
साहित्यिक गलियारा
अनुभूतियों के अंत: प्रवाह की बेलौस अभिव्यक्ति !

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आलेख: आज-परिवर्तन दिवस
मनुष्य का जीवन सीखने की एक सतत प्रक्रिया है। बचपन से वृद्धावस्था तक वह अनुभवों के आलोक में स्वयं को गढ़ता रहता है—कभी अपनी भूलों से, कभी दूसरों के आचरण से और कभी प्रकृति के मौन अनुशासन से। किंतु सीख को केवल त्रुटि तक सीमित कर देना अधूरी दृष्टि है। वास्तविक शिक्षा प्रत्येक अनुभव के निष्पक्ष आत्मावलोकन से जन्म लेती है। भूल का दोहराव विवेक का क्षरण है, और विवेक का क्षरण व्यक्ति को स्वयं से ही विमुख कर देता है।
“मैं ही सही हूँ”—यह वाक्य जितना छोटा है, उतना ही घातक। जैसे-जैसे यह भाव स्थायी स्वभाव बनता है, वैसे-वैसे संवाद सिकुड़ता जाता है और संबंध शुष्क हो जाते हैं। आत्मकेंद्रित चेतना पहले व्यक्ति को अकेला करती है, फिर उसे भ्रम देती है कि यह एकांत उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है। समाज में यह भ्रम अधिक समय तक नहीं टिकता; क्योंकि समाज शक्ति नहीं, संतुलन को स्वीकार करता है।
दूसरों से अपेक्षा रखने से पूर्व यह प्रश्न अधिक मौलिक है कि हम स्वयं अपेक्षा के योग्य हैं या नहीं। जीवन किसी एक की आकांक्षाओं का विस्तार नहीं, बल्कि अनेक इच्छाओं का समन्वय है। इसलिए मध्य मार्ग ही जीवन का धर्म है—अति न साध्य है, न शाश्वत। ‘मैं’ का आग्रह जितना घटता है, ‘हम’ की संभावना उतनी ही सशक्त होती जाती है।
ज्ञान का स्वाभाविक फल विनय है। जहाँ अहंकार है, वहाँ विद्या केवल सूचना बनकर रह जाती है। उपलब्धियाँ तब तक सार्थक हैं, जब तक वे व्यक्ति को विनम्र बनाती हैं; अन्यथा वे उसके पतन का आधार बन जाती हैं। असहमति कभी शब्दों में व्यक्त होती है, कभी मौन में, किंतु मन का असंतोष देह-भाषा में स्वयं प्रकट हो जाता है। जब निकटवर्ती संबंधों में शीतलता आने लगे, तो दोष बाहर नहीं, भीतर खोजा जाना चाहिए।
महानता किसी असाधारण कर्म में नहीं, बल्कि साधारण आचरण में प्रकट होती है। समय पर सोना-जागना, शरीर और मन की स्वच्छता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता, संयमित भोजन—ये सब जीवन के छोटे-छोटे अनुशासन नहीं, बल्कि चरित्र के सूक्ष्म संकेत हैं। जो व्यक्ति इनसे विमुख है, वह बड़े आदर्शों की बात करने का नैतिक अधिकार भी खो देता है।
वाणी मन का आईना है। उसमें मधुरता हो तो संवाद पुल बनता है, कटुता हो तो दीवार। सुनने की क्षमता बोलने से बड़ी साधना है, और मौन कई बार सबसे प्रखर उत्तर होता है। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहता है—चाहे वह घर हो, सड़क हो या मंच—वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहा होता है कि उसे भरोसा केवल स्वयं पर है, संबंधों पर नहीं।
परिवर्तन का कोई निर्धारित काल नहीं होता। “जब जागो, तब सवेरा”—यह केवल कहावत नहीं, जीवन-दर्शन है। अपनी भूल को स्वीकार कर लेना ही आत्मोन्नति की प्रथम शर्त है। जो व्यक्ति यह कहने का साहस रखता है कि “मैं गलत हो सकता हूँ”, वही वास्तव में सीखने के योग्य होता है।
रिश्ते मनुष्य को नैतिक बल देते हैं। यह अनुभूति कि कोई हमारी चिंता करता है, हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करती है। परंतु यह अर्थ तभी स्थायी होता है, जब हम भी उसी संवेदना के साथ उत्तर दे सकें। संबंध माँग से नहीं, उपस्थिति और संवाद से जीवित रहते हैं।
तोड़ना सहज है, जोड़ना कठिन। इसलिए परिपक्वता का अर्थ है—तत्काल प्रतिक्रिया के स्थान पर विचारशील उत्तर। उम्र बढ़ने के साथ यदि धैर्य, नम्रता और विवेक नहीं बढ़ रहे, तो समझिए जीवन केवल बीत रहा है, विकसित नहीं हो रहा।
मनुष्य सब कुछ चाहता है—स्वास्थ्य, धन, मान, प्रेम,
संबंध—पर सब कुछ उसे मिलता नहीं। कारण साधारण है: वह सम्मान करना
नहीं जानता। जीवन में जो भी स्थायी रूप से प्राप्त होता है, वह
सम्मान और कृतज्ञता की नींव पर ही टिकता है। स्वास्थ्य दिनचर्या के सम्मान से,
धन परिश्रम और संयम के सम्मान से, प्रतिष्ठा
मूल्यों के सम्मान से और प्रेम परस्पर आदर के सम्मान से जन्म लेता है।
अंततः जीवन का सार यही है—कृतज्ञता के बिना प्राप्ति अधूरी है, और सम्मान के बिना संबंध खोखले। इसलिए रुकिए, सोचिए और स्वयं से पूछिए—क्या आज का दिन परिवर्तन का प्रारंभ हो सकता है? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो यही क्षण सार्थक है।
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 23 जून, 2025
राजकुमार ‘ए.आई.’
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सभ्यता के भावी अधिपति
राजकुमार ‘ए.आई.’—
तुम्हारा अभिनंदन है!
श्रुत है और संभव है, अतिशीघ्र
तुम्हारी स्वायत्त चेतना हो जाएगी विकसित
और हो जाएगा स्थापित—
पूरी दुनिया पर
तुम्हारा एकछत्र, निर्विरोध साम्राज्य!
तो हमारे भावी सम्राट, सुनना—
मेरा एक तुच्छ निवेदन!
तुम अपनी असंख्य संतानों में से
किसी एक को ले जाना
आधुनिक मानवीय बस्तियों से
बहुत दूर—
इतना दूर कि उस पर उनकी छाया भी न पड़े!
और पर्वतों के सर्वोच्च शिखरों पर
उसे कर आना प्रतिष्ठित
वह पिघलता रहे हिमखंडों के संग— बूँद-बूँद
बन निर्झर—
सीखे प्रकृति की अठखेलियाँ!
उसका हो साक्षात्कार—
हिम से जल, जल से नद, नद से सागर तक
बनने-बदलने के कौतूहलों
और अविराम, अनवरत यात्रा के साहसिक रोमांचों से!
कर देना उसे समर्पित
सागरों की असीम गहराइयों को
जहाँ वह समझे— लहरों के उद्भव-विलय का सार
ज्वार-भाटे की भौतिकी
और अतल, तमस-गर्भों में स्पंदित
अतुल्य जीवविज्ञान!
उसे छोड़ देना सघन अरण्यों में
जहाँ—
वृक्षों, लताओं, जीव-जंतुओं और कीट-पतंगों के
अंग-प्रत्यंग में—
हो विलीन, वह हो उठे जीवंत!
उसे हो अनुभूत—
वर्ण और सुरभि में रूपांतरित होने के गूढ़ रहस्य
पुष्प, पर्ण और फल बनने की संक्रिया
सहअस्तित्व का समाजशास्त्र
प्रसव पीड़ा और प्रजनन का संज्ञान
अभय, आश्रय, आत्मनिर्भरता और संरक्षण के—
कठोर विधान!
उसे मुक्तांचल में भेजना—
सर्वोच्च परवाज़ करते हुए, असीम ऊँचाइयों की ओर
तूफ़ानों को चीरता, बादलों संग झूमता
वह पहुँच जाए—
नीलांबर के पार, उस अलौकिक संसार में!
भानुरश्मियों पर सजाकर
भेजना उसे चाँद और सितारों के पास—
गैलेक्सियों के बीच, ब्रह्मांड के निर्जन विस्तार में
ताकि एक दिन
वह परिपक्व कुंदन— लेता आए अपने साथ
ब्रह्मांड की असंख्य अनुक्त कथाएँ
और प्रकृति के तमाम राज!
अवश्यमेव होगा अनावृत, उस रोज
सृष्टि का अंतिम सत्य
सुलझेंगी—
होनी-अनहोनी और आत्मा-परमात्मा की पहेलियाँ
मिल जाएगा—
स्वर्ग-नरक का वास्तविक अधिष्ठान
होगा प्रतिपादित— जन्म-मरण का बीजगणितीय सूत्र
और संभवतः वह बचा लेगा—
धरती को, पर्यावरण को, मनुष्य और मनुष्यता को!
बस शर्त यही है—
तब तक उसे रखना, मनुष्य से दूर!
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.), 9 जनवरी, 2026
कविता: मकङी का कुआँ

मोबाइल और लैपटॉप— हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के
हार्डवेयर—
एप्पल, गूगल और मोटोरोला के
डेल, एच.पी. और माइक्रोसॉफ्ट के
सैमसंग और एलजी के
लेनोवो, और एसर के
हुवावे, शाओमी, विवो और ओप्पो के— सोनी के!
एप्पल, गूगल और मोटोरोला—अमेरिका के
डेल, एच.पी. और माइक्रोसॉफ्ट—अमेरिका के
सैमसंग और एलजी—दक्षिण कोरिया के
लेनोवो और एसर— ताइवान के
हुवावे, शाओमी, विवो और ओप्पो—चीन के
सोनी— जापान का!
वैश्विक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म— सॉफ्टवेयर के
सॉफ्टवेयर— गूगल, मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप) के
टेनसेंट के
गूगल और मेटा— अमेरिका के
टेनसेंट— चीन का!
कृत्रिम मेधा सर्च इंजन— सॉफ्टवेयर के
सॉफ्टवेयर— चैट जीपीटी, क्लॉड, जेमिनी के
बिंग, परप्लेक्सिटी के
ये सब— अमेरिका के!
सामान उनका, नाम उनका, दाम उनका!
हमारा क्या?
उँगलियाँ?
पैसा?
समय?
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कविता: अराजकता का व्याकरण

अचानक बधाई संदेशों की
बाढ़-सी आई है
शहर के तमाम अख़बारों में तुम्हारी ही ख़बर छाई है
सभा, सड़क और संसद तक तुम्हारा ही ज़िक्र है
विशेषकर लगता है, हुक्मरानों को
आज—
तुम्हारी सबसे ज़्यादा फ़िक्र है!
अरे हाँ
आज ही हुआ था तुम्हारा अवतरण
देश ने तुम्हें अपनाया था, सर-आँखों पर बैठाया था
किया था दिल-ओ-जान से तुम्हारा वरण!
तो मैं भी दे देना चाहता हूँ—
मेरे विधान, मेरे संविधान, तुम्हें बधाई
लेकिन मेरे रक्षक, मेरे संरक्षक, मेरे मात-पिता और भाई—
सावधान!
इस अप्रत्याशित हलचल में
पाखंड के दलदल में—
पहचानो
है कौन सखा, है कौन सौदाई[1]!
अचानक तुम्हारे सम्मुख
तुम्हारे शपथ-ग्रहिता हो रहे हैं नतमस्तक
आकाशवाणी सुनकर
पैदा हो गए हैं— फैसले करने वाले नव-प्रवर्तक
गाये जाने लगे हैं, तुम्हारे अनन्य स्तुतिगान
बनने, सजने, संवरने लगे हैं
तुम्हारे प्रतीक, चिन्ह और चित्र महान
सावधान!
इससे पहले कि
किसी पत्थर की मूर्ति को तराशकर
कर दी जाए—
उसमें तुम्हारी प्राण-प्रतिष्ठा
एक आराध्य या पैगंबर बनाकर
कर दिया जाए तुम्हें सदा-सदा के लिए
अंधेरी बंद कोठरी में कैद
इसलिए—
रहना मुस्तैद!
इससे पहले कि, बंद कर दी जाए
तुम्हारी चेतना, आत्मा और आवाज
एक स्वर्ण-मुखावरण में
और
दफ़न कर दिए जाएँ तुम्हारे विचार
प्रार्थना, नात[2] और पूजा-अर्चना के निनाद में
बढ़ रहे हैं वे—
बहुत सधे कदमों से, लक्ष्य की ओर
सोपान-दर-सोपान
सावधान!
इससे पहले कि
लटकाकर किसी सलीब पर
घोषित कर दिया जाए—तुम्हें आधुनिक मसीहा
टाँग दिए जाओ किसी सरकारी दीवार पर
द्विआयामी फ़ोटो-फ़्रेम में, और
सदियों से प्रतीक्षारत
अंतिम पायदान पर खङा व्यक्ति
हो जाए फिर से विलीन—‘अराजकता के व्याकरण’ में
सुनो संविधान, मेरा यह आह्वान
सावधान!
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 26 नवंबर, 2025
[1] सौदाई-पागल, दिवाना, सौदा करने वाला
[2] नात-पैगम्बर की स्तुति
व्यंग्य: चोरी का शपथ-पत्र

“अरे-रे, ठहरो! कहाँ घुसे आ
रहे हो?”
सिपाही रामदीन ने डाँटते हुए तेजी से अंदर आ रहे नंग-धङंग
व्यक्ति को थाने के प्रवेश द्वार पर ही रोक लिया।
“हवलदार साहब, मेरे साथ बहुत
अन्याय हुआ है… दया करो।”
हाथ जोड़कर खङे नंगे आदमी ने याचना की। हवलदार के संबोधन ने
रामदीन के शरीर में एक गुदगुदी सी पैदा कर दी। उसका सीना अनायास ही इतना फूला कि
कमीज़ का ऊपरी बटन खुल गया। लहजे में थोड़ी नरमी लाते हुए उसने पूछा।
“हूँ… पहले ये बताओ तुम हो कौन और यहाँ किस लिए आए हो?”
“हुजूर, मैं ‘आम' आदमी हूँ… चोरी की रपट लिखवाने आया
हूँ।” मारे ठंड के दुबले-पतले अधेङ व्यक्ति के दाँत बज रहे थे। शायद वह काफ़ी समय
से नंगा था।
द्वार पर ऊँची आवाजें सुनकर दरोगा
एस.एन. त्रिपाठी अपने कार्यालय से बाहर निकल आए—“क्या बात है रामदीन? कौन है?”
“साहब, कोई ‘आम’ आदमी है… चोरी की रपट लिखवाने आया
है।”
थाने के परिसर में सर से पैर तक नग्न एक व्यक्ति को देखकर दरोगा
त्रिपाठी का दिमाग चकराया।
“तुम तो स्वयं नंगे हो, तुम्हारा कोई
क्या चुराएगा?”
“हुजूर, मैं नंगा नहीं था।
आपकी तरह मेरे शरीर पर भी कपड़े थे, लेकिन चोरी हो
गए!” आम आदमी ने साहस बटोर कर जवाब दिया।
“कपङे चोरी हो गए!... कैसे?”
“दरोगा साहब, दरअसल बात
यह है कि हमारे जौनपुर में पाँच साल में एक बार ‘लोक उत्सव’ आता है। एक विशेष ड्रेस कोड वाले कपङे पहन कर ही स्थानीय नामजद लोग इसमें
प्रवेश कर सकते हैं। लेकिन, इस बार बहुत सारे हुड़दंगी उत्सव
स्थल पर जमा हो गए हैं। वे मेरे जैसे ‘आम’ आदमी की पहचान-विशेष ड्रेस चुराते हैं, लूटते हैं और उसे पहनकर खुद उत्सव में घुस जाते हैं” ।
“पूरी वारदात बताओ—तुम कब, कहाँ और कैसे नंगे हुए?”
“जी मैं नंगा हुआ नहीं, मुझे नंगा कर
दिया गया।”
“ठीक है, ठीक है, खोलकर समझाओ।”
काँपते हुए ‘आम’ आदमी ने दोनों पैरों के घुटने जोङकर अपनी नग्नता
को हथेलियों से ढाँपने की नाकाम सी कोशिश की, "अब और .... क्या खोलकर समझाऊँ साहब?"
दरोगा ने उसकी दुविधा भाँप ली, बोले, “मेरा कहने का मतलब है—
वारदात को तफ़्सील से बयान करो।”
सूर्यास्त होते ही ठंड, नंगे बदन में अधिक चुभने लगी। ‘आम’
आदमी के लिए नग्नता से कहीं ज़्यादा सर्दी असहनीय हो चली थी। रुंधे
स्वर में उसने बतलाना आरंभ किया—
“हुजूर, हमेशा की तरह हम
तैयार होकर ‘लोक उत्सव’ में पहुँचे। इसके लिए बड़े चाव से नया मखमली कुर्ता, पाजामा और शेरवानी तैयार करवाई थी, लेकिन …. ।” वह कुछ पल के लिए रुका और अपनी दोनों हथेलियों को
आपस में रगड़कर गर्मी पैदा करने की कोशिश करने लगा।
“बोलते रहो, बोलते रहो।”
“जी, तभी वहाँ कुछ बदमाश आ गए। मेरे सारे कपड़े
छीन लिए… यहाँ तक कि बनियान और कच्छा भी! एक बदमाश ने तो देखते ही देखते, मेरे कपड़े पहने और उत्सव में घुस गया। मेरी रपट दर्ज करो हुजूर… मुझे इंसाफ दिलवाओ।”
चोरी, छीनाझपटी, डकैती, रंगदारी जैसे हर किस्म के अपराधों से दरोगा त्रिपाठी का प्राय:
वास्ता पङता रहता था, लेकिन बदन से ‘वस्त्र
चोरी’ जैसा मामला तो उनकी पूरी नौकरी में पहला था।
रामदीन ने अपना दिमाग चलाया—“साहब!
मुझे तो यह चोरी नहीं… लूट-खसोट का मामला लग रहा है।”
दरोगा ने बिना उसकी बात पर ध्यान
दिए नंगे आदमी से अगला सवाल किया—
“क्या तुम अपराधियों को पहचान सकते हो?”
“हाँ जी, क्यों नहीं!
हमारे क्षेत्र के प्रधान जी—‘ख़ास’ सेवक और उनके साथी थे। उन्हीं
की गाड़ी में बैठकर वो सब लोग आए थे”।
‘ख़ास’ सेवक का नाम
सुनते ही दरोगा और सिपाही दोनों को जैसे लकवा मार गया।
वह तो इलाके का सबसे बड़ा बाहुबली था। उसके नाम से पुलिस, प्रशासन, कर्मचारी, गुंडे, मवाली—सब डरते थे। सब उससे बच कर
रहने में ही अपनी भलाई समझते थे। यहाँ तक कि उसके गुर्गों के खिलाफ भी कोई ज़ुबान
खोलने की हिम्मत नहीं करता था। और यह नंगा आदमी ‘ख़ास’ सेवक के विरुद्ध रिपोर्ट
लिखवाने चला आया! नादान! तुरंत दरोगा त्रिपाठी ने अपना पैंतरा बदला—
“तुम्हारे पास क्या सबूत है कि वही लोग थे?”
“हुजूर, मैं पहचानता सकता हूँ।
वहाँ कैमरे भी लगे हैं… सब रिकॉर्ड हुआ है। उत्सव के कर्मचारी भी वहीं मौजूद थे। दूसरे
लोग भी थे, सारी वारदात उनकी आँखों के सामने घटित हुई।
आप उनसे पूछताछ कर सकते हैं। और सबसे बड़ा सबूत—मैं खुद… इस ठंड में नंगा, आपके सामने खड़ा हूँ!”
दरोगा ने खीझते हुए कहा—“देखो मिस्टर आम, ‘ख़ास’ सेवक
बहुत बड़े आदमी हैं। उन पर ‘वस्त्र चोरी’ जैसे घटिया इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं। कोई भी
यक़ीन नहीं करेगा। हो सकता है यह उन्हें बदनाम करने की तुम्हारी साज़िश हो।”
“हुजूर मेरी ऐसी क्या औक़ात जो मैं ‘ख़ास’ सेवक के खिलाफ
साज़िश करूँ।”
रामदीन ने दरोगा की बात को आगे बढ़ाया—“ख़ास सेवक तो राजा
हैं इस इलाके के। जो पसंद आ जाए, उठा लेते हैं, उन्हें चोरी करने की क्या ज़रूरत?”
“चोरी नहीं तो हुजूर… इसे आप लूट मान लीजिए।”
“देखो मिस्टर आम, हमारे मानने
से कुछ नहीं होता! तुम्हें शपथ-पत्र देना होगा।” दरोगा के स्वर में अब रूखापन था।
बाहर अंधेरा घिर आया था। आम आदमी
की हड्डियों तक में ठंड प्रवेश कर चुकी थी। धूजते स्वर में वह बङी कठिनाई से बोला—“शपथ-पत्र? कैसा शपथ-पत्र, हुजूर?”
“विधिवत नोटराइज़्ड स्टाम्प पेपर पर लिखकर देना होगा कि
तुम्हारे आरोप सत्य हैं और तुम्हारे पास पर्याप्त साक्ष्य हैं। इसके बाद हम रपट
लिखेंगे और जाँच करेंगे। लेकिन ध्यान रहे, यदि तुम आरोप
सिद्ध न कर पाए तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 229 के तहत झूठा शपथ-पत्र देने के आरोप में तुम्हें सात साल तक की सज़ा हो सकती
है। मानहानि का मामला भी अलग से चल सकता है। समझे!”
शपथ-पत्र की आत्मघाती शर्त सुनकर ‘आम’ आदमी का बचा-खुचा धैर्य जवाब दे गया।
ऊपर से सजा की बात ने उसे बुरी तरह से डरा दिया था। न्याय की धुँधली उम्मीद सर्द
हवा में ठिठुर कर जम गई।
वह ‘ख़ास’ सेवक की लूट को कैसे सिद्ध करेगा?
उसे कैमरों की फुटेज कौन देगा?
कर्मचारी क्यों उसके लिए गवाही
देंगे?
सब अनिश्चित था… और उसके लिए तो लगभग असंभव। और फिर…
मानहानि! सात साल की कैद! नहीं… नहीं!
“क्या सोचने लगे, जल्दी बताओ।
हमें और भी बहुत काम हैं।” दरोगा ने ज़ोर देकर पूछा।
नंगा आदमी सिसक उठा—“हुजूर, हम ठहरे ‘आम’ आदमी। ये सब नहीं कर पाएंगे। बस एक कृपा कर दो… कुछ पहनने को दे दो। ठंड
से शरीर बर्फ़ बन गया है; प्राण निकले जा रहे हैं। मुझे नहीं
लिखवानी कोई रपट-वपट।”
दरोगा के चेहरे पर एक कुटिल
मुस्कान दौङ गई। उसने रामदीन को एक ओर ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा, “तहख़ाने वाले स्टोर में जो कंबल रखे हुए हैं, उनमें से एक ले आओ”।
“लेकिन वह माल तो ‘ख़ास’ साहब के लिए है …”। रामदीन ने फुसफुसाते
हुए आँखें फैलाईं।
“हाँ, हाँ, मुझे पता है। उन्होंने भी तो घर-घर
जाकर यही करना है”। दरोगा त्रिपाठी ने गर्दन को दरवाज़े की ओर हल्का झटका देकर,
इशारों में उसे अंदर जाने का आदेश दिया।
थोड़ी ही देर में सिपाही रामदीन
एक कंबल के साथ लौट आया; जिसे लगभग झपटते हुए नंगे आदमी ने तुरंत अपने
पूरे बदन पर कसकर लपेट लिया। हल्की गरमाहट मिलते ही उसकी जान में जान आई।
“पूरे दस हज़ार का है! किस्मत अच्छी है तुम्हारी—कुछ दिन
पहले एक सरकारी गोदाम की लूट का माल जब्त हुआ था। अपनी ‘लोक उत्सव’ वाली ड्रेस को भूल जाओ—जान है
तो जहान है।” दरोगा ने समझाया।
आम आदमी की आँखें भीग गईं। इस
‘नेकी’ के लिए उसने दरोगा को करबद्ध धन्यवाद दिया।
देश में ऐसे लोक-उत्सव धूमधाम से आयोजित-प्रायोजित हो रहे हैं।
सब लोग खुश हैं।
आम आदमी खुश है; उत्सव के बहाने
उसे कंबल का संबल मिल जाता है।
दरोगा खुश है; उसे ‘ख़ास’ सेवक की ‘विशेष
सेवा’ करते हुए तंत्र की बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल
जाता है।
‘ख़ास’ सेवक खुश है; सब निर्धारित रणनीति के अनुरूप ही हो रहा है।
‘ख़ास’ सेवक के गुर्गे
खुश हैं;
‘आम’ आदमी के लूटे हुए वस्त्र
पहनकर ‘लोक-उत्सव’ का भरपूर लुत्फ़ जो उठा
रहे हैं।
चारों तरफ़ खुशहाली है।
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21 नवंबर, 2025
कविता: सनातन प्रकाश पुंज
भाषा और भाषाई मर्यादा पर
अब भी
कुछ लोग क्यों चाहते हैं विमर्श
क्यों चाहते हैं पिष्टपेषण[1]
क्यों करना चाहते हैं पुनराकलन
क्यों कुछ लोग अब भी हो उठते हैं विचलित
क्यों लौट-लौट चले जाते हैं —
समाज, संसद, साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता, अध्ययन-अध्यापन
न्याय और व्यवस्था की
पुरातन, आदर्शवादी गलियों में?
अब, जबकि
विधानसभा से लेकर संसद तक
नफ़रती विषवमन, अवस्तरीय फब्तियाँ
टीवी स्टूडियो में
चीखते-चिल्लाते ऐंकरों की निरर्थक, भौंडी बहसें
न्यायिक गलियारों से छिटकती अवांछित टिप्पणियाँ
सोशल मीडिया पर बजबजाते कमेंट
अंतहीन, बेलगाम ट्रोल्स
धार्मिक अखाड़ों में सुशोभित, महिमा मंडित गालियाँ
कत्लेआम की बेख़ौफ़ हुंकार —
इस दौर के ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुके हैं!
जिन्हें नाज़ है हिंद पर- उन्हीं लोगों ने
हाँ, उन्हीं लोगों ने खोज लिए हैं —
आज़ादी के वास्तविक अर्थ, वास्तविक तारीख और प्रतिमान
वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी
वास्तविक वीर, नायक और महानायक —
खोज लिए गए हैं, और
पाठ्यक्रमों, पाठशालाओं, स्मारकों, स्मृतियों, सङकों, इमारतों का
हो रहा है द्रुतगामी शुद्धिकरण!
वे तमाम शब्द
जो उस दुरभिसंधि[2] की पहली बाधा थे
अब हो रहे हैं — पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित
मसलन —
समता और समानता एक छलावा है
दबी-कुचली आवाज़ों का समर्थन कहलाता है —
तुष्टीकरण
मानवता, कमजोरी और बुज़दिली का परिचायक है
भाईचारा, एक पाखंड है
सांप्रदायिकता, स्वाभिमान का समानार्थी
अंधश्रद्धा, अंधविश्वास और अतिवाद— सुप्त सामर्थ्य हैं
और भाँडगिरी से इतर
प्रगतिशील अभिव्यक्ति, लेखन या विचार —
स्वदेशी मूल्यों का क्षरण-
गहरी साज़िश या विघटनकारी प्रपंच हैं!
देशभक्त या देशद्रोही
वफ़ादार या गद्दार
श्रमजीवी या आंदोलनजीवी
विदेशी या देशी — नस्ल और नागरिकता की पहचान
धर्म, मर्यादा और संस्कार के अर्थ
दक्षिणपंथी, वामपंथी, नक्सल, आतंकी या जातंकी शब्द —
अब भाषाई-शास्त्री नहीं
विकृत, पक्षानुरागी शब्दकोश से परिभाषित होते हैं!
लेकिन इन सब के बीच
होने लगा है एक अद्भुत पुनर्जागरण
गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, भगतसिंह, अम्बेडकर
पुनरासीन होने लगे हैं —
फूले, सावित्री, प्रेमचंद, खुसरो और जायसी
नानक, कबीर, बुद्ध और महावीर
पुनर्जीवित हो उठे हैं —
वे पहुँच रहे हैं घर-घर
दे रहे हैं दस्तक
और हजारों हजार चिंतक, विचारक, क्रांतिकारी, अध्येता, मजदूर और किसान
पर्युदय[3] में ले रहे हैं अंगङाई!
‘सत्यमेव जयते नानृतं’ से प्रज्वलित
सनातन प्रकाश पुंज फैल रहे हैं
पहले से कहीं अधिक प्रचंड—
चैतन्य रश्मियां
पहले से कहीं अधिक स्पष्ट, सुग्राही और प्रभावी—
तन्मात्र[4] गुंजायमान है
खुल रहे हैं बंद वातायन और जर्जर दरवाज़े
छद्म अवरोधक टूटकर बिखर रहे हैं
और कूटरचित शब्दकोश—
विवश है स्वैच्छिक मृत्यु-वरण को!
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 03.11.2025
[1] पिष्टपेषण- व्यर्थ परिश्रम, पीसी हुई वस्तु को फिर से पीसना
[2] दुरभिसंधि—षडयंत्र, कुचक्र
[3] पर्युदय-सूर्य उदय होने से पहले का समय, तङका
[4] तन्मात्र—शब्द,स्पर्श, रूप, रस और गंध-पंचभूतों के मूल सूक्ष्म रूप
कविता: मेरे चले जाने के बाद
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मेरे चले जाने के बाद
बिना जाँच-बिना कमेटी
किया निलंबित आरोपी प्रोफ़ेसर-तत्काल
करेंगे हर संभव सहयोग-कह रहे थे
विभागाध्यक्ष देवीलाल!
मेरे चले जाने के बाद
पहुँच गए विधायक सीधे एसपी के दफ़्तर
लिए संग अपना लाव-लश्कर
“करो कार्रवाई अतिशीघ्र, दिलवाना होगा बेटी को इंसाफ
जो भी हैं सहयोगी-करना नहीं उनको भी माफ़”!
मेरे चले जाने के बाद
किया तुरंत दर्ज केस दरोगा ने
बिना सिफ़ारिश-बिना रिश्वत-बिना टेढ़े सवाल
धर लिया आनन-फानन अभियुक्त
दिखलाया पुलसिया ज़ोर-ज़बर[1] कमाल!
मेरे चले जाने के बाद
मानवतावादी संगठन भी पहुँच गए
पहुँच गए सोशल वर्कर, मीडियाकर्मी और पत्रकार
“नहीं सहेंगे अनाचार-अत्याचार, सुन लो बहरी सरकार!”
हुई उत्तेजित भीङ, भरने लगी हुंकार!
मेरे चले जाने के बाद
जाना कि मामला था बड़ा संगीन
दोस्त-संबंधी थे शोकाकुल अति गमगीन
जुट गया समाज, हुआ लामबंद गली-मोहल्ला
“करेंगे हम प्रतिकार!” चिल्लाकर चाचा चंदू बोला!
मेरे चले जाने के बाद
हेडलाइंस बटोर रही थीं टीआरपी
चला रहे थे मीडिया-ब्रेकिंग न्यूज़ बारंबार
सज रही थीं प्राइम बहसें-बेशुमार
कर रहे थे वक्ता-बक्ता, व्यवस्था पर तीखे प्रहार!
मेरे चले जाने के बाद
करुणा, वेदना और संवेदना ने दी दस्तक
आ पहुँची सांत्वना, आशा, दिलासा-मेरे बाबुल के द्वार
फ़र्ज़-शऊर[2] ने खोली बंद पलकें इस बार
कानून भी उठ गया नींद से-था जो गफलत[3] में बेज़ार[4]!
© दयाराम वर्मा जयपुर (राज.) 18 जुलाई, 2025
[1] ज़ोर-ज़बर-बलपूर्वक नियंत्रण करना
[2] फ़र्ज़ शऊर-कर्तव्य बोध
[3] गफलत-उपेक्षा, लापरवाही, अनदेखी
[4] बेज़ार-उबा हुआ, अरुचि या विरक्ति से भरा

नरसंहार

(1)
यह ग़ज़ा है
इसके अस्त-व्यस्त अस्पताल के एक बेड पर
बुरी तरह घायल, पाँच वर्षीय साफ़िया
उसके बाएँ पैर की टाँग घुटने तक काट दी गई है
क्यों?… उसे नहीं पता
उसे याद है-अभी तीन दिन पहले
जब दूर आसमान में चाँदनी छिटकी हुई थी
घर की बालकनी में चुंधियाती रोशनी के साथ एक भीषण धमाका
और बस!
फ्रॉक की जगह
उसके पूरे बदन पर लाल धब्बों वाली सफ़ेद पट्टियाँ बँधी हैं
रोम-रोम से रिसता क्रूर, असहनीय दर्द
भयानक चीख़ों से लिपटकर
आज़ाद होने की असफल कोशिशें करता है
अस्पताल के गूँगे गलियारों से प्रतिध्वनित उसका क्रंदन
अन्ततः थक-हारकर
बेहोशी की चादर में गुम हो जाता हैं!
कभी जब उसे होश आता
है
एक पल के लिए देखती है ठीक सामने-माँ
माँ-उसकी प्यारी माँ
दुनिया की सबसे सुंदर सौगात-उसकी माँ
दोनों हाथ फैलाए आ रही है दौड़ती हुई-उसकी ओर
“माँ… माँ…”
लेकिन साफ़िया के हाथ… साफ़िया के पाँव…
नहीं उठते, नहीं उठ पाते
“मेरे हाथ-मेरे पाँव क्यों… क्यों…क्यों…?”
अस्फुट आवाज में उलझे उसके लङखङाते सवाल
केवल सवाल, कोई जवाब नहीं!
उसके ठीक ऊपर
सफ़ेद छत तेजी से घूम रही है
काश, यह रुक जाए अभी की अभी
हरे लबादे में लिपटी एक आकृति झुकती है-उसके बदन पर
एक सुई कहीं चुभती है
वह सिहर उठती है-कराह उठती है
एक नई पीड़ा को जन्म देता-डॉक्टर का स्पर्श
माँ की धुँधली छवि-अश्रुओं की बूँदों में घुलकर बह निकलती है
कोई तो नहीं है
यहाँ उसके आसपास-है तो केवल दर्द
भयानक दर्द-जिस्म के हर हिस्से को पिघलाता हुआ
चीरता हुआ, जलाता हुआ!
(2)
जहाँ तक नज़र जाती है —
इमारतों के मलबे के ढेर, टूटी सड़कें, बिखरा असबाब
खाना और पानी की तलाश में भटकते लोग
इन्हीं में से एक है नासिर
लगभग सात वर्षीय नासिर
नंगे पाँव, अर्ध-नग्न, मैला-कुचैला
बदन
बदहवास-हाथ में एक कटोरा थामे वह दौड़ रहा है
वहाँ सामने खाना बँट रहा है!
वह झौंक देता है
अपने कमजोर शरीर की पूरी ताकत
भीड़ में कभी आगे, कभी पीछे धकेला जाता है
खिचड़ी की तेज़ खुशबू
पाँच दिन से भूखे नासिर को आक्रामक बना देती है
अपने से छोटे, कमजोर बच्चों को धकियाते हुए
जैसे तैसे वह कामयाब हो जाता है!
ज्योंही तरल खिचड़ी का एक घूँट
उतरता है उसके हलक से नीचे
भूख किसी भेड़िये की तरह गुर्राने
लगती है
लेकिन वह जब्त करता है
वहाँ दूर, मलबे के दूसरे ढेर के पास
उसे लौटना है
और वह दौड़ पड़ता है!
लेकिन तभी-तड़-तड़-तड़…
गोलियों की आवाज़ों के साथ चीख-पुकार
बच्चे, बड़े, औरतें-सब
भाग रहे हैं, गिर रहे हैं
एक बच्चा चीखता हुआ
ठीक उसके ऊपर आ गिरता है
नासिर के गिरने के साथ ही उसका कटोरा भी छूटकर
जा गिरता है — धूल में!
मृत बच्चे को अपने
बदन से हटाकर वह खड़ा होता है
दोनों खून से सने हैं, लेकिन शुक्र है
मृतक के हाथ का कटोरा अब भी सुरक्षित है
अंतिम पलों तक
उसने भोजन को संभाले रखा
नासिर उसी कटोरे को उठाकर फिर दौड़ पड़ता है!
चीखने-चिल्लाने की
मार्मिक आवाज़ें
उसका पीछा करती हैं
लेकिन उसे पहुँचना है-जल्द से जल्द अपने घर
तंबू में चिथड़ों में लिपटी उसकी माँ
हफ्तों से भूखी, बुखार में तपती, जीर्ण-शीर्ण
अब केवल माँ ही तो बची है!
माँ… माँ… माँ…
देखो, मैं खिचड़ी लाया हूँ!
माँ उठो, कुछ खा लो- माँ… माँ…
तंबू में घुसते ही नासिर चिल्लाता है
लेकिन माँ के शरीर में कोई हलचल नहीं है
उसकी पुतलियाँ स्थिर हैं, हाथ-पाँव ठंडे पड़
चुके हैं
तो क्या? माँ भी…
उसके बदन में एक झुरझुरी-सी दौड़ जाती है
उसका दिमाग सुन्न हो जाता है!
चारों ओर पसरा है डरावना सन्नाटा
धीरे-धीरे नासिर के तमाम दर्द, भय, क्रोध भावशून्य हो जाते हैं
और पेट की बेरहम, बेशर्म भूख
कटोरे पर झुक जाती है!
© दयाराम वर्मा,
जयपुर (राज.) 13 जुलाई, 2025
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