चिंग-तम अमत्तनि (कविता संग्रह)
नोशन प्रेस चेन्नई प्लेटफार्म पर निर्मित
प्रकाशन की तिथी: 26 अगस्त, 2026




लोकार्पण समारोह दिनांक 12.10.2026




बाएं से -साकार श्रीवास्तव, प्रेमचंद गांधी, प्रेमकृष्ण शर्मा, फारूक आफरीदी, नंद भारद्वाज, दयाराम वर्मा, उमा, कमल मेहता  



दयाराम वर्मा

चेतना शर्मा

फ़ारूक आफ़रीदी, नंद भारद्वाज, लेखक एवं मुखर कविता डायस पर चेतना शर्मा



नंद भारद्वाज, दयाराम वर्मा, उमा, कमल मेहता







बाएं से, दयाराम वर्मा, प्रेमकृष्ण शर्मा, फ़ारूक आफ़रीदी, नंद भारद्वाज और डायस पर मुखर कविता

















बाएं से कांता वर्मा, निर्मला वर्मा, दयाराम वर्मा

मुखर कविता, निर्मला एवं दयाराम वर्मा



प्रेस विज्ञप्ति: श्री साकार श्रीवास्तव, साहित्य प्रभारी राही सहयोग संस्थान, अध्यक्ष अमराई  

कल राजस्थान समग्र सेवा संस्था के शारदा पुस्तकालय सभागार में आयोजित गरिमामय कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार दयाराम वर्मा के काव्य-संग्रह ‘चिंग तम अमत्तनि’ के लोकार्पण का हिस्सा होने का सुअवसर मिला। लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज, प्रेमकृष्ण शर्मा, फ़ारुख़ अफ़रीदी, प्रेमचंद गाँधी, दयाराम वर्मा, उमा, कमल मेहता व मुझ अकिंचन द्वारा सम्पन्न हुआ।

मणिपुरी नारा ‘चिंग तम अमत्तनि’, जिसका अर्थ है कि “मणिपुर घाटियों और पहाड़ियों से मिलकर बना है; उसके ये दोनों भू-भाग कभी अलग नहीं हुए”, इसकी एकता को दर्शाता है। पुस्तक का शीर्षक इसी एकता का प्रतीक है।
इस अवसर पर पुस्तक में से कुछ कविताओं का वाचन किया गया। वसुंधरा मंच से जुड़ी युवा कवयित्री चेतना शर्मा ने ‘अनेक थे एक थे’, नारी चेतना की मुखर आवाज़ कवयित्री अनुपमा तिवारी ने ‘प्यारे रफ़ूगर’, कथाकार और ‘ओ री चिरैया’ बालगीत के लिए जाने जाने वाले महेश कुमार ने ‘बच्चे, मेरे प्यारे बच्चे सुन’ और कवयित्री, गायिका एवं संगीतकार अजंता देव ने पुस्तक की शीर्षक कविता ‘चिंग तम अमत्तनि’ सुनाई। विचारशीलता और प्रतिरोध के स्वर लिए कविताएँ सुनकर सभागार वाह-वाह कर उठा।

समीक्षा-सत्र में पत्रकार और कवयित्री उमा ने कहा कि संग्रह की हर कविता अनूठी है और वर्तमान की ज़रूरत है। वहीं, प्रो. कमल मेहता ने कहा कि प्रकृति में आपस में दर्द का रिश्ता होता है और ये कविताएँ उसी का बखान करती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेमचंद गाँधी ने अपने वक्तव्य में इन्हें साहसी कवि की कविताएँ कहा। पूर्व प्रशासक एवं साहित्यकार हरिराम मीणा ने पुस्तक के शीर्षक को एकता का नारा बताते हुए कहा कि विचार के बिना कविता नहीं होती और जब दमित भावनाएँ ज्वालामुखी की तरह प्रकट होती हैं, तो वे प्रतिरोध के स्वर में होती हैं।

संस्था की अध्यक्ष एवं कार्यक्रम की संयोजक कविता मुखर ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए बताया कि इस पुस्तक पर देश के विभिन्न हिस्सों से पाठकीय प्रतिक्रियाएँ आईं। इनके पाठ का अवसर भी मुझे तथा कथाकार नरेंद्र लाटा को मिला।कविता मुखर ने यह भी सूचित किया कि सात समंदर पार बैठे संस्था के निदेशक प्रबोध गोविल ने इस कार्यक्रम की लिए शुभकामनाएँ भेजी हैं।

चर्चित पुस्तक के कवि दयाराम वर्मा ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया बताते हुए कहा कि अपने आरंभिक जीवन, सेवाकाल में भारतीय वायु सेना व बैंकिंग सेवा तथा पर्यटन के दौरान हुए अनुभवों के साथ देश-काल की परिस्थितियों ने उन्हें उद्वेलित किया, जिसका परिणाम यह काव्य-संग्रह है।

वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज ने कहा कि प्रकृति, मणिपुर और देश की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में एक जागरूक नागरिक की पीड़ा को दयाराम जी ने कवि के रूप में बख़ूबी व्यक्त किया है। ये कविताएँ अपने समय की विद्रूपताएँ और अन्याय के विरुद्ध निर्भीक प्रतिरोध का स्वर बनकर उभरी हैं। व्यंग्यकार फ़ारुख़ अफ़रीदी ने उन्हें सशक्त और जागरूक कवि बताते हुए इन कविताओं पर और भी चर्चा किए जाने की आवश्यकता बताई।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहर के जाने-माने पत्रकार एवं साहित्यकार विनोद भारद्वाज, राजेंद्र बोड़ा, अशोक मुखर्जी, मणिमाला शर्मा, ज्योत्सना सक्सेना, डॉ. सुषमा शर्मा, शिवराज पाल सिंह, ओमेन्द्र, अरुण ठाकर आदि ने भाग लिया। अनेक शोधार्थी व विद्यार्थीगण भी उपस्थित रहे।

यह कार्यक्रम लबमे समय तक राही सहयोग संस्थान के चुनिंदा यादगार कार्यक्रमों में याद किया जाएगा।



श्री प्रेमकृष्ण शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार


आज श्री दयाराम वर्मा के कविता संग्रह चिंग तम अमत्तनि के लोकार्पण के अवसर पर आमंत्रित किया गया। इसके लिए संयोजकों का हार्दिक आभार। कविता संग्रह पढ़ने के बाद अभीभूत हो जाना स्वाभाविक था।इन कविताओं के मूल में मानवता है और आज जिस प्रकार मानवता का सत्ता द्वारा हनन किया जा रहा है उस पर गहरे दुख , चिंता, निराशा, व्यंग्य के साथ क्रोध भी है और उसका समूल नाश करने की प्रबल आकांक्षा भी है। कविताएं पढ़ते हुए मानस कवि के साथ एकाकार हो जाता है।


मो. फारूक आफरीदी, वरिष्ठ साहित्यकार 


समय के सच को साहित्य में दर्ज करना और प्रतिरोध की आवाज़ को मुखरता देना रचनाकार की सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचायक है। आपकी इस कृति पर वरिष्ठ साहित्यकारों एवं विद्वानों का विचार-विमर्श निश्चित ही इसकी साहित्यिक संभावनाओं को पाठकों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। आशा है, यह संग्रह समकालीन यथार्थ से सार्थक संवाद स्थापित करते हुए पाठकों को विचार और संवेदना के नए धरातल प्रदान करेगा।



प्रतिरोध की कविताएं: वरिष्ट पत्रकार श्री राजेंद्र बोरा


लेखक अपने आत्मकथ्य में ही कह देता है कि वह तटस्थ नहीं है और यह तय कर चुका है कि उसे किस तरफ खड़ा होना है। उसकी कविताएं उसी की तरफदारी करती हैं, जिस तरफ वह खड़ा है।

पुस्तक की प्रस्तावना में डॉ. दीप्ति गुप्ता कहती है कि इस संग्रह की कविताएं कवि के भीतर की बेचैनी, प्रश्न और आत्मसंवाद को व्यक्त करती हैं। वे यह भी कहती हैं कि किसी कवि की पहचान उसकी भाषा नहीं,उसकी संवेदना होती है।

बेबाक़ बोल एस.पी.सिंह, अम्बाला, हरियाणा

समय के सच को साहित्य में दर्ज करना और प्रतिरोध की आवाज़ को मुखरता देना रचनाकार की सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचायक है। आपकी इस कृति पर वरिष्ठ साहित्यकारों एवं विद्वानों का विचार-विमर्श निश्चित ही इसकी साहित्यिक संभावनाओं को पाठकों तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। आशा है, यह संग्रह समकालीन यथार्थ से सार्थक संवाद स्थापित करते हुए पाठकों को विचार और संवेदना के नए धरातल प्रदान करेगा।


लोकार्पण के अवसर पर प्राप्त चुनिंदा प्रतिक्रियाएँ और बधाई संदेश

(1) डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय, अध्यापक हिंदी विभाग डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर (मध्यप्रदेश) और संपादक, त्रैमासिक साहित्य सरस्वती (सागर) से प्राप्त सारगर्भित समीक्षा:

चिंग -तम अमत्तनि , एक बेहतरीन ओजस्वी, भावपूर्ण, सार्थक और प्रासंगिक काव्य संग्रह है। दयाराम वर्मा की कलम समय की नब्ज पर हाथ रखती है। अक्सर राष्ट्र ,राज्य,समाज या मनुष्य अपने जिन मूल्यों,उद्देश्यों, दृष्टि और उद्देश्य तक पहुंचने वाले चयनित पथों के वैशिष्ट्य के लिए जाने जाते हैं , जिस वजह से अपनी पहचान बनाते हैं, उन मूल्यों को महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की दौड़ में, सफलताओं के मद में भूल जाते हैं, विस्मृति के अंधकार में खोने लगते हैं और विकृतियों की ढलान पर नीचे फिसलने लगते हैं। ऐसे में इन्हें बचाने और वापस मूल्यवान बनाने का दायित्व साहित्य उठाता है।


मणिपुर का यह शीर्षक उद्घोष प्रभावित करता है। पिछले कवर पर उद्घोष वाक्य का अर्थ पढ़कर दयाराम वर्मा जी की सराहना किए बिना नहीं रह सकते - ' कविता का यह उद्घोष केवल मणिपुर का भूगोल नहीं, बल्कि मनुष्य की उस सनातन आकांक्षा का प्रतीक है जो विभाजन नहीं, सह अस्तित्व, वैमनस्य नहीं,आत्मीयता,और वर्चस्व नहीं, साझी मनुष्यता में विश्वास करती है। संभवतः इसी विश्वास का नाम चिंग - तम अमत्तनि है कि - पहाड़ और घाटियां मत और मतांतर, मनुष्य और मनुष्य अंततः अलग नहीं हैं इन्हें अलग करने का प्रत्येक प्रयास प्रकृति और इतिहास दोनों के विरुद्ध है’ । जो बात मणिपुर के लिए याद रखने वाली ज्वलंत उक्ति है वह पूरे भारतीय गणतंत्र के गुलदस्ते पर भी लागू होती है। भारत भी नदी पहाड़ घाटियों और समुद्रों से घिरा भू भाग है जो एक दूसरे से कभी अलग नहीं होंगे।

दयाराम वर्मा श्रेष्ठ चिकित्सक की तरह समाज के हर पक्ष का पोस्टमार्टम करते हैं और आवश्यक औषधि का सुझाव देते हैं। वर्मा जी के साहित्य में चाहे वह काव्य हो या गद्य परिष्कृत भाषा, शैली वैविध्य, सुगठित वाक्य विन्यास के साथ प्रवाहित भाव व्यंजना बेहद मर्मस्पर्शी हो उठती है। मनुष्य के जीवन से ओर-छोर परिचित वर्मा जी मनुष्य को गहराई और गंभीरता से पढ़ने में कुशल हैं। वे आवश्यक मुद्दों को गंभीरता और शालीनता से प्रकाशित करते हैं। इस संग्रह की अनेक कविताएं मन पर गहरी छाप छोड़ती हैं।

उन्होंने विस्मृत हो रहे मूल्यों को अपनी कविताओं के माध्यम से याद दिलाने का पुण्य कार्य कर साहित्य के अर्थ को सार्थक किया है। दयाराम वर्मा का यह काव्य संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है यह उनके संवेदनशील और परदुखकातर श्रेष्ठ साहित्यकार होने की पुष्टि करता है। आपकी लेखनी और आप दीर्घायु और यशस्वी हों ऐसी कामना है।

(2) कपिल शास्त्री – संपादक ‘सत्य की मशाल’ मासिक साहित्यिक पत्रिका-भोपाल ने संग्रह की कुछ कविताओं के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया इस प्रकार से व्यक्त की है:

ऐसे समय में, जब धर्मांधता अपने चरम पर है और अंधभक्ति हर विरोध को कुचल रही है, आपकी कलम निर्भीकता से विद्रोह कर रही है; भ्रष्ट व्यवस्था, तानाशाही और अन्याय से प्रश्न कर रही है। जहाँ प्रश्न करना ही राष्ट्रद्रोह हो गया है, ऐसे समय में आपकी कलम इस अन्याय और इस अघोषित आपातकाल का विरोध कर रही है। हाल ही में पढ़ी आपकी कविता ‘दिमागी नक्सल’ में आपका यह विद्रोह बहुत खूब व्यक्त हुआ है। एक ईमानदार कवि की यही पहचान है कि वह सत्ता की चाटुकारिता की राह को त्यागकर पीड़ित मानवता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करे। आशा करता हूँ कि आपका यह कविता-संग्रह जनता में जागरूकता का नया संचार करेगा और गलत को गलत कहने की शक्ति प्रदान करेगा।”

(3) जय कार्की, वैज्ञानिक एवं कलाकार काठमांडू, नेपाल ने कविता दिमागी नक्सल को पास्टर (मार्टिन) नीमोलर की कविता जैसी एक शानदार कविता बताया और कहा कि नाजीवादी चरित्र ऐसा ही होता है।”

(4) भोपाल से वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण अर्णव खरे, चिंग-तम अमत्तनि की कविताओं को प्रतिरोध, प्रेम और सह-अस्तित्व की कविताएँ करार देते हुए लिखते हैं:

दयाराम वर्मा को मैं संवेदना और सरोकारों का रचनाकार मानता हूँ। पिछले दिनों भोपाल से प्रकाशित साहित्यिक मासिक ‘सत्य की मशाल’ में उनकी तीन कविताएँ - ‘उठो और भरो हुंकार’, ‘धत तेरे की’ और ‘दिमागी नक्सल’ पढ़ने को मिलीं। ये कविताएँ समकालीन सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर तीखे व्यंग्य और निर्भीक अभिव्यक्ति का सशक्त उदाहरण हैं।

….. अभी मुझे इस संग्रह की कुछ ही कविताएँ पढ़ने का अवसर मिला है, इसलिए इसके समग्र मूल्यांकन का दावा करना उचित नहीं होगा। फिर भी, पढ़ी गई रचनाएँ समय के यथार्थ से रूबरू कराते हुए पाठक की संवेदना को झकझोरती हैं। वे मानवीय मूल्यों के क्षरण और सामाजिक विखंडन की पीड़ा को स्वर देती हैं, लेकिन इन विसंगतियों के बीच भी कवि मनुष्यता से अपनी उम्मीद नहीं खोता।

(5) वरिष्ठ समालोचक एवं साहित्यकार मधुर कुलश्रेष्ठ (गुना-मध्यप्रदेश) ने कविता संग्रह पर अपनी समीक्षा में लिखते हैं:

प्रख्यात गद्यकार दयाराम वर्मा जी का कविता संग्रह हाथ में आते ही सुखद आश्चर्य से भर गया कि मात्र एक उपन्यास व एक यात्रा वृत्तांत से ही साहित्य जगत में स्थापित साहित्यकार का तमगा हासिल करने वाले वर्मा जी की कविताएँ भी निश्चित ही स्तरीय होंगी। पहले-पहल कविता संग्रह का नाम ‘चिंग-तम अमत्तनि’ अटपटा-सा लगा, लेकिन जब पृष्ठ भाग पर नजर पड़ी तो पता चला, यह मणिपुर का एक प्रसिद्ध उद्घोष है, जिसका अर्थ है, “पहाड़ और घाटी एक हैं।” समकालीन समाज में विभाजन के समय में दयाराम वर्मा जी के काव्य संग्रह का शीर्षक दरअसल एक लेखक व कवि की समाज को जोड़ने की नैतिक जिम्मेदारी को पूरा करता हुआ, सटीक प्रतीत होता है, क्योंकि न केवल मणिपुर बल्कि किसी भी समाज में विभिन्न समुदायों के बीच एकता, पारस्परिकता और साझा अस्तित्व की कल्पना दयाराम वर्मा जी जैसा संवेदनशील रचनाकार ही कर सकता है। एक तरह से इस शीर्षक या उद्घोष ‘चिंग-तम अमत्तनि’ ने भारतीय दर्शन की भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को ही विस्तारित किया है।

वास्तविकता में देखा जाए तो वर्तमान समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, एक ओर जहाँ सूचनाओं की भयंकर बम्बार्डिंग हो रही है, दूसरी ओर कृत्रिम मेधा तहलका मचाए हुए है, तो कहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरे लग रहे हैं। सारे हालात मनुष्य की बुद्धि और विवेक पर प्रहार कर उसे निरंतर क्षरित करने में लगे हुए हैं। ऐसे खतरनाक दौर, जहाँ मानव बुद्धि, कृत्रिम बुद्धि की गुलाम हो रही है, झूठी-सच्ची सूचनाओं का जाल मनुष्य को भ्रमित कर रहा है तथा शब्दों पर पहरे लगे हुए हैं व सवालों को द्रोह माना जा रहा हो, वहाँ दयाराम वर्मा जी विद्रूपताओं, शोषण, अत्याचार व अन्याय के विरुद्ध अपनी कविताओं में निर्भीक प्रतिरोध दर्ज कराकर सच्चे साहित्यकार का कर्तव्य-निर्वहन कर रहे हैं – “खिलाफत में जो बोले / हल्का सा कभी मुख खोले / कहलाते उसके / विचार, प्रतिकार, बहिष्कार / दुश्मन प्रायोजित ‘विदेशी औजार’।” (भ्रमितकाल)

संग्रह की कविताएँ मनुष्य के अंदर झूठी खबर, आधी-अधूरी सूचना, भ्रामक शीर्षक व वीडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित सामग्री प्रवेश कराई जाकर नफरत, हिंसा व वैचारिक कुंदता का ‘स्लो-पॉइजन’ दिए जाने पर पाठकों के समक्ष सवाल खड़े करती हैं तथा उन्हें सोचने के लिए विवश कर देती हैं कि हमारी प्यारी हरी-भरी बगिया में ये कैसी आँधियाँ उठने लगी हैं – “प्यारे रफ़ूगर / तुम्हारे दिल-दिमाग-दृष्टि को / बहुत होशियारी से, बहुत समझदारी और चालाकी से / वर्षों-वर्ष ढाला गया एक साँचे में / जहाँ सोच और समझ सिमट जाती है- / एक बंद कूपमंडूक कैप्सूल में।” (प्यारे रफ़ूगर)

प्रसिद्ध समाजशास्त्री ‘हाबर्मास’ का संवादात्मक दर्शन है कि समाज में “सह-अस्तित्व का अर्थ समान विचार होना नहीं, बल्कि असमान विचारों के साथ संवाद करने की क्षमता होना है।” जिसको सत्ताएँ अपनी विचारधाराओं के प्रवाह से दबाती जा रही हैं। दयाराम वर्मा जी को यह दुख सालता है कि ‘हम क्या थे और क्या होते जा रहे हैं!’ ये दर्द उनकी इन कविताओं में देखा जा सकता है, क्या थे – “सुबह शाम / बजती थीं, मंदिर में मधुर घंटियाँ / और आती थी दूर मस्जिद से सुरीली अज़ान / सेवैयाँ, लड्डू तो कभी हलवा बँटता था / कुहासा भेद भ्रम का छँटता था / यद्यपि हमारे इष्ट अनेक थे / लेकिन पैग़ाम सबके-एक थे, नेक थे।” (अनेक थे नेक थे)

और क्या हो गए – “भरे परिसर अदालत में / डंके की चोट / किया स्वयं मुंसिफ़ ने उद्घोष- / बहुसंख्यकों के अनुसार चलेगा- यह देश महान / एक डंडा, एक फंडा, होगी एक पहचान / शपथ सो गई, प्रस्तावना खो गई / करे भीड़ जो तय / निर्णय अंतिम - वही जान।” (भीड़तंत्र-सरकार)

ईशावास्य उपनिषद् में कहा गया है - “ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।” अर्थात इस समस्त जगत् में जो कुछ भी है, वह एक व्यापक चेतना से आवृत है। तेजी से बढ़ते ध्रुवीकरण तथा तकनीकी प्रयोग ने मनुष्य की इसी चेतना को कुंद किया है। वर्मा जी तकनीक के दुरुपयोग पर व्यथित होकर लिखते हैं – “सोशल मीडिया पर बजबजाते कमेंट / अंतहीन, बेलगाम ट्रोल्स / धार्मिक अखाड़ों में सुशोभित, महिमा मंडित गालियाँ / कत्लेआम की बेखौफ हुंकार / इस दौर के ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुके हैं।” (सनातन प्रकाश पुंज)

संग्रह की शीर्षक कविता ‘चिंग-तम अमत्तनि’ में दयाराम वर्मा जी मणिपुर के साथ-साथ अन्य प्रदेशों में वर्षों से जारी हिंसा और उन्माद से बहुत व्यथित व आक्रोशित हैं कि जिस धरती मणिपुर से इस उद्घोष की उत्पत्ति हुई, उसी धरती पर उद्घोष की भावना की धज्जियां उड़ रही हैं – “भीड़ टूट पड़ी / एक व्यंजन पर / एक निरीह विजातीय शिकार पर / एक देह - एक स्त्री देह पर / हरी-भरी घाटियाँ सिसक उठीं / ‘थौबल’ का सीना फट पड़ा / अंतिम उच्छ्वास से पहले / बंद होती आँखों ने देखा, दूर बहुत दूर / 'थौबल' के शिखरों पर - / चिथड़े- चिथड़े ‘चिंग-तम अमत्तनि’।” (चिंग-तम अमत्तनि)

संग्रह की कविताएँ पाठकों को अति बौद्धिकता से आतंकित नहीं करती हैं, बल्कि यथार्थ से रूबरू कराकर उनकी संवेदना को झकझोरती हैं। मुद्रण बढ़िया है। पूरे संग्रह में ‘ड़’ की जगह ‘ङ’ का प्रयोग टाइपिंग त्रुटि हो सकती है लेकिन बहुत खटकती है।

सुखद है कि जहाँ आज साहित्यकार अपने शब्दों एवं साहित्य में भयमिश्रित स्व-अनुशासन लगाये हुए हैं वहीं दयाराम वर्मा जी अपनी कविताओं में कठिन परिस्थितियों से डरकर आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, न ही वे अपनी कविताओं में एक पक्षीय अनर्गल प्रलाप करते हैं, बल्कि उनकी कविताओं में मानवीय संवेदना, विखंडन की पीड़ा तथा मानवतावादी जीवन मूल्यों के क्षरण की चिंता है। लेकिन वे निराश नहीं हैं, उनको पूर्ण विश्वास एवं आशा है कि परिस्थितियाँ बदलेंगी और फिर से लोगों के हृदयों में ‘ढाई आखर’ लहलहाएगा, क्योंकि इस जगत में प्रेम ही अंतिम सत्य है। सच को सच और झूठ को झूठ कहने का हौसला ही दयाराम वर्मा जी को विलक्षण एवं साहसी कवि स्थापित करता है, जिसको आने वाली तारीखें याद रखेंगी।

6) डॉ. सतपाल, वरिष्ठ पशु चिकित्सक, मानसा पंजाब से लिखते हैं: यह काव्य-संग्रह हमारे समय के सामाजिक, राजनीतिक और व्यापारिक जीवन में घटते मूल्यों का चित्रण करते हुए मानवीय संवेदनाओं, नैतिकता और सामाजिक सरोकारों को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देता है।

(7) संग्रह की कविता ‘बच्चे, मेरे प्यारे बच्चे सुन’ पर डॉ. अशोक कुमार वर्मा, प्रोफेसर एवं डीन-भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय खानपुर, हरियाणा का कहना है कि,

यह कविता मुझे वर्ड्सवर्थ की बहुचर्चित कविता ‘Nutting’ की याद दिलाती है। अंतर यह है कि जहाँ ‘Nutting’ एक बच्चे के दृष्टिकोण से लिखी गई है, वहीं यह कविता ‘उजाड़ दी गई प्रकृति’ के दृष्टिकोण को सामने रखती है। निस्संदेह इसमें रोमांटिक संवेदनशीलता की एक झलक दिखाई देती है!”

(8) वहीं डॉ. वंदना पांडेय, दोइमुख विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश ने इस कविता को “प्रकृति-केंद्रित भावपूर्ण कविता बताते हुए कहा है कि इसमें यथार्थ की अभिव्यक्ति है, जहाँ विकास के नाम पर प्राकृतिक सौंदर्य को मिटाया जा रहा है। कविता के माध्यम से प्रकृति की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।”

(9) श्री हरदयाल सिंह सेवा निवृत्त उप-महा प्रबंधक ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के अनुसार:

संग्रह की व्यंग्यात्मक कविताओं में समाज की सच्चाई तीखे और कलात्मक ढंग से उभरती हैं। पढ़ते हुए मुस्कान भी आती है और बहुत कुछ सोचने के लिए भी विवश होना पड़ता है। शब्दों का सुंदर और प्रभावशाली चयन इन कविताओं को विशेष धार देता है।

(10) श्री सत्यनारायण प्रजापति: संस्थापक भारतीय प्रजापति हीरोज ऑर्गेनाइजेशन का कहना है कि,

यह संग्रह विविध विषयों पर लिखी गई कविताओं का एक जीवंत कोलाज है। लेखक की वैचारिक दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सिद्धांतवादी निर्भीकता है। लेखक आज की स्थापित व्यवस्था, सामाजिक रूढ़ियों, परंपराओं और यहाँ तक कि मानवीय संवेदनाओं के क्षरण पर सीधे और तीखे सवाल उठाने से गुरेज नहीं करते। ……. कवि की काव्य-शैली में जटिलता के बजाय सहजता और गहराई का अनूठा संतुलन है। वे अपनी बात को घुमा-फिराकर कहने के बजाय सीधे पाठक के दिल पर चोट करने वाले बिंबों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। शब्दावली में एक ओर जहाँ संवेदनशीलता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ एक गहरा असंतोष और आक्रोश भी झलकता है। …. यह कविता संग्रह ऐसे समय में आया है जब समाज में मानवीय मूल्य और संवेदनाएं लगातार कम हो रही हैं। ऐसे दौर में सत्ता, समाज और स्वयं मनुष्यता को कटघरे में खड़ा कर सवाल पूछने वाली कविताएँ साहित्य को समाज का सच्चा दर्पण बनाती हैं।

(11) भोपाल से वरिष्ठ साहित्यकार, श्री सुरेश पटवा ने अपनी त्वरित प्रतिक्रिया में लिखा है:

प्रबुद्ध रचनाकार दयाराम वर्मा जी के नवीन कविता संग्रह “चिंग-तम अमत्तनी” की कुछ कविताएँ पढ़ीं। यह काव्य संग्रह अपने समय का निर्भीक दस्तावेज़ है। इसमें एक संवेदनशील कवि की मर्माहत भावनाओं को अभिव्यक्ति मिली है। इसकी रचनाएं पाठक को झकझोरती हैं, उद्वेलित करती हैं। सत्ता के तानाशाही एजेंडा को वस्त्र विहीन कर सच्चाई सामने लाती हैं।

पिछले आठ-दस वर्षों में राष्ट्रवाद और संस्कृति के नाम पर जो भी निरंकुश अत्याचार हमारे आसपास घटित हो रहा है उसे सशक्त रूप से अभिव्यक्त करती कविताएँ ठीक वैसी प्रभाव छोड़ती हैं जैसा दुष्यंत की ग़ज़लों ने तानाशाही तरीकों को नेस्तनाबूद किया था।

(12) पुणे महाराष्ट्र में रहने वाली वरिष्ठ साहित्यकार दीप्ति गुप्ता, जिन्होंने पुस्तक की भूमिका भी लिखी है ने पुस्तक लोकार्पण पर अपनी शुभकामनाएं कुछ इस प्रकार से व्यक्त की हैं:

चिंग-तम अमत्तनि का शीर्षक ही अत्यंत भावपूर्ण और गहन अर्थवत्ता से परिपूर्ण है। यह मणिपुर की घाटियों और पहाड़ियों की भौगोलिक वास्तविकता को सह-अस्तित्व, सौहार्द और मानवीय एकता के व्यापक रूपक में जिस सुंदरता से रूपांतरित करता है, वह उल्लेखनीय है। जब कोई भू-दृश्य दर्शन का रूप ले ले और किसी क्षेत्र विशेष का अनुभव समस्त मानवता के हृदय से संवाद करने लगे, उसी में तो कविता की सार्थकता निहित होती है।

मेरी भूमिका के रूप में लिखे गए शब्दों के प्रति आपके उदार भावों ने मुझे सम्मानित भी किया है और विनम्र भी। आपके काव्य-संग्रह की भूमिका लिखना मेरे लिए महज़ एक साहित्यिक दायित्व नहीं था; यह ऐसे काव्य-स्वर से संवाद करने का अवसर था, जिसकी जड़ें प्रकृति, समाज, मानवीय संवेदनशीलता और हमारे समय की जटिल वास्तविकताओं में गहराई तक पैठी हुई हैं।

‘सियांग के उस पार’ और ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो: एक सफ़रनामा’ से लेकर आपके प्रथम काव्य-संग्रह तक की यात्रा एक लेखक की अभिव्यक्ति के नए रूपों और मानवीय अनुभव के गहनतर आयामों की निरंतर खोज को प्रतिबिंबित करती है।

मेरी कामना है कि ‘चिंग-तम अमत्तनि’ मणिपुर की सीमाओं से बहुत आगे तक पहुँचे और भौगोलिक, भाषायी तथा सांस्कृतिक सीमाओं के पार पाठकों के हृदय को स्पर्श करे। इसकी घाटियाँ और पहाड़ियाँ सदैव परस्पर जुड़ी रहें—कविता में, विचारों में और सबसे बढ़कर मानवीय चेतना में। इस सुंदर साहित्यिक यात्रा के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। कामना है कि इस पुस्तक को वह पाठकीय स्नेह और साहित्यिक पहचान प्राप्त हो, जिसकी यह सचमुच हकदार है।

(13) कवि: शिवभूषण सिंह गौतम ‘भूषण’ छतरपुर, मध्यप्रदेश से एक दोहावली में अपना बधाई संदेश इस प्रकार से दिया है:

औपन्यासिक कृति प्रथम, सियांग के उस पार।
अरुणाचल की धरा का, था नैसर्गिक प्यार॥

ब्रह्मपुत्र से सांगपो, है यात्रा-वृत्तांत।
लेखकीय दायित्व का, है निर्वाह नितांत॥

चिंग-तम अमत्तनि हुआ, कविता-संग्रह प्राप्त।
जिसमें है कवि-कर्म का, मर्म सर्वथा व्याप्त॥

तीनों कृति उत्तम प्रकृति, की देकर श्रीमान।
साहित्यिक संसार में, पाएँगे सम्मान॥

शैलीगत वैविध्य का, है उत्तम निर्वाह।
अभी और कितनी विधा, में चल रहा प्रवाह॥

हर रचना में आपकी, मिलता नव उन्मेष।
नई-नई परिकल्पना, नया-नया परिवेश॥

सामाजिक विद्रूपता पर, अति गहरा व्यंग्य।
कविताओं में आपकी, है आवश्यक अंग।।

मानवीय संवेदना, का जब-पड़े अकाल।
मर्यादायें बिखर कर, जब हो रही बेहाल॥

ऐसे में कवि-कर्म का, बन जाता दायित्व।
बचा सकेगा किस तरह, कविता का अस्तित्व॥

कवि की अंतर्वेदना, ही कविता का मर्म।
युग को दे नव-चेतना, है यह कवि का धर्म॥

सत्ता से होती नहीं, संस्कारों की शुद्धि।
देगा सत्साहित्य ही, शासन को सद्बुद्धि॥

है मेरी शुभकामना, लोकार्पण हेतु।
लेखक-पाठक मध्य में, बनें कार्यक्रम सेतु॥

नित नूतन करते रहें, सर्जन इसी प्रकार।
कृति, आकृति औ प्रकृति से, पाएँ नव विस्तार॥

वर्मा जी, आपका, नित नूतन उत्कर्ष।
‘भूषण’ की शुभकामनाएँ, स्वीकारो सहर्ष॥

 प्रस्तावना:  चिंग-तम अमत्तनि: मनुष्यता के पक्ष में एक निर्भीक हस्तक्षेप

हर कविता अपने समय की संतान होती है; किन्तु कुछ कविताएँ अपने समय की केवल संतान नहीं, उसकी अंतरात्मा और उसका प्रतिवाद भी होती हैं। वे केवल शब्दों का विन्यास नहीं करतीं, अपितु अपने युग की आत्मा में उठ रहे प्रश्नों, अंतर्द्वंद्वों और मानवीय आकांक्षाओं को स्वर प्रदान करती हैं। ऐसे सृजक समय की सतह पर घटित घटनाओं का मात्र विवरण नहीं लिखते; वे उसके भीतर बह रही उस अदृश्य धारा को पहचानते हैं, जो मनुष्य को उसकी मनुष्यता से जोड़ती है। दयाराम वर्मा का यह प्रथम काव्य-संग्रह ऐसी ही सृजनधर्मी प्रज्ञा का साक्ष्य है। यह किसी आत्मान्वेषी आग्रह का घोषणापत्र नहीं, बल्कि मनुष्य, समाज और समय के बीच निरंतर चल रहे संवाद का एक संवेदनशील दस्तावेज़ है।

साहित्य का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि प्रत्येक युग अपनी पहचान केवल राजाओं, साम्राज्यों, युद्धों अथवा राजनीतिक घोषणाओं से नहीं बनाता; वह अपने समय के साहित्य से भी पहचाना जाता है। इतिहास घटनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है, जबकि साहित्य उन घटनाओं के भीतर स्पंदित मानव-अंतःकरण का वृत्तांत रचता है। इतिहास यह बताता है कि क्या घटित हुआ; काव्य यह बताता है कि उसके घटित होने से मनुष्य के भीतर क्या टूटा, क्या बचा और क्या अब भी बचाया जा सकता है। यही कारण है कि जब भी सभ्यता किसी मूल्यनिष्ठ संकट के दोराहे पर खड़ी होती है, काव्य केवल एक साहित्यिक विधा नहीं रह जाता; वह मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज़ बन जाता है।

आज का समय अभूतपूर्व उपलब्धियों का कालखण्ड है। विज्ञान ने असंभव को संभव कर दिखाया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, संचार-क्रांति और तकनीकी विकास ने मनुष्य की क्षमताओं को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। किन्तु इसी परिदृश्य में मनुष्य का अंतर्जगत अनेक विडंबनाओं से भी घिरा हुआ है। धर्म के नाम पर विभाजन, जातीय असमानता, वैचारिक असहिष्णुता, पर्यावरण का निरंतर क्षरण, लोकतांत्रिक मूल्यों पर उठते प्रश्न और संवेदना का क्रमशः क्षीण होना—ये सब इस युग की ऐसी सच्चाइयाँ हैं, जिनसे कोई भी सजग रचनाकार स्वयं को पृथक नहीं रख सकता। ऐसे परिवेश में कविता का दायित्व केवल सौंदर्य का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि मनुष्य के पक्ष में खड़े होने का नैतिक साहस भी है। दयाराम वर्मा का यह काव्य-संग्रह इसी नैतिक साहस की सशक्त अभिव्यक्ति है।

इन रचनाओं को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि सृजक ने अपने समय को दूर खड़े होकर नहीं देखा; उसने उसे जिया है, भोगा है और उसके अंतर्विरोधों को भीतर तक महसूस किया है। यही कारण है कि उसकी काव्याभिव्यक्ति किसी पूर्व निर्धारित बौद्धिक आग्रह का घोषणापत्र नहीं बनती, बल्कि मनुष्य की नियति के प्रति गहरी चिंता का दस्तावेज़ बनकर सामने आती है। वे किसी एक विषय के कवि नहीं हैं। उनकी दृष्टि वहाँ भी जाती है, जहाँ मनुष्य धर्म के नाम पर मनुष्य से अलग किया जा रहा है; वहाँ भी, जहाँ किसान अपनी ही सभ्यता में उपेक्षित खड़ा है; वहाँ भी, जहाँ प्रकृति अपने अस्तित्व की अंतिम पुकार लगा रही है; और वहाँ भी, जहाँ भविष्य का कृत्रिम बुद्धिमान मनुष्य वर्तमान के संवेदनशून्य मनुष्य से अधिक मृदुहृदय होने की संभावना जगाता है।

दयाराम वर्मा की कविताओं का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उनकी मानवतावादी जीवन-दृष्टि है। उनके लिए मनुष्य की पहचान किसी जाति, धर्म, भाषा अथवा वर्ग से नहीं, उसकी मनुष्यता से होती है। यही कारण है कि ‘पोस्टमार्टम’ जैसी कविता में वे एक अत्यंत सरल, किन्तु असाधारण प्रश्न उठाते हैं—

“लाल रक्त, सफ़ेद अस्थियाँ, हृदय, फेफड़े या पसलियाँ—
कहीं कोई भेद नहीं
फिर वह कौनसा अंग है
चुन देता है मज़हबी दीवारें
बाँट देता है—
मानव से मानवता, इंसान से इंसान को
शहर से बस्ती, खेत से खलिहान को”


यह प्रश्न केवल कविता का प्रश्न नहीं है; यह हमारे समय की सबसे बड़ी मानवोचित चुनौती है। रचनाकार उत्तर देने की जल्दी में नहीं है। वह चाहता है कि यह प्रश्न पाठक के भीतर उतरे, उसे विचलित करे और उसकी प्रज्ञा में दीर्घकाल तक गूँजता रहे। एक सच्चे कवि की यही पहचान है कि वह उत्तरों की अपेक्षा प्रश्नों को अधिक जीवित रखता है।

इस संग्रह की दूसरी बड़ी विशेषता समकालीन यथार्थ से उसका निर्भीक साक्षात्कार है। दयाराम वर्मा अपने समय की विसंगतियों को किसी आवरण में छिपाकर प्रस्तुत नहीं करते; वे उन्हें उसी तीखेपन के साथ अभिव्यक्त करते हैं, जैसा उन्होंने अनुभव किया है। उल्लेखनीय यह है कि उनकी निर्भीकता आक्रामकता नहीं बनती और उनका प्रतिरोध कटुता में परिवर्तित नहीं होता। उनके यहाँ असहमति का आधार वैमनस्य नहीं, बल्कि मूल्यनिष्ठ विवेक है। इसीलिए उनकी कविता किसी विचारधारा की परिधि में कैद नहीं होती; वह मनुष्य की गरिमा और सामाजिक सह-अस्तित्व के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

यह विश्वास उनकी अनेक कविताओं में प्रतिध्वनित होता है। चाहे ‘जाति कबहूँ न जाती’, ‘अनेक थे, नेक थे’ अथवा ‘कलम की अभिलाषा’—हर जगह रचनाकार विभाजन नहीं, संवाद और विमर्श की तलाश करता दिखाई देता है। वह जानता है कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है, उसके विखंडन में नहीं।

दयाराम वर्मा की कविताओं में करुणा और प्रतिरोध का एक अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे केवल व्यवस्था की आलोचना नहीं करते; वे उन मौन चेहरों की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं, जो प्रायः इतिहास और समाचारों के हाशिए पर छूट जाते हैं। इसी कारण उनकी कविता में किसान है, नदी है, पहाड़ है, जंगल है, बच्चा है, स्त्री है, संविधान है, शब्द हैं और अंततः संपूर्ण मानव-संसार है। इन सबको जोड़ने वाली अदृश्य कड़ी है—संवेदना।

उनकी कविता का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह भी है कि वह निराशा के बीच भी आशा का दीप जलाए रखती है। जब वे लिखते हैं—

"साफ-स्वच्छ हमें रखना, अरे ओ कृतघ्न इंसान
मात्र पूजना नहीं
सीखो सहेजना —
है यही विनती, यही मेरी अंतिम देशना”


तो यह केवल नदी की व्यथा नहीं रह जाती; यह मनुष्य और प्रकृति के सनातन सह-अस्तित्व का सात्त्विक उद्घोष बन जाती है।

उनकी भाषा दिखावटी अलंकरणों से बोझिल नहीं है। उसमें विचार की स्पष्टता, भाव की गरिमा और अभिव्यक्ति की ऊर्जा एक साथ विद्यमान हैं। वे तत्सम, तद्भव, उर्दू, लोक-प्रयोग और समकालीन शब्दावली का स्वाभाविक प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में वक्तव्य की दृढ़ता है, पर वह कविता की संवेदनशीलता को कहीं भी विस्मृत नहीं करती। कहीं-कहीं उनकी पंक्तियाँ घोषणात्मक प्रतीत होती हैं, किन्तु उनके भीतर धड़कती मानवीय करुणा उन्हें पुनः काव्य में रूपांतरित कर देती है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे कविता को मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते अपितु उसे सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व का माध्यम मानते हैं। फलत: उनकी कविता का अनुनाद केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक मानुषिक सरोकारों का प्रतिनिधि बन जाता है। ‘कलम की अभिलाषा’ की ये पंक्तियाँ—


" लिखूँ संघर्ष मृग का
शिकारी व्याघ्र नहीं महान
दबे-कुचले, विस्मृत, तिरस्कृत, शोषित, वंचित की
बन जाऊँ मैं बुलंद जुबान"

—केवल एक सृजक की निजी आकांक्षा नहीं, बल्कि प्रत्येक सजग रचनाकार के सामाजिक दायित्व की उद्घोषणा हैं। वस्तुतः यही आकांक्षा इस पूरे काव्य-संग्रह की आत्मा है।

कवि दयाराम वर्मा की रचनाओं का एक उल्लेखनीय गुण यह है कि वह किसी पूर्व निर्धारित निष्कर्ष से आरम्भ नहीं होती। वह जीवन के बीचों-बीच उतरती है और वहीं से अपने प्रश्न उठाती है। उनकी रचनाओं में चिंतन अवश्य है, किन्तु वह कविता पर आरोपित नहीं लगता; वह अंतश्चेतना से स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होकर आता है। यही कारण है कि उनकी कविताएँ पाठक से सहमति की अपेक्षा नहीं करतीं, अपितु उसे सोचने के लिए विवश करती हैं। किसी भी सार्थक साहित्य की यही सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

इस संग्रह को पढ़ते हुए सहज ही अनुभव होता है कि कवि ने अपने समय की घटनाओं को केवल देखा नहीं, भीतर तक जिया है। मणिपुर की विभीषिका हो, किसानों का असंतोष, जातीय विडम्बनाएँ, लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति चिंता, पर्यावरण का संकट अथवा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य को लेकर उठते प्रश्न—इन सबके बीच कवि का मन बार-बार उसी मूल प्रश्न पर लौट आता है कि मानव अपनी मानवता को किस प्रकार सुरक्षित रखे।

विविध विषयों पर लिखी गई ये कविताएँ अंततः एक ही भावभूमि पर आकर मिल जाती हैं—मनुष्य और उसकी गरिमा की रक्षा की भावभूमि पर।

लेखक की रचनात्मक दृष्टि का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी नीति-सम्मत निर्भीकता है। वे कठिन प्रश्न पूछने से नहीं हिचकते। उनकी रचनाएँ सत्ता से भी प्रश्न करती है, समाज से भी, परम्परा से भी और स्वयं मनुष्य से भी। यह प्रश्नाकुलता किसी नकारात्मक आग्रह से प्रेरित नहीं है; इसके मूल में यह गहरा विश्वास निहित है कि मनुष्य अभी भी बेहतर हो सकता है और समाज अधिक न्यायपूर्ण बन सकता है। इसी विश्वास के कारण उनकी कविता प्रतिरोध के भीतर भी आशा का दीप सुरक्षित रखती है।

भाषिक विन्यास की दृष्टि से भी यह कृति इसलिए उल्लेखनीय है कि रचनाकार ने अपनी अभिव्यक्ति को अनावश्यक अलंकरणों से नहीं सजाया। उनकी भाषा में सहजता है, पर उस सहजता के भीतर विचार की गहराई भी है। वे संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग करते हैं तो वहीं उर्दू के शब्द भी उतनी ही स्वाभाविकता से उनकी कविता में प्रवेश करते हैं। कहीं लोकभाषा की माटी की गंध है, तो कहीं आधुनिक विज्ञान, लोकतंत्र और संविधान की शब्दावली। यह भाषिक विविधता बनावटी नहीं लगती, क्योंकि उसके पीछे जीवन का व्यापक अनुभव और रूपायन पर स्वाभाविक अधिकार है।

इन कविताओं का एक और आकर्षक पक्ष उनकी बिम्ब-सृष्टि है। पहाड़ बोलते हैं, नदी अपनी पीड़ा कहती है, शब्द स्वयं अपना चरित्र उद्घाटित करते हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी एक विवेकसम्मत प्रश्न बनकर सामने आती है। यह मानवीकरण केवल काव्य-शिल्प नहीं, बल्कि उस व्यापक अनुकम्पामय दृष्टि का परिणाम है जो समस्त सृष्टि को एक साझा नियति में देखती है।

निस्संदेह, दयाराम वर्मा की कविताएं अपने समय के प्रश्नों से गहरे स्तर पर जुड़ती है। इसलिए स्वाभाविक है कि अनेक स्थानों पर उसकी व्यंजना तीखी भी हो जाती है; किन्तु यह तीखापन कभी विद्वेष का रूप नहीं लेता। उसके भीतर करुणा की ऊष्मा और मानव-मर्यादा के प्रति अटूट आस्था विद्यमान रहती है। उनकी कविता विरोध के लिए विरोध नहीं करती; वह मानवोचित मूल्यों के पक्ष में खड़ी होकर अपने समय से विमर्श करती है।

साहित्य का अंतिम मूल्य इस बात से निर्धारित नहीं होता कि उसने अपने समय की कितनी घटनाओं का उल्लेख किया, बल्कि इस बात से होता है कि उसने मनुष्य के भीतर कितनी देर तक प्रकाश जलाए रखा। इस संग्रह की कविताएँ इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण हैं। वे हमें असहज करती हैं, क्योंकि वे हमें हमारे समय से परिचित कराती हैं; वे हमें उद्वेलित करती हैं, वे हमारे भीतर सोई हुई सहृदयता को पुकारती हैं; और अंततः यह विश्वास भी जगाती हैं कि जब तक मनुष्य के पक्ष में बोलने वाली कविता जीवित है, तब तक आशा भी जीवित है।

संग्रह की अंतिम कविता ‘ढाई आखर’ मानो पूरे काव्य-संसार का निष्कर्ष बनकर सामने आती है। अनेक जटिल सामाजिक, राजनीतिक और चिंतनोन्मुख प्रश्नों से होकर गुजरने के बाद कवि अंततः प्रेम को ही मनुष्य की अंतिम भाषा के रूप में स्वीकार करता है—

" कभी झाँकना उन आँखों में
और डूबकर बाँचना
जहाँ लिखे होते हैं— केवल ढाई आखर
प्रेम, इश्क़, प्यार के शब्द”


यही 'ढाई आखर' इस पूरे संग्रह का केंद्रीय भाव है। यही वह सूत्र है जो विविध विषयों, विविध सरोकारों और विविध अनुभवों को एक मानवीय कड़ी में पिरो देता है।

आज जब कविता के सामने त्वरित लोकप्रियता का आकर्षण, अवधारणात्मक ध्रुवीकरण का दबाव और बाज़ार की चकाचौंध एक साथ उपस्थित हैं, ऐसे समय में लेखक का यह प्रथम काव्य-संग्रह इस विश्वास को पुष्ट करता है कि सच्ची कविता अंततः अपने समय की अंतरात्मा से ही जन्म लेती है। वह किसी सत्ता की प्रवक्ता नहीं होती, न किसी विचारधारा की प्रचारक; वह मनुष्य की अंतर्दृष्टि की सतर्क प्रहरी होती है। उसका कार्य अंतिम उत्तर देना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को जीवित रखना है जिनके बिना कोई भी सभ्यता अपनी नैतिक ऊर्जा को सुरक्षित नहीं रख सकती।

कवि की पहली पहचान उसकी भाषा नहीं, उसकी संवेदना होती है। भाषा समय के साथ और अधिक परिमार्जित होती रहती है, शिल्प नए आयाम ग्रहण करता है; किन्तु यदि संवेदना प्रामाणिक हो तो वही किसी रचना की सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है। ‘चिंग-तम अमत्तनि’ की कविताओं का सबसे विश्वसनीय पक्ष यही है कि वे अपने पाठक पर यत्रसाध्य प्रभाव आरोपित नहीं करतीं, अपितु उसके साथ आत्मीय संवाद स्थापित करती हैं। वे पाठक को निर्देश नहीं देतीं; उसके भीतर एक बेचैनी, एक प्रश्न और आत्मसंवाद का एक दीर्घ अनुगुंजन छोड़ जाती हैं।

यद्यपि इस संग्रह की अनेक कविताएँ अपने समय की विशिष्ट घटनाओं से प्रेरित हैं, तथापि उनका आशय किसी एक कालखंड तक सीमित नहीं रह जाता। मनुष्य, प्रकृति, समानता, न्याय, प्रेम और सह-अस्तित्व जैसे शाश्वत प्रश्न इन्हें समय की सीमाओं से ऊपर उठाकर व्यापक मानुषिक संदर्भ प्रदान करते हैं। इसी कारण यह संग्रह केवल आज का दस्तावेज़ नहीं, आने वाले समय के लिए भी एक विचारोत्तेजक पाठ सिद्ध होने की क्षमता रखता है।

जब समय मनुष्य से उसकी संवेदना छीन लेने पर आमादा हो, तब कविता केवल साहित्य नहीं रह जाती; वह मानवता की अंतिम शरण बन जाती है। दयाराम वर्मा की ये कविताएँ उसी शरण की ओर ले जाने वाली अर्थवान पदचाप हैं। एक सच्चे रचनाकार की यात्रा किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि निरंतर आत्म-विस्तार की ओर अग्रसर होती है। मुझे विश्वास है कि यह काव्य-संग्रह उस सार्थक यात्रा का सुदृढ़ और आश्वस्तिपूर्ण प्रारम्भ सिद्ध होगा और केवल पढ़ा ही नहीं जाएगा, बल्कि अपने पाठकों की प्रज्ञा में दीर्घकाल तक अनुगुंजित होता रहेगा।

अंततः, मैं दयाराम वर्मा को उनके प्रथम काव्य-संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देती हूँ। आशा है कि वे अपनी वैचारिक निष्ठा, मानवतावादी दृष्टि और रचनात्मक निर्भीकता को भविष्य में भी अक्षुण्ण रखेंगे।


डॉ. दीप्ति गुप्ता
पूर्व प्रोफेसर, पूर्व शिक्षा सलाहकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (भारत सरकार)
सम्प्रति: पूर्णतया साहित्य सृजन को समर्पित
पुणे: 411006 (महाराष्ट्र)
मो: 9890633582

 आत्मकथ्य: 

उपन्यास ‘सियांग के उस पार’ और यात्रा-वृत्तांत ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो: एक सफ़रनामा’ के उपरांत प्रकाशित होने वाली यह मेरी तीसरी साहित्यिक कृति है।

मेरा विश्वास है कि कविता किसी मत, विचारधारा, पंथ या सत्ता की उपासक, बंधक, पोषक अथवा प्रचारक नहीं हो सकती। उसका धर्म किसी वैचारिक अनुशासन या राजनीतिक निष्ठा का अनुचर बनना नहीं, बल्कि मनुष्य की सामूहिक चेतना को परिमार्जित, विस्तृत और ऊर्ध्वमुखी बनाने वाली एक स्वायत्त सृजन-शक्ति के रूप में निरंतर अभिव्यक्त होते रहना है।

जो कविताएँ विषम परिस्थितियों में जन्म लेती हैं, वे परिवर्तन और पुनर्निर्माण के वट-बीज भी संजोए रखती हैं। उम्मीद की मशाल थामे कवि जावेद आलम ख़ान अपनी कृति ‘स्याह वक्त की इबारतें’ में इस विचार को स्वर देते हुए लिखते हैं—

“तुम देखना चाँद!
एक दिन कविताओं से उठा ज्वार
अपने साथ बहा ले जाएगा
दुनिया का तमाम बारूद…”

हर अन्याय, हर शोषण और परीक्षा की हर घड़ी मनुष्य के सामने तीन विकल्प रखती है—किसी एक पक्ष या विचार के साथ सहमति और समर्थन, असहमति और विरोध, अथवा तटस्थता। यद्यपि कहने को तीन विकल्प हैं, लेकिन व्यवहारिक रूप से ये दो ही हैं। तटस्थता कोई तीसरा पक्ष नहीं, बल्कि एक सुविधाजनक चुप्पी या भयाकुल सहमति है, जो स्वतः ही झूठ और अन्याय के पाले में गिर जाती है। साहित्य से भी यही सवाल पूछा जाना चाहिए—“उस समय तुम किसके साथ थे?”

आज के दौर में, चारों ओर सूचनाएं आंधी, तुफान और बाढ़ की तरह बह रही हैं; अतएव इसे ‘सूचना का सुनामी काल’ कहना गलत न होगा। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती, सच और झूठ के बीच अंतर कर पाना है। यही पहचान किसी पक्ष या विचार के प्रति हमारी सहमति अथवा असहमति का आधार बनती है और अंततः यह भी तय करती है कि हम किसके साथ खड़े हैं, कहाँ खड़े हैं।

‘चिंग-तम अमत्तनि’ किसके साथ है? सुधी पाठक इस प्रश्न का निरपेक्ष उत्तर दे सकते हैं। वही उत्तर इन कविताओं के साहित्यिक औचित्य और अवदान का मूल्यांकन करेगा।

इसी विश्वास और अनंत सद्भावनाओं के साथ मैं अपना प्रथम काव्य-संग्रह आपके समक्ष समर्पित कर रहा हूँ।

और अंत में, इस काव्य-संग्रह की संवेदनापूर्ण, विचार-समृद्ध और मर्मवेधी प्रस्तावना लिखने के लिए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. दीप्ति गुप्ता तथा इस पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रकाशक ‘नोशन प्रेस-चेन्नई’ का हृदय की गहराइयों से आभार, धन्यवाद।


दयाराम वर्मा

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लेखक परिचय: 

दयाराम वर्मा का जन्म 17 जुलाई 1966 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की भादरा तहसील के ग्राम महराणा में हुआ। आपने विज्ञान में स्नातक, लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर तथा सी.ए.आई.आई.बी. की शिक्षा प्राप्त की। लगभग एक दशक तक भारतीय वायु सेना में रेडियो तकनीशियन के रूप में सेवाएँ देने के उपरांत ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स तथा पंजाब नेशनल बैंक में अधिकारी के रूप में कार्य किया। मुख्य प्रबंधक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद, सितंबर 2023 से आप पूर्णकालिक स्वतंत्र लेखन को समर्पित हैं।

आपकी पूर्व प्रकाशित कृतियों में ‘सियांग के उस पार’ (उपन्यास, 2018) तथा ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो : एक सफ़रनामा’ (यात्रा-वृत्तांत, 2022) प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त आप कविता, व्यंग्य, आलेख, संस्मरण तथा अन्य साहित्यिक विधाओं में भी नियमित लेखन करते हैं। उपन्यास ‘सियांग के उस पार’ पर राजीव गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, दोईमुख (अरुणाचल प्रदेश) में वर्ष 2020 में एम.फिल. स्तर का शोध भी हुआ है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। पंजाब नेशनल बैंक ने आपके यात्रा-वृत्तांत ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो : एक सफ़रनामा’, कविता ‘चिंग-तम अमत्तनि’ और ‘अनेक थे नेक थे’ को राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर पुरस्कृत किया है। आपने संयुक्त अरब अमीरात, थाईलैंड, आयरलैंड, स्कॉटलैंड और ब्रिटेन की विदेश यात्राएँ भी की हैं।

संपर्क:
विला संख्या: 77, महिमा शुभ निलय, चिमनपुरा, अजमेर रोड, जयपुर–302026 (राजस्थान)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

 



कविता: दिमाग़ी नक्सल




(Part of the poem)

पहले उन्होंने मुसलमानों को ‘गद्दार’ कहा
और मैं चुप रहा—क्योंकि मैं मुसलमान नहीं था!

फिर उन्होंने वामपंथियों को ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग कहा
मैं चुप रहा, मैं वामपंथी नहीं था!

किसान आंदोलनकारियों को उन्होंने ‘खालिस्तानी’ कहा
प्रदर्शनकारी विरोधियों को ‘आंदोलनजीवी’
मैं तब भी चुप रहा, मैं किसान नहीं था
मैं प्रदर्शनकारी भी नहीं था!

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© दयाराम वर्मा, 17 अगस्त 2026 डबलिन (आयरलैंड)

Published : 

1. सत्य की मशाल मासिक पत्रिका भोपाल सितंबर, -2026
2. काव्य संग्रह 'चिंग-तम अमत्तनि' नोशन प्रेस प्लेटफार्म -2026










 व्यंग्य: मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा



मगध के नंद वंश के अंतिम सम्राट धनानंद ने दानशाला की सभा में मुख्य अतिथि चाणक्य के साधारण पहनावे, उनके साँवले रंग और शारीरिक कुरूपता का न केवल मजाक उड़ाया, बल्कि उन्हें बलपूर्वक सम्मानित आसन से हटा दिया। इस धक्का-मुक्की में चाणक्य की शिखा खुल गई। कहते हैं, इस सार्वजनिक अपमान से अत्यंत क्रोधित चाणक्य ने भरे दरबार में अपनी खुली हुई शिखा को हाथ में लेकर प्रतिज्ञा की, “जब तक मैं इस अन्यायी और अहंकारी धनानंद के समूल नंद वंश का नाश नहीं कर दूँगा, तब तक अपनी इस शिखा (चोटी) में गाँठ नहीं बाँधूँगा।”

और फिर उन्होंने एक मेधावी बालक चंद्रगुप्त को एक योद्धा और भावी सम्राट के रूप में तैयार किया। आगे चलकर चंद्रगुप्त ने धनानंद को हराया। मगध से नंद वंश का समूल नाश हो गया और मौर्य वंश का परचम लहराने लगा।

इतिहास में चाणक्य के उपर्युक्त प्रसंग जैसे सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं, जो सिद्ध करते हैं कि आत्मसम्मान को बींधने वाले शब्द जब प्रतिशोध का रूप धारण करते हैं, तो वे इतिहास की धारा ही बदल देते हैं। विडंबना यह है कि इतिहास की चेतावनियों के बावजूद मनुष्य वही भूलें दोहराता रहता है। संभवतः प्रतिकूल परिस्थितियों में इतिहास के पुनर्लेखन की यह भी एक नैसर्गिक व्यवस्था है।

15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में वकालत के पेशे और कुछ युवा वकीलों से संबंधित एक मामला सुनवाई में था। उसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश महोदय सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी कर दी— “कुछ युवा कॉकरोच जैसे होते हैं, जिन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ आर.टी.आई. कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर सब पर हमला करना शुरू कर देते हैं।”

अब कोई ऐसा न सोचे कि बेरोजगारों के एक वर्ग विशेष के लिए इस नए विशेषण का उद्घोष करते समय उनके मन में ख्याल आया हो—“सरदार बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा…” और आज नहीं तो कल गोगोई साहब की तरह बढ़िया ‘इनाम’ भी! यह तो बस बातों-बातों में ‘ऐवें ही’ हो गया था। उन्हें इल्म नहीं था कि रीलें देखने और बनाने से उकता चुके बेरोजगार, अर्द्ध-बेरोजगार और छद्म-बेरोजगार इस विशेषण की गुलेल बना लेंगे। उन्हें सपने में भी अहसास नहीं हुआ होगा कि यह विशेषण सरदार और सरकार सब के गले की फाँस बनने वाला है।

हालाँकि अगले रोज सी.जे.आई. साहब ने रायता समेटने की कोशिश करते हुए स्पष्ट किया कि उनका मतलब सभी बेरोजगार युवाओं से नहीं, बल्कि कानून की फर्जी डिग्री के सहारे वकालत में प्रवेश करने वालों से था। लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। सफाई देते समय उन्होंने एक और दुखती रग पर हाथ रख दिया—‘फर्जी डिग्री’ वाली बात। हङबङी में सफाई करते समय कई बार घर का कीमती काँच का सामान गिर कर चकनाचूर हो जाता है। बहुत जोड़-तोड़ और कानूनी दाँव-पेंच लगाकर आदरजोग मोदी जी की तथाकथित ‘एंटायर पॉलिटिक्स’ की डिग्री पर पर्दा डाला गया था। कहीं ‘फर्जी डिग्री’ वाला तीर परदानशीन की ओर न मुङ जाए। यू नो, वैसे भी आजकल दीवारों के न केवल कान होते हैं, बल्कि आँख और नाक भी होती है।

लेकिन शुक्र है, निठल्ले कॉकरोचों का ध्यान इस ओर नहीं गया। दूसरी बात, निशाना बन गए ‘बेचारे’ केंद्रीय शिक्षा मंत्री महोदय-धर्मेंद्र प्रधान। वो लाख कहते रहे- ‘मैया मोरी मैंने कॉकरोच नाम नहीं धरायो!’ लेकिन तिलचट्टों ने एक न सुनी, वैसे भी भीङ कब, कहाँ, किसकी सुनती है।

इस एक ‘कॉकरोच’ शब्द ने उनके सब्र का बाँध तोड़ दिया। उनकी ढीठ भावना इस बार सच्ची-मुच्ची गंभीर रूप से आहत हो गई। उनकी सोई हुई अंतरात्मा एक झटके में बिस्तर छोङ खङी हो गई। हमें कॉकरोच कहा! ये न चलने वाला। ये न बरदाश्त होने वाला। अब तो आर-पार होकर ही रहेगा। अब सवाल मूँछों का है। इस बार मादा कॉकरोचों के तेवर भी उतने ही तीखे थे। वे भी सुर में सुर मिलाकर चिल्लाईं—हमारे भी पंखों की सुर्खी का सवाल है, अब और नहीं—बस!

ऐसी लाखों आहत भावनाओं के आर्तनाद ब्रह्मांड में विचरण करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे। इस आर्तनाद को वहाँ रहने वाले एक प्रवासी भारतीय अभिजीत दीपके ने सुना तो उसका दयालु हृदय मोम की तरह पिघल गया। उसके बस में इस अपमान का बदला लेने का कोई सीधा उपाय तो नहीं था; हाँ, उसने बेरोजगारों के गुस्से को व्यंजनापूर्ण अभिव्यक्ति देते हुए इंस्टाग्राम पर एक आभासी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’, यानी ‘सी.जे.पी.’ का गठन कर डाला।

अब कुदरत का करिश्मा देखिए या कहिए कि होनी को कौन टाल सकता है। चंद रोज में ही कॉकरोच जनता पार्टी इस कदर वायरल हुई कि इसके इंस्टाग्राम पर दो करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हो गए।

देशभर के तिलचट्टे अँधेरे कोनों से निकल-निकलकर खुले में एकजुट होने लगे। उनके साथ बहुत से मौकापरस्त खटमल, परजीवी और मक्खी-मच्छर भी हो लिए-जैसा कि अकसर हर भीङ के साथ होता है। आगे चलकर इस जमावड़े ने देश की परीक्षा प्रणाली की विभिन्न खामियों, विशेषकर ‘नीट पेपर लीक’ के मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल आरंभ कर दी। आइसा की नेहा बोरा और अन्य अनेक छात्रों के साथ इस दशक के छोटे अन्ना, ‘सोनम वांगचुक’ भी भूख हड़ताल पर बैठ गए। और 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसे पूरी दुनिया ने देखा। अंततः शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।

मात्र कुछ ही दिनों में किसी आभासी पटल पर गठित एक पार्टी के नेतृत्व में हिंदुस्तान में होने वाला यह पहला ऐतिहासिक युवा आंदोलन बन गया। किसी ने इसे जेन-जी का आंदोलन कहा तो किसी ने देशद्रोहियों का षडयंत्र! आगे जो भी हो, अंजाम जो भी हो—इस आंदोलन से दो बातें जरूर हुईं, पहली यह कि हर आम और खास के दिमाग में सत्ता का पहले वाला डर समाप्त हो गया; दूसरी यह कि झूठ व छद्म नैरेटिव आधारित मीडिया और आईटी सेल्स का साम्राज्य तिनकों की तरह बिखर गया।

लेकिन रुको जरा, खेल अभी खत्म नहीं हुआ। जिस प्रकार जेन-जी के बाद जेन-अल्फा के आंदोलनों की खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि हिंदुस्तान की जनता जिन जन क्रांतियों को भूल चुकी थी, एक बार फिर कहीं ये आंदोलन उनका प्रस्थान बिंदु सिद्ध न हो जाए।

इब्तिदाए इश्क़ है, रोता है क्या?
आगे-आगे देखिए होता है क्या।

लब्बोलुआब यह है कि न ‘कॉकरोच’ वाला ताना सी.जे.आई. साहब मारते, न सी.जे.पी. बनती, न उसके आभासी पटल पर करोड़ोंकॉकरोच फॉलोअर्स बनते, न बात आगे बढ़ती और न प्रधान जी की प्रधानगिरी और न सरकार की इज्जत दाँव पर लगती।

खैर जो हुआ सो हुआ, बाज लोग अब भी बाज नहीं आ रहे। कारण, ख़ुराफ़ात एक लाइलाज चर्म रोग है। अब भी कुछ अति-उत्साहित चिंतकचुल्लु और घनभक्त गुरुड़गुल्लु न खुद चैन से बैठते हैं, न किसी को बैठने देते हैं। सुना है ऐसी ही किसी कसमसायी आत्मा ने प्रधान तिलचट्टे अभिजीत दीपके से उसकी अमेरिका में हुई पढ़ाई पर खर्चे का हिसाब माँगा है। बदले में दीपके ने भी कह दिया है, “मैं तो दिखा दूँगा, लेकिन क्या मोदी जी अपनी डिग्री दिखाएंगे।”

लो जिस बात का डर था, घूम फिर कर बात वहीं आ गई। अरे धरती-धकेल चिंतकचुल्लुओ और गुरुड़गुल्लुओ! दीपके का कुछ बिगड़े या न बिगड़े—कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जहाँ तक सी.जे.आई. साहब की बात है, उनका तो नाम अमर हो गया। जैसे ताजमहल के साथ शाहजहां का नाम जुङा है, कोणार्क सूर्य मंदिर के साथ राजा नरसिंह देव प्रथम और हवा महल के साथ महाराज सवाई प्रताप सिंह का नाम जुङा है; सी.जे.आई. सूर्यकांत का नाम भी कॉकरोच जनता पार्टी के साथ सदैव जुङा रहेगा।

माना तुम्हारा भी कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन सरदार और सरदार के चाणक्य? क्या बिगाड़ा है उन्होंने तुम्हारा, कुछ तो ख्याल करो। इस नाजुक वक्त में क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हो? जाओ जाकर कोई और काम करो। देखते नहीं बीस जुलाई के बाद पंद्रह दिन से डबल इंजन संसद एक्सप्रेस दोनों ड्राइवरों की अनुपस्थिति में एक जगह ही खङी है।


“और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा”


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 05 अगस्त, 2026

 प्रकाशन: दैनिक इंदौर समाचार पत्र,  13 अगस्त, 2026



 

 



कविता: धत तेरे की


(Part of the poem)

डरे-सहमे चूहे
अपने-अपने बिलों में दुबके
सिर्फ़ चूहा-गोष्ठियाँ किया करते थे!


शेरों ने छोङ दिया था दहाड़ना
हाथी भूल चूके थे चिंघाङना
भयाकुल कौओं ने मूंद लीं थीं आँखें
और घोड़ों ने सीख लिया था— चुपचाप बोझा ढोना!


कुत्तों ने भी त्याग दिया था अपना चौकसी-धर्म
भौंकने की जगह
अब वे केवल दुम हिलाते थे!

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© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21 जुलाई 2026

Publication: 

1. सत्य की मशाल मासिक पत्रिका भोपाल August -2026
2. काव्य संग्रह 'चिंग-तम अमत्तनि' नोशन प्रेस प्लेटफार्म -2026







कविता: उठो, और भरो हुंकार




(Part of the poem)

हद है
तुम्हें अब भी यकीन है
यकीन है कि पत्थर पिघलेंगे
बादल फट जाएंगे
तुम्हारी कातर पुकार से
पसीज उठेगा व्याघ्र का कलेजा
सर्प छोङ देंगे डसना
शर्मिंदा होकर पीछे हट जाएंगे भेड़िए!

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उठो
और भरो हुंकार—
ऐसी हुंकार कि थर्रा उठें चारों दिशाएँ
जलाओ एक साथ, सैकड़ों-हजारों मशालें
लंबी, अंतहीन रात से पहले
शिकारी की आख़िरी चाल, शह और मात से पहले
इससे पहले कि देर हो जाए—उठो
वर्तमान के लिए उठो
भविष्य के लिए उठो
उठो!

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© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 16 जुलाई 2026

Publication: 
1. सत्य की मशाल मासिक पत्रिका भोपाल अगस्त-2026
2. काव्य संग्रह 'चिंग-तम अमत्तनि' नोशन प्रेस प्लेटफार्म -2026




 


चिंग-तम अमत्तनि (कविता संग्रह) नोशन प्रेस चेन्नई प्लेटफार्म पर निर्मित प्रकाशन की तिथी: 26 अगस्त, 2026 https://www.amazon.in/dp/B0HGMDJ3J3?...