आलेख: वरदान से अभिशाप की ओर
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आलेख प्रकाशन : दैनिक मृदुल पत्रिका जयपुर शनिवार 11.07.2026
अनुभूतियों के अंत: प्रवाह की बेलौस अभिव्यक्ति !
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आलेख प्रकाशन : दैनिक मृदुल पत्रिका जयपुर शनिवार 11.07.2026
व्यंग्य: हिंदुस्तानी गधे का पासपोर्ट

हाल ही में सऊदी अरब के ऊँटों को पासपोर्ट जारी किया गया। यह खबर हिंदुस्तान के पशु-जगत में भी तेज़ी से वायरल होने लगी और जैसलमेर, बीकानेर, जयपुर से होते हुए दिल्ली, लखनऊ और झूमरी तलैया तक जा पहुँची। यद्यपि खबर ऊँटों की थी, विदेशी धरती की थी, लेकिन यहाँ के घोड़े, गधे, कुत्ते और साँड़ आदि सभी चौपायों में यह मुद्दा कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया।
जब मैंने यह खबर सुनी तो मेरे कान
भी नब्बे डिग्री के कोण पर खड़े हो गए। बचपन से ही मेरी तमन्ना थी कि कभी
विदेश-भ्रमण का मौका मिले। लेकिन मेरे जैसे गधों को पासपोर्ट कौन देगा—यह सोचकर मन
मसोसकर रह जाता था। यद्यपि हिंदुस्तान से हर साल अवैध रूप से हजारों लोग 'डंकी-रूट' से अमेरिका और यूरोप के देशों
में जाते रहते हैं; लेकिन मैं ठहरा खानदानी, नेकदिल, ईमानदार और देशभक्त गधा, भला अवैध तरीके कैसे अपना सकता हूँ। लिहाज़ा, ऊँटों
के पासपोर्ट की खबर मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थी।
विस्तृत जानकारी के लिए जब मैं
अल-जज़ीरा और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे विदेशी अख़बार टटोल रहा था तो एक और चौंकाने
वाली खबर सामने आ गई। खबर यह थी कि चीन और पाकिस्तान के बीच गधों के आयात-निर्यात
को लेकर एक समझौता हुआ है, जिसके मुताबिक चीन प्रतिवर्ष पाकिस्तान से
तीन लाख गधे खरीदेगा। जैसे ही यह समझौता हुआ, पाकिस्तान में
तीस हज़ार वाला गधा डेढ़ से दो लाख तक में बिकने लगा। वाह क्या बात है, एक ओर मालिकों की चाँदी, दूसरी ओर गधों को चीन की
सैर करने का मौका!
खबर वाकई दिलचस्प थी। लेकिन जब
मैंने इसकी गहराई से पड़ताल की तो दिल बैठ गया। मालूम पड़ा कि गधों की खाल से अपनी
पारंपरिक दवा 'एजियाओ' बनाने के लिए
चीन उन्हें खरीद रहा है। धत्त तेरे की! स्पष्ट था—पाकिस्तानी गधों का स्वागत चिनकू
लोग सीधे अपने बूचड़खानों में कर रहे हैं। मैंने तुरंत प्रभाव से चीन-भ्रमण के
अपने बाल्यकाल के स्वप्न को दिल-ओ-दिमाग़ से खुरचकर निकाल फेंका। जान है तो जहान
है।
यद्यपि आबादी के लिहाज़ से
हिंदुस्तान में पाकिस्तान से कई गुना ज़्यादा गधे हैं, फिर भी गनीमत है कि हमारी सरकार ने गधों के निर्यात का कोई
व्यापारिक समझौता चीन के साथ नहीं किया। इसके अलावा, नारे
लगाने, डीजे के सामने कूल्हे मटकाने, हुड़दंग
और तमाशों से लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग जैसी तमाम तरह की व्यवस्थाएं और अंशकालीन
एवं पूर्णकालीन रोजगार, निठल्ले लेकिन देशभक्त गधों के लिए पैदा
किए हैं।
यदि अरब देश ऊँटों को पासपोर्ट दे
सकते हैं तो हिंदुस्तान अपने काबिल और मेहनती गधों को क्यों नहीं दे सकता—यह सवाल
मेरे मन को बार-बार कचोट रहा था। यकीन मानिए, बाहर
जाकर वे विदेशी मुद्रा देश में भेजेंगे, जिसकी देश के विकास
के लिए सख्त ज़रूरत है। वैसे भी देशभक्ति, स्वामी-भक्ति,
मेहनत और बाअदबी का जो जज़्बा हिंदुस्तानी गधों में होता है,
शायद ही किसी और प्रजाति में हो। विश्वास न हो तो आप किसी भी देश
में उन्हें भेजकर आज़मा लीजिए; देश का डंका न बजवा दिया तो
कहना।
रहा सवाल मेरा, मैं अपनी काबिलियत का अपने मुँह से क्या बखान करूँ। आप इस बात
से अंदाज़ा लगा लीजिए कि मेरे खानदान में एक से बढ़कर एक देशभक्त, मेहनती और कर्तव्यपरायण गधों ने जन्म लिया है। मेरे परदादा की संघर्षपूर्ण
जीवनी से प्रेरित होकर कथाकार कृश्नचंदर ने 'एक गधे की
आत्मकथा' लिखी और साहित्य-जगत में छा गए। सन् 1962 में मेरे दादा मरहूम 'सुल्तान' बाराबंकी की तस्वीर 'द टाइम्स ऑफ़ लंदन' में छपी, जिसने स्वर्गीय रघु राय की फ़ोटोग्राफी के
करियर की नींव रखी और कालांतर में वे एक महान फ़ोटोग्राफर बन गए। मेरे मरहूम पिता 'शहंशाह' ने खाजूवाला बॉर्डर पर तस्करों के एक बड़े
नेटवर्क का पर्दाफाश किया और बी.एस.एफ. के जाने कितने अधिकारियों को सम्मान और
पदोन्नति दिलवाई। ऐसे सैकड़ों किस्से हैं मेरे खानदान के।
खैर! दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत
के बाद मैं और मेरी मंगेतर 'धन्नो' रात्रि में भट्टा बस्ती में एक घूरे पर लेटकर आराम फरमाने लगे। चीन-भ्रमण
की योजना रद्द होने से धन्नो बेहद ख़फ़ा थी। किसी तरह अपने होने वाले बच्चों की
कसम खाकर मैंने उसे विश्वास दिलाया कि पासपोर्ट जारी होते ही उसे स्विट्ज़रलैंड,
बैंकॉक या पटाया जैसी किसी खूबसूरत जगह हनीमून पर ले जाऊँगा। जब
उसका मिज़ाज थोड़ा सुधरा तो तारों भरे नीले आसमान के नीचे धीरे-धीरे हमारा इश्क़
परवान चढ़ने लगा।
ठीक उसी वक़्त सूअरों का एक
परिवार मुँह मारता हुआ वहाँ आ पहुँचा। सूअर, सूअरानी
और उनके एक दर्जन बच्चों की घुर्र-घुर्र ने हमारे रंग में भंग डाल दिया। सभी को
नहाए-धोए, क्रीम-पाउडर लगाए देख हम चौंक उठे। सूअर के बच्चे
तो इतने गोरे-चिट्टे, प्यारे और मुलायम थे कि धन्नो उन्हें
अपनी गोद में उठाकर प्यार करने के लिए मचलने लगी।
"वाह सूअरमल जी, बड़े
सज-धज रहे हो! किसी की शादी में गए थे क्या?" जिज्ञासा
वश मैंने पूछ लिया।
सूअरमल ने अपनी मिचमिची आँखें
झपकाईं और अकड़ते हुए बोले—"तुम्हें मालूम नहीं क्या?" इस अप्रत्याशित उत्तर से मेरी हैरानी और बढ़ गई।
"नहीं भाईजान, आप ही बताइए।"
सूअरमल ने थूथनी से बाएँ-दाएँ
दो-तीन बार सूँघा, घूरे के बिखरे कचरे पर एक हिकारत-भरी नज़र
डाली और गंभीर स्वर में बोले—
"देखिए मिस्टर, आगे
से हमें 'सूअर' और 'भाईजान' वगैरह कहना बंद कीजिए। हिंदुओं की ओर से हमारी
थोक में माँग आ रही है। वे हमें श्वानों की भाँति पालने लगे हैं। मालपुए खिलाए जा
रहे हैं, साफ़-सुथरे बिस्तरों पर सुलाया जा रहा है।"
सूअरमल की बातें सुनकर अनायास ही
मेरी हँसी छूट गई। हो न हो, इसका दिमाग़ सटक गया है। नालियों में मुँह
मारने वाले, सिर से पाँव तक गंदगी में पलने वाले सूअर को
हिंदू अपने घरों में पाल रहे हैं? असंभव!
"लेकिन यह चमत्कार कैसे हो गया, सूअरमल जी? सॉर्री-सॉर्री…
शूकरमल जी!"
"दरअसल, इस
मोहल्ले में हिंदुओं का धार्मिक पुनर्जागरण चल रहा है। उनके एक पहुँचे हुए बाबा को
आकाशवाणी हुई है कि वराह-देव यानी हम शूकर-जात को यदि घरों में पाला जाए, सेवा-शुश्रूषा की जाए और प्यार से मॉर्निंग-इवनिंग वॉक करवाई जाए, तो आसपास के म्लेच्छ भाग खड़े होंगे। बस, तभी से
हमारे पौ-बारह हैं।"
सूअरमल ने हम दोनों के हैरान
चेहरों पर एक रहस्यमयी मुस्कान डाली और मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना शान से
अपने कुनबे के साथ घुर्र-घुर्र करते हुए दूसरी दिशा में निकल गए।
धन्नो और मेरी प्यार-भरी बातों
में खलल पड़ चुका था। सूअरमल की बातों से मेरी चिंता और अधिक बढ़ गई। देश में
धार्मिक नफ़रत अब इस खतरनाक मोड़ पर आ पहुँची है—यह सचमुच भयावह है।
दूसरी ओर सूअरों से ईर्ष्या भी हो
रही थी। सूअर कहीं के… कितने भाग्यशाली हैं! कहने को तो हम भी वैशाख-नंदन हैं, माता शीतला की सवारी। और नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि
भी हमारी पीठ पर सवार होकर निकलती है। फिर भी किसी हिंदू ने आज तक अपने ड्राइंगरूम
में बैठाकर हमें चाय नाश्ता तक नहीं कराया बल्कि झांकने तक नहीं दिया। स्साला कारण
क्या है?
सोचते-विचारते मुझे इल्म हुआ कि
गधे सदैव सेक्युलर रहे हैं। और इस दौर में सेक्युलर होना ही अपने आप में एक अपराध
है। बस कृपा यहीं अटकी हुई है-बात समझ में आ गई।
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी।
आसमान में सप्त-ऋषि तारा मंडल पश्चिम की ओर झुकने लगा था। मुझे बेचैन देख धन्नो ने
अपने नरम ओठों से मेरे गाल और गर्दन को सहलाया और मादक स्वर में
फुसफुसाई—"किस चिंता में डूबे हो जानू, रात
बहुत अधिक बीत चुकी है। सवेरे जल्द ही मालिक भट्टे पर ईंट ढोने लगा देगा। प्लीज़,
अब सो जाओ।"
एक तो पासपोर्ट की चिंता, दूसरे धन्नो का प्यार भरा स्पर्श और मिश्री से मीठे बोल! नींद
आए भी तो कैसे? मैंने उसका दिल रखने के लिए आँखें मूँद लीं।
लेकिन मन में भाँति-भाँति के विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। आसमान में एक उल्का-पिंड
टूटा और तेज़ी से रोशनी बिखेरता हुआ कहीं विलीन हो गया; इसी
के साथ मेरे मन में भी उल्का-पिंड सा एक धांसू आइडिया चमका—यदि म्लेच्छों को दूर
रखने में सूअर इतने ही प्रभावी हैं, तो क्यों न इन्हें
बांग्लादेश और पाकिस्तान की सरहदों और कश्मीर के कुपवाड़ा, पुंछ,
राजौरी जैसे सीमावर्ती इलाकों में तैनात कर दिया जाए— शूकर सुरक्षा
बल!
सूअरों के सुरक्षा चक्र को बेधकर
म्लेच्छ आतंकी और बांग्लादेशी घुसपैठियों की क्या मजाल जो भारत के अंदर झांक भी
सके। इनकी विशाल सैन्य वाहिनी की छाया देखकर ही वे भाग खड़े होंगे। इस प्रकार न
केवल हमारी सीमाएँ सुरक्षित हो जाएँगी, बल्कि
अर्द्धसैनिक बलों और फ़ौज पर खर्च होने वाला अरबों रुपये का राजस्व भी बच जाएगा।
इस कमाल के आइडिया के साथ मैंने पूरी रात करवट बदल-बदलकर बिताई। अब इसे लिखित में
सरकार को भिजवा रहा हूँ, उम्मीद है इस पर गंभीरता पूर्वक
विचार किया जाएगा। मेरी केवल एक ही इल्तिजा है कि यदि सरकार को यह सुझाव पसंद आ जाए
तो इनाम के तौर पर हमारे पासपोर्ट जारी कर दिया जाएं।
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 30 अप्रैल, 2026
प्रकाशन विवरण : दैनिक मृदुल पत्रिका जयपुर दिनांक 04 मई 2026,
सत्य की मशाल-भोपाल मई 2026
अट्टाहास (व्यंग्य मासिक पत्रिका) जुलाई 2026



Article published in 'I AM GREATFUL' a collection of 151 articles on gratitude
Gratitude means giving thanks for pleasant experiences
According to the American Psychological Association's definition, gratitude
is a feeling of appreciation or happiness toward a tangible benefit (like a
gift or favor) or an intangible or incidental event (like a good day).
From birth to adulthood, a person remains grateful for the support of
parents, educational, professional, and spiritual mentors, employers, and
others who contribute to their success. However, it is not necessary that this
feeling of gratitude be reserved only for life-changing events. We can also
feel grateful for small joys and acts of kindness, such as guidance from a
stranger in an unfamiliar place, a birthday greeting, clouds and rain on a
humid day, etc.
Gratitude is also a powerful tool for personal development. When practiced
regularly, gratitude helps us face even the toughest situations—such as
prolonged illness, financial crises, loss of a loved one, legal disputes—by
fostering the patience, courage, and wisdom we need for challenging times
ahead.
Feelings that inspire gratitude are not limited to humans alone; animals
and birds also display this. Sensitive creatures understand the value of mutual
dependence and the importance of the natural ecosystem for coexistence. They
often express this understanding in some form. Thus, it can be said that the
thought or feeling of giving thanks for pleasant experiences is, in essence,
gratitude among all sentient beings.
Dayaram Verma, Jaipur 30.10.2024
सुखद अनुभूतियों का धन्यवाद अर्थात कृतज्ञता
अमेरिकन मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन की परिभाषा के अनुसार, कृतज्ञता, किसी मूर्त
लाभ (जैसे उपहार या उपकार) या अमूर्त या आकस्मिक घटना (जैसे अच्छा दिन) के प्रति
आभार या खुशी की भावना है.
जन्म से लेकर बङे होने तक एक मनुष्य की सफलता के पीछे उसके माता पिता, शैक्षिक-व्यावसायिक और आध्यात्मिक शिक्षक, नियोक्ता आदि के उपकारों के प्रति सदैव आभारी रहता है. लेकिन जरूरी नहीं
कि कृतज्ञता की यह भावना जीवन को वृहत रूप से प्रभावित करने वाली घटनाओं के प्रति
ही हो. छोटी-छोटी खुशियों और उपकार के लिए भी हम कृतज्ञ हो
सकते हैं यथा, किसी अनजान जगह पर किसी अपरिचित द्वारा सही
रास्ते का मार्गदर्शन, जन्मदिन पर किसी का बधाई संदेश,
उमस भरे एक गर्म दिन अचानक से उमङ-घुमङ कर छाए बादल और बारिश,
इत्यादि.
कृतज्ञता व्यक्तिगत विकास के लिए भी एक सशक्त उपकरण है. नियमित रूप से कृतज्ञता
का अभ्यास होने पर प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियां, यथा लंबी बीमारी, आर्थिक संकट, प्रियजन की अकाल मृत्यु, अदालती विवाद आदि भी चुनौती
भरे भविष्य में हमारे लिए आवश्यक धैर्य, साहस और विवेक की
सौगात लेकर आती हैं.
आभार प्रकट करने के लिए प्रेरित करने वाली संवेदनाएं, केवल मानव मात्र तक ही सीमित नहीं होती अपितु यह जीव-जंतुओं और पशु-पक्षियों
में भी देखी जा सकती हैं. सभी संवेदनशील प्राणी अपने सह अस्तित्व के लिए, एक दूसरे पर निर्भरता और प्राकृतिक इकोसिस्टम के महत्व को न केवल समझते
हैं वरन किसी न किसी रूप में कभी न कभी इसे उद्घाटित भी करते हैं. इस प्रकार,
कहा जा सकता है कि संवेदनशील प्राणियों का अपनी सुखद अनुभूतियों के प्रति
धन्यवाद-रूपी विचार या भाव ही कृतज्ञता है.
व्यंग्य: चारों धाम- सेवा तीर्थ

विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक रोमियो और जूलियट में नायिका जूलियट अपने प्रेमी से कहती है—
यहाँ जूलियट अपने प्रेमी को नाम की पहचान से मुक्त होकर
प्रेम को प्राथमिकता देने का आग्रह कर रही है। उसका तर्क है— नाम बदलने से
व्यक्तित्व नहीं बदलता।
लेकिन यह कथन सोलहवीं सदी का है। तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। यह कहाँ लिखा है कि साहित्य और समाज में सदैव गुलाब का ही दबदबा रहेगा? कमल भी तो है—फूलों का महाफूल। कमल का कमाल यह है कि वह कीचड़ में खिलता है। यह उसका बड़प्पन है, उसका समाजवादी और समावेशी चित्रण है! भले ही गुलाब उसे कीचड़ का शोषक बताकर उसका सामंती निरूपण करें। लब्बोलुआब यह है कि नाम बदलने से गुलाब को फर्क पड़े या न पड़े औरों को पड़ सकता है। अब जैसे यह उदाहरण देखिए।
उत्तर कोरिया में पिछले दशक में माँ-बाप अपने बच्चों को नरम और सरल नाम देने लगे थे, जैसे ‘ए रि’, ‘सु मि’ जिनका शाब्दिक अर्थ होता है— प्यारा/प्यारी और सुंदर। जब यह बात किम जोंग के संज्ञान में आई तो उनका पारा गर्म होना स्वाभाविक ही था। वे भला अपने प्यारे देश की संस्कृति को प्यारे और सुंदर नामों से अपसंस्कृत होते हुए कैसे सहन करते!
फौरन दिशा-निर्देश जारी किए गए— देश के बच्चों के नाम ‘वैचारिक’ और ‘क्रांतिकारी’ हों जैसे ‘चुंग सिम’ जो निष्ठा (स्वामी भक्ति) को दर्शाता है या ‘पोक-II’ जो एक बम का नाम है। और जैसा कि हम सब जानते हैं, वहाँ की जनता कितनी आज्ञाकारी है। इस आदेश के बाद जन्म लेने वाले बच्चों के नाम ‘पोक-II’ से लेकर ‘चोंग’ (बंदूक), ‘सो-चोंग’ (राइफल), ‘क्वोन चोंग’ (पिस्तौल), ‘पोग-याक’ (विस्फोटक) जैसे बारूदी नाम रखने की होड़ मच गई।
फिलहाल हमारे यहाँ गली, मोहल्लों, गाँव, शहरों और सरकारी संस्थाओं, कार्यालयों आदि के नाम बदल कर उन्हें जोश, गर्व और गौरव की ड्रिप चढ़ाई जा रही है, व्यक्तिगत नामों पर अगले चरण में विचार किया जाएगा। तो इस अभियान को विस्तार देते हुए शाही नवरत्न, बहुत मंथन के उपरांत ‘सेवा तीर्थ’ जैसा धाँसू शब्द खोज ले आए। इस शब्द में संकल्प, प्रकल्प, कायाकल्प आदि के भाव वैसे ही गूँथे हुए हैं जैसे ‘कर्तव्य पथ’, ‘लोक कल्याण मार्ग’, ‘कर्तव्य भवन’ आदि नामों में थे।
नाम पढ़-सुनकर ही काम की संतुष्टि हो जाती है। जैसे मन की बात सुनने के बाद काम की बात करने का मन ही नहीं करता! यदि नाम का ऐसा प्रताप हो सकता है तो फिर काम पर व्यर्थ पैसा और समय क्यों बर्बाद किया जाए?
बाज़ लोगों को, जिनमें
पिछली सरकारें बाय डिफॉल्ट शामिल हैं, नहीं मालूम कि तीर्थ
की उपमा किसे दी जानी चाहिए। अब नेहरू जी को ही लीजिए! उनकी निगाह में तो भाखड़ा
नांगल डेम, भिलाई स्टील प्लांट, भारत
हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड जैसे प्रोजेक्ट्स ही आधुनिक भारत के तीर्थ थे। कौन
समझाए!
तीर्थ उस स्थान को कहा जाता है जो पवित्र है, जहाँ मुख्य देवता और अन्य देवगणों की पावन उपस्थिति हों। जहाँ भक्ति और श्रद्धा से परिपूर्ण वातावरण हो, चढ़ावा चढ़ता हो, प्रसाद बँटता हो, वंदन-गान गाए जाते हों।
अब किसी बाँध, स्टील या बिजली के कारखाने को तीर्थ कहना—लाहौल-विला-कुव्वत। कोई अल्पज्ञ ही ऐसी कल्पना कर सकता है? यह मानना होगा कि नाम बदलना सबसे महत्वपूर्ण शासकीय कामों में से एक है। नाम ऐसा होना चाहिए कि सुनते ही कानों में संगीत बज उठे, दिल कहे इलु-इलु! दो शब्दों के संयोजन से निर्मित सेवा तीर्थ, ऐसा ही एक भावोत्तेजक, सुविचारित और कर्णप्रिय नाम है।
और, पीएमओ को सेवा तीर्थ का नाम देना बिल्कुल युक्तियुक्त है, तर्कसंगत है, व्यावहारिक है, समसामयिक है, संस्कारी है और सब पर भारी है। इसमें एक तीर्थ स्थल जैसी तमाम अर्हताएँ पाई जाती हैं। यहाँ न केवल देवों के अधिपति स्वयं विराजमान हैं बल्कि पूरी देव-नगरी मौजूद है। साफ-सफाई, हरे-भरे बगीचे, झरनों जैसे फव्वारे, गर्मी में सर्दी और सर्दी में गर्मी का अहसास—यह सब आप यहाँ महसूस कर सकते हैं।
अब जबकि अमृतकाल आया हुआ है या यूँ कहें कि घनघोर छाया हुआ है, तो इस पुण्य काल में देव, महादेव सब सशरीर सेवा-तीर्थ में मौजूद हैं, अमृत पिया जा रहा है, अमृत पिलाया जा रहा है। ऐसे में दान, पूजा, भेंट, परिक्रमा आदि की व्यवस्था न हो— ऐसा तो सपने में भी सोचा नहीं जा सकता।
रही बात सेवा की तो जिसकी जैसी श्रद्धा वैसी सेवा की जा सकती है। और जैसी होगी सेवा वैसा मिलेगा मेवा। भक्त ध्रुवदास ने सेवा और भक्ति की महिमा कुछ इस प्रकार से समझाई है—‘सेवा अरु तीरथ-भ्रमन, फलतेहि कालहि पाइ। भक्तन-संग छिन एक में, परमभक्ति उपजाइ।’ सेवा तीर्थ के संदर्भ में इस दोहे का भावार्थ यह लिया जा सकता है कि भक्तों की संगति में एक क्षण में ही परमभक्ति के पद पर पहुँचा जा सकता है।
इस नामोत्तेजक वातावरण में कुछ सुझाव निःशुल्क पेश हैं, यथा—पुलिस चौकी का नाम ‘सेवा मठ’, तहसील
कार्यालय का ‘भू-सेवा धाम’, आयकर विभाग का ‘अर्थ अखाड़ा’,
ईडी का ‘वज्रपात पीठ’। संभावनाएँ असीमित हैं—थोड़ा योगदान आप भी दे
सकते हैं।
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 15 फरवरी, 2026
प्रकाशन: व्यंग्य यात्रा (संपादक प्रेम जनमेजय) जनवरी-मार्च 2026

व्यंग्य: फेंको तो लंबा फेंको

इस देश में बड़े-बड़े अर्थशास्त्री पैदा हुए, किताबें लिखी, हार्वर्ड, कैम्ब्रिज, कोलंबिया,
ऑक्सफोर्ड, शिकागो, एम.आई.टी.
जैसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे—लेकिन अफ़सोस, उन्हें यह अर्थसत्य कभी समझ में ही नहीं आया कि बजट एक साल का नहीं,
इक्कीस साल का भी हो सकता है। मनमोहन जी जैसे मंजे हुए अर्थशास्त्री
और रिजर्व बैंक के गवर्नर तो बाकायदा दस साल तक देश के प्रधानमंत्री भी रहे;
पर इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति उन्हें नहीं हुई।
लेकिन पहली बार आज़ाद भारत में ऐसा बजट पेश हुआ है, जो पेश तो 2026 में हुआ है, लेकिन जिसका मिशन वर्ष 2047 है। आलाकमान ने वह कर दिखाया है, जो न नेहरू कर पाए,
न मनमोहन, न योजना आयोग, न नीति आयोग। वैसे यह आलाकमान के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनुकूल ही था;
उनके हर काम में इतिहास की नवसृजना और चकाचौंध छुपी होती है।
हम अल्प बुद्धि लोग बजट को अगले एक वर्ष के वित्तीय
लेखा-जोखा के रूप में देखने के आदी रहे हैं और आय-व्यय, टैक्स, सब्सिडी, छूट, सरकारी योजनाओं
आदि आँकड़ों में ही उलझे रहते हैं। अब तक वित्तमंत्री और अर्थशास्त्री बजट तैयार
करते वक्त गिरते रुपये, बढ़ती महँगाई, घटते
रोज़गार, खेती की बदहाली, औद्योगिक
मंदी, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे सुधारातीत विषयों पर माथापच्ची
करते रहे हैं। नतीजा— न महँगाई कम हुई, न बेरोज़गारी घटी,
न गरीबी दूर हुई। चाहे जितनी सब्सिडी दो, टैक्स
छूट दो, जनता कभी संतुष्ट हुई? तरक़्क़ी
बैलगाड़ी की तरह खिसकती रही—कृपा खजूर की ऊँची टहनी पर अटकी रही।
अब ज़रा सोचिए— क्या बजट जैसे महान दस्तावेज़ के साथ यह
अन्याय नहीं है कि उसके दायरे को महज एक वर्ष तक सीमित कर दिया जाए? इतने विशाल देश के लिए एक
साल की तुच्छ सोच! बड़ा देश है तो सोच भी बड़ी, लंबी और महान
होनी चाहिए। जब तक सोच और लक्ष्य बड़े नहीं होंगे, उपलब्धि
भला कैसे बड़ी हो सकती है?
अब जब इक्कीस वर्षीय बजट आ ही गया है, तो क्यों न इस क्रांतिकारी
सोच को और आगे बढ़ाया जाए? मसलन, जीडीपी।
सालों से घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं, चाबुक घिस
गए हैं— लेकिन जीडीपी है कि चौथे पायदान से ऊपर खिसक ही नहीं रही।
गंभीरता से विचार करना होगा। यह बड़ी सोच का समय है— हमें
तीसरे पायदान और दूसरे पायदान जैसे छोटे लक्ष्य छोड़कर सीधे पहले नंबर पर नज़र गड़ा
देनी चाहिए।
इसमें चौंकने जैसा कुछ नहीं है— यह बहुत कूल-कूल है। मात्र
यह घोषणा करनी है कि वर्ष 2147 में, जब भारत आज़ादी के 200 साल
पूरे करेगा, तब वह विश्व की सबसे बड़ी (नंबर-वन)
अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अख़बारों में फुल पेज साइज, गौरव-गुदी
संकल्प वाले रंगीन विज्ञापन ही तो छपवाने हैं! फिर देखिए—विपक्षियों और विरोधियों
की कैसे वाट लगती है। उनकी रोज़-रोज की घोचेबाज़ी पर विराम लग जाएगा और देश के
लीडरान अपेक्षाकृत अन्य महत्वपूर्ण प्रच्छन्न उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित कर
सकेंगे।
इक्कीस,
पच्चीस या पचास वर्ष जितने दूरगामी लक्ष्य तय करने में कोई जोखिम
नहीं है। और यक़ीन मानिए—एक कॉल पर बालकनी में आकर थाली बजाने वाली जनता, ऐसी महान घोषणा का तो सड़कों पर भांगड़ा, कत्थक,
घूमर और डांडिया से लेकर सपेरा-डांस आदि करते हुए स्वागत करेगी।
वैसे यह बात नहीं है कि आलाकमान ने पहले लंबी अवधि के तीर
नहीं चलाए। चलाए— और खूब चलाए! मसलन वर्ष 2016 में कहा कि 2022 तक किसानों की आय
दुगुनी होगी! खूब वाह-वाही बटोरी गई। लेकिन इस तीर को लक्ष्य भेदने के लिए मात्र
छह साल मिले। बदकिस्मती देखिए—दस साल बीत जाने के बाद भी यह राजधानी की सदाबहार
धुंध में भटक रहा है। इसके अलावा पेट्रोल-डीज़ल के दाम, काले
धन की वापसी, हर भारतवासी के खाते में 15-15 लाख, हर साल दो करोड़ रोज़गार— जैसे अनेक संकल्प
बहुत ही पाक-साफ नीयत से लिये गए थे। चूक बस इतनी हुई कि लक्ष्यावधि कम रखी गई।
वफादार चिंतकचुल्लुओं और ज्ञानी गुरङगुल्लुओं ने इस प्रकार
के आसमान-फाङक, धरती-धकेल
लक्ष्यों की तटस्थ समीक्षा की तो पाया कि दुर्गति की असल वजह, लीडर लोगों द्वारा आगामी चुनाव से पूर्व अपने कर्मों के परिणाम जानने की लालसा
है। चूँकि दो चुनावों के बीच समय अंतराल मात्र पाँच वर्ष का होता है, अत: शाही लक्ष्य-लेखकों के लिए एक मनोवैज्ञानिक दवाब बन जाता है और वे अधिक
दूर तक फेंकने से परहेज करते हैं। लेकिन इस बजट ने इस उहापोह पर ढक्कन लगा दिया है।
बहुत सही किया। अब भला दस-पंद्रह साल, सत्ता में कोई ज़्यादा समय
होता है? 50-60 प्रतिशत समय तो चुनावी रैलियों और जोड़-तोड़
में ही खप जाता है, कम से कम 10 प्रतिशत
विदेशी दौरों में— 15-20 प्रतिशत समय सोने-खाने-जाने-नहाने
के लिए भी तो चाहिए; चाहे बंदा अठारह-अठारह घंटे काम करने
वाला ही क्यों न हो। फिर शेष समय बचा ही कितना!
विकसित भारत के लक्ष्य को बुलडोजर से उठाकर खाली सड़क पर
घसीटते हुए 2047 मील-पत्थर के पास स्थापित पहले ही किया जा चुका था। यह बजट इसी विकसित
भारत के सपनों को कंधा देने आया है। सब कुछ सेट हो जाएगा, लेकिन
आम आदमी को कैसे समझाएं, जैसे ही चुनाव आते हैं— उसके नखरे
शुरु हो जाते हैं। कर्मठ नेताओं को भी हर पाँच वर्ष बाद जनता की अदालत में खङा होना
ही पङता है।
इन्हीं सब तथ्यों की रोशनी में, अब ज़रूरी हो गया है कि देश
में आम चुनावों की अवधि पाँच की जगह बीस वर्ष कर दी जाए। पक्का इलाज!
इस परिकल्पना के पीछे एक और पहलू है। ज़रा सोचिए—एक गरीब
देश में बार-बार चुनावों पर होने वाला खर्च! भाइयों-बहनों, माताओं-बुज़ुर्गों— देश के
कीमती संसाधनों की बर्बादी रुकनी चाहिए कि नहीं? हाँ जी,
हाँ— रुकनी चाहिए! वैसे भी सब जानते हैं—आएगा तो…!
आख़िर एक राजनेता के लिए पाँच साल भी कोई समय होता है? सम्राट अशोक ने 36 वर्ष राज किया, अकबर ने 49 वर्ष—तभी
तो वे कुछ कर पाए और महान कहलाए। इसलिए बिला नागा, भविष्य
में आम चुनावों की अवधि न्यूनतम बीस वर्ष कर देनी चाहिए—सीधे-सीधे 75 प्रतिशत समय, संसाधनों और पैसों की बचत! हींग लगे न
फिटकरी—रंग चोखा आए! 2047 में भारत ‘विकसित’ कैसे नहीं बनेगा— देखते हैं।
संभव है,
इस दिशा में अंदरखाने कार्य ज़ोर-शोर से प्रगति पर हो! एक के बाद एक
राज्यों में ताबड़तोड़ एस.आई.आर. क्या इशारा कर रही हैं? एक
बार सारे राज्य लाइन पर आ जाएँ, फिर कुछ ऐसा बड़ा और अनूठा
किया जा सकता है कि पंचवर्षीय चुनावी झंझट से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए!
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© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 9 फरवरी, 2026
Published in - मासिक व्यंग्य पत्रिका -अट्टाहास मार्च, 2026 . सत्य की मशाल -मार्च, 2026






व्यंग्य: अमृतकाल का विश्वगुरु
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इस वयोवृद्ध शांतिदूत ने अपने दूसरे कार्यकाल में पदार्पण करते ही विश्व-शांति
के लिए दिन-रात एक कर दिया। यह बात जग-जाहिर है। चाहे ग़ज़ा हो, यूक्रेन हो, भारत-पाकिस्तान
हो—दादा डोनाल हर जंग के मैदान में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद थे।
लड़ाई के लिए नहीं—लड़ाई रुकवाने के लिए, भई। उन्होंने
बुढ़ापे, सेहत और शोहरत से समझौता किया—लेकिन विश्व-शांति से
नहीं।
नतीजा—फ़िलिस्तीन अब दादा के सपनों के विकास की राह पर है। सुना है, उसे एक विश्वस्तरीय रिसॉर्ट की भाँति
सजाने-सँवारने के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन किया गया है। भारत-पाक के बीच भड़के
‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विराम लग ही चुका है और पुतिन-ज़ेलेंस्की की उछल-कूद में भी
कमी आई है।
लेकिन दादा की बदकिस्मती! दुनिया बहुत बेरहम है, अहसान-फ़रामोश है। वे क्या माँग रहे थे—फ़क़त नोबेल ही तो!
किसी ने उनकी पीठ नहीं थपथपाई। स्वीडन की नोबेल प्राइज़ कमेटी ने तो शांति-दूत के
महान शांति-कार्यों को जैसे नज़रअंदाज़ करने की क़सम ही खा रखी है।
जबकि देखा जाए तो दादा डोनाल, न केवल युद्ध के ज़रिये शांति स्थापित करने वाले आधुनिक मसीहा हैं,
बल्कि उपेक्षित और तकनीकी रूप से पिछड़े छोटे देशों का भी उद्धार
करने का पवित्र अभियान अमल में ला रहे हैं। वे जानते हैं कि आर्थिक स्वावलंबन के
बिना शांति की कल्पना महज़ एक कोरी कल्पना ही है।
अतएव पूरी दुनिया को ‘एक धरती’, ‘एक राजा’, ‘एक खाजा’ में बदलना होगा। वे मनोयोग से,
विधि-विधान से, राजसूय यज्ञों में—
“मेरी छतरी के नीचे आओ, झूमो-नाचो-गाओ, वरना टैरिफ टॉफी खाओ”— सरीखे तत्काल प्रभावी ट्रम्पंत्र का अखंड जाप करवा रहे हैं।
साथ ही उन्होंने दुनिया के अपेक्षाकृत छोटे देशों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने परिवार, दामाद, पुत्र-पुत्रियों और तमाम सगे-संबंधियों को पूरी ज़िम्मेदारी से काम पर लगा रखा है—
“जाओ, फैल जाओ दुनिया
में। जो कमज़ोर हैं, उनके साथ साझेदारी करो, कंपनियाँ खोलो, बिटकॉइन बेचो, चिप्स
बेचो, होटल बनाओ, ए.आई. प्रोजेक्ट लगाओ,
रियल एस्टेट खड़ा करो… मतलब यह कि उन्हें हर तरह से मज़बूत बनाओ।”
इतिहास में ऐसा परोपकारी सम्राट ईसा-पूर्व तीसरी सदी में या तो अशोक हुआ था, जिसने अपने प्रियजनों को श्रीलंका और अन्य
पूर्वी देशों में भेजकर ‘धम्म’ संदेश फैलाया—या इस सदी में दादा डोनाल, जो ‘धमक’ संदेश फैला रहे हैं।
इसी क्रम में दादा ने एक रोज जब क़तर-शेख को एक बेहतरीन
नुस्खा दिया, तो वे बाग़-बाग़ हो उठे। उपकृत शेख ने
तुरंत क़तर के बेहतरीन किस्म के ऊँट और भेड़ों को कई जहाज़ों में भरकर बतौर तोहफ़ा
अमेरिका भिजवाने की पेशकश कर दी। लेकिन दादा तो दादा! बोले—
“दोस्त, इन लाजवाब प्राणियों को चराने-फिराने के लिए हमारे यहाँ अब खुले चरागाह कहाँ बचे हैं। सारी खाली ज़मीनों पर हम हवाई अड्डे बना चुके हैं, यू नो।”
शेख ने दादा की नेक नियति को फ़ौरन ताड़ लिया, बोले—
“वल्लाह हबीबी! फिर हम आपको कुछ और देती।”
और झट से 3800 करोड़ का लग्ज़री बोइंग जंबो
जेट भेंट कर दिया। अगली कतार में बैठने वाले तथाकथित मज़बूत देशों को क़तर जैसी
मेहमाननवाज़ी सीखने की ज़रूरत है।
अभी यह सब चल ही रहा था कि दादा डोनाल की चिंता में एक और अध्याय जुड़ गया, जब उन्हें पता चला कि ग्रीनलैंड की रणनीतिक
स्थिति, दुर्लभ खनिज, तेल और गैस के
भंडारों पर चीन और रूस जैसे चोट्टों की गिद्ध-दृष्टि लगी है। विश्व-शांति
को सीधा ख़तरा!
लेकिन दादा ठहरे अडिग यौद्धा। उन्होंने अपने एक पुराने दोस्त के मुँह से, एक बार एक आइलैंड पार्टी में सुना था—
“हार नहीं मानूँगा / रार नहीं ठानूँगा / काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ /गीत
नया गाता हूँ…”
तुरंत ऐलान कर दिया—‘ग्रीनलैंड हमारा’। चारों तरफ़ हाय-तौबा मच गई। डेनमार्क
ऐंठने लगा; उसके नाटो मित्र
फुफकारने लगे—इस बार चोट सीधी थी। मोतियाबिंद से ग्रसित इन अमीरज़ादों को दादा की
दूरदर्शिता का ठीक से अंदाज़ा नहीं। नोबेल, यानी विश्व-शांति
के लिए, दादा को दशकों के पक्के मित्रों की नाराज़गी भी मोल
लेनी पड़ रही है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं—एक अकेला सब पर भारी!
याद कीजिए, ऑपरेशन सिंदूर!
भारत-पाक युद्धविराम को लेकर दादा ने एक-दो बार नहीं, पचासों
बार कहा—
‘लड़ाई मैंने रुकवाई, लड़ाई मैंने रुकवाई,
मान लो भाई’,
लेकिन मोदी जी ने एक बार भी हाँ में मुंडी ना हिलाई। कहा तो उन्होंने ‘ना’ भी
नहीं, लेकिन डोनाल के लिए ‘हाँ’ ज़रूरी था—कारण
वही नोबेल!
हम यह मौका चूक गए, जबकि
वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मचाडो इस मामले में होशियार निकलीं। उन्होंने
विश्व-शांति दूत ‘दादा डोनाल’ के असाधारण योगदान को न केवल पहचाना, बल्कि अपना नोबेल उनके श्रीचरणों में समर्पित कर स्वयं को अनुग्रहीत भी कर
लिया। पहली बार दादा को लगा—किसी ने उन्हें ठीक से समझा है।
‘दोनों मुट्ठियों में—तेल, मादुरो गया जेल, लीला तेरी अपरंपार—रचता कैसे-कैसे खेल!’
इस समय हालात बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। दोस्त कब दुश्मन बन जाए, दुश्मन कब दोस्त बन जाए—कुछ पता नहीं। दुनिया के किसी भी देश में वेनेज़ुएला जैसा खेला हो सकता है!
हमारी परेशानी यह है कि दादा को देने के लिए हमारे पास न तो तेल है, न नोबेल जैसा पुरस्कार। ले-दे के टैरिफ
है—सो दिल खोलकर दे ही रहे हैं। माँ कसम, यदि हमारे पास
वेनेज़ुएला का दस फ़ीसद भी तेल होता, तो हम दादा को ‘तेल
देने’ से हरगिज़ न चूकते। तेल के नाम पर हमारे पास केवल मालिश वाला तेल है,
जो ‘माई फ्रेंड डोनाल’, ‘अबकी बार ट्रम्प
सरकार’, ‘नमस्ते ट्रम्प’ जैसे इवेंट्स के समय खूब
रगड़-रगड़कर दादा को लगाया गया था। अब डोनाल दादा ठहरे शौकीन मिज़ाज—पुराने तेल,
पुरानी मित्रता, पुरानी वफ़ादारी से बोर हो
जाते हैं। यू नो, ये दिल माँगे मोर!
वैसे कुछ भी कहो, एक
बात माननी पड़ेगी—दादा जो भी करते हैं, खुला खेल
फ़र्रुख़ाबादी; जो भी कहते हैं, बिना
लाग-लपेट, बिना शर्म-संकोच। बंदे ने बेलौस दिल की भड़ास
खोलकर रख दी—
‘आठ-आठ लड़ाइयाँ रुकवाईं, फिर भी नोबेल नहीं। अब
दुनिया में शांति बनाए रखने की मेरी ज़िम्मेदारी नहीं!’
इन परिस्थितियों में क्या किया जा सकता है? दुनिया को अराजकता, अशांति, रोज़-रोज़
की टैरिफ-ट्रेड वॉर, शेयर मार्केट और सोने-चाँदी के
उतार-चढ़ाव जैसी समस्याओं और तृतीय विश्व युद्ध के आसन्न ख़तरे से कैसे बचाया जाए,
कौन बचाए? एक सौ चालीस करोड़ की आबादी
वाला हिंदुस्तान! दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र! हमारा भी कोई फ़र्ज़ बनता
है कि नहीं?
तो क्यों न कुछ बड़ा किया जाए। वैसे भी हम बड़ा करने के बड़े सिद्धहस्त
खिलाड़ी हैं। तो पेश है विशुद्ध देशी घी में तैयार, एकदम नवीन और मौलिक सुझाव—अमृतकाल विश्व शांति पुरस्कार की
स्थापना! नोबेल से भी बड़ा, एक विश्वस्तरीय शांतिदूत
पुरस्कार। नाम रखा जाए—‘ अमृतकाल विश्वगुरु पुरस्कार’!
न-न! मेरी बात का ग़लत अर्थ मत निकालिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि तथाकथित
‘विश्वगुरु’ हम ही हैं, और
इस बात का चतुर्दिक डंका भी बजता है; लेकिन, सीss… अंदर की बात तो केवल हम ही जानते हैं!
तो यह जो शांति पुरस्कार होगा, वह ‘अमृतकाल स्पेशल’ होगा।
यानी पहला और आख़िरी! और यह ख़िताब, ज़ाहिर है—दादा डोनाल को
गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के साथ दिया जाएगा।
जब दादा-डोनाल यह ख़िताब ग्रहण करेंगे, तो दसों दिशाओं से पुष्प-वर्षा होगी; जल-थल और नभ
में उनकी अखंड कीर्ति और बेजोड़ पराक्रम के जय-जयकार के नारे गूँज उठेंगे। पुतिन,
जिनपिंग, नेतन्याहू, ……… आदि धुरंधर आँखें फाड़े देखते ही रह जाएंगे।
इस ख़िताब को हासिल करने के बाद मुझे यक़ीन है कि नोबेल के लिए दादा की भटकती
आत्मा शांत हो जाएगी और विश्व के ‘अच्छे दिन’ लौट आएंगे। साथ ही दुनिया को यह पता भी
चल जाएगा कि, अमृतकाल के असल ‘विश्वगुरु’ कौन हैं?
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 4 फ़रवरी,
2026
आलेख: वरदान से अभिशाप की ओर वर्ष 1995 की बात है। मैं बैंकिंग सेवा भर्ती बोर्ड, दिल्ली में परिवीक्षाधीन अधिकारी के पद के लिए साक्षात्कार दे...