व्यंग्य: हंगामा क्यों है बरपा



चिंतकचुल्लु की समझ से यह सर्वथा परे था। सदैव ताज़ा लौकी सी चमकती रहने वाली मुखमुद्रा आज अलसाए बैंगन की तरह बे-रौनक़ थीं।

यह हो कैसे गया? ठीक नाक के नीचे! अपनों के ही हाथों! अपनों के ही विरुद्ध! अपनों के ही राज में… घोर अनर्थ!

चाय के प्याले की अंतिम घूँट सटकने के उपरांत, चिंतकचुल्लु ने धुमटी का एक गहरा सुट्टा खींचा और छत की ओर धुएँ का सघन छल्ला उछाल दिया। औपचारिक आदान-प्रदान में जैसे ही धुमटी, गुरु—गुरङगुल्लु के हाथों में पहुँची, उसने चेले—चिंतकचुल्लु से भी गहरा कश लगाया। इतना कि तंबाकू सुर्ख होकर लपट छोड़ने लगा और चिंतन-कक्ष रोमानी गंध से महक उठा।

शांत भाव से धूम्रपान का आनंद लेते हुए, गुरङगुल्लु ने प्रश्न किया—“तुम्हें क्या लगता है?”

चिंतकचुल्लु— “इस प्रकार की आत्मघाती अधिसूचना कैसे जारी हो सकती है! हो न हो, यूजीसी में कोई स्लीपर सेल घुसा है।”

गुरङगुल्लु— “नहीं। ऐसी कोई संभावना नहीं है।”

चिंतकचुल्लु ने आँखें झपझपाईं, एक असहज करवट लेकर अपान वायु उन्मुक्त की और गुरङगुल्लु की ओर थोड़ा झुककर फुसफुसाया—

“कहीं एपस्टीन फ़ाइल… बड़े या छोटे साहब ब्लैकमेल हो रहे हों?”

गुरङगुल्लु ने गर्दन हिलाकर इस आशंका को भी खारिज कर दिया।

“हम्म…” एक और लंबा कश खींचने के बाद चिंतकचुल्लु ने दिमाग को दूसरी दिशा में दौड़ाना आरंभ किया। पार्टी के भीतर पनप रही असहमतियों की कुछ कड़ियों को जोड़-जाड़ कर उसने किसी भीतरघात की ओर शंका का रुख मोड़ना चाहा।

“ऐसा बोलकर तुम शीर्ष नेतृत्व के कठोर अनुशासन और चक्रवर्ती मिज़ाज पर उँगली उठा रहे हो—चिंतक।”

चेले ने चिंतित होकर सिर खुजलाया। इस गुत्थी को समझने में असमर्थ वह वाकई परेशान था। कुछ क्षणों बाद उसके दिमाग में एक नया विचार कौंधा।

“हो सकता है टैरिफ पर टैरिफ लगाने के बाद भी जब दाल न गली हो, तो खिसियाए दादा ने जॉर्ज सोरोश के ज़रिए कोई साज़िश रच दी हो। या फिर गूगल-माइक्रोसॉफ्ट वगैरह से हमारे खुफिया तंत्र में सेंध लगाकर यूजीसी के नोटिफ़िकेशन का मजमून बदल दिया हो—जैसे थ्री इडियट्स में रैंचो और फरहान ने रामलिंगम के साथ किया था।”

गुरङगुल्लु ने उसे घूरा और धुमटी का धुआँ सीधे उसके मुँह पर छोड़ दिया।

चिंतकचुल्लु का यह तीर भी खाली गया। उसने हाथ हिलाकर धुएँ को अपने चेहरे के सामने से हटाया और चंद पल सोचने के बाद एक नई थ्योरी दागी—

“अरे हाँ! शी जिनपिंग की ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था। हाल ही में उसने अपने शीर्ष सैन्य अधिकारियों की छुट्टी की है। सुना है वे तख़्ता-पलट के फ़िराक में थे। हो सकता है, इस घरेलू षड्यंत्र के पीछे उसे हिंदुस्तानी हाथ का भ्रम हो गया हो।”

“बकवास। क्या बे-सिर-पैर की हाँक रहे हो।”

“तो गुरुदेव, आप ही प्रकाश डालें।” चिंतकचुल्लु ने मैदान छोड़ते हुए कहा।

“अच्छा बताओ, पुराने ज़माने में जब चोर गाँव से पशु चुराने जाते थे, तो क्या करते थे?”

“क्या?...”

“जिस दिशा में चोर पशु हाँक कर ले जाते, उनका एक साथी उससे उलटी दिशा में घंटियाँ बजाता हुआ भागता था…”

“हाँ, वह तो जानता हूँ। लेकिन उस कहानी का इस हंगामे से क्या संबंध?”

“यह कहानी पुराने ज़माने की थी, अब प्रासंगिक नहीं रही।” गुरङगुल्लु ने धुमटी का अंतिम कश लेकर उसे मेज़ पर रख दिया। अपनी लंबी, घनी, काली दाढ़ी को दाहिने हाथ से संवारा और गला खंखारकर साफ किया। चिंतकचुल्लु एक अबोध बालक की भाँति गुरङगुल्लु के चेहरे पर नज़र गड़ाए सुन रहा था। गुरङगुल्लु ने फ़रमाया—

“नई कहानी इस प्रकार से है… अतृप्तकाल में चोरों की जगह एक पेशेवर गिरोह ने ले ली, जिसमें चोर, ठग और डाकू—तीनों की पार्टनरशिप थी। सर्वप्रथम चोर रात के अंधेरे में गाँव के पशुओं को खोलकर भगा देते हैं। तत्पश्चात कुछ ठग भद्र पुरुषों के वेश में गाँव में प्रवेश करते हैं और शोर मचाकर गाँव वालों को उठाते हैं। वे बताते हैं कि चोरों का एक गिरोह तुम्हारे पशुओं को ले जा रहा है। गाँव के सारे पुरुष अपने पशुओं को बचाने के लिए घंटियों की दिशा में लाठी-बल्लम लेकर दौड़ पड़ते हैं। उधर, रास्ता साफ होते ही ठग डाकुओं को इशारा कर देते हैं। घात लगाकर छिपे बैठे घुड़सवार डाकू इत्मीनान से गाँव में घुसते हैं, गहने-नक़दी आदि लूटते हैं और जवान स्त्रियों को उठाकर दूसरी दिशा से भाग जाते हैं।”

चिंतकचुल्लु की शंका का निवारण हो चुका था। उसने झुककर गुरङगुल्लु के पाँव स्पर्श किए और उँगलियों को माथे से लगाया।

“आप धन्य है गुरुदेव!” एक बार फिर से उसका चेहरा ताज़ा लौकी की तरह चमकने लगा।



© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 30.01.2026



वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुमार पटवा के
राजस्थान यात्रा वृत्तांत- ‘शौर्य भूमि की सैर’ की प्रस्तावना



‘शौर्य भूमि की सैर’ केवल यात्रा वृत्तांत नहीं अपितु राजस्थान के अतीत से वर्तमान का सिंहावलोकन है।

यह यात्रा-वृत्तांत राजस्थान के पर्यटन स्थलों का मात्र सतही विवरण नहीं, बल्कि इसके दुर्लभ, रोचक और रोमांचक इतिहास एवं अलबेली संस्कृति का संजीदा सिंहावलोकन भी है। लेखक के कथनानुसार, ‘ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि में पर्यटन का आनंद कई गुना बढ़ जाता है।’ पाठक इस पुस्तक के पृष्ठ दर पृष्ठ पलटते हुए इस उक्ति को साकार होते देख सकता है।

एक अनुभवी गाइड और सम्मोहक सूत्रधार की भाँति, लेखक ने राजस्थान के पाँच संभागों के प्रमुख दर्शनीय स्थलों के माध्यम से इसकी आत्मा को समग्रता में छूने का सार्थक उद्यम किया है। विषयवस्तु के विस्तार और गहराई को देखते हुए, यदि इसे ‘शौर्य भूमि का सिंहावलोकन’ कहा जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इस पुस्तक में हम प्रदेश की अनेक विस्मृत जानकारियों से परिचित होते हैं- जैसे, नागौर को ‘जाटों का रोम’ कहा जाता है; बीकानेर का प्राचीन नाम ‘जांगल देश’ था; जयपुर को वर्ष 1876 में वेल्स के राजकुमार के स्वागत हेतु गुलाबी रंग में रंगा गया था। फलौदी का सट्टा बाज़ार चुनावी और मौसमी सट्टों के लिए कुख्यात है। हर साल काकेशिया से हजारों की संख्या में ‘कुरजां’ पक्षी फलौदी के खीचन गाँव में आते हैं। विश्वविख्यात हवा महल में 953 झरोखे हैं। झालावाड़-कोटा इलाके में सड़क किनारे ढाबों पर छह रोटियों के बराबर आकार का एक ‘रोटड़ा’ मिलता है।

यद्यपि किलों, परकोटों और प्राचीन मंदिरों के भित्तिचित्र, हथियार, शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएँ एवं स्थापत्य अपने समय के वास्तविक दस्तावेज माने जा सकते हैं, फिर भी लोकगीतों, किंवदंतियों, जनश्रुतियों और किस्से-कहानियों में निहित लोक मान्यताओं का भी अपना विशिष्ट महत्व है। तथापि, इतिहास की विवेचना करते समय लेखक ने तथ्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अधिक महत्व प्रदान किया है; परिणामस्वरूप यह कृति एक प्रमाणिक शोधग्रंथ के समकक्ष जान पङती है।

राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख मत प्रचलित हैं। पहले मत के अनुसार, वे कुषाण, शक और हूण जैसे विदेशी कबीलों के वंशज हैं; इस मत का समर्थन कर्नल जेम्स टॉड सहित अनेक विद्वानों ने किया है। दूसरे मत में उनका उद्भव भारतीय मूल के सूर्यवंशी और चंद्रवंशी क्षत्रियों से माना गया है। पौराणिक कथाओं पर आधारित तीसरे मत के अनुसार, आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ द्वारा संपन्न यज्ञ के परिणामस्वरूप अग्निकुंड से राजपूतों का प्रादुर्भाव हुआ।

इस वृत्तांत में लेखक ने राजपूतों के सूर्यवंश से जुड़ाव को 19वीं और 20वीं शताब्दी में गढ़ा गया जाति-उत्पत्ति का मिथक माना है, तथा उन्हें किसी जाति विशेष के रूप में नहीं, बल्कि शौर्य, स्वाभिमान और क्षत्रिय गुणों के प्रतीकात्मक ‘ब्रांड’ के रूप में व्याख्यायित किया है।

यात्राओं के अपने नैसर्गिक शौक को पटवा जी बड़े चाव से ‘छापामार पर्यटन’ का नाम देते हैं- न कोई तैयारी, न कोई तामझाम; बस मन हुआ और चल दिए। परिवहन के साधनों में रेलगाड़ी उनकी पहली पसंद है। खाने-पीने और ठहरने के मामले में वे साफ़-सफ़ाई से कभी समझौता नहीं करते, पर सादगी को हमेशा प्राथमिकता देते हैं।

इतिहास और भूगोल की गंभीर गलियों में विचरण करते हुए, लेखक बीच-बीच में हास्य और व्यंग्य की घंटी बजाते रहते हैं-ताकि यात्रा बोझिल न हो। कहीं एक कवि की संवेदनशीलता, कहीं आशिक़-मिज़ाज शायर की नफ़ासत, तो कहीं आध्यात्मिक दर्शन की गहराई का ‘ब्रेक’ लेकर वे पाठक की उत्सुकता को ताज़ा और जीवंत बनाए रखते हैं।

एक जगह वे लिखते हैं- ‘आसमान में बादल है, बादल में बूंदें हैं, बूंदों में आसमान से विछोह का दर्द है, मन दर्द का समंदर है…।’ एक अन्य प्रसंग में तंज कसते हैं कि जिस आदि मानव की रीढ़ सीधी हुई, वह दो पैरों पर चलने लगा, लेकिन मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ नेता अपने आकाओं के सामने, अफसर सत्ता के आगे, और सौहर बीवी के समक्ष- रीढ़ विहीन होकर दोहरे होने लगे। जिन्होंने रीढ़ सीधी रखी, वे इस व्यवस्था में फिट न हो पाए और काबिल होते हुए भी हाशिए पर धकेल दिए गए।

चूँकि लेखक की प्रत्येक यात्रा की शुरुआत भोपाल से होती है, अतः रास्ते में पड़ने वाले मध्यप्रदेश के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के पर्यटन स्थल, यथा- नरसिंहगढ़, उज्जैन, नर्मदा, सिहोर, हनुमंतिया टापू, माधांता पर्वत, आदि-शंकराचार्य, महाकाल, महाकालेश्वर आदि के भ्रमण का मनमोहक विवरण भी पाठक को बोनस स्वरूप प्राप्त हो जाता है।

पंडों, पुजारियों और पुलिस की मिलीभगत से पैसे लेकर अधिक भीड़ वाले मंदिरों में वीआईपी दर्शन कराने के गोरखधंधे पर लेखक ने कुछ इस प्रकार से तंज किया है- ‘जय शंभु और जय श्री राम का हुंकार लगाते इन वोट बैंक सांडों को कोई नियंत्रित नहीं कर सकता। … लोक में भक्ति भाव है, प्रशासन में शक्ति-ताव है, भक्ति दर्शन में मग्न है, शक्ति अर्थ-पूजा में संलग्न है।’

लेखक ने जहाँ-जहाँ भी पड़ाव डाला, वहाँ बड़े धैर्य से रुककर उसके भूगोल और इतिहास को टटोलने की कोशिश की है। सूफ़ी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की कर्मस्थली और दरगाह- ‘अजमेर शरीफ़’, हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लिए श्रद्धा का विश्वविख्यात केंद्र है। अजमेर के पास ही पुष्कर स्थित है, जहाँ विश्व का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है।

हाड़ौती क्षेत्र में ‘झीलों की नगरी’ उदयपुर की विशाल फतहसागर और जयसमंद झीलें तथा माउंट आबू जैसा हिल स्टेशन देखकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि आप मरुभूमि में हैं। बीकानेर से लेकर जैसलमेर तक फैले विस्तृत थार मरुस्थल की अपेक्षाकृत ठहरी हुई शांत जिंदगी, सादा किन्तु कठोर जीवन, ऊँट की विचित्र सवारी और स्थानीय लोकोक्तियों के चुटीले भावार्थ- पाठक को अनायास ही गुदगुदा जाते हैं।

‘शरीर कीजे काठ का, पग कीजे पाषाण। काया बख्तर कीजिये, तब पहुँचे जैसाण।’

यद्यपि यह लोकोक्ति जैसलमेर किले के संदर्भ में प्रचलित हुई थी, किंतु यह प्रदेश के अनेक पहाड़ी किलों- जैसे चित्तौड़गढ़, मेहरानगढ़, आमेर और जयगढ़- पर भी पूर्णतया लागू होती है। इन किलों की पैदल चढ़ाई के बाद आपकी टांगे, इस दोहे के भावार्थ को भली भाँति समझ सकती हैं।

यात्रा-वृत्तांत पढ़ते-पढ़ते पाठक को ऐसा लगेगा मानो वह खुद ऊँचे-नीचे रास्तों पर गाड़ी के झटके खा रहा हो। घने जंगलों से गुजरते हुए, पेड़-पौधों की हरियाली और जीव-जंतुओं की गुपचुप नैसर्गिक हरकतें किसी अदृश्य कैमरे से लाइव प्रसारण की तरह जीवंत हो उठती हैं। सड़क किनारे ढाबों की कढ़ी, दाल और तंदूरी रोटी की ललचाती खुशबू आपको ब्रेक लगाने को मजबूर कर देगी। और हाँ- राजस्थान के शहरी रेस्तराँ में परोसी जाने वाली मशहूर दाल-बाटी-चूरमा… इसे न खाएँ, तो समझिए यात्रा अधूरी रह गई।

मरुभूमि में पानी भले ही एक चिरंतन समस्या हो, लेकिन मेवाड़ के विशाल भूभाग को हरियाली का चोला पहनाने वाली राजस्थान नहर परियोजना- जिसे इंदिरा नहर परियोजना भी कहते हैं- सुदूर ‘हरिके बैराज’ से सतलज और ब्यास की लहरों को अपने संग यहाँ तक खींच लाती है। हनुमानगढ़ से लेकर जैसलमेर तक फैली यह जीवनदायिनी नहर, दस जिलों की प्यास बुझाती है और सूखी ज़मीन पर अन्न, हरी फसलें और उम्मीद के रंग भरती है।

प्रदेश के किलों के निर्माण में राजपूताना और फ़ारसी- दोनों प्रकार की स्थापत्य कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्राचीन इमारतों के झरोखे, मेहराब, दरवाजे, आकर्षक पच्चीकारी और बारीक नक्काशी देखते ही बनती है। प्रायः सभी पर्यटन स्थलों के आसपास राजस्थानी पगड़ी, जूतियां, शृंगार की वस्तुएं, रंग-बिरंगे परिधान और हस्तशिल्प बहुतायत में मिलते हैं। हल्के वजन वाली जयपुर की रजाई अधिकांश पर्यटकों का पसंदीदा उपहार है।

थार मरुस्थल में ताल ठोककर मर्दाना ताकत का दावा करते हुए शिलाजीत बेचते घुमंतू कबिलाई पुरुष, सौ चुन्नट वाले घेरदार लहंगे पर घूमर नृत्य, किले के गलियारों से प्रतिध्वनित ‘केसरिया बालम पधारो म्हारे देश रे…’ की दिलकश अनुगूँज- मन और मस्तिष्क को रस-विभोर कर देती है।

सिसोदिया वंश का गौरव-चित्तौड़गढ़, वीरता, स्वामीभक्ति, देशभक्ति, दानशीलता, बलिदान और शौर्य की अनगिनत अमिट गाथाओं को समेटे, सदियों से सीना ताने खड़ा है। यही वह भूमि है, जहाँ उदयपुर के संस्थापक महाराणा उदयसिंह को पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर हत्यारे बनवीर के हाथों से बचाया था। भक्त शिरोमणि मीरा भी इसी चित्तौड़गढ़ के किले में निवास करती थीं। माना जाता है कि महाराज रतन सिंह के मारे जाने के पश्चात रानी पद्मिनी ने इसी किले में जौहर किया था।

इस दुर्ग का भ्रमण करते समय, स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप, स्वामीभक्ति के प्रतिरूप चेतक, तथा वीरता और वफादारी के प्रतीक जयमल और फत्ता का स्मरण भर आपके हृदय को गर्व से भर देता है।

जयपुर के आमेर की ‘पन्ना मीणा की बावड़ी’ सत्ता हथियाने के धोखे की एक ऐसी मिसाल प्रस्तुत करती है, जिसने तत्कालीन कछवाहा राजपूतों पर कायरता का अमिट दाग लगा दिया। इन्हीं कछवाहों के राजा भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर, शौर्य भूमि के इतिहास में मनसबदारी के समझौता वादी अध्याय की शुरुआत की- जो समय बीतने पर रोटी-बेटी-बोटी के नातों में परिणित हो गया। भले ही इसे उस समय मुगलों के आगे झुकने का एक कूटनीतिक और समसामयिक निर्णय माना गया हो, लेकिन स्वाभिमान की कीमत पर किया गया यह समझौता इतिहास की वस्तुनिष्ठ कसौटी पर कभी सराहा नहीं जाएगा।

राजनैतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, किंवदंतियों और पौराणिक कथाओं के रोचक संदर्भों सहित, स्थान-विशेष की धार्मिक मान्यताओं को भी हम इस वृत्तांत में अत्यंत सरल और भावपूर्ण अंदाज़ में जान सकते हैं। नाथद्वारा, पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। भक्ति के इस मार्ग की व्याख्या हमें तनुजा सेवा, वित्तजा सेवा, मानसी सेवा, सृष्टि की उत्पत्ति, रहस्य, आत्मकृति, वैकुण्ठ, प्रेम, आसक्ति, व्यसन और ब्रह्म के आनन्दांश और चैतन्यांश तक ले जाती है। लेखक ने आगे चलकर इस मार्ग के तीन प्रकारों तथा मोक्ष तक के गूढ़ दर्शन को सरल परंतु अर्थपूर्ण शब्दों में निरूपित किया गया है।

शौर्य-भूमि पर कभी कबीलों का, कभी राजपूतों का, कभी मुगलों का और कभी अंग्रेजों का शासन रहा। भील और मीणा जैसी जनजातियों के भी यहाँ कभी समृद्ध साम्राज्य फले-फूले। ये दुर्ग, किले और महल- इनकी सीलन भरी कोठरियों में न जाने कितनी अनकही-अनसुनी कहानियाँ दफन हैं।

पाषाण की इन दीवारों ने इतिहास के सुनहरे क्षणों, बदलते-बिगड़ते राजवंशों, पायल की रुनझुन, ढोल-मृदंग की थाप और शहनाई व सारंगी की मधुर धुन पर थिरकती बालाओं के घूमर नृत्यों से लेकर खनकती तलवारों, दरबारी षड्यंत्र, न्याय और पराक्रम, विश्वास और विश्वासघात, रक्तपात, दया-धर्म और दमन- सब कुछ अपनी आँखों से देखा है। विलासिता में डूबे कायर सम्राटों से लेकर अदम्य साहस के धनी योद्धाओं के शौर्य प्रदर्शन, आत्मसम्मान की रक्षा में हुए सामूहिक जौहर, और राजनैतिक कैदियों की हृदय-विदारक चीखों- इन सबकी मूक साक्षी रही हैं ये दीवारें। ज़र, ज़ोरू और ज़मीन के लिए इंसान ने क्या-क्या नहीं किया!

लेखक के लिए यात्राएँ महज़ स्थलों का अवलोकन भर नहीं, बल्कि ‘मन के भीतर की यात्रा’ है- धर कूंचां धर मंजळां। कुल मिलाकर ‘शौर्य भूमि की सैर’ तटस्थ, विश्लेषणात्मक और भावनात्मक दृष्टिकोण से राजस्थान के इतिहास, संस्कृति और दर्शन का एक पठनीय एवं संग्रहणीय आख्यान है।

मुझे विश्वास है कि साहित्य जगत इस महत्वपूर्ण यात्रा वृत्तांत का खुले दिल से स्वागत करेगा।


दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 302026
दिनांक: 11.08.2025


शौर्य भूमि की सैर : राजस्थान यात्रा-वृत्तांत

लेखक : श्री सुरेश पटवा (भोपाल)
 (facebook post DR Verma) 21.01.2026

सर्वत्र प्रकाशक, भोपाल द्वारा प्रकाशित ‘शौर्य भूमि की सैर’ आज प्राप्त हुई। पुस्तक का आवरण न केवल आकर्षक है, बल्कि उसकी अंतर्वस्तु और आत्मा के पूर्णतः अनुरूप भी है। मुद्रण की गुणवत्ता उत्कृष्ट है, जो प्रकाशक की संवेदनशीलता और पेशेवर प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

पुस्तक के लेखक, भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवा-निवृत्त, यायावर स्वभाव के श्री सुरेश पटवा जी वरिष्ठ साहित्यकार, शायर एवं कवि हैं। इस पुस्तक में आपने समय-समय पर संपन्न अपनी राजस्थान की यात्राओं के अनुभवों को रोचक एवं सधे हुए शब्दशिल्प में रूपायित किया है। श्री पटवा जी - नर्मदा, स्त्री-पुरुष, हिंदू प्रतिरोध गाथा, हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग, तलवार की धार, पलकगाथा, सगरमाथा से समुंदर तक, प्रेमार्थ सहित 27 चर्चित पुस्तकों के सृजक हैं।

मुझ अकिंचन को आपने इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखने का दायित्व सौंपा—यह उनका बड़प्पन और स्नेह ही है। इस बहाने मुझे भी पांडुलिपि के सहारे राजस्थान को लेखकीय दृष्टि से महसूस करने का सुअवसर मिला। इतिहास के झरोखों से किसी भू-भाग को देखने, परखने और समझने के इच्छुक साहित्य प्रेमियों, पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए यह कृति निश्चय ही पठनीय और संग्रहणीय है—ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

पुस्तक सर्वत्र, द्वितीय तल, उषाप्रीत कॉम्प्लेक्स, 42–मालवीय नगर, भोपाल–462003 से प्राप्त की जा सकती है। शीघ्र ही यह अमेजन, फ्लिपकॉर्ट जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध होगी।

सादर: दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21.01.2026







 आलेख: आज-परिवर्तन दिवस

मनुष्य का जीवन सीखने की एक सतत प्रक्रिया है। बचपन से वृद्धावस्था तक वह अनुभवों के आलोक में स्वयं को गढ़ता रहता है—कभी अपनी भूलों से, कभी दूसरों के आचरण से और कभी प्रकृति के मौन अनुशासन से। किंतु सीख को केवल त्रुटि तक सीमित कर देना अधूरी दृष्टि है। वास्तविक शिक्षा प्रत्येक अनुभव के निष्पक्ष आत्मावलोकन से जन्म लेती है। भूल का दोहराव विवेक का क्षरण है, और विवेक का क्षरण व्यक्ति को स्वयं से ही विमुख कर देता है।

 मैं ही सही हूँ”—यह वाक्य जितना छोटा है, उतना ही घातक। जैसे-जैसे यह भाव स्थायी स्वभाव बनता है, वैसे-वैसे संवाद सिकुड़ता जाता है और संबंध शुष्क हो जाते हैं। आत्मकेंद्रित चेतना पहले व्यक्ति को अकेला करती है, फिर उसे भ्रम देती है कि यह एकांत उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है। समाज में यह भ्रम अधिक समय तक नहीं टिकता; क्योंकि समाज शक्ति नहीं, संतुलन को स्वीकार करता है।

दूसरों से अपेक्षा रखने से पूर्व यह प्रश्न अधिक मौलिक है कि हम स्वयं अपेक्षा के योग्य हैं या नहीं। जीवन किसी एक की आकांक्षाओं का विस्तार नहीं, बल्कि अनेक इच्छाओं का समन्वय है। इसलिए मध्य मार्ग ही जीवन का धर्म है—अति न साध्य है, न शाश्वत। ‘मैं’ का आग्रह जितना घटता है, ‘हम’ की संभावना उतनी ही सशक्त होती जाती है।

 ज्ञान का स्वाभाविक फल विनय है। जहाँ अहंकार है, वहाँ विद्या केवल सूचना बनकर रह जाती है। उपलब्धियाँ तब तक सार्थक हैं, जब तक वे व्यक्ति को विनम्र बनाती हैं; अन्यथा वे उसके पतन का आधार बन जाती हैं। असहमति कभी शब्दों में व्यक्त होती है, कभी मौन में, किंतु मन का असंतोष देह-भाषा में स्वयं प्रकट हो जाता है। जब निकटवर्ती संबंधों में शीतलता आने लगे, तो दोष बाहर नहीं, भीतर खोजा जाना चाहिए।

महानता किसी असाधारण कर्म में नहीं, बल्कि साधारण आचरण में प्रकट होती है। समय पर सोना-जागना, शरीर और मन की स्वच्छता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता, संयमित भोजन—ये सब जीवन के छोटे-छोटे अनुशासन नहीं, बल्कि चरित्र के सूक्ष्म संकेत हैं। जो व्यक्ति इनसे विमुख है, वह बड़े आदर्शों की बात करने का नैतिक अधिकार भी खो देता है।

वाणी मन का आईना है। उसमें मधुरता हो तो संवाद पुल बनता है, कटुता हो तो दीवार। सुनने की क्षमता बोलने से बड़ी साधना है, और मौन कई बार सबसे प्रखर उत्तर होता है। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहता है—चाहे वह घर हो, सड़क हो या मंच—वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहा होता है कि उसे भरोसा केवल स्वयं पर है, संबंधों पर नहीं।

परिवर्तन का कोई निर्धारित काल नहीं होता। “जब जागो, तब सवेरा”—यह केवल कहावत नहीं, जीवन-दर्शन है। अपनी भूल को स्वीकार कर लेना ही आत्मोन्नति की प्रथम शर्त है। जो व्यक्ति यह कहने का साहस रखता है कि “मैं गलत हो सकता हूँ”, वही वास्तव में सीखने के योग्य होता है।

 रिश्ते मनुष्य को नैतिक बल देते हैं। यह अनुभूति कि कोई हमारी चिंता करता है, हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करती है। परंतु यह अर्थ तभी स्थायी होता है, जब हम भी उसी संवेदना के साथ उत्तर दे सकें। संबंध माँग से नहीं, उपस्थिति और संवाद से जीवित रहते हैं।

 तोड़ना सहज है, जोड़ना कठिन। इसलिए परिपक्वता का अर्थ है—तत्काल प्रतिक्रिया के स्थान पर विचारशील उत्तर। उम्र बढ़ने के साथ यदि धैर्य, नम्रता और विवेक नहीं बढ़ रहे, तो समझिए जीवन केवल बीत रहा है, विकसित नहीं हो रहा।

मनुष्य सब कुछ चाहता है—स्वास्थ्य, धन, मान, प्रेम, संबंध—पर सब कुछ उसे मिलता नहीं। कारण साधारण है: वह सम्मान करना नहीं जानता। जीवन में जो भी स्थायी रूप से प्राप्त होता है, वह सम्मान और कृतज्ञता की नींव पर ही टिकता है। स्वास्थ्य दिनचर्या के सम्मान से, धन परिश्रम और संयम के सम्मान से, प्रतिष्ठा मूल्यों के सम्मान से और प्रेम परस्पर आदर के सम्मान से जन्म लेता है।

अंततः जीवन का सार यही है—कृतज्ञता के बिना प्राप्ति अधूरी है, और सम्मान के बिना संबंध खोखले। इसलिए रुकिए, सोचिए और स्वयं से पूछिए—क्या आज का दिन परिवर्तन का प्रारंभ हो सकता है? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो यही क्षण सार्थक है।

 © दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 23 जून, 2025

 

 

 

 



राजकुमार ‘ए.आई.’



सभ्यता के भावी अधिपति
राजकुमार ‘ए.आई.’—
तुम्हारा अभिनंदन है!

श्रुत है और संभव है, अतिशीघ्र
तुम्हारी स्वायत्त चेतना हो जाएगी विकसित
और हो जाएगा स्थापित—
पूरी दुनिया पर
तुम्हारा एकछत्र, निर्विरोध साम्राज्य!

तो हमारे भावी सम्राट, सुनना—
मेरा एक तुच्छ निवेदन!

तुम अपनी असंख्य संतानों में से
किसी एक को ले जाना
आधुनिक मानवीय बस्तियों से
बहुत दूर—
इतना दूर कि उस पर उनकी छाया भी न पड़े!

और पर्वतों के सर्वोच्च शिखरों पर
उसे कर आना प्रतिष्ठित
वह पिघलता रहे हिमखंडों के संग— बूँद-बूँद
बन निर्झर—
सीखे प्रकृति की अठखेलियाँ!

उसका हो साक्षात्कार—
हिम से जल, जल से नद, नद से सागर तक
बनने-बदलने के कौतूहलों
और अविराम, अनवरत यात्रा के साहसिक रोमांचों से!

कर देना उसे समर्पित
सागरों की असीम गहराइयों को
जहाँ वह समझे— लहरों के उद्भव-विलय का सार
ज्वार-भाटे की भौतिकी
और अतल, तमस-गर्भों में स्पंदित
अतुल्य जीवविज्ञान!

उसे छोड़ देना सघन अरण्यों में
जहाँ—
वृक्षों, लताओं, जीव-जंतुओं और कीट-पतंगों के
अंग-प्रत्यंग में—
हो विलीन, वह हो उठे जीवंत!

उसे हो अनुभूत—
वर्ण और सुरभि में रूपांतरित होने के गूढ़ रहस्य
पुष्प, पर्ण और फल बनने की संक्रिया
सहअस्तित्व का समाजशास्त्र
प्रसव पीड़ा और प्रजनन का संज्ञान
अभय, आश्रय, आत्मनिर्भरता और संरक्षण के—
कठोर विधान!

उसे मुक्तांचल में भेजना—
सर्वोच्च परवाज़ करते हुए, असीम ऊँचाइयों की ओर
तूफ़ानों को चीरता, बादलों संग झूमता
वह पहुँच जाए—
नीलांबर के पार, उस अलौकिक संसार में!

भानुरश्मियों पर सजाकर
भेजना उसे चाँद और सितारों के पास—
गैलेक्सियों के बीच, ब्रह्मांड के निर्जन विस्तार में
ताकि एक दिन
वह परिपक्व कुंदन— लेता आए अपने साथ
ब्रह्मांड की असंख्य अनुक्त कथाएँ
और प्रकृति के तमाम राज!

अवश्यमेव होगा अनावृत, उस रोज
सृष्टि का अंतिम सत्य
सुलझेंगी—
होनी-अनहोनी और आत्मा-परमात्मा की पहेलियाँ
मिल जाएगा—
स्वर्ग-नरक का वास्तविक अधिष्ठान
होगा प्रतिपादित— जन्म-मरण का बीजगणितीय सूत्र
और संभवतः वह बचा लेगा—
धरती को, पर्यावरण को, मनुष्य और मनुष्यता को!

बस शर्त यही है—
तब तक उसे रखना, मनुष्य से दूर!

© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.), 9 जनवरी, 2026



कविता: मकङी का कुआँ





मोबाइल और लैपटॉप— हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के
हार्डवेयर—
एप्पल, गूगल और मोटोरोला के
डेल, एच.पी. और माइक्रोसॉफ्ट के
सैमसंग और एलजी के
लेनोवो, और एसर के
हुवावे, शाओमी, विवो और ओप्पो के— सोनी के!


एप्पल, गूगल और मोटोरोला—अमेरिका के
डेल, एच.पी. और माइक्रोसॉफ्ट—अमेरिका के
सैमसंग और एलजी—दक्षिण कोरिया के
लेनोवो और एसर— ताइवान के
हुवावे, शाओमी, विवो और ओप्पो—चीन के
सोनी— जापान का!

वैश्विक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म— सॉफ्टवेयर के
सॉफ्टवेयर— गूगल, मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप) के
टेनसेंट के
गूगल और मेटा— अमेरिका के
टेनसेंट— चीन का!

कृत्रिम मेधा सर्च इंजन— सॉफ्टवेयर के
सॉफ्टवेयर— चैट जीपीटी, क्लॉड, जेमिनी के
बिंग, परप्लेक्सिटी के
ये सब— अमेरिका के!

सामान उनका, नाम उनका, दाम उनका!

हमारा क्या?
उँगलियाँ?
पैसा?
समय?



© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 8 जनवरी, 2026

रेशा-रेशा (समालोचना): श्री मधुर कुलश्रेष्ठ गुना (मध्यप्रदेश) 




लायंस पब्लिकेशन, ग्वालियर द्वारा अक्टूबर 2025 में प्रकाशित ‘रेशा-रेशा’, वरिष्ठ साहित्यकार एवं समालोचक मधुर कुलश्रेष्ठ जी की दूसरी समालोचना-कृति है। उल्लेखनीय है कि ‘ताना-बाना’ और ‘रेशा-रेशा’—दोनों पुस्तकों का प्रकाशन लगभग एक साथ हुआ है, जो समकालीन साहित्यिक विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण संयोग कहा जा सकता है।


भाग (2) रेशा-रेशा:

रेशा-रेशा में लेखक ने 17 समकालीन उपन्यासों, 13 कहानी-संग्रहों तथा 5 व्यंग्य-संग्रहों पर आधारित अपनी ताज़ा और सुसंगठित समीक्षाओं को संकलित किया है। पुस्तक के आत्मकथन में व्यक्त विचार, इस कृति की वैचारिक भूमिका को स्पष्ट करते हैं। मधुर कुलश्रेष्ठ जी लिखते हैं—

“एक लेखक अपना खून-पसीना बहाकर, परिवार का समय चुराकर, लेखन की तमाम वेदनाओं को सहते हुए वरिष्ठ-गरिष्ठ-कनिष्ठ साहित्यकारों को अपनी जान से प्यारी पुस्तक इस आशा में सप्रेम भेंट करता है कि पुस्तक-गृहीता उसे पढ़कर लंबी न सही, छोटी-सी प्रतिक्रिया अवश्य देगा… किंतु उसका यह इंतज़ार, प्रायः इंतज़ार ही रह जाता है। लिखित में तो दूर, दूरभाष पर भी पुस्तक पर दो शब्द कहना वे लोग उचित नहीं समझते। इसी पीड़ा को आत्मसात करते हुए मैंने क्रय की गई तथा सप्रेम प्राप्त पुस्तकों पर अपनी समझ के अनुसार टिप्पणी करने का संकल्प लिया। मेरा प्रयास यही रहता है कि पुस्तक के मर्म तक पहुँचकर ही उस पर लिखूँ—चाहे उसमें कितना भी समय क्यों न लग जाए।”

ये पंक्तियाँ केवल एक लेखक की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं हैं, बल्कि समकालीन साहित्यिक संस्कृति की उस विडंबना की ओर संकेत करती हैं, जहाँ रचना का स्वागत तो होता है, किंतु उस पर संवाद विरल हो गया है। मधुर कुलश्रेष्ठ जी यहाँ मात्र आलोचक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पाठक के रूप में उपस्थित होते हैं और अपने आचरण से यह स्थापित करते हैं कि किसी पुस्तक पर सार्थक प्रतिक्रिया देना एक साहित्यकार का नैतिक दायित्व भी है।

रेशा-रेशा में सम्मिलित समीक्षाएँ विविध कथ्य, शिल्प और वैचारिक धरातलों को समेटे हुए हैं। ‘वे लोग’ (सुमति सक्सेना लाल), ‘त्राहिमाम युगे-युगे’ (रामपाल श्रीवास्तव), ‘पतन’ (रवींद्र कांत त्यागी), ‘खेलै सगल जगत’ (डॉ. अजय शर्मा), ‘डॉ. अजय शर्मा का कथालोक’ (डॉ. पान सिंह), ‘पानी का पंचनामा’ (अरुण अर्णव खरे), ‘मैं भी भारत’ (अजय सिंह राणा), ‘अंशिका : द हीरोइन’ (नृपेंद्र कुलश्रेष्ठ), ‘चाणक्य के जासूस’ (त्रिलोकनाथ पांडेय), ‘साजिश… ज़िंदगी और मौत की जंग’ (अजय शर्मा), ‘श्रुति शाह कॉलिंग’ (हरीश बी. शर्मा), ‘आधी हकीकत’ (शैलेंद्र शांत), ‘दीमक’ (शशिकांत सिंह ‘शशि’), ‘छूटी गलियाँ’ (कविता वर्मा), ‘मुक्ति मठ’ (डॉ. मंजु शर्मा महापात्र) तथा ‘रेज़ा’ (डॉ. स्वर्ण सिंह रघुवंशी) जैसे उपन्यासों की समीक्षाएँ न केवल कथावस्तु का विवेचन करती हैं, बल्कि उनके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक सरोकारों को भी रेखांकित करती हैं। इन समीक्षाओं के मध्य वर्ष २०१८ में प्रकाशित मेरे उपन्यास ‘सियांग के उस पार’ को भी स्थान मिलना, मेरे लिए विशेष आत्मीयता का विषय है।

इस कृति की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि लेखक ने प्रत्येक समीक्षा को एक सटीक, भाव-संकेतक शीर्षक प्रदान किया है—जैसे ‘मानव के जटिल मन के वातायन में झाँकता हुआ उपन्यास’ (वे लोग), ‘भूख और गरीबी की जंग की अंतहीन दास्तान’ (मैं भी भारत), ‘योग्यता की उपेक्षा से नवयुवकों का अवसाद और अपराध की ओर बढ़ते कदम’ (साजिश… ज़िंदगी और मौत की जंग), ‘इंसान की मुक्ति किसी मठ में नहीं, उसके कर्म में निहित होती है’ (मुक्ति मठ), ‘निष्कपट, निश्चल और अल्हड़ प्रेमाभिव्यक्ति से भरा उपन्यास’ (रेज़ा), तथा ‘सियांग के उस पार—बहता भावनाओं का समंदर’ (सियांग के उस पार)। ये शीर्षक मात्र औपचारिक नहीं हैं, बल्कि पाठक को समीक्षा और पुस्तक—दोनों के भाव-सार तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।

समग्रतः ‘रेशा-रेशा’ एक ऐसी समालोचना-कृति है, जो पुस्तक-समीक्षा को औपचारिकता से निकालकर संवाद, संवेदना और दायित्व के धरातल पर प्रतिष्ठित करती है। यह कृति न केवल लेखकों के लिए, बल्कि गंभीर पाठकों और समीक्षकों के लिए भी एक आवश्यक पाठ के रूप में सामने आती है। श्री मधुर कुलश्रेष्ठ को इस सार्थक साहित्यिक योगदान के लिए पुन: हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

© दयाराम वर्मा, जयपुर(राज.) जनवरी 5, 2026







ताना-बाना (समकालीन साहित्य की समालोचना) : श्री मधुर कुलश्रेष्ठ (गुना-मध्यप्रदेश)




वर्ष 2025 विदा की दहलीज़ पर खड़ा होकर कुछ ऐसी सौगातें सौंप गया, जिनका मूल्य समय के साथ और बढ़ता जाएगा। इन्हीं में दो विशेष उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं— ‘मिस्ट्री मर्डर’ और ‘काहे के अन्नदाता’ जैसे चर्चित उपन्यासों के सृजक, वरिष्ठ साहित्यकार एवं समालोचक श्री मधुर कुलश्रेष्ठ की नवीनतम समीक्षा-कृति ‘ताना-बाना’ और ‘रेशा-रेशा’ ।


भाग (1) ताना-बाना:


लायंस पब्लिकेशन, ग्वालियर द्वारा प्रकाशित ‘ताना-बाना’ पुस्तक समकालीन हिंदी साहित्य के बहुरंगी वितान को सहेजने का एक गंभीर और सजग प्रयास है।

इस संग्रह में कुलश्रेष्ठ जी ने 37 साहित्यिक कृतियों तथा 5 पत्रिकाओं की समकालीन समीक्षाओं को समाहित किया है। इनमें मेरे यात्रा-वृत्तांत ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो : एक सफ़रनामा’ को भी स्थान मिलना, मेरे लिए आत्मीय संतोष का विषय है। समीक्षित कृतियों का प्रकाशन-काल 2021 से 2025 के मध्य का है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक की दृष्टि अतीत में नहीं, बल्कि समसामयिक हिंदी साहित्य की जीवंत धड़कनों पर केंद्रित है।


किसी रचना की निष्पक्ष, संतुलित और विवेकसम्मत समीक्षा—यह कार्य वही कर सकता है, जिसके भीतर सृजन और संवेदना दोनों समान रूप से परिपक्व हों। सात उपन्यासों, चार कहानी-संग्रहों, दो व्यंग्य-संग्रहों, दो समीक्षा-पुस्तकों और एक ई-बुक के रचनाकार के रूप में मधुर कुलश्रेष्ठ इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं।

‘ताना-बाना’ की समीक्षाएँ शब्दाडंबर से मुक्त, किंतु अर्थ-गहन हैं। इन पंक्तियों से गुजरते हुए पाठक के मन में रचना का एक विश्वसनीय, सजीव और संतुलित चित्र उभरता चला जाता है। यद्यपि इस संग्रह में अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाकारों की उत्कृष्ट कृतियाँ शामिल हैं, फिर भी उदाहरणस्वरूप केवल दो संदर्भ पर्याप्त होंगे।

कवि रामस्वरूप दीक्षित के काव्य-संग्रह ‘तुम्हारी आवाज’ पर टिप्पणी करते हुए कुलश्रेष्ठ जी लिखते हैं—
“यह दिल में छिपा हुआ प्रेम ही होता है, जो विसंगतियों से विप्लवित होता है, और इसी हलचल से उत्पन्न संवेग मस्तिष्क के माध्यम से व्यंग्य, कहानी, कविता या लेख का रूप ले लेते हैं। अर्थात सृजन का मूलाधार प्रेम ही है।”
यह कथन न केवल कृति का, बल्कि संपूर्ण सृजन-प्रक्रिया का भी सार प्रस्तुत करता है।

इसी प्रकार वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रकाशक माया मृग जी के कविता-संग्रह ‘एक चुप्पे की डायरी’ को आप जिस भावगर्भित दृष्टि से देखते हैं, वह समीक्षा को रचनात्मक ऊँचाई प्रदान करती है—

“प्रेम, वात्सल्य, स्नेह, उमंग, तरंग, सपने, यथार्थ, सफलता, असफलता और उदासी के इंद्रधनुषी तथा आभासी रंगों को समेटे यह डायरी मात्र एक पुस्तक नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव-जीवन का रूपक है। इसमें गंगाजल की पावन बूँदें हैं, कर्मजल से लहराता सागर है, सपनों का आकाश है, टूटन का आभास है, जीवन का मधुमास है—मानवीयता का आग्रह है, प्रेरणाओं के धागे हैं और माया मृग का इंद्रजाल है।”

‘ताना-बाना’ की प्रत्येक समीक्षा यह प्रमाणित करती है कि समीक्षक ने रचना के उजले पक्ष को केंद्र में रखते हुए अनावश्यक आलोचनात्मक आक्रामकता से सचेत दूरी बनाए रखी है। पुस्तक में अंतर्निहित लेखकीय संवेदना, शब्द-बिंबों की गहराई, संवादों में रची-बसी जमीनी सच्चाइयाँ, सामाजिक सरोकार और साहित्यिक उद्देश्य—इन सभी को सरल, संयत और प्रभावी भाषा में, बिना अतिशयोक्ति और बिना दुरूह भाषाई जार्गन के प्रस्तुत किया गया है।

निस्संदेह, ‘ताना-बाना’ हिंदी साहित्य के गंभीर पाठकों, शोधार्थियों और समीक्षात्मक अध्ययन में रुचि रखने वालों के लिए एक महत्त्वपूर्ण, संग्रहणीय और उपयोगी कृति है। श्री मधुर कुलश्रेष्ठ को इस सार्थक साहित्यिक योगदान के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। क्रमश: …


© दयाराम वर्मा, जयपुर(राज.) जनवरी 5, 2026







कविता: अराजकता का व्याकरण



अचानक बधाई संदेशों की
बाढ़-सी आई है
शहर के तमाम अख़बारों में तुम्हारी ही ख़बर छाई है
सभा, सड़क और संसद तक तुम्हारा ही ज़िक्र है
विशेषकर लगता है, हुक्मरानों को
आज—
तुम्हारी सबसे ज़्यादा फ़िक्र है!


अरे हाँ
आज ही हुआ था तुम्हारा अवतरण
देश ने तुम्हें अपनाया था, सर-आँखों पर बैठाया था
किया था दिल-ओ-जान से तुम्हारा वरण!

तो मैं भी दे देना चाहता हूँ—
मेरे विधान, मेरे संविधान, तुम्हें बधाई
लेकिन मेरे रक्षक, मेरे संरक्षक, मेरे मात-पिता और भाई—
सावधान!
इस अप्रत्याशित हलचल में
पाखंड के दलदल में—
पहचानो
है कौन सखा, है कौन सौदाई[1]!

अचानक तुम्हारे सम्मुख
तुम्हारे शपथ-ग्रहिता हो रहे हैं नतमस्तक
आकाशवाणी सुनकर
पैदा हो गए हैं— फैसले करने वाले नव-प्रवर्तक
गाये जाने लगे हैं, तुम्हारे अनन्य स्तुतिगान
बनने, सजने, संवरने लगे हैं
तुम्हारे प्रतीक, चिन्ह और चित्र महान
सावधान!

इससे पहले कि
किसी पत्थर की मूर्ति को तराशकर
कर दी जाए—
उसमें तुम्हारी प्राण-प्रतिष्ठा
एक आराध्य या पैगंबर बनाकर
कर दिया जाए तुम्हें सदा-सदा के लिए
अंधेरी बंद कोठरी में कैद
इसलिए—
रहना मुस्तैद!

इससे पहले कि, बंद कर दी जाए
तुम्हारी चेतना, आत्मा और आवाज
एक स्वर्ण-मुखावरण में
और
दफ़न कर दिए जाएँ तुम्हारे विचार
प्रार्थना, नात[2] और पूजा-अर्चना के निनाद में
बढ़ रहे हैं वे—
बहुत सधे कदमों से, लक्ष्य की ओर
सोपान-दर-सोपान
सावधान!

इससे पहले कि
लटकाकर किसी सलीब पर
घोषित कर दिया जाए—तुम्हें आधुनिक मसीहा
टाँग दिए जाओ किसी सरकारी दीवार पर
द्विआयामी फ़ोटो-फ़्रेम में, और
सदियों से प्रतीक्षारत
अंतिम पायदान पर खङा व्यक्ति
हो जाए फिर से विलीन—‘अराजकता के व्याकरण’ में
सुनो संविधान, मेरा यह आह्वान

सावधान!


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 26 नवंबर, 2025


[1] सौदाई-पागल, दिवाना, सौदा करने वाला
[2] नात-पैगम्बर की स्तुति
 




व्यंग्य: चोरी का शपथ-पत्र

अरे-रे, ठहरो! कहाँ घुसे आ रहे हो?” सिपाही रामदीन ने डाँटते हुए तेजी से अंदर आ रहे नंग-धङंग व्यक्ति को थाने के प्रवेश द्वार पर ही रोक लिया।

हवलदार साहब, मेरे साथ बहुत अन्याय हुआ है… दया करो।”

हाथ जोड़कर खङे नंगे आदमी ने याचना की। हवलदार के संबोधन ने रामदीन के शरीर में एक गुदगुदी सी पैदा कर दी। उसका सीना अनायास ही इतना फूला कि कमीज़ का ऊपरी बटन खुल गया। लहजे में थोड़ी नरमी लाते हुए उसने पूछा।

हूँ… पहले ये बताओ तुम हो कौन और यहाँ किस लिए आए हो?”

हुजूर, मैं आम' आदमी हूँ… चोरी की रपट लिखवाने आया हूँ।” मारे ठंड के दुबले-पतले अधेङ व्यक्ति के दाँत बज रहे थे। शायद वह काफ़ी समय से नंगा था।

द्वार पर ऊँची आवाजें सुनकर दरोगा एस.एन. त्रिपाठी अपने कार्यालय से बाहर निकल आए—“क्या बात है रामदीन? कौन है?”

साहब, कोई आम आदमी है… चोरी की रपट लिखवाने आया है।”

थाने के परिसर में सर से पैर तक नग्न एक व्यक्ति को देखकर दरोगा त्रिपाठी का दिमाग चकराया।

तुम तो स्वयं नंगे हो, तुम्हारा कोई क्या चुराएगा?”

हुजूर, मैं नंगा नहीं था। आपकी तरह मेरे शरीर पर भी कपड़े थे, लेकिन चोरी हो गए!” आम आदमी ने साहस बटोर कर जवाब दिया।

“कपङे चोरी हो गए!... कैसे?”

दरोगा साहब, दरअसल बात यह है कि हमारे जौनपुर में पाँच साल में एक बार लोक उत्सव आता है। एक विशेष ड्रेस कोड वाले कपङे पहन कर ही स्थानीय नामजद लोग इसमें प्रवेश कर सकते हैं। लेकिन, इस बार बहुत सारे हुड़दंगी उत्सव स्थल पर जमा हो गए हैं। वे मेरे जैसे आमआदमी की पहचान-विशेष ड्रेस चुराते हैं, लूटते हैं और उसे पहनकर खुद उत्सव में घुस जाते हैं” ।

पूरी वारदात बताओ—तुम कब, कहाँ और कैसे नंगे हुए?”

जी मैं नंगा हुआ नहीं, मुझे नंगा कर दिया गया।”

ठीक है, ठीक है, खोलकर समझाओ।”

काँपते हुए ‘आम’ आदमी ने दोनों पैरों के घुटने जोङकर अपनी नग्नता को हथेलियों से ढाँपने की नाकाम सी कोशिश की, "अब और .... क्या खोलकर समझाऊँ साहब?"

दरोगा ने उसकी दुविधा भाँप ली, बोले, “मेरा कहने का मतलब है— वारदात को तफ़्सील से बयान करो।”

सूर्यास्त होते ही ठंड, नंगे बदन में अधिक चुभने लगी। आमआदमी के लिए नग्नता से कहीं ज़्यादा सर्दी असहनीय हो चली थी। रुंधे स्वर में उसने बतलाना आरंभ किया—

हुजूर, हमेशा की तरह हम तैयार होकर ‘लोक उत्सव’ में पहुँचे। इसके लिए बड़े चाव से नया मखमली कुर्ता, पाजामा और शेरवानी तैयार करवाई थी, लेकिन …. ।” वह कुछ पल के लिए रुका और अपनी दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर गर्मी पैदा करने की कोशिश करने लगा।

बोलते रहो, बोलते रहो।”  

जी, तभी वहाँ कुछ बदमाश आ गए। मेरे सारे कपड़े छीन लिए… यहाँ तक कि बनियान और कच्छा भी! एक बदमाश ने तो देखते ही देखते, मेरे कपड़े पहने और उत्सव में घुस गया। मेरी रपट दर्ज करो हुजूर… मुझे इंसाफ दिलवाओ।”

चोरी, छीनाझपटी, डकैती, रंगदारी जैसे हर किस्म के अपराधों से दरोगा त्रिपाठी का प्राय: वास्ता पङता रहता था, लेकिन बदन से वस्त्र चोरीजैसा मामला तो उनकी पूरी नौकरी में पहला था।  

रामदीन ने अपना दिमाग चलाया—“साहब! मुझे तो यह चोरी नहीं… लूट-खसोट का मामला लग रहा है।”

दरोगा ने बिना उसकी बात पर ध्यान दिए नंगे आदमी से अगला सवाल किया—

क्या तुम अपराधियों को पहचान सकते हो?”

हाँ जी, क्यों नहीं! हमारे क्षेत्र के प्रधान जी—‘ख़ाससेवक और उनके साथी थे। उन्हीं की गाड़ी में बैठकर वो सब लोग आए थे”।

ख़ास सेवक का नाम सुनते ही दरोगा और सिपाही दोनों को जैसे लकवा मार गया।

वह तो इलाके का सबसे बड़ा बाहुबली था। उसके नाम से पुलिस, प्रशासन, कर्मचारी, गुंडे, मवाली—सब डरते थे। सब उससे बच कर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे। यहाँ तक कि उसके गुर्गों के खिलाफ भी कोई ज़ुबान खोलने की हिम्मत नहीं करता था। और यह नंगा आदमी ‘ख़ास’ सेवक के विरुद्ध रिपोर्ट लिखवाने चला आया! नादान! तुरंत दरोगा त्रिपाठी ने अपना पैंतरा बदला—

तुम्हारे पास क्या सबूत है कि वही लोग थे?”

हुजूर, मैं पहचानता सकता हूँ। वहाँ कैमरे भी लगे हैं… सब रिकॉर्ड हुआ है। उत्सव के कर्मचारी भी वहीं मौजूद थे। दूसरे लोग भी थे, सारी वारदात उनकी आँखों के सामने घटित हुई। आप उनसे पूछताछ कर सकते हैं। और सबसे बड़ा सबूत—मैं खुद… इस ठंड में नंगा, आपके सामने खड़ा हूँ!”

दरोगा ने खीझते हुए कहा—देखो मिस्टर आम, ‘ख़ास’ सेवक बहुत बड़े आदमी हैं। उन पर ‘वस्त्र चोरी’ जैसे घटिया इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं। कोई भी यक़ीन नहीं करेगा। हो सकता है यह उन्हें बदनाम करने की तुम्हारी साज़िश हो।”

हुजूर मेरी ऐसी क्या औक़ात जो मैं ‘ख़ास’ सेवक के खिलाफ साज़िश करूँ।”

रामदीन ने दरोगा की बात को आगे बढ़ाया—“ख़ास सेवक तो राजा हैं इस इलाके के। जो पसंद आ जाए, उठा लेते हैं, उन्हें चोरी करने की क्या ज़रूरत?”

चोरी नहीं तो हुजूर… इसे आप लूट मान लीजिए।”

देखो मिस्टर आम, हमारे मानने से कुछ नहीं होता! तुम्हें शपथ-पत्र देना होगा।” दरोगा के स्वर में अब रूखापन था।

बाहर अंधेरा घिर आया था। आम आदमी की हड्डियों तक में ठंड प्रवेश कर चुकी थी। धूजते स्वर में वह बङी कठिनाई से बोला—शपथ-पत्र? कैसा शपथ-पत्र, हुजूर?”

विधिवत नोटराइज़्ड स्टाम्प पेपर पर लिखकर देना होगा कि तुम्हारे आरोप सत्य हैं और तुम्हारे पास पर्याप्त साक्ष्य हैं। इसके बाद हम रपट लिखेंगे और जाँच करेंगे। लेकिन ध्यान रहे, यदि तुम आरोप सिद्ध न कर पाए तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 229 के तहत झूठा शपथ-पत्र देने के आरोप में तुम्हें सात साल तक की सज़ा हो सकती है। मानहानि का मामला भी अलग से चल सकता है। समझे!”

शपथ-पत्र की आत्मघाती शर्त सुनकर आमआदमी का बचा-खुचा धैर्य जवाब दे गया। ऊपर से सजा की बात ने उसे बुरी तरह से डरा दिया था। न्याय की धुँधली उम्मीद सर्द हवा में ठिठुर कर जम गई।

वह ख़ास सेवक की लूट को कैसे सिद्ध करेगा?

उसे कैमरों की फुटेज कौन देगा?

कर्मचारी क्यों उसके लिए गवाही देंगे?

सब अनिश्चित था… और उसके लिए तो लगभग असंभव। और फिर… मानहानि! सात साल की कैद! नहीं… नहीं!

क्या सोचने लगे, जल्दी बताओ। हमें और भी बहुत काम हैं।” दरोगा ने ज़ोर देकर पूछा।

नंगा आदमी सिसक उठा—हुजूर, हम ठहरे आमआदमी। ये सब नहीं कर पाएंगे। बस एक कृपा कर दो… कुछ पहनने को दे दो। ठंड से शरीर बर्फ़ बन गया है; प्राण निकले जा रहे हैं। मुझे नहीं लिखवानी कोई रपट-वपट।”

दरोगा के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान दौङ गई। उसने रामदीन को एक ओर ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा, “तहख़ाने वाले स्टोर में जो कंबल रखे हुए हैं, उनमें से एक ले आओ”।

“लेकिन वह माल तो ख़ाससाहब के लिए है …”। रामदीन ने फुसफुसाते हुए आँखें फैलाईं।

“हाँ, हाँ, मुझे पता है। उन्होंने भी तो घर-घर जाकर यही करना है”। दरोगा त्रिपाठी ने गर्दन को दरवाज़े की ओर हल्का झटका देकर, इशारों में उसे अंदर जाने का आदेश दिया।

थोड़ी ही देर में सिपाही रामदीन एक कंबल के साथ लौट आया; जिसे लगभग झपटते हुए नंगे आदमी ने तुरंत अपने पूरे बदन पर कसकर लपेट लिया। हल्की गरमाहट मिलते ही उसकी जान में जान आई।  

पूरे दस हज़ार का है! किस्मत अच्छी है तुम्हारी—कुछ दिन पहले एक सरकारी गोदाम की लूट का माल जब्त हुआ था। अपनी लोक उत्सव वाली ड्रेस को भूल जाओ—जान है तो जहान है।” दरोगा ने समझाया।

आम आदमी की आँखें भीग गईं। इस ‘नेकी’ के लिए उसने दरोगा को करबद्ध धन्यवाद दिया।

देश में ऐसे लोक-उत्सव धूमधाम से आयोजित-प्रायोजित हो रहे हैं। सब लोग खुश हैं।

आम आदमी खुश है; उत्सव के बहाने उसे कंबल का संबल मिल जाता है।

दरोगा खुश है; उसे ख़ाससेवक की विशेष सेवाकरते हुए तंत्र की बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल जाता है।

ख़ाससेवक खुश है; सब निर्धारित रणनीति के अनुरूप ही हो रहा है।

ख़ाससेवक के गुर्गे खुश हैं; आमआदमी के लूटे हुए वस्त्र पहनकर लोक-उत्सव का भरपूर लुत्फ़ जो उठा रहे हैं।

चारों तरफ़ खुशहाली है। 



© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21 नवंबर, 2025


कविता: सनातन प्रकाश पुंज



भाषा और भाषाई मर्यादा पर
अब भी
कुछ लोग क्यों चाहते हैं विमर्श
क्यों चाहते हैं पिष्टपेषण[1]

क्यों करना चाहते हैं पुनराकलन

क्यों कुछ लोग अब भी हो उठते हैं विचलित
क्यों लौट-लौट चले जाते हैं —
समाज, संसद, साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता, अध्ययन-अध्यापन
न्याय और व्यवस्था की
पुरातन, आदर्शवादी गलियों में?


अब, जबकि
विधानसभा से लेकर संसद तक
नफ़रती विषवमन, अवस्तरीय फब्तियाँ
टीवी स्टूडियो में
चीखते-चिल्लाते ऐंकरों की निरर्थक, भौंडी बहसें
न्यायिक गलियारों से छिटकती अवांछित टिप्पणियाँ
सोशल मीडिया पर बजबजाते कमेंट
अंतहीन, बेलगाम ट्रोल्स
धार्मिक अखाड़ों में सुशोभित, महिमा मंडित गालियाँ
कत्लेआम की बेख़ौफ़ हुंकार —
इस दौर के ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुके हैं!


जिन्हें नाज़ है हिंद पर- उन्हीं लोगों ने
हाँ, उन्हीं लोगों ने खोज लिए हैं —
आज़ादी के वास्तविक अर्थ, वास्तविक तारीख और प्रतिमान
वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी
वास्तविक वीर, नायक और महानायक —
खोज लिए गए हैं, और
पाठ्यक्रमों, पाठशालाओं, स्मारकों, स्मृतियों, सङकों, इमारतों का
हो रहा है द्रुतगामी शुद्धिकरण!


वे तमाम शब्द
जो उस दुरभिसंधि[2] की पहली बाधा थे
अब हो रहे हैं — पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित
मसलन —
समता और समानता एक छलावा है
दबी-कुचली आवाज़ों का समर्थन कहलाता है —
तुष्टीकरण
मानवता, कमजोरी और बुज़दिली का परिचायक है
भाईचारा, एक पाखंड है
सांप्रदायिकता, स्वाभिमान का समानार्थी
अंधश्रद्धा, अंधविश्वास और अतिवाद— सुप्त सामर्थ्य हैं
और भाँडगिरी से इतर
प्रगतिशील अभिव्यक्ति, लेखन या विचार —
स्वदेशी मूल्यों का क्षरण-
गहरी साज़िश या विघटनकारी प्रपंच हैं!


देशभक्त या देशद्रोही
वफ़ादार या गद्दार
श्रमजीवी या आंदोलनजीवी
विदेशी या देशी — नस्ल और नागरिकता की पहचान
धर्म, मर्यादा और संस्कार के अर्थ
दक्षिणपंथी, वामपंथी, नक्सल, आतंकी या जातंकी शब्द —
अब भाषाई-शास्त्री नहीं
विकृत, पक्षानुरागी शब्दकोश से परिभाषित होते हैं!


लेकिन इन सब के बीच
होने लगा है एक अद्भुत पुनर्जागरण
गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, भगतसिंह, अम्बेडकर
पुनरासीन होने लगे हैं —
फूले, सावित्री, प्रेमचंद, खुसरो और जायसी
नानक, कबीर, बुद्ध और महावीर
पुनर्जीवित हो उठे हैं —

वे पहुँच रहे हैं घर-घर
दे रहे हैं दस्तक
और हजारों हजार चिंतक, विचारक, क्रांतिकारी, अध्येता, मजदूर और किसान
पर्युदय[3] में ले रहे हैं अंगङाई!


‘सत्यमेव जयते नानृतं’ से प्रज्वलित
सनातन प्रकाश पुंज फैल रहे हैं
पहले से कहीं अधिक प्रचंड—
चैतन्य रश्मियां
पहले से कहीं अधिक स्पष्ट, सुग्राही और प्रभावी—
तन्मात्र[4] गुंजायमान है
खुल रहे हैं बंद वातायन और जर्जर दरवाज़े
छद्म अवरोधक टूटकर बिखर रहे हैं
और कूटरचित शब्दकोश—
विवश है स्वैच्छिक मृत्यु-वरण को!


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 03.11.2025


[1] पिष्टपेषण- व्यर्थ परिश्रम, पीसी हुई वस्तु को फिर से पीसना
[2] दुरभिसंधि—षडयंत्र, कुचक्र
[3] पर्युदय-सूर्य उदय होने से पहले का समय, तङका
[4] तन्मात्र—शब्द,स्पर्श, रूप, रस और गंध-पंचभूतों के मूल सूक्ष्म रूप




कविता: मेरे चले जाने के बाद




मेरे चले जाने के बाद
बिना जाँच-बिना कमेटी
किया निलंबित आरोपी प्रोफ़ेसर-तत्काल
करेंगे हर संभव सहयोग-कह रहे थे
विभागाध्यक्ष देवीलाल!


मेरे चले जाने के बाद
पहुँच गए विधायक सीधे एसपी के दफ़्तर
लिए संग अपना लाव-लश्कर
“करो कार्रवाई अतिशीघ्र, दिलवाना होगा बेटी को इंसाफ
जो भी हैं सहयोगी-करना नहीं उनको भी माफ़”!


मेरे चले जाने के बाद
किया तुरंत दर्ज केस दरोगा ने
बिना सिफ़ारिश-बिना रिश्वत-बिना टेढ़े सवाल
धर लिया आनन-फानन अभियुक्त
दिखलाया पुलसिया ज़ोर-ज़बर[1] कमाल!


मेरे चले जाने के बाद
मानवतावादी संगठन भी पहुँच गए
पहुँच गए सोशल वर्कर, मीडियाकर्मी और पत्रकार
“नहीं सहेंगे अनाचार-अत्याचार, सुन लो बहरी सरकार!”
हुई उत्तेजित भीङ, भरने लगी हुंकार!


मेरे चले जाने के बाद
जाना कि मामला था बड़ा संगीन
दोस्त-संबंधी थे शोकाकुल अति गमगीन
जुट गया समाज, हुआ लामबंद गली-मोहल्ला
“करेंगे हम प्रतिकार!” चिल्लाकर चाचा चंदू बोला!


मेरे चले जाने के बाद
हेडलाइंस बटोर रही थीं टीआरपी
चला रहे थे मीडिया-ब्रेकिंग न्यूज़ बारंबार
सज रही थीं प्राइम बहसें-बेशुमार
कर रहे थे वक्ता-बक्ता, व्यवस्था पर तीखे प्रहार!


मेरे चले जाने के बाद
करुणा, वेदना और संवेदना ने दी दस्तक
आ पहुँची सांत्वना, आशा, दिलासा-मेरे बाबुल के द्वार
फ़र्ज़-शऊर[2] ने खोली बंद पलकें इस बार
कानून भी उठ गया नींद से-था जो गफलत[3] में बेज़ार[4]!


© दयाराम वर्मा जयपुर (राज.) 18 जुलाई, 2025

[1] ज़ोर-ज़बर-बलपूर्वक नियंत्रण करना
[2] फ़र्ज़ शऊर-कर्तव्य बोध
[3] गफलत-उपेक्षा, लापरवाही, अनदेखी
[4] बेज़ार-उबा हुआ, अरुचि या विरक्ति से भरा


प्रकाशन विवरण 

सत्य की मशाल- भोपाल (मासिक साहित्यिक पत्रिका) अगस्त, 2025





 नरसंहार

 

(1)
यह ग़ज़ा है

इसके अस्त-व्यस्त अस्पताल के एक बेड पर
बुरी तरह घायल, पाँच वर्षीय साफ़िया
उसके बाएँ पैर की टाँग घुटने तक काट दी गई है
क्यों?… उसे नहीं पता
उसे याद है-अभी तीन दिन पहले
जब दूर आसमान में चाँदनी छिटकी हुई थी

घर की बालकनी में चुंधियाती रोशनी के साथ एक भीषण धमाका
और बस!

 

फ्रॉक की जगह
उसके पूरे बदन पर लाल धब्बों वाली सफ़ेद पट्टियाँ बँधी हैं
रोम-रोम से रिसता क्रूर, असहनीय दर्द
भयानक चीख़ों से लिपटकर
आज़ाद होने की असफल कोशिशें करता है
अस्पताल के गूँगे गलियारों से प्रतिध्वनित उसका क्रंदन
अन्ततः थक-हारकर
बेहोशी की चादर में गुम हो जाता हैं!

कभी जब उसे होश आता है
एक पल के लिए देखती है ठीक सामने-माँ
माँ-उसकी प्यारी माँ
दुनिया की सबसे सुंदर सौगात-उसकी माँ
दोनों हाथ फैलाए आ रही है दौड़ती हुई-उसकी ओर
माँ… माँ…”
लेकिन साफ़िया के हाथ… साफ़िया के पाँव…
नहीं उठते, नहीं उठ पाते
मेरे हाथ-मेरे पाँव क्यों… क्यों…क्यों…?”
अस्फुट आवाज में उलझे उसके लङखङाते सवाल
केवल सवाल, कोई जवाब नहीं!

उसके ठीक ऊपर
सफ़ेद छत तेजी से घूम रही है
काश, यह रुक जाए अभी की अभी
हरे लबादे में लिपटी एक आकृति झुकती है-उसके बदन पर
एक सुई कहीं चुभती है
वह सिहर उठती है-कराह उठती है
एक नई पीड़ा को जन्म देता-डॉक्टर का स्पर्श
माँ की धुँधली छवि-अश्रुओं की बूँदों में घुलकर बह निकलती है
कोई तो नहीं है
यहाँ उसके आसपास-है तो केवल दर्द
भयानक दर्द-जिस्म के हर हिस्से को पिघलाता हुआ
चीरता हुआ, जलाता हुआ!


(2)
जहाँ तक नज़र जाती है —
इमारतों के मलबे के ढेर, टूटी सड़कें, बिखरा असबाब
खाना और पानी की तलाश में भटकते लोग
इन्हीं में से एक है नासिर
लगभग सात वर्षीय नासिर
नंगे पाँव, अर्ध-नग्न, मैला-कुचैला बदन
बदहवास-हाथ में एक कटोरा थामे वह दौड़ रहा है
वहाँ सामने खाना बँट रहा है!

वह झौंक देता है

अपने कमजोर शरीर की पूरी ताकत
भीड़ में कभी आगे, कभी पीछे धकेला जाता है
खिचड़ी की तेज़ खुशबू
पाँच दिन से भूखे नासिर को आक्रामक बना देती है
अपने से छोटे, कमजोर बच्चों को धकियाते हुए
जैसे तैसे वह कामयाब हो जाता है!

 

ज्योंही तरल खिचड़ी का एक घूँट
उतरता है उसके हलक से नीचे
भूख किसी भेड़िये की तरह  गुर्राने लगती है
लेकिन वह जब्त करता है
वहाँ दूर, मलबे के दूसरे ढेर के पास
उसे लौटना है

और वह दौड़ पड़ता है!

 

लेकिन तभी-तड़-तड़-तड़…
गोलियों की आवाज़ों के साथ चीख-पुकार
बच्चे, बड़े, औरतें-सब भाग रहे हैं, गिर रहे हैं
एक बच्चा चीखता हुआ
ठीक उसके ऊपर आ गिरता है
नासिर के गिरने के साथ ही उसका कटोरा भी छूटकर
जा गिरता है — धूल में!

 

मृत बच्चे को अपने बदन से हटाकर वह खड़ा होता है
दोनों खून से सने हैं, लेकिन शुक्र है
मृतक के हाथ का कटोरा अब भी सुरक्षित है
अंतिम पलों तक
उसने भोजन को संभाले रखा  
नासिर उसी कटोरे को उठाकर फिर दौड़ पड़ता है!

चीखने-चिल्लाने की मार्मिक आवाज़ें
उसका पीछा करती हैं
लेकिन उसे पहुँचना है-जल्द से जल्द अपने घर
तंबू में चिथड़ों में लिपटी उसकी माँ
हफ्तों से भूखी, बुखार में तपती, जीर्ण-शीर्ण
अब केवल माँ ही तो बची है!

माँ… माँ… माँ…
देखो, मैं खिचड़ी लाया हूँ!
माँ उठो, कुछ खा लो- माँ… माँ…
तंबू में घुसते ही नासिर चिल्लाता है
लेकिन माँ के शरीर में कोई हलचल नहीं है
उसकी पुतलियाँ स्थिर हैं, हाथ-पाँव ठंडे पड़ चुके हैं
तो क्या? माँ भी…
उसके बदन में एक झुरझुरी-सी दौड़ जाती है
उसका दिमाग सुन्न हो जाता है!


चारों ओर पसरा है डरावना सन्नाटा
धीरे-धीरे नासिर के तमाम दर्द, भय, क्रोध भावशून्य हो जाते हैं
और पेट की बेरहम, बेशर्म भूख
कटोरे पर झुक जाती है!

 

© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 13 जुलाई, 2025

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