व्यंग्य: अमृतकाल का विश्वगुरु
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इस वयोवृद्ध शांतिदूत ने अपने दूसरे कार्यकाल में पदार्पण करते ही विश्व-शांति
के लिए दिन-रात एक कर दिया। यह बात जग-जाहिर है। चाहे ग़ज़ा हो, यूक्रेन हो, भारत-पाकिस्तान
हो—दादा डोनाल हर जंग के मैदान में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद थे।
लड़ाई के लिए नहीं—लड़ाई रुकवाने के लिए, भई। उन्होंने
बुढ़ापे, सेहत और शोहरत से समझौता किया—लेकिन विश्व-शांति से
नहीं।
नतीजा—फ़िलिस्तीन अब दादा के सपनों के विकास की राह पर है। सुना है, उसे एक विश्वस्तरीय रिसॉर्ट की भाँति
सजाने-सँवारने के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन किया गया है। भारत-पाक के बीच भड़के
‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विराम लग ही चुका है और पुतिन-ज़ेलेंस्की की उछल-कूद में भी
कमी आई है।
लेकिन दादा की बदकिस्मती! दुनिया बहुत बेरहम है, अहसान-फ़रामोश है। वे क्या माँग रहे थे—फ़क़त नोबेल ही तो!
किसी ने उनकी पीठ नहीं थपथपाई। स्वीडन की नोबेल प्राइज़ कमेटी ने तो शांति-दूत के
महान शांति-कार्यों को जैसे नज़रअंदाज़ करने की क़सम ही खा रखी है।
जबकि देखा जाए तो दादा डोनाल, न केवल युद्ध के ज़रिये शांति स्थापित करने वाले आधुनिक मसीहा हैं,
बल्कि उपेक्षित और तकनीकी रूप से पिछड़े छोटे देशों का भी उद्धार
करने का पवित्र अभियान अमल में ला रहे हैं। वे जानते हैं कि आर्थिक स्वावलंबन के
बिना शांति की कल्पना महज़ एक कोरी कल्पना ही है।
अतएव पूरी दुनिया को ‘एक धरती’, ‘एक राजा’, ‘एक खाजा’ में बदलना होगा। वे मनोयोग से,
विधि-विधान से, राजसूय यज्ञों में—
“मेरी छतरी के नीचे आओ, झूमो-नाचो-गाओ, वरना टैरिफ टॉफी खाओ”— सरीखे तत्काल प्रभावी ट्रम्पंत्र का अखंड जाप करवा रहे हैं।
साथ ही उन्होंने दुनिया के अपेक्षाकृत छोटे देशों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने परिवार, दामाद, पुत्र-पुत्रियों और तमाम सगे-संबंधियों को पूरी ज़िम्मेदारी से काम पर लगा रखा है—
“जाओ, फैल जाओ दुनिया
में। जो कमज़ोर हैं, उनके साथ साझेदारी करो, कंपनियाँ खोलो, बिटकॉइन बेचो, चिप्स
बेचो, होटल बनाओ, ए.आई. प्रोजेक्ट लगाओ,
रियल एस्टेट खड़ा करो… मतलब यह कि उन्हें हर तरह से मज़बूत बनाओ।”
इतिहास में ऐसा परोपकारी सम्राट ईसा-पूर्व तीसरी सदी में या तो अशोक हुआ था, जिसने अपने प्रियजनों को श्रीलंका और अन्य
पूर्वी देशों में भेजकर ‘धम्म’ संदेश फैलाया—या इस सदी में दादा डोनाल, जो ‘धमक’ संदेश फैला रहे हैं।
इसी क्रम में दादा ने एक रोज जब क़तर-शेख को एक बेहतरीन
नुस्खा दिया, तो वे बाग़-बाग़ हो उठे। उपकृत शेख ने
तुरंत क़तर के बेहतरीन किस्म के ऊँट और भेड़ों को कई जहाज़ों में भरकर बतौर तोहफ़ा
अमेरिका भिजवाने की पेशकश कर दी। लेकिन दादा तो दादा! बोले—
“दोस्त, इन लाजवाब प्राणियों को चराने-फिराने के लिए हमारे यहाँ अब खुले चरागाह कहाँ बचे हैं। सारी खाली ज़मीनों पर हम हवाई अड्डे बना चुके हैं, यू नो।”
शेख ने दादा की नेक नियति को फ़ौरन ताड़ लिया, बोले—
“वल्लाह हबीबी! फिर हम आपको कुछ और देती।”
और झट से 3800 करोड़ का लग्ज़री बोइंग जंबो
जेट भेंट कर दिया। अगली कतार में बैठने वाले तथाकथित मज़बूत देशों को क़तर जैसी
मेहमाननवाज़ी सीखने की ज़रूरत है।
अभी यह सब चल ही रहा था कि दादा डोनाल की चिंता में एक और अध्याय जुड़ गया, जब उन्हें पता चला कि ग्रीनलैंड की रणनीतिक
स्थिति, दुर्लभ खनिज, तेल और गैस के
भंडारों पर चीन और रूस जैसे चोट्टों की गिद्ध-दृष्टि लगी है। विश्व-शांति
को सीधा ख़तरा!
लेकिन दादा ठहरे अडिग यौद्धा। उन्होंने अपने एक पुराने दोस्त के मुँह से, एक बार एक आइलैंड पार्टी में सुना था—
“हार नहीं मानूँगा / रार नहीं ठानूँगा / काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ /गीत
नया गाता हूँ…”
तुरंत ऐलान कर दिया—‘ग्रीनलैंड हमारा’। चारों तरफ़ हाय-तौबा मच गई। डेनमार्क
ऐंठने लगा; उसके नाटो मित्र
फुफकारने लगे—इस बार चोट सीधी थी। मोतियाबिंद से ग्रसित इन अमीरज़ादों को दादा की
दूरदर्शिता का ठीक से अंदाज़ा नहीं। नोबेल, यानी विश्व-शांति
के लिए, दादा को दशकों के पक्के मित्रों की नाराज़गी भी मोल
लेनी पड़ रही है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं—एक अकेला सब पर भारी!
याद कीजिए, ऑपरेशन सिंदूर!
भारत-पाक युद्धविराम को लेकर दादा ने एक-दो बार नहीं, पचासों
बार कहा—
‘लड़ाई मैंने रुकवाई, लड़ाई मैंने रुकवाई,
मान लो भाई’,
लेकिन मोदी जी ने एक बार भी हाँ में मुंडी ना हिलाई। कहा तो उन्होंने ‘ना’ भी
नहीं, लेकिन डोनाल के लिए ‘हाँ’ ज़रूरी था—कारण
वही नोबेल!
हम यह मौका चूक गए, जबकि
वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मचाडो इस मामले में होशियार निकलीं। उन्होंने
विश्व-शांति दूत ‘दादा डोनाल’ के असाधारण योगदान को न केवल पहचाना, बल्कि अपना नोबेल उनके श्रीचरणों में समर्पित कर स्वयं को अनुग्रहीत भी कर
लिया। पहली बार दादा को लगा—किसी ने उन्हें ठीक से समझा है।
‘दोनों मुट्ठियों में—तेल, मादुरो गया जेल, लीला तेरी अपरंपार—रचता कैसे-कैसे खेल!’
इस समय हालात बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। दोस्त कब दुश्मन बन जाए, दुश्मन कब दोस्त बन जाए—कुछ पता नहीं। दुनिया के किसी भी देश में वेनेज़ुएला जैसा खेला हो सकता है!
हमारी परेशानी यह है कि दादा को देने के लिए हमारे पास न तो तेल है, न नोबेल जैसा पुरस्कार। ले-दे के टैरिफ
है—सो दिल खोलकर दे ही रहे हैं। माँ कसम, यदि हमारे पास
वेनेज़ुएला का दस फ़ीसद भी तेल होता, तो हम दादा को ‘तेल
देने’ से हरगिज़ न चूकते। तेल के नाम पर हमारे पास केवल मालिश वाला तेल है,
जो ‘माई फ्रेंड डोनाल’, ‘अबकी बार ट्रम्प
सरकार’, ‘नमस्ते ट्रम्प’ जैसे इवेंट्स के समय खूब
रगड़-रगड़कर दादा को लगाया गया था। अब डोनाल दादा ठहरे शौकीन मिज़ाज—पुराने तेल,
पुरानी मित्रता, पुरानी वफ़ादारी से बोर हो
जाते हैं। यू नो, ये दिल माँगे मोर!
वैसे कुछ भी कहो, एक
बात माननी पड़ेगी—दादा जो भी करते हैं, खुला खेल
फ़र्रुख़ाबादी; जो भी कहते हैं, बिना
लाग-लपेट, बिना शर्म-संकोच। बंदे ने बेलौस दिल की भड़ास
खोलकर रख दी—
‘आठ-आठ लड़ाइयाँ रुकवाईं, फिर भी नोबेल नहीं। अब
दुनिया में शांति बनाए रखने की मेरी ज़िम्मेदारी नहीं!’
इन परिस्थितियों में क्या किया जा सकता है? दुनिया को अराजकता, अशांति, रोज़-रोज़
की टैरिफ-ट्रेड वॉर, शेयर मार्केट और सोने-चाँदी के
उतार-चढ़ाव जैसी समस्याओं और तृतीय विश्व युद्ध के आसन्न ख़तरे से कैसे बचाया जाए,
कौन बचाए? एक सौ चालीस करोड़ की आबादी
वाला हिंदुस्तान! दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र! हमारा भी कोई फ़र्ज़ बनता
है कि नहीं?
तो क्यों न कुछ बड़ा किया जाए। वैसे भी हम बड़ा करने के बड़े सिद्धहस्त
खिलाड़ी हैं। तो पेश है विशुद्ध देशी घी में तैयार, एकदम नवीन और मौलिक सुझाव—अमृतकाल विश्व शांति पुरस्कार की
स्थापना! नोबेल से भी बड़ा, एक विश्वस्तरीय शांतिदूत
पुरस्कार। नाम रखा जाए—‘ अमृतकाल विश्वगुरु पुरस्कार’!
न-न! मेरी बात का ग़लत अर्थ मत निकालिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि तथाकथित
‘विश्वगुरु’ हम ही हैं, और
इस बात का चतुर्दिक डंका भी बजता है; लेकिन, सीss… अंदर की बात तो केवल हम ही जानते हैं!
तो यह जो शांति पुरस्कार होगा, वह ‘अमृतकाल स्पेशल’ होगा।
यानी पहला और आख़िरी! और यह ख़िताब, ज़ाहिर है—दादा डोनाल को
गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के साथ दिया जाएगा।
जब दादा-डोनाल यह ख़िताब ग्रहण करेंगे, तो दसों दिशाओं से पुष्प-वर्षा होगी; जल-थल और नभ
में उनकी अखंड कीर्ति और बेजोड़ पराक्रम के जय-जयकार के नारे गूँज उठेंगे। पुतिन,
जिनपिंग, नेतन्याहू, ……… आदि धुरंधर आँखें फाड़े देखते ही रह जाएंगे।
इस ख़िताब को हासिल करने के बाद मुझे यक़ीन है कि नोबेल के लिए दादा की भटकती
आत्मा शांत हो जाएगी और विश्व के ‘अच्छे दिन’ लौट आएंगे। साथ ही दुनिया को यह पता भी
चल जाएगा कि, अमृतकाल के असल ‘विश्वगुरु’ कौन हैं?
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 4 फ़रवरी,
2026

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