वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुमार पटवा के
राजस्थान यात्रा वृत्तांत- ‘शौर्य भूमि की सैर’ की प्रस्तावना
‘शौर्य भूमि की सैर’ केवल यात्रा वृत्तांत नहीं अपितु राजस्थान के अतीत से वर्तमान का सिंहावलोकन है।
यह यात्रा-वृत्तांत राजस्थान के पर्यटन स्थलों का मात्र सतही विवरण नहीं, बल्कि इसके दुर्लभ, रोचक और रोमांचक इतिहास एवं अलबेली संस्कृति का संजीदा सिंहावलोकन भी है। लेखक के कथनानुसार, ‘ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि में पर्यटन का आनंद कई गुना बढ़ जाता है।’ पाठक इस पुस्तक के पृष्ठ दर पृष्ठ पलटते हुए इस उक्ति को साकार होते देख सकता है।
एक अनुभवी गाइड और सम्मोहक सूत्रधार की भाँति, लेखक ने राजस्थान के पाँच संभागों के प्रमुख दर्शनीय स्थलों के माध्यम से इसकी आत्मा को समग्रता में छूने का सार्थक उद्यम किया है। विषयवस्तु के विस्तार और गहराई को देखते हुए, यदि इसे ‘शौर्य भूमि का सिंहावलोकन’ कहा जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इस पुस्तक में हम प्रदेश की अनेक विस्मृत जानकारियों से परिचित होते हैं- जैसे, नागौर को ‘जाटों का रोम’ कहा जाता है; बीकानेर का प्राचीन नाम ‘जांगल देश’ था; जयपुर को वर्ष 1876 में वेल्स के राजकुमार के स्वागत हेतु गुलाबी रंग में रंगा गया था। फलौदी का सट्टा बाज़ार चुनावी और मौसमी सट्टों के लिए कुख्यात है। हर साल काकेशिया से हजारों की संख्या में ‘कुरजां’ पक्षी फलौदी के खीचन गाँव में आते हैं। विश्वविख्यात हवा महल में 953 झरोखे हैं। झालावाड़-कोटा इलाके में सड़क किनारे ढाबों पर छह रोटियों के बराबर आकार का एक ‘रोटड़ा’ मिलता है।
यद्यपि किलों, परकोटों और प्राचीन मंदिरों के भित्तिचित्र, हथियार, शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएँ एवं स्थापत्य अपने समय के वास्तविक दस्तावेज माने जा सकते हैं, फिर भी लोकगीतों, किंवदंतियों, जनश्रुतियों और किस्से-कहानियों में निहित लोक मान्यताओं का भी अपना विशिष्ट महत्व है। तथापि, इतिहास की विवेचना करते समय लेखक ने तथ्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अधिक महत्व प्रदान किया है; परिणामस्वरूप यह कृति एक प्रमाणिक शोधग्रंथ के समकक्ष जान पङती है।
राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख मत प्रचलित हैं। पहले मत के अनुसार, वे कुषाण, शक और हूण जैसे विदेशी कबीलों के वंशज हैं; इस मत का समर्थन कर्नल जेम्स टॉड सहित अनेक विद्वानों ने किया है। दूसरे मत में उनका उद्भव भारतीय मूल के सूर्यवंशी और चंद्रवंशी क्षत्रियों से माना गया है। पौराणिक कथाओं पर आधारित तीसरे मत के अनुसार, आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ द्वारा संपन्न यज्ञ के परिणामस्वरूप अग्निकुंड से राजपूतों का प्रादुर्भाव हुआ।
इस वृत्तांत में लेखक ने राजपूतों के सूर्यवंश से जुड़ाव को 19वीं और 20वीं शताब्दी में गढ़ा गया जाति-उत्पत्ति का मिथक माना है, तथा उन्हें किसी जाति विशेष के रूप में नहीं, बल्कि शौर्य, स्वाभिमान और क्षत्रिय गुणों के प्रतीकात्मक ‘ब्रांड’ के रूप में व्याख्यायित किया है।
यात्राओं के अपने नैसर्गिक शौक को पटवा जी बड़े चाव से ‘छापामार पर्यटन’ का नाम देते हैं- न कोई तैयारी, न कोई तामझाम; बस मन हुआ और चल दिए। परिवहन के साधनों में रेलगाड़ी उनकी पहली पसंद है। खाने-पीने और ठहरने के मामले में वे साफ़-सफ़ाई से कभी समझौता नहीं करते, पर सादगी को हमेशा प्राथमिकता देते हैं।
इतिहास और भूगोल की गंभीर गलियों में विचरण करते हुए, लेखक बीच-बीच में हास्य और व्यंग्य की घंटी बजाते रहते हैं-ताकि यात्रा बोझिल न हो। कहीं एक कवि की संवेदनशीलता, कहीं आशिक़-मिज़ाज शायर की नफ़ासत, तो कहीं आध्यात्मिक दर्शन की गहराई का ‘ब्रेक’ लेकर वे पाठक की उत्सुकता को ताज़ा और जीवंत बनाए रखते हैं।
एक जगह वे लिखते हैं- ‘आसमान में बादल है, बादल में बूंदें हैं, बूंदों में आसमान से विछोह का दर्द है, मन दर्द का समंदर है…।’ एक अन्य प्रसंग में तंज कसते हैं कि जिस आदि मानव की रीढ़ सीधी हुई, वह दो पैरों पर चलने लगा, लेकिन मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ नेता अपने आकाओं के सामने, अफसर सत्ता के आगे, और सौहर बीवी के समक्ष- रीढ़ विहीन होकर दोहरे होने लगे। जिन्होंने रीढ़ सीधी रखी, वे इस व्यवस्था में फिट न हो पाए और काबिल होते हुए भी हाशिए पर धकेल दिए गए।
चूँकि लेखक की प्रत्येक यात्रा की शुरुआत भोपाल से होती है, अतः रास्ते में पड़ने वाले मध्यप्रदेश के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के पर्यटन स्थल, यथा- नरसिंहगढ़, उज्जैन, नर्मदा, सिहोर, हनुमंतिया टापू, माधांता पर्वत, आदि-शंकराचार्य, महाकाल, महाकालेश्वर आदि के भ्रमण का मनमोहक विवरण भी पाठक को बोनस स्वरूप प्राप्त हो जाता है।
पंडों, पुजारियों और पुलिस की मिलीभगत से पैसे लेकर अधिक भीड़ वाले मंदिरों में वीआईपी दर्शन कराने के गोरखधंधे पर लेखक ने कुछ इस प्रकार से तंज किया है- ‘जय शंभु और जय श्री राम का हुंकार लगाते इन वोट बैंक सांडों को कोई नियंत्रित नहीं कर सकता। … लोक में भक्ति भाव है, प्रशासन में शक्ति-ताव है, भक्ति दर्शन में मग्न है, शक्ति अर्थ-पूजा में संलग्न है।’
लेखक ने जहाँ-जहाँ भी पड़ाव डाला, वहाँ बड़े धैर्य से रुककर उसके भूगोल और इतिहास को टटोलने की कोशिश की है। सूफ़ी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की कर्मस्थली और दरगाह- ‘अजमेर शरीफ़’, हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लिए श्रद्धा का विश्वविख्यात केंद्र है। अजमेर के पास ही पुष्कर स्थित है, जहाँ विश्व का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है।
हाड़ौती क्षेत्र में ‘झीलों की नगरी’ उदयपुर की विशाल फतहसागर और जयसमंद झीलें तथा माउंट आबू जैसा हिल स्टेशन देखकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि आप मरुभूमि में हैं। बीकानेर से लेकर जैसलमेर तक फैले विस्तृत थार मरुस्थल की अपेक्षाकृत ठहरी हुई शांत जिंदगी, सादा किन्तु कठोर जीवन, ऊँट की विचित्र सवारी और स्थानीय लोकोक्तियों के चुटीले भावार्थ- पाठक को अनायास ही गुदगुदा जाते हैं।
‘शरीर कीजे काठ का, पग कीजे पाषाण। काया बख्तर कीजिये, तब पहुँचे जैसाण।’
यद्यपि यह लोकोक्ति जैसलमेर किले के संदर्भ में प्रचलित हुई थी, किंतु यह प्रदेश के अनेक पहाड़ी किलों- जैसे चित्तौड़गढ़, मेहरानगढ़, आमेर और जयगढ़- पर भी पूर्णतया लागू होती है। इन किलों की पैदल चढ़ाई के बाद आपकी टांगे, इस दोहे के भावार्थ को भली भाँति समझ सकती हैं।
यात्रा-वृत्तांत पढ़ते-पढ़ते पाठक को ऐसा लगेगा मानो वह खुद ऊँचे-नीचे रास्तों पर गाड़ी के झटके खा रहा हो। घने जंगलों से गुजरते हुए, पेड़-पौधों की हरियाली और जीव-जंतुओं की गुपचुप नैसर्गिक हरकतें किसी अदृश्य कैमरे से लाइव प्रसारण की तरह जीवंत हो उठती हैं। सड़क किनारे ढाबों की कढ़ी, दाल और तंदूरी रोटी की ललचाती खुशबू आपको ब्रेक लगाने को मजबूर कर देगी। और हाँ- राजस्थान के शहरी रेस्तराँ में परोसी जाने वाली मशहूर दाल-बाटी-चूरमा… इसे न खाएँ, तो समझिए यात्रा अधूरी रह गई।
मरुभूमि में पानी भले ही एक चिरंतन समस्या हो, लेकिन मेवाड़ के विशाल भूभाग को हरियाली का चोला पहनाने वाली राजस्थान नहर परियोजना- जिसे इंदिरा नहर परियोजना भी कहते हैं- सुदूर ‘हरिके बैराज’ से सतलज और ब्यास की लहरों को अपने संग यहाँ तक खींच लाती है। हनुमानगढ़ से लेकर जैसलमेर तक फैली यह जीवनदायिनी नहर, दस जिलों की प्यास बुझाती है और सूखी ज़मीन पर अन्न, हरी फसलें और उम्मीद के रंग भरती है।
प्रदेश के किलों के निर्माण में राजपूताना और फ़ारसी- दोनों प्रकार की स्थापत्य कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्राचीन इमारतों के झरोखे, मेहराब, दरवाजे, आकर्षक पच्चीकारी और बारीक नक्काशी देखते ही बनती है। प्रायः सभी पर्यटन स्थलों के आसपास राजस्थानी पगड़ी, जूतियां, शृंगार की वस्तुएं, रंग-बिरंगे परिधान और हस्तशिल्प बहुतायत में मिलते हैं। हल्के वजन वाली जयपुर की रजाई अधिकांश पर्यटकों का पसंदीदा उपहार है।
थार मरुस्थल में ताल ठोककर मर्दाना ताकत का दावा करते हुए शिलाजीत बेचते घुमंतू कबिलाई पुरुष, सौ चुन्नट वाले घेरदार लहंगे पर घूमर नृत्य, किले के गलियारों से प्रतिध्वनित ‘केसरिया बालम पधारो म्हारे देश रे…’ की दिलकश अनुगूँज- मन और मस्तिष्क को रस-विभोर कर देती है।
सिसोदिया वंश का गौरव-चित्तौड़गढ़, वीरता, स्वामीभक्ति, देशभक्ति, दानशीलता, बलिदान और शौर्य की अनगिनत अमिट गाथाओं को समेटे, सदियों से सीना ताने खड़ा है। यही वह भूमि है, जहाँ उदयपुर के संस्थापक महाराणा उदयसिंह को पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर हत्यारे बनवीर के हाथों से बचाया था। भक्त शिरोमणि मीरा भी इसी चित्तौड़गढ़ के किले में निवास करती थीं। माना जाता है कि महाराज रतन सिंह के मारे जाने के पश्चात रानी पद्मिनी ने इसी किले में जौहर किया था।
इस दुर्ग का भ्रमण करते समय, स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप, स्वामीभक्ति के प्रतिरूप चेतक, तथा वीरता और वफादारी के प्रतीक जयमल और फत्ता का स्मरण भर आपके हृदय को गर्व से भर देता है।
जयपुर के आमेर की ‘पन्ना मीणा की बावड़ी’ सत्ता हथियाने के धोखे की एक ऐसी मिसाल प्रस्तुत करती है, जिसने तत्कालीन कछवाहा राजपूतों पर कायरता का अमिट दाग लगा दिया। इन्हीं कछवाहों के राजा भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर, शौर्य भूमि के इतिहास में मनसबदारी के समझौता वादी अध्याय की शुरुआत की- जो समय बीतने पर रोटी-बेटी-बोटी के नातों में परिणित हो गया। भले ही इसे उस समय मुगलों के आगे झुकने का एक कूटनीतिक और समसामयिक निर्णय माना गया हो, लेकिन स्वाभिमान की कीमत पर किया गया यह समझौता इतिहास की वस्तुनिष्ठ कसौटी पर कभी सराहा नहीं जाएगा।
राजनैतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, किंवदंतियों और पौराणिक कथाओं के रोचक संदर्भों सहित, स्थान-विशेष की धार्मिक मान्यताओं को भी हम इस वृत्तांत में अत्यंत सरल और भावपूर्ण अंदाज़ में जान सकते हैं। नाथद्वारा, पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। भक्ति के इस मार्ग की व्याख्या हमें तनुजा सेवा, वित्तजा सेवा, मानसी सेवा, सृष्टि की उत्पत्ति, रहस्य, आत्मकृति, वैकुण्ठ, प्रेम, आसक्ति, व्यसन और ब्रह्म के आनन्दांश और चैतन्यांश तक ले जाती है। लेखक ने आगे चलकर इस मार्ग के तीन प्रकारों तथा मोक्ष तक के गूढ़ दर्शन को सरल परंतु अर्थपूर्ण शब्दों में निरूपित किया गया है।
शौर्य-भूमि पर कभी कबीलों का, कभी राजपूतों का, कभी मुगलों का और कभी अंग्रेजों का शासन रहा। भील और मीणा जैसी जनजातियों के भी यहाँ कभी समृद्ध साम्राज्य फले-फूले। ये दुर्ग, किले और महल- इनकी सीलन भरी कोठरियों में न जाने कितनी अनकही-अनसुनी कहानियाँ दफन हैं।
पाषाण की इन दीवारों ने इतिहास के सुनहरे क्षणों, बदलते-बिगड़ते राजवंशों, पायल की रुनझुन, ढोल-मृदंग की थाप और शहनाई व सारंगी की मधुर धुन पर थिरकती बालाओं के घूमर नृत्यों से लेकर खनकती तलवारों, दरबारी षड्यंत्र, न्याय और पराक्रम, विश्वास और विश्वासघात, रक्तपात, दया-धर्म और दमन- सब कुछ अपनी आँखों से देखा है। विलासिता में डूबे कायर सम्राटों से लेकर अदम्य साहस के धनी योद्धाओं के शौर्य प्रदर्शन, आत्मसम्मान की रक्षा में हुए सामूहिक जौहर, और राजनैतिक कैदियों की हृदय-विदारक चीखों- इन सबकी मूक साक्षी रही हैं ये दीवारें। ज़र, ज़ोरू और ज़मीन के लिए इंसान ने क्या-क्या नहीं किया!
लेखक के लिए यात्राएँ महज़ स्थलों का अवलोकन भर नहीं, बल्कि ‘मन के भीतर की यात्रा’ है- धर कूंचां धर मंजळां। कुल मिलाकर ‘शौर्य भूमि की सैर’ तटस्थ, विश्लेषणात्मक और भावनात्मक दृष्टिकोण से राजस्थान के इतिहास, संस्कृति और दर्शन का एक पठनीय एवं संग्रहणीय आख्यान है।
मुझे विश्वास है कि साहित्य जगत इस महत्वपूर्ण यात्रा वृत्तांत का खुले दिल से स्वागत करेगा।
दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 302026
दिनांक: 11.08.2025
शौर्य भूमि की सैर : राजस्थान यात्रा-वृत्तांत
लेखक : श्री सुरेश पटवा (भोपाल)
(facebook post DR Verma) 21.01.2026
सर्वत्र प्रकाशक, भोपाल द्वारा प्रकाशित ‘शौर्य भूमि की सैर’ आज प्राप्त हुई। पुस्तक का आवरण न केवल आकर्षक है, बल्कि उसकी अंतर्वस्तु और आत्मा के पूर्णतः अनुरूप भी है। मुद्रण की गुणवत्ता उत्कृष्ट है, जो प्रकाशक की संवेदनशीलता और पेशेवर प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।
पुस्तक के लेखक, भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवा-निवृत्त, यायावर स्वभाव के श्री सुरेश पटवा जी वरिष्ठ साहित्यकार, शायर एवं कवि हैं। इस पुस्तक में आपने समय-समय पर संपन्न अपनी राजस्थान की यात्राओं के अनुभवों को रोचक एवं सधे हुए शब्दशिल्प में रूपायित किया है। श्री पटवा जी - नर्मदा, स्त्री-पुरुष, हिंदू प्रतिरोध गाथा, हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग, तलवार की धार, पलकगाथा, सगरमाथा से समुंदर तक, प्रेमार्थ सहित 27 चर्चित पुस्तकों के सृजक हैं।
मुझ अकिंचन को आपने इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखने का दायित्व सौंपा—यह उनका बड़प्पन और स्नेह ही है। इस बहाने मुझे भी पांडुलिपि के सहारे राजस्थान को लेखकीय दृष्टि से महसूस करने का सुअवसर मिला। इतिहास के झरोखों से किसी भू-भाग को देखने, परखने और समझने के इच्छुक साहित्य प्रेमियों, पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए यह कृति निश्चय ही पठनीय और संग्रहणीय है—ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
पुस्तक सर्वत्र, द्वितीय तल, उषाप्रीत कॉम्प्लेक्स, 42–मालवीय नगर, भोपाल–462003 से प्राप्त की जा सकती है। शीघ्र ही यह अमेजन, फ्लिपकॉर्ट जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध होगी।
सादर: दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21.01.2026