17 मई, 2024 को दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के संसद प्रत्याशी कन्हैया कुमार पर किया गया हमला-जब एक चुनावी सभा में उनको माला पहनाने के बहाने दक्ष उर्फ दक्ष चौधरी और अन्नू चौधरी नाम के युवाओं ने थप्पङ जङ दिया और धार्मिक नारे लगाते हुए अपने कृत्य को न्यायोचित ठहराया. विपरीत विचारधारा से बंधे हुए लोग यदि इस घटना पर आनंदित होते हैं तो वे विवेकपूर्ण, सभ्य समाज का हिस्सा नहीं हो सकते और उनको कंगना रनौत के पक्ष में खङे होने का कोई नैतिक अधिकार नहीं.

तथापि ड्युटी के समय सुरक्षाकर्मियों द्वारा नस्ल, जाति, धर्म या राजनैतिक विचार धारा की रंजिश के चलते, किसी व्यक्ति पर शाब्दिक या शारीरिक हमला चिंतनीय ही नहीं बेहद खतरनाक भी है. एक सुरक्षा कर्मी के हाथों में बंदूक इसलिए थमाई जाती है कि वक्त आने पर वह अपने देश और देशवासियों रक्षा करेगा. हमारे देश के जांबाज, देशभक्त रक्षा कर्मियों या सैनिकों द्वारा न केवल युद्ध के समय बल्कि शांतिकाल में भी असंख्य मौकों पर इस विश्वास को बनाए रखने की मिसाल से इतिहास भरा पङा है और उन्होंने अपने प्राणों की आहूति देकर भी देश व देशवासियों की रक्षा की है. लेकिन दूसरी और यदा-कदा सुरक्षाकर्मियों के विद्रोह की घटनाएँ भी इतिहास की कठोर सच्चाई है. उदाहरण के तौर पर हम निम्न दो घटनाओं का संदर्भ लेते हैं.

31 अक्टूबर, 1984 को नई दिल्ली के सफदरगंज रोड स्थित आवास पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की उनके ही अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोली मार कर हत्या कर दी थी-वजह थी ऑपरेशन ब्लू स्टार’, के तहत सिक्खों के अमृतसर स्थित धार्मिक स्थल स्वर्ण मंदिरमें शस्त्र बलों का प्रवेश और खालिस्तान आंदोलन के पैरोकार जरनैल सिंह भिंडरावाले की हत्या! रेलवे सुरक्षा बल (आर.पी.एफ.) के कांस्टेबल चेतन कुमार चौधरी ने 31जुलाई, 2023 को जयपुर-मुंबई सेंट्रल एक्सप्रेस के चार यात्रियों की गोली मारकर हत्या कर दी थी-वजह था उनका वह धर्म जिससे वह नफ़रत करता था! लेकिन इनके कृत्यों का किसी भी जिम्मेवार नागरिक, अधिकारी या नेता ने महिमामंडन या समर्थन नहीं किया और कानून ने अपना काम किया.

सवाल पैदा होता है कि क्या सुरक्षा कर्मियों के ऐसे विद्रोही कृत्यों का किसी भी रूप में महिमामंडन या समर्थन उचित है? एक पूर्व सैनिक के रूप में मेरा जवाब होगा-कतई नहीं. सुरक्षा बलों के जवान या अधिकारी महज सरकारी नौकर नहीं होते. वे वर्दीधारी सिपाही होते हैं जिन्हें पूर्ण विश्वास के साथ देश की आंतरिक या बाहरी सुरक्षा की जिम्मेवारी सौंपी जाती है-उनके हाथों में एक भरोसे के साथ बंदूक थमाई जाती है. सैनिक किसी भी देश की सबसे बड़ी संपत्ति में से एक होते हैं. वे राष्ट्र के संरक्षक हैं और हर कीमत पर अपने नागरिकों की रक्षा करते हैं. उनसे अपेक्षित है कि वे देश के हित को अपने व्यक्तिगत हित से ऊपर रखेंगे. अनुशासन में रहते हुए आदेश की पालना करना, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र या किसी भी प्रकार की विभिन्नता के प्रति तटस्थ रहना एक सैनिक के खून में होता है. यदि कंगना रनौत, सुरक्षा परीक्षण में सहयोग नहीं कर रही थी तो कुलविंदर कौर उनको रोक सकती थी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को मामले को रैफर कर सकती थी. वैसे भी हवाई अड्डे पर सुरक्षा परीक्षण के समय अनेक सुरक्षा कर्मी और अधिकारी मौजूद रहते हैं.

बेशक भूतकाल में कंगना रनौत की किसानों पर की गई टिप्पणी हजारों वास्तविक आंदलोनकारियों को आहत करने वाली थीं लेकिन जज्बाती होकर या बदले की भावना से बतौर सुरक्षा कर्मी ड्युटी के दौरान उसके द्वारा एक यात्री पर किया गया कोई भी शाब्दिक या शारीरिक हमला किसी भी कोण से न्यायोचित या क्षम्य नहीं हो सकता. यदि इन कसौटियों पर देखा जाए तो कुलविंदर कौर का चंडीगढ़ हवाई अड्डे पर कंगना रनौत के साथ किया गया व्यवहार अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है.

 @दयाराम वर्मा, जयपुर (राजस्थान) 10.06.2024

 

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