Article published in 'I AM GREATFUL' a collection of 151 articles on gratitude 



Gratitude means giving thanks for pleasant experiences

 

According to the American Psychological Association's definition, gratitude is a feeling of appreciation or happiness toward a tangible benefit (like a gift or favor) or an intangible or incidental event (like a good day).

 

From birth to adulthood, a person remains grateful for the support of parents, educational, professional, and spiritual mentors, employers, and others who contribute to their success. However, it is not necessary that this feeling of gratitude be reserved only for life-changing events. We can also feel grateful for small joys and acts of kindness, such as guidance from a stranger in an unfamiliar place, a birthday greeting, clouds and rain on a humid day, etc.

 

Gratitude is also a powerful tool for personal development. When practiced regularly, gratitude helps us face even the toughest situations—such as prolonged illness, financial crises, loss of a loved one, legal disputes—by fostering the patience, courage, and wisdom we need for challenging times ahead.

 

Feelings that inspire gratitude are not limited to humans alone; animals and birds also display this. Sensitive creatures understand the value of mutual dependence and the importance of the natural ecosystem for coexistence. They often express this understanding in some form. Thus, it can be said that the thought or feeling of giving thanks for pleasant experiences is, in essence, gratitude among all sentient beings.

 

Dayaram Verma, Jaipur 30.10.2024

 

 हिंदी अनुवाद:

सुखद अनुभूतियों का धन्यवाद अर्थात कृतज्ञता

 

अमेरिकन मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन की परिभाषा के अनुसार, कृतज्ञता, किसी मूर्त लाभ (जैसे उपहार या उपकार) या अमूर्त या आकस्मिक घटना (जैसे अच्छा दिन) के प्रति आभार या खुशी की भावना है.

 

जन्म से लेकर बङे होने तक एक मनुष्य की सफलता के पीछे उसके माता पिता, शैक्षिक-व्यावसायिक और आध्यात्मिक शिक्षक, नियोक्ता आदि के उपकारों के प्रति सदैव आभारी रहता है. लेकिन जरूरी नहीं कि कृतज्ञता की यह भावना जीवन को वृहत रूप से प्रभावित करने वाली घटनाओं के प्रति ही हो. छोटी-छोटी खुशियों और उपकार के लिए भी हम कृतज्ञ हो सकते हैं यथा, किसी अनजान जगह पर किसी अपरिचित द्वारा सही रास्ते का मार्गदर्शन, जन्मदिन पर किसी का बधाई संदेश, उमस भरे एक गर्म दिन अचानक से उमङ-घुमङ कर छाए बादल और बारिश, इत्यादि.

 

कृतज्ञता व्यक्तिगत विकास के लिए भी एक सशक्त उपकरण है. नियमित रूप से कृतज्ञता का अभ्यास होने पर प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियां, यथा लंबी बीमारी, आर्थिक संकट, प्रियजन की अकाल मृत्यु, अदालती विवाद आदि भी चुनौती भरे भविष्य में हमारे लिए आवश्यक धैर्य, साहस और विवेक की सौगात लेकर आती हैं.    

 

आभार प्रकट करने के लिए प्रेरित करने वाली संवेदनाएं, केवल मानव मात्र तक ही सीमित नहीं होती अपितु यह जीव-जंतुओं और पशु-पक्षियों में भी देखी जा सकती हैं. सभी संवेदनशील प्राणी अपने सह अस्तित्व के लिए, एक दूसरे पर निर्भरता और प्राकृतिक इकोसिस्टम के महत्व को न केवल समझते हैं वरन किसी न किसी रूप में कभी न कभी इसे उद्घाटित भी करते हैं. इस प्रकार, कहा जा सकता है कि संवेदनशील प्राणियों का अपनी सुखद अनुभूतियों के प्रति धन्यवाद-रूपी विचार या भाव ही कृतज्ञता है.

 























































 व्यंग्य: चारों धाम- सेवा तीर्थ

 

विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक रोमियो और जूलियट में नायिका जूलियट अपने प्रेमी से कहती है—

नाम में क्या रखा है? जिसे हम गुलाब कहते हैं, किसी और नाम से भी उसकी सुगंध उतनी ही मीठी होती है। रोमियो, अपना नाम त्याग दो, और उस नाम के बदले—जो तुम्हारा कोई अंश नहीं—मुझे पूरी तरह अपना लो।”

यहाँ जूलियट अपने प्रेमी को नाम की पहचान से मुक्त होकर प्रेम को प्राथमिकता देने का आग्रह कर रही है। उसका तर्क है— नाम बदलने से व्यक्तित्व नहीं बदलता।

लेकिन यह कथन सोलहवीं सदी का है। तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। यह कहाँ लिखा है कि साहित्य और समाज में सदैव गुलाब का ही दबदबा रहेगा? कमल भी तो है—फूलों का महाफूल। कमल का कमाल यह है कि वह कीचड़ में खिलता है। यह उसका बड़प्पन है, उसका समाजवादी और समावेशी चित्रण है! भले ही गुलाब उसे कीचड़ का शोषक बताकर उसका सामंती निरूपण करें। लब्बोलुआब यह है कि नाम बदलने से गुलाब को फर्क पड़े या न पड़े औरों को पड़ सकता है। अब जैसे यह उदाहरण देखिए।

उत्तर कोरिया में पिछले दशक में माँ-बाप अपने बच्चों को नरम और सरल नाम देने लगे थे, जैसे ‘ए रि’, ‘सु मि’ जिनका शाब्दिक अर्थ होता है— प्यारा/प्यारी और सुंदर। जब यह बात किम जोंग के संज्ञान में आई तो उनका पारा गर्म होना स्वाभाविक ही था। वे भला अपने प्यारे देश की संस्कृति को प्यारे और सुंदर नामों से अपसंस्कृत होते हुए कैसे सहन करते!

फौरन दिशा-निर्देश जारी किए गए— देश के बच्चों के नाम ‘वैचारिक’ और ‘क्रांतिकारी’ हों जैसे ‘चुंग सिम’ जो निष्ठा (स्वामी भक्ति) को दर्शाता है या ‘पोक-II’ जो एक बम का नाम है। और जैसा कि हम सब जानते हैं, वहाँ की जनता कितनी आज्ञाकारी है। इस आदेश के बाद जन्म लेने वाले बच्चों के नाम पोक-II’ से लेकर ‘चोंग’ (बंदूक), ‘सो-चोंग’ (राइफल), ‘क्वोन चोंग’ (पिस्तौल), ‘पोग-याक’ (विस्फोटक) जैसे बारूदी नाम रखने की होड़ मच गई। 

फिलहाल हमारे यहाँ गली, मोहल्लों, गाँव, शहरों और सरकारी संस्थाओं, कार्यालयों आदि के नाम बदल कर उन्हें जोश, गर्व और गौरव की ड्रिप चढ़ाई जा रही है, व्यक्तिगत नामों पर अगले चरण में विचार किया जाएगा। तो इस अभियान को विस्तार देते हुए शाही नवरत्न, बहुत मंथन के उपरांत ‘सेवा तीर्थ’ जैसा धाँसू शब्द खोज ले आए। इस शब्द में संकल्प, प्रकल्प, कायाकल्प आदि के भाव वैसे ही गूँथे हुए हैं जैसे ‘कर्तव्य पथ’, ‘लोक कल्याण मार्ग’, ‘कर्तव्य भवन’ आदि नामों में थे। 

नाम पढ़-सुनकर ही काम की संतुष्टि हो जाती है। जैसे मन की बात सुनने के बाद काम की बात करने का मन ही नहीं करता! यदि नाम का ऐसा प्रताप हो सकता है तो फिर काम पर व्यर्थ पैसा और समय क्यों बर्बाद किया जाए? 

बाज़ लोगों को, जिनमें पिछली सरकारें बाय डिफॉल्ट शामिल हैं, नहीं मालूम कि तीर्थ की उपमा किसे दी जानी चाहिए। अब नेहरू जी को हो लीजिए! उनकी निगाह में तो भाखड़ा नांगल डेम, भिलाई स्टील प्लांट, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड जैसे प्रोजेक्ट्स ही आधुनिक भारत के तीर्थ थे। कौन समझाए!

तीर्थ उस स्थान को कहा जाता है जो पवित्र है, जहाँ मुख्य देवता और अन्य देवगणों की पावन उपस्थिति हों। जहाँ भक्ति और श्रद्धा से परिपूर्ण वातावरण हो, चढ़ावा चढ़ता हो, प्रसाद बँटता हो, वंदन-गान गाए जाते हों।

अब किसी बाँध, स्टील या बिजली के कारखाने को तीर्थ कहना—लाहौल-विला-कुव्वत। कोई अल्पज्ञ ही ऐसी कल्पना कर सकता है? यह मानना होगा कि नाम बदलना सबसे महत्वपूर्ण शासकीय कामों में से एक है। नाम ऐसा होना चाहिए कि सुनते ही कानों में संगीत बज उठे, दिल कहे इलु-इलु! दो शब्दों के संयोजन से निर्मित सेवा तीर्थ, ऐसा ही एक भावोत्तेजक, सुविचारित और कर्णप्रिय नाम है। 

और, पीएमओ को सेवा तीर्थ का नाम देना बिल्कुल युक्तियुक्त है, तर्कसंगत है, व्यावहारिक है, समसामयिक है, संस्कारी है और सब पर भारी है। इसमें एक तीर्थ स्थल जैसी तमाम अर्हताएँ पाई जाती हैं। यहाँ न केवल देवों के अधिपति स्वयं विराजमान हैं बल्कि पूरी देव-नगरी मौजूद है। साफ-सफाई, हरे-भरे बगीचे, झरनों जैसे फव्वारे, गर्मी में सर्दी और सर्दी में गर्मी का अहसास—यह सब आप यहाँ महसूस कर सकते हैं। 

अब जबकि अमृतकाल आया हुआ है या यूँ कहें कि घनघोर छाया हुआ है, तो इस पुण्य काल में देव, महादेव सब सशरीर सेवा-तीर्थ में मौजूद हैं, अमृत पिया जा रहा है, अमृत पिलाया जा रहा है। ऐसे में दान, पूजा, भेंट, परिक्रमा आदि की व्यवस्था न हो— ऐसा तो सपने में भी सोचा नहीं जा सकता। 

रही बात सेवा की तो जिसकी जैसी श्रद्धा वैसी सेवा की जा सकती है। और जैसी होगी सेवा वैसा मिलेगा मेवा। भक्त ध्रुवदास ने सेवा और भक्ति की महिमा कुछ इस प्रकार से समझाई है—‘सेवा अरु तीरथ-भ्रमन, फलतेहि कालहि पाइ। भक्तन-संग छिन एक में, परमभक्ति उपजाइ।’ सेवा तीर्थ के संदर्भ में इस दोहे का भावार्थ यह लिया जा सकता है कि भक्तों की संगति में एक क्षण में ही परमभक्ति के पद पर पहुँचा जा सकता है। 

इस नामोत्तेजक वातावरण में कुछ सुझाव निःशुल्क पेश हैं, यथा—पुलिस चौकी का नाम ‘सेवा मठ’, तहसील कार्यालय का ‘भू-सेवा धाम’, आयकर विभाग का ‘अर्थ अखाड़ा’, ईडी का ‘वज्रपात पीठ’। संभावनाएँ असीमित हैं—थोड़ा योगदान आप भी दे सकते हैं।

 © दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 15 फरवरी, 2026

 व्यंग्य: फेंको तो लंबा फेंको


इस देश में बड़े-बड़े अर्थशास्त्री पैदा हुए, किताबें लिखी, हार्वर्ड, कैम्ब्रिज, कोलंबिया, ऑक्सफोर्ड, शिकागो, एम.आई.टी. जैसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे—लेकिन अफ़सोस, उन्हें यह अर्थसत्य कभी समझ में ही नहीं आया कि बजट एक साल का नहीं, इक्कीस साल का भी हो सकता है। मनमोहन जी जैसे मंजे हुए अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर तो बाकायदा दस साल तक देश के प्रधानमंत्री भी रहे; पर इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति उन्हें नहीं हुई।

लेकिन पहली बार आज़ाद भारत में ऐसा बजट पेश हुआ है, जो पेश तो 2026 में हुआ है, लेकिन जिसका मिशन वर्ष 2047 है। आलाकमान ने वह कर दिखाया है, जो न नेहरू कर पाए, न मनमोहन, न योजना आयोग, न नीति आयोग। वैसे यह आलाकमान के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनुकूल ही था; उनके हर काम में इतिहास की नवसृजना और चकाचौंध छुपी होती है।

हम अल्प बुद्धि लोग बजट को अगले एक वर्ष के वित्तीय लेखा-जोखा के रूप में देखने के आदी रहे हैं और आय-व्यय, टैक्स, सब्सिडी, छूट, सरकारी योजनाओं आदि आँकड़ों में ही उलझे रहते हैं। अब तक वित्तमंत्री और अर्थशास्त्री बजट तैयार करते वक्त गिरते रुपये, बढ़ती महँगाई, घटते रोज़गार, खेती की बदहाली, औद्योगिक मंदी, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे सुधारातीत विषयों पर माथापच्ची करते रहे हैं। नतीजा— न महँगाई कम हुई, न बेरोज़गारी घटी, न गरीबी दूर हुई। चाहे जितनी सब्सिडी दो, टैक्स छूट दो, जनता कभी संतुष्ट हुई? तरक़्क़ी बैलगाड़ी की तरह खिसकती रही—कृपा खजूर की ऊँची टहनी पर अटकी रही।

अब ज़रा सोचिए— क्या बजट जैसे महान दस्तावेज़ के साथ यह अन्याय नहीं है कि उसके दायरे को महज एक वर्ष तक सीमित कर दिया जाए? इतने विशाल देश के लिए एक साल की तुच्छ सोच! बड़ा देश है तो सोच भी बड़ी, लंबी और महान होनी चाहिए। जब तक सोच और लक्ष्य बड़े नहीं होंगे, उपलब्धि भला कैसे बड़ी हो सकती है?

अब जब इक्कीस वर्षीय बजट आ ही गया है, तो क्यों न इस क्रांतिकारी सोच को और आगे बढ़ाया जाए? मसलन, जीडीपी।
सालों से घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं, चाबुक घिस गए हैं— लेकिन जीडीपी है कि चौथे पायदान से ऊपर खिसक ही नहीं रही।

गंभीरता से विचार करना होगा। यह बड़ी सोच का समय है— हमें तीसरे पायदान और दूसरे पायदान जैसे छोटे लक्ष्य छोड़कर सीधे पहले नंबर पर नज़र गड़ा देनी चाहिए।

इसमें चौंकने जैसा कुछ नहीं है— यह बहुत कूल-कूल है। मात्र यह घोषणा करनी है कि वर्ष 2147 में, जब भारत आज़ादी के 200 साल पूरे करेगा, तब वह विश्व की सबसे बड़ी (नंबर-वन) अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अख़बारों में फुल पेज साइज, गौरव-गुदी संकल्प वाले रंगीन विज्ञापन ही तो छपवाने हैं! फिर देखिए—विपक्षियों और विरोधियों की कैसे वाट लगती है। उनकी रोज़-रोज की घोचेबाज़ी पर विराम लग जाएगा और देश के लीडरान अपेक्षाकृत अन्य महत्वपूर्ण प्रच्छन्न उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।

इक्कीस, पच्चीस या पचास वर्ष जितने दूरगामी लक्ष्य तय करने में कोई जोखिम नहीं है। और यक़ीन मानिए—एक कॉल पर बालकनी में आकर थाली बजाने वाली जनता, ऐसी महान घोषणा का तो सड़कों पर भांगड़ा, कत्थक, घूमर और डांडिया से लेकर सपेरा-डांस आदि करते हुए स्वागत करेगी।

वैसे यह बात नहीं है कि आलाकमान ने पहले लंबी अवधि के तीर नहीं चलाए। चलाए— और खूब चलाए! मसलन वर्ष 2016 में कहा कि 2022 तक किसानों की आय दुगुनी होगी! खूब वाह-वाही बटोरी गई। लेकिन इस तीर को लक्ष्य भेदने के लिए मात्र छह साल मिले। बदकिस्मती देखिए—दस साल बीत जाने के बाद भी यह राजधानी की सदाबहार धुंध में भटक रहा है। इसके अलावा पेट्रोल-डीज़ल के दाम, काले धन की वापसी, हर भारतवासी के खाते में 15-15 लाख, हर साल दो करोड़ रोज़गार— जैसे अनेक संकल्प बहुत ही पाक-साफ नीयत से लिये गए थे। चूक बस इतनी हुई कि लक्ष्यावधि कम रखी गई।

वफादार चिंतकचुल्लुओं और ज्ञानी गुरङगुल्लुओं ने इस प्रकार के आसमान-फाङक, धरती-धकेल लक्ष्यों की तटस्थ समीक्षा की तो पाया कि दुर्गति की असल वजह, लीडर लोगों द्वारा आगामी चुनाव से पूर्व अपने कर्मों के परिणाम जानने की लालसा है। चूँकि दो चुनावों के बीच समय अंतराल मात्र पाँच वर्ष का होता है, अत: शाही लक्ष्य-लेखकों के लिए एक मनोवैज्ञानिक दवाब बन जाता है और वे अधिक दूर तक फेंकने से परहेज करते हैं। लेकिन इस बजट ने इस उहापोह पर ढक्कन लगा दिया है।

बहुत सही किया। अब भला दस-पंद्रह साल, सत्ता में कोई ज़्यादा समय होता है? 50-60 प्रतिशत समय तो चुनावी रैलियों और जोड़-तोड़ में ही खप जाता है, कम से कम 10 प्रतिशत विदेशी दौरों में— 15-20 प्रतिशत समय सोने-खाने-जाने-नहाने के लिए भी तो चाहिए; चाहे बंदा अठारह-अठारह घंटे काम करने वाला ही क्यों न हो। फिर शेष समय बचा ही कितना!

विकसित भारत के लक्ष्य को बुलडोजर से उठाकर खाली सड़क पर घसीटते हुए 2047 मील-पत्थर के पास स्थापित पहले ही किया जा चुका था। यह बजट इसी विकसित भारत के सपनों को कंधा देने आया है। सब कुछ सेट हो जाएगा, लेकिन आम आदमी को कैसे समझाएं, जैसे ही चुनाव आते हैं— उसके नखरे शुरु हो जाते हैं। कर्मठ नेताओं को भी हर पाँच वर्ष बाद जनता की अदालत में खङा होना ही पङता है।

इन्हीं सब तथ्यों की रोशनी में, अब ज़रूरी हो गया है कि देश में आम चुनावों की अवधि पाँच की जगह बीस वर्ष कर दी जाए। पक्का इलाज!

इस परिकल्पना के पीछे एक और पहलू है। ज़रा सोचिए—एक गरीब देश में बार-बार चुनावों पर होने वाला खर्च! भाइयों-बहनों, माताओं-बुज़ुर्गों— देश के कीमती संसाधनों की बर्बादी रुकनी चाहिए कि नहीं? हाँ जी, हाँ— रुकनी चाहिए! वैसे भी सब जानते हैं—आएगा तो…!

आख़िर एक राजनेता के लिए पाँच साल भी कोई समय होता है? सम्राट अशोक ने 36 वर्ष राज किया, अकबर ने 49 वर्ष—तभी तो वे कुछ कर पाए और महान कहलाए। इसलिए बिला नागा, भविष्य में आम चुनावों की अवधि न्यूनतम बीस वर्ष कर देनी चाहिए—सीधे-सीधे 75 प्रतिशत समय, संसाधनों और पैसों की बचत! हींग लगे न फिटकरी—रंग चोखा आए! 2047 में भारत विकसित कैसे नहीं बनेगा— देखते हैं।

संभव है, इस दिशा में अंदरखाने कार्य ज़ोर-शोर से प्रगति पर हो! एक के बाद एक राज्यों में ताबड़तोड़ एस.आई.आर. क्या इशारा कर रही हैं? एक बार सारे राज्य लाइन पर आ जाएँ, फिर कुछ ऐसा बड़ा और अनूठा किया जा सकता है कि पंचवर्षीय चुनावी झंझट से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए!

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© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 9 फरवरी, 2026

Published in - मासिक व्यंग्य पत्रिका -अट्टाहास मार्च, 2026 . सत्य की मशाल -मार्च, 2026






 






 व्यंग्य: अमृतकाल का विश्वगुरु

पता नहीं क्यों दुनिया के बड़े-बड़े नेता—पुतिन, शी जिनपिंग, टोनी ब्लेयर, इमैनुएल मैक्रों, फ्रेडरिक मर्ज़ और मोदी जी तक—दादा डोनाल के चक्रवर्तित्व को स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहे!

इस वयोवृद्ध शांतिदूत ने अपने दूसरे कार्यकाल में पदार्पण करते ही विश्व-शांति के लिए दिन-रात एक कर दिया। यह बात जग-जाहिर है। चाहे ग़ज़ा हो, यूक्रेन हो, भारत-पाकिस्तान हो—दादा डोनाल हर जंग के मैदान में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद थे। लड़ाई के लिए नहीं—लड़ाई रुकवाने के लिए, भई। उन्होंने बुढ़ापे, सेहत और शोहरत से समझौता किया—लेकिन विश्व-शांति से नहीं।

नतीजा—फ़िलिस्तीन अब दादा के सपनों के विकास की राह पर है। सुना है, उसे एक विश्वस्तरीय रिसॉर्ट की भाँति सजाने-सँवारने के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन किया गया है। भारत-पाक के बीच भड़के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विराम लग ही चुका है और पुतिन-ज़ेलेंस्की की उछल-कूद में भी कमी आई है।

लेकिन दादा की बदकिस्मती! दुनिया बहुत बेरहम है, अहसान-फ़रामोश है। वे क्या माँग रहे थे—फ़क़त नोबेल ही तो! किसी ने उनकी पीठ नहीं थपथपाई। स्वीडन की नोबेल प्राइज़ कमेटी ने तो शांति-दूत के महान शांति-कार्यों को जैसे नज़रअंदाज़ करने की क़सम ही खा रखी है।

जबकि देखा जाए तो दादा डोनाल, न केवल युद्ध के ज़रिये शांति स्थापित करने वाले आधुनिक मसीहा हैं, बल्कि उपेक्षित और तकनीकी रूप से पिछड़े छोटे देशों का भी उद्धार करने का पवित्र अभियान अमल में ला रहे हैं। वे जानते हैं कि आर्थिक स्वावलंबन के बिना शांति की कल्पना महज़ एक कोरी कल्पना ही है।

अतएव पूरी दुनिया को ‘एक धरती’, ‘एक राजा’, ‘एक खाजा’ में बदलना होगा। वे मनोयोग से, विधि-विधान से, राजसूय यज्ञों में—

मेरी छतरी के नीचे आओ,  झूमो-नाचो-गाओ,  वरना टैरिफ टॉफी खाओ”— सरीखे तत्काल प्रभावी ट्रम्पंत्र का अखंड जाप करवा रहे हैं।

साथ ही उन्होंने दुनिया के अपेक्षाकृत छोटे देशों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने परिवार, दामाद, पुत्र-पुत्रियों और तमाम सगे-संबंधियों को पूरी ज़िम्मेदारी से काम पर लगा रखा है—

जाओ, फैल जाओ दुनिया में। जो कमज़ोर हैं, उनके साथ साझेदारी करो, कंपनियाँ खोलो, बिटकॉइन बेचो, चिप्स बेचो, होटल बनाओ, ए.आई. प्रोजेक्ट लगाओ, रियल एस्टेट खड़ा करो… मतलब यह कि उन्हें हर तरह से मज़बूत बनाओ।”

इतिहास में ऐसा परोपकारी सम्राट ईसा-पूर्व तीसरी सदी में या तो अशोक हुआ था, जिसने अपने प्रियजनों को श्रीलंका और अन्य पूर्वी देशों में भेजकर ‘धम्म’ संदेश फैलाया—या इस सदी में दादा डोनाल, जो ‘धमक’ संदेश फैला रहे हैं।

इसी क्रम में दादा ने एक रोज जब क़तर-शेख को एक बेहतरीन नुस्खा दिया, तो वे बाग़-बाग़ हो उठे। उपकृत शेख ने तुरंत क़तर के बेहतरीन किस्म के ऊँट और भेड़ों को कई जहाज़ों में भरकर बतौर तोहफ़ा अमेरिका भिजवाने की पेशकश कर दी। लेकिन दादा तो दादा! बोले—

 दोस्त, इन लाजवाब प्राणियों को चराने-फिराने के लिए हमारे यहाँ अब खुले चरागाह कहाँ बचे हैं। सारी खाली ज़मीनों पर हम हवाई अड्डे बना चुके हैं, यू नो।”

 शेख ने दादा की नेक नियति को फ़ौरन ताड़ लिया, बोले—

वल्लाह हबीबी! फिर हम आपको कुछ और देती।”


और झट से 3800 करोड़ का लग्ज़री बोइंग जंबो जेट भेंट कर दिया। अगली कतार में बैठने वाले तथाकथित मज़बूत देशों को क़तर जैसी मेहमाननवाज़ी सीखने की ज़रूरत है।

अभी यह सब चल ही रहा था कि दादा डोनाल की चिंता में एक और अध्याय जुड़ गया, जब उन्हें पता चला कि ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति, दुर्लभ खनिज, तेल और गैस के भंडारों पर चीन और रूस जैसे चोट्टों की गिद्ध-दृष्टि लगी है। विश्व-शांति को सीधा ख़तरा!

लेकिन दादा ठहरे अडिग यौद्धा। उन्होंने अपने एक पुराने दोस्त के मुँह से, एक बार एक आइलैंड पार्टी में सुना था—

हार नहीं मानूँगा / रार नहीं ठानूँगा / काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ /गीत नया गाता हूँ…”

तुरंत ऐलान कर दिया—‘ग्रीनलैंड हमारा’। चारों तरफ़ हाय-तौबा मच गई। डेनमार्क ऐंठने लगा; उसके नाटो मित्र फुफकारने लगे—इस बार चोट सीधी थी। मोतियाबिंद से ग्रसित इन अमीरज़ादों को दादा की दूरदर्शिता का ठीक से अंदाज़ा नहीं। नोबेल, यानी विश्व-शांति के लिए, दादा को दशकों के पक्के मित्रों की नाराज़गी भी मोल लेनी पड़ रही है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं—एक अकेला सब पर भारी!

याद कीजिए, ऑपरेशन सिंदूर! भारत-पाक युद्धविराम को लेकर दादा ने एक-दो बार नहीं, पचासों बार कहा—
लड़ाई मैंने रुकवाई, लड़ाई मैंने रुकवाई, मान लो भाई’,

लेकिन मोदी जी ने एक बार भी हाँ में मुंडी ना हिलाई। कहा तो उन्होंने ‘ना’ भी नहीं, लेकिन डोनाल के लिए ‘हाँ’ ज़रूरी था—कारण वही नोबेल!

हम यह मौका चूक गए, जबकि वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मचाडो इस मामले में होशियार निकलीं। उन्होंने विश्व-शांति दूत ‘दादा डोनाल’ के असाधारण योगदान को न केवल पहचाना, बल्कि अपना नोबेल उनके श्रीचरणों में समर्पित कर स्वयं को अनुग्रहीत भी कर लिया। पहली बार दादा को लगा—किसी ने उन्हें ठीक से समझा है।

दोनों मुट्ठियों में—तेलमादुरो गया जेललीला तेरी अपरंपार—रचता कैसे-कैसे खेल!’

 इस समय हालात बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। दोस्त कब दुश्मन बन जाए, दुश्मन कब दोस्त बन जाए—कुछ पता नहीं। दुनिया के किसी भी देश में वेनेज़ुएला जैसा खेला हो सकता है!

हमारी परेशानी यह है कि दादा को देने के लिए हमारे पास न तो तेल है, न नोबेल जैसा पुरस्कार। ले-दे के टैरिफ है—सो दिल खोलकर दे ही रहे हैं। माँ कसम, यदि हमारे पास वेनेज़ुएला का दस फ़ीसद भी तेल होता, तो हम दादा को ‘तेल देने’ से हरगिज़ न चूकते। तेल के नाम पर हमारे पास केवल मालिश वाला तेल है, जो ‘माई फ्रेंड डोनाल’, ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’, ‘नमस्ते ट्रम्प’ जैसे इवेंट्स के समय खूब रगड़-रगड़कर दादा को लगाया गया था। अब डोनाल दादा ठहरे शौकीन मिज़ाज—पुराने तेल, पुरानी मित्रता, पुरानी वफ़ादारी से बोर हो जाते हैं। यू नो, ये दिल माँगे मोर!

वैसे कुछ भी कहो, एक बात माननी पड़ेगी—दादा जो भी करते हैं, खुला खेल फ़र्रुख़ाबादी; जो भी कहते हैं, बिना लाग-लपेट, बिना शर्म-संकोच। बंदे ने बेलौस दिल की भड़ास खोलकर रख दी—

आठ-आठ लड़ाइयाँ रुकवाईं, फिर भी नोबेल नहीं। अब दुनिया में शांति बनाए रखने की मेरी ज़िम्मेदारी नहीं!’

इन परिस्थितियों में क्या किया जा सकता है? दुनिया को अराजकता, अशांति, रोज़-रोज़ की टैरिफ-ट्रेड वॉर, शेयर मार्केट और सोने-चाँदी के उतार-चढ़ाव जैसी समस्याओं और तृतीय विश्व युद्ध के आसन्न ख़तरे से कैसे बचाया जाए, कौन बचाए? एक सौ चालीस करोड़ की आबादी वाला हिंदुस्तान! दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र! हमारा भी कोई फ़र्ज़ बनता है कि नहीं?

तो क्यों न कुछ बड़ा किया जाए। वैसे भी हम बड़ा करने के बड़े सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं। तो पेश है विशुद्ध देशी घी में तैयार, एकदम नवीन और मौलिक सुझाव—अमृतकाल विश्व शांति पुरस्कार की स्थापना! नोबेल से भी बड़ा, एक विश्वस्तरीय शांतिदूत पुरस्कार। नाम रखा जाए—‘ अमृतकाल विश्वगुरु पुरस्कार’!

न-न! मेरी बात का ग़लत अर्थ मत निकालिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि तथाकथित ‘विश्वगुरु’ हम ही हैं, और इस बात का चतुर्दिक डंका भी बजता है; लेकिन, सीss अंदर की बात तो केवल हम ही जानते हैं! तो यह जो शांति पुरस्कार होगा, वह ‘अमृतकाल स्पेशल’ होगा। यानी पहला और आख़िरी! और यह ख़िताब, ज़ाहिर है—दादा डोनाल को गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के साथ दिया जाएगा।

जब दादा-डोनाल यह ख़िताब ग्रहण करेंगे, तो दसों दिशाओं से पुष्प-वर्षा होगी; जल-थल और नभ में उनकी अखंड कीर्ति और बेजोड़ पराक्रम के जय-जयकार के नारे गूँज उठेंगे। पुतिन, जिनपिंग, नेतन्याहू, ……… आदि धुरंधर आँखें फाड़े देखते ही रह जाएंगे।

इस ख़िताब को हासिल करने के बाद मुझे यक़ीन है कि नोबेल के लिए दादा की भटकती आत्मा शांत हो जाएगी और विश्व के अच्छे दिनलौट आएंगे। साथ ही दुनिया को यह पता भी चल जाएगा कि, अमृतकाल के असल ‘विश्वगुरु’ कौन हैं?

© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 4 फ़रवरी, 2026



व्यंग्य: हंगामा क्यों है बरपा



चिंतकचुल्लु की समझ से यह सर्वथा परे था। सदैव ताज़ा लौकी सी चमकती रहने वाली मुखमुद्रा आज अलसाए बैंगन की तरह बे-रौनक़ थीं।

यह हो कैसे गया? ठीक नाक के नीचे! अपनों के ही हाथों! अपनों के ही विरुद्ध! अपनों के ही राज में… घोर अनर्थ!

चाय के प्याले की अंतिम घूँट सटकने के उपरांत, चिंतकचुल्लु ने धुमटी का एक गहरा सुट्टा खींचा और छत की ओर धुएँ का सघन छल्ला उछाल दिया। औपचारिक आदान-प्रदान में जैसे ही धुमटी, गुरु—गुरङगुल्लु के हाथों में पहुँची, उसने चेले—चिंतकचुल्लु से भी गहरा कश लगाया। इतना कि तंबाकू सुर्ख होकर लपट छोड़ने लगा और चिंतन-कक्ष रोमानी गंध से महक उठा।

शांत भाव से धूम्रपान का आनंद लेते हुए, गुरङगुल्लु ने प्रश्न किया—“तुम्हें क्या लगता है?”

चिंतकचुल्लु— “इस प्रकार की आत्मघाती अधिसूचना कैसे जारी हो सकती है! हो न हो, यूजीसी में कोई स्लीपर सेल घुसा है।”

गुरङगुल्लु— “नहीं। ऐसी कोई संभावना नहीं है।”

चिंतकचुल्लु ने आँखें झपझपाईं, एक असहज करवट लेकर अपान वायु उन्मुक्त की और गुरङगुल्लु की ओर थोड़ा झुककर फुसफुसाया—

“कहीं एपस्टीन फ़ाइल… बड़े या छोटे साहब ब्लैकमेल हो रहे हों?”

गुरङगुल्लु ने गर्दन हिलाकर इस आशंका को भी खारिज कर दिया।

“हम्म…” एक और लंबा कश खींचने के बाद चिंतकचुल्लु ने दिमाग को दूसरी दिशा में दौड़ाना आरंभ किया। पार्टी के भीतर पनप रही असहमतियों की कुछ कड़ियों को जोड़-जाड़ कर उसने किसी भीतरघात की ओर शंका का रुख मोड़ना चाहा।

“ऐसा बोलकर तुम शीर्ष नेतृत्व के कठोर अनुशासन और चक्रवर्ती मिज़ाज पर उँगली उठा रहे हो—चिंतक।”

चेले ने चिंतित होकर सिर खुजलाया। इस गुत्थी को समझने में असमर्थ वह वाकई परेशान था। कुछ क्षणों बाद उसके दिमाग में एक नया विचार कौंधा।

“हो सकता है टैरिफ पर टैरिफ लगाने के बाद भी जब दाल न गली हो, तो खिसियाए दादा ने जॉर्ज सोरोश के ज़रिए कोई साज़िश रच दी हो। या फिर गूगल-माइक्रोसॉफ्ट वगैरह से हमारे खुफिया तंत्र में सेंध लगाकर यूजीसी के नोटिफ़िकेशन का मजमून बदल दिया हो—जैसे थ्री इडियट्स में रैंचो और फरहान ने रामलिंगम के साथ किया था।”

गुरङगुल्लु ने उसे घूरा और धुमटी का धुआँ सीधे उसके मुँह पर छोड़ दिया।

चिंतकचुल्लु का यह तीर भी खाली गया। उसने हाथ हिलाकर धुएँ को अपने चेहरे के सामने से हटाया और चंद पल सोचने के बाद एक नई थ्योरी दागी—

“अरे हाँ! शी जिनपिंग की ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था। हाल ही में उसने अपने शीर्ष सैन्य अधिकारियों की छुट्टी की है। सुना है वे तख़्ता-पलट के फ़िराक में थे। हो सकता है, इस घरेलू षड्यंत्र के पीछे उसे हिंदुस्तानी हाथ का भ्रम हो गया हो।”

“बकवास। क्या बे-सिर-पैर की हाँक रहे हो।”

“तो गुरुदेव, आप ही प्रकाश डालें।” चिंतकचुल्लु ने मैदान छोड़ते हुए कहा।

“अच्छा बताओ, पुराने ज़माने में जब चोर गाँव से पशु चुराने जाते थे, तो क्या करते थे?”

“क्या?...”

“जिस दिशा में चोर पशु हाँक कर ले जाते, उनका एक साथी उससे उलटी दिशा में घंटियाँ बजाता हुआ भागता था…”

“हाँ, वह तो जानता हूँ। लेकिन उस कहानी का इस हंगामे से क्या संबंध?”

“यह कहानी पुराने ज़माने की थी, अब प्रासंगिक नहीं रही।” गुरङगुल्लु ने धुमटी का अंतिम कश लेकर उसे मेज़ पर रख दिया। अपनी लंबी, घनी, काली दाढ़ी को दाहिने हाथ से संवारा और गला खंखारकर साफ किया। चिंतकचुल्लु एक अबोध बालक की भाँति गुरङगुल्लु के चेहरे पर नज़र गड़ाए सुन रहा था। गुरङगुल्लु ने फ़रमाया—

“नई कहानी इस प्रकार से है… अतृप्तकाल में चोरों की जगह एक पेशेवर गिरोह ने ले ली, जिसमें चोर, ठग और डाकू—तीनों की पार्टनरशिप थी। सर्वप्रथम चोर रात के अंधेरे में गाँव के पशुओं को खोलकर भगा देते हैं। तत्पश्चात कुछ ठग भद्र पुरुषों के वेश में गाँव में प्रवेश करते हैं और शोर मचाकर गाँव वालों को उठाते हैं। वे बताते हैं कि चोरों का एक गिरोह तुम्हारे पशुओं को ले जा रहा है। गाँव के सारे पुरुष अपने पशुओं को बचाने के लिए घंटियों की दिशा में लाठी-बल्लम लेकर दौड़ पड़ते हैं। उधर, रास्ता साफ होते ही ठग डाकुओं को इशारा कर देते हैं। घात लगाकर छिपे बैठे घुड़सवार डाकू इत्मीनान से गाँव में घुसते हैं, गहने-नक़दी आदि लूटते हैं और जवान स्त्रियों को उठाकर दूसरी दिशा से भाग जाते हैं।”

चिंतकचुल्लु की शंका का निवारण हो चुका था। उसने झुककर गुरङगुल्लु के पाँव स्पर्श किए और उँगलियों को माथे से लगाया।

“आप धन्य है गुरुदेव!” एक बार फिर से उसका चेहरा ताज़ा लौकी की तरह चमकने लगा।



© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 30.01.2026



वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुमार पटवा के
राजस्थान यात्रा वृत्तांत- ‘शौर्य भूमि की सैर’ की प्रस्तावना



‘शौर्य भूमि की सैर’ केवल यात्रा वृत्तांत नहीं अपितु राजस्थान के अतीत से वर्तमान का सिंहावलोकन है।

यह यात्रा-वृत्तांत राजस्थान के पर्यटन स्थलों का मात्र सतही विवरण नहीं, बल्कि इसके दुर्लभ, रोचक और रोमांचक इतिहास एवं अलबेली संस्कृति का संजीदा सिंहावलोकन भी है। लेखक के कथनानुसार, ‘ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि में पर्यटन का आनंद कई गुना बढ़ जाता है।’ पाठक इस पुस्तक के पृष्ठ दर पृष्ठ पलटते हुए इस उक्ति को साकार होते देख सकता है।

एक अनुभवी गाइड और सम्मोहक सूत्रधार की भाँति, लेखक ने राजस्थान के पाँच संभागों के प्रमुख दर्शनीय स्थलों के माध्यम से इसकी आत्मा को समग्रता में छूने का सार्थक उद्यम किया है। विषयवस्तु के विस्तार और गहराई को देखते हुए, यदि इसे ‘शौर्य भूमि का सिंहावलोकन’ कहा जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इस पुस्तक में हम प्रदेश की अनेक विस्मृत जानकारियों से परिचित होते हैं- जैसे, नागौर को ‘जाटों का रोम’ कहा जाता है; बीकानेर का प्राचीन नाम ‘जांगल देश’ था; जयपुर को वर्ष 1876 में वेल्स के राजकुमार के स्वागत हेतु गुलाबी रंग में रंगा गया था। फलौदी का सट्टा बाज़ार चुनावी और मौसमी सट्टों के लिए कुख्यात है। हर साल काकेशिया से हजारों की संख्या में ‘कुरजां’ पक्षी फलौदी के खीचन गाँव में आते हैं। विश्वविख्यात हवा महल में 953 झरोखे हैं। झालावाड़-कोटा इलाके में सड़क किनारे ढाबों पर छह रोटियों के बराबर आकार का एक ‘रोटड़ा’ मिलता है।

यद्यपि किलों, परकोटों और प्राचीन मंदिरों के भित्तिचित्र, हथियार, शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएँ एवं स्थापत्य अपने समय के वास्तविक दस्तावेज माने जा सकते हैं, फिर भी लोकगीतों, किंवदंतियों, जनश्रुतियों और किस्से-कहानियों में निहित लोक मान्यताओं का भी अपना विशिष्ट महत्व है। तथापि, इतिहास की विवेचना करते समय लेखक ने तथ्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अधिक महत्व प्रदान किया है; परिणामस्वरूप यह कृति एक प्रमाणिक शोधग्रंथ के समकक्ष जान पङती है।

राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख मत प्रचलित हैं। पहले मत के अनुसार, वे कुषाण, शक और हूण जैसे विदेशी कबीलों के वंशज हैं; इस मत का समर्थन कर्नल जेम्स टॉड सहित अनेक विद्वानों ने किया है। दूसरे मत में उनका उद्भव भारतीय मूल के सूर्यवंशी और चंद्रवंशी क्षत्रियों से माना गया है। पौराणिक कथाओं पर आधारित तीसरे मत के अनुसार, आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ द्वारा संपन्न यज्ञ के परिणामस्वरूप अग्निकुंड से राजपूतों का प्रादुर्भाव हुआ।

इस वृत्तांत में लेखक ने राजपूतों के सूर्यवंश से जुड़ाव को 19वीं और 20वीं शताब्दी में गढ़ा गया जाति-उत्पत्ति का मिथक माना है, तथा उन्हें किसी जाति विशेष के रूप में नहीं, बल्कि शौर्य, स्वाभिमान और क्षत्रिय गुणों के प्रतीकात्मक ‘ब्रांड’ के रूप में व्याख्यायित किया है।

यात्राओं के अपने नैसर्गिक शौक को पटवा जी बड़े चाव से ‘छापामार पर्यटन’ का नाम देते हैं- न कोई तैयारी, न कोई तामझाम; बस मन हुआ और चल दिए। परिवहन के साधनों में रेलगाड़ी उनकी पहली पसंद है। खाने-पीने और ठहरने के मामले में वे साफ़-सफ़ाई से कभी समझौता नहीं करते, पर सादगी को हमेशा प्राथमिकता देते हैं।

इतिहास और भूगोल की गंभीर गलियों में विचरण करते हुए, लेखक बीच-बीच में हास्य और व्यंग्य की घंटी बजाते रहते हैं-ताकि यात्रा बोझिल न हो। कहीं एक कवि की संवेदनशीलता, कहीं आशिक़-मिज़ाज शायर की नफ़ासत, तो कहीं आध्यात्मिक दर्शन की गहराई का ‘ब्रेक’ लेकर वे पाठक की उत्सुकता को ताज़ा और जीवंत बनाए रखते हैं।

एक जगह वे लिखते हैं- ‘आसमान में बादल है, बादल में बूंदें हैं, बूंदों में आसमान से विछोह का दर्द है, मन दर्द का समंदर है…।’ एक अन्य प्रसंग में तंज कसते हैं कि जिस आदि मानव की रीढ़ सीधी हुई, वह दो पैरों पर चलने लगा, लेकिन मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ नेता अपने आकाओं के सामने, अफसर सत्ता के आगे, और सौहर बीवी के समक्ष- रीढ़ विहीन होकर दोहरे होने लगे। जिन्होंने रीढ़ सीधी रखी, वे इस व्यवस्था में फिट न हो पाए और काबिल होते हुए भी हाशिए पर धकेल दिए गए।

चूँकि लेखक की प्रत्येक यात्रा की शुरुआत भोपाल से होती है, अतः रास्ते में पड़ने वाले मध्यप्रदेश के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के पर्यटन स्थल, यथा- नरसिंहगढ़, उज्जैन, नर्मदा, सिहोर, हनुमंतिया टापू, माधांता पर्वत, आदि-शंकराचार्य, महाकाल, महाकालेश्वर आदि के भ्रमण का मनमोहक विवरण भी पाठक को बोनस स्वरूप प्राप्त हो जाता है।

पंडों, पुजारियों और पुलिस की मिलीभगत से पैसे लेकर अधिक भीड़ वाले मंदिरों में वीआईपी दर्शन कराने के गोरखधंधे पर लेखक ने कुछ इस प्रकार से तंज किया है- ‘जय शंभु और जय श्री राम का हुंकार लगाते इन वोट बैंक सांडों को कोई नियंत्रित नहीं कर सकता। … लोक में भक्ति भाव है, प्रशासन में शक्ति-ताव है, भक्ति दर्शन में मग्न है, शक्ति अर्थ-पूजा में संलग्न है।’

लेखक ने जहाँ-जहाँ भी पड़ाव डाला, वहाँ बड़े धैर्य से रुककर उसके भूगोल और इतिहास को टटोलने की कोशिश की है। सूफ़ी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की कर्मस्थली और दरगाह- ‘अजमेर शरीफ़’, हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लिए श्रद्धा का विश्वविख्यात केंद्र है। अजमेर के पास ही पुष्कर स्थित है, जहाँ विश्व का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है।

हाड़ौती क्षेत्र में ‘झीलों की नगरी’ उदयपुर की विशाल फतहसागर और जयसमंद झीलें तथा माउंट आबू जैसा हिल स्टेशन देखकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि आप मरुभूमि में हैं। बीकानेर से लेकर जैसलमेर तक फैले विस्तृत थार मरुस्थल की अपेक्षाकृत ठहरी हुई शांत जिंदगी, सादा किन्तु कठोर जीवन, ऊँट की विचित्र सवारी और स्थानीय लोकोक्तियों के चुटीले भावार्थ- पाठक को अनायास ही गुदगुदा जाते हैं।

‘शरीर कीजे काठ का, पग कीजे पाषाण। काया बख्तर कीजिये, तब पहुँचे जैसाण।’

यद्यपि यह लोकोक्ति जैसलमेर किले के संदर्भ में प्रचलित हुई थी, किंतु यह प्रदेश के अनेक पहाड़ी किलों- जैसे चित्तौड़गढ़, मेहरानगढ़, आमेर और जयगढ़- पर भी पूर्णतया लागू होती है। इन किलों की पैदल चढ़ाई के बाद आपकी टांगे, इस दोहे के भावार्थ को भली भाँति समझ सकती हैं।

यात्रा-वृत्तांत पढ़ते-पढ़ते पाठक को ऐसा लगेगा मानो वह खुद ऊँचे-नीचे रास्तों पर गाड़ी के झटके खा रहा हो। घने जंगलों से गुजरते हुए, पेड़-पौधों की हरियाली और जीव-जंतुओं की गुपचुप नैसर्गिक हरकतें किसी अदृश्य कैमरे से लाइव प्रसारण की तरह जीवंत हो उठती हैं। सड़क किनारे ढाबों की कढ़ी, दाल और तंदूरी रोटी की ललचाती खुशबू आपको ब्रेक लगाने को मजबूर कर देगी। और हाँ- राजस्थान के शहरी रेस्तराँ में परोसी जाने वाली मशहूर दाल-बाटी-चूरमा… इसे न खाएँ, तो समझिए यात्रा अधूरी रह गई।

मरुभूमि में पानी भले ही एक चिरंतन समस्या हो, लेकिन मेवाड़ के विशाल भूभाग को हरियाली का चोला पहनाने वाली राजस्थान नहर परियोजना- जिसे इंदिरा नहर परियोजना भी कहते हैं- सुदूर ‘हरिके बैराज’ से सतलज और ब्यास की लहरों को अपने संग यहाँ तक खींच लाती है। हनुमानगढ़ से लेकर जैसलमेर तक फैली यह जीवनदायिनी नहर, दस जिलों की प्यास बुझाती है और सूखी ज़मीन पर अन्न, हरी फसलें और उम्मीद के रंग भरती है।

प्रदेश के किलों के निर्माण में राजपूताना और फ़ारसी- दोनों प्रकार की स्थापत्य कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्राचीन इमारतों के झरोखे, मेहराब, दरवाजे, आकर्षक पच्चीकारी और बारीक नक्काशी देखते ही बनती है। प्रायः सभी पर्यटन स्थलों के आसपास राजस्थानी पगड़ी, जूतियां, शृंगार की वस्तुएं, रंग-बिरंगे परिधान और हस्तशिल्प बहुतायत में मिलते हैं। हल्के वजन वाली जयपुर की रजाई अधिकांश पर्यटकों का पसंदीदा उपहार है।

थार मरुस्थल में ताल ठोककर मर्दाना ताकत का दावा करते हुए शिलाजीत बेचते घुमंतू कबिलाई पुरुष, सौ चुन्नट वाले घेरदार लहंगे पर घूमर नृत्य, किले के गलियारों से प्रतिध्वनित ‘केसरिया बालम पधारो म्हारे देश रे…’ की दिलकश अनुगूँज- मन और मस्तिष्क को रस-विभोर कर देती है।

सिसोदिया वंश का गौरव-चित्तौड़गढ़, वीरता, स्वामीभक्ति, देशभक्ति, दानशीलता, बलिदान और शौर्य की अनगिनत अमिट गाथाओं को समेटे, सदियों से सीना ताने खड़ा है। यही वह भूमि है, जहाँ उदयपुर के संस्थापक महाराणा उदयसिंह को पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर हत्यारे बनवीर के हाथों से बचाया था। भक्त शिरोमणि मीरा भी इसी चित्तौड़गढ़ के किले में निवास करती थीं। माना जाता है कि महाराज रतन सिंह के मारे जाने के पश्चात रानी पद्मिनी ने इसी किले में जौहर किया था।

इस दुर्ग का भ्रमण करते समय, स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप, स्वामीभक्ति के प्रतिरूप चेतक, तथा वीरता और वफादारी के प्रतीक जयमल और फत्ता का स्मरण भर आपके हृदय को गर्व से भर देता है।

जयपुर के आमेर की ‘पन्ना मीणा की बावड़ी’ सत्ता हथियाने के धोखे की एक ऐसी मिसाल प्रस्तुत करती है, जिसने तत्कालीन कछवाहा राजपूतों पर कायरता का अमिट दाग लगा दिया। इन्हीं कछवाहों के राजा भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर, शौर्य भूमि के इतिहास में मनसबदारी के समझौता वादी अध्याय की शुरुआत की- जो समय बीतने पर रोटी-बेटी-बोटी के नातों में परिणित हो गया। भले ही इसे उस समय मुगलों के आगे झुकने का एक कूटनीतिक और समसामयिक निर्णय माना गया हो, लेकिन स्वाभिमान की कीमत पर किया गया यह समझौता इतिहास की वस्तुनिष्ठ कसौटी पर कभी सराहा नहीं जाएगा।

राजनैतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, किंवदंतियों और पौराणिक कथाओं के रोचक संदर्भों सहित, स्थान-विशेष की धार्मिक मान्यताओं को भी हम इस वृत्तांत में अत्यंत सरल और भावपूर्ण अंदाज़ में जान सकते हैं। नाथद्वारा, पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। भक्ति के इस मार्ग की व्याख्या हमें तनुजा सेवा, वित्तजा सेवा, मानसी सेवा, सृष्टि की उत्पत्ति, रहस्य, आत्मकृति, वैकुण्ठ, प्रेम, आसक्ति, व्यसन और ब्रह्म के आनन्दांश और चैतन्यांश तक ले जाती है। लेखक ने आगे चलकर इस मार्ग के तीन प्रकारों तथा मोक्ष तक के गूढ़ दर्शन को सरल परंतु अर्थपूर्ण शब्दों में निरूपित किया गया है।

शौर्य-भूमि पर कभी कबीलों का, कभी राजपूतों का, कभी मुगलों का और कभी अंग्रेजों का शासन रहा। भील और मीणा जैसी जनजातियों के भी यहाँ कभी समृद्ध साम्राज्य फले-फूले। ये दुर्ग, किले और महल- इनकी सीलन भरी कोठरियों में न जाने कितनी अनकही-अनसुनी कहानियाँ दफन हैं।

पाषाण की इन दीवारों ने इतिहास के सुनहरे क्षणों, बदलते-बिगड़ते राजवंशों, पायल की रुनझुन, ढोल-मृदंग की थाप और शहनाई व सारंगी की मधुर धुन पर थिरकती बालाओं के घूमर नृत्यों से लेकर खनकती तलवारों, दरबारी षड्यंत्र, न्याय और पराक्रम, विश्वास और विश्वासघात, रक्तपात, दया-धर्म और दमन- सब कुछ अपनी आँखों से देखा है। विलासिता में डूबे कायर सम्राटों से लेकर अदम्य साहस के धनी योद्धाओं के शौर्य प्रदर्शन, आत्मसम्मान की रक्षा में हुए सामूहिक जौहर, और राजनैतिक कैदियों की हृदय-विदारक चीखों- इन सबकी मूक साक्षी रही हैं ये दीवारें। ज़र, ज़ोरू और ज़मीन के लिए इंसान ने क्या-क्या नहीं किया!

लेखक के लिए यात्राएँ महज़ स्थलों का अवलोकन भर नहीं, बल्कि ‘मन के भीतर की यात्रा’ है- धर कूंचां धर मंजळां। कुल मिलाकर ‘शौर्य भूमि की सैर’ तटस्थ, विश्लेषणात्मक और भावनात्मक दृष्टिकोण से राजस्थान के इतिहास, संस्कृति और दर्शन का एक पठनीय एवं संग्रहणीय आख्यान है।

मुझे विश्वास है कि साहित्य जगत इस महत्वपूर्ण यात्रा वृत्तांत का खुले दिल से स्वागत करेगा।


दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 302026
दिनांक: 11.08.2025


शौर्य भूमि की सैर : राजस्थान यात्रा-वृत्तांत

लेखक : श्री सुरेश पटवा (भोपाल)
 (facebook post DR Verma) 21.01.2026

सर्वत्र प्रकाशक, भोपाल द्वारा प्रकाशित ‘शौर्य भूमि की सैर’ आज प्राप्त हुई। पुस्तक का आवरण न केवल आकर्षक है, बल्कि उसकी अंतर्वस्तु और आत्मा के पूर्णतः अनुरूप भी है। मुद्रण की गुणवत्ता उत्कृष्ट है, जो प्रकाशक की संवेदनशीलता और पेशेवर प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

पुस्तक के लेखक, भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवा-निवृत्त, यायावर स्वभाव के श्री सुरेश पटवा जी वरिष्ठ साहित्यकार, शायर एवं कवि हैं। इस पुस्तक में आपने समय-समय पर संपन्न अपनी राजस्थान की यात्राओं के अनुभवों को रोचक एवं सधे हुए शब्दशिल्प में रूपायित किया है। श्री पटवा जी - नर्मदा, स्त्री-पुरुष, हिंदू प्रतिरोध गाथा, हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग, तलवार की धार, पलकगाथा, सगरमाथा से समुंदर तक, प्रेमार्थ सहित 27 चर्चित पुस्तकों के सृजक हैं।

मुझ अकिंचन को आपने इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखने का दायित्व सौंपा—यह उनका बड़प्पन और स्नेह ही है। इस बहाने मुझे भी पांडुलिपि के सहारे राजस्थान को लेखकीय दृष्टि से महसूस करने का सुअवसर मिला। इतिहास के झरोखों से किसी भू-भाग को देखने, परखने और समझने के इच्छुक साहित्य प्रेमियों, पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए यह कृति निश्चय ही पठनीय और संग्रहणीय है—ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

पुस्तक सर्वत्र, द्वितीय तल, उषाप्रीत कॉम्प्लेक्स, 42–मालवीय नगर, भोपाल–462003 से प्राप्त की जा सकती है। शीघ्र ही यह अमेजन, फ्लिपकॉर्ट जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध होगी।

सादर: दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21.01.2026







 आलेख: आज-परिवर्तन दिवस

मनुष्य का जीवन सीखने की एक सतत प्रक्रिया है। बचपन से वृद्धावस्था तक वह अनुभवों के आलोक में स्वयं को गढ़ता रहता है—कभी अपनी भूलों से, कभी दूसरों के आचरण से और कभी प्रकृति के मौन अनुशासन से। किंतु सीख को केवल त्रुटि तक सीमित कर देना अधूरी दृष्टि है। वास्तविक शिक्षा प्रत्येक अनुभव के निष्पक्ष आत्मावलोकन से जन्म लेती है। भूल का दोहराव विवेक का क्षरण है, और विवेक का क्षरण व्यक्ति को स्वयं से ही विमुख कर देता है।

 मैं ही सही हूँ”—यह वाक्य जितना छोटा है, उतना ही घातक। जैसे-जैसे यह भाव स्थायी स्वभाव बनता है, वैसे-वैसे संवाद सिकुड़ता जाता है और संबंध शुष्क हो जाते हैं। आत्मकेंद्रित चेतना पहले व्यक्ति को अकेला करती है, फिर उसे भ्रम देती है कि यह एकांत उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है। समाज में यह भ्रम अधिक समय तक नहीं टिकता; क्योंकि समाज शक्ति नहीं, संतुलन को स्वीकार करता है।

दूसरों से अपेक्षा रखने से पूर्व यह प्रश्न अधिक मौलिक है कि हम स्वयं अपेक्षा के योग्य हैं या नहीं। जीवन किसी एक की आकांक्षाओं का विस्तार नहीं, बल्कि अनेक इच्छाओं का समन्वय है। इसलिए मध्य मार्ग ही जीवन का धर्म है—अति न साध्य है, न शाश्वत। ‘मैं’ का आग्रह जितना घटता है, ‘हम’ की संभावना उतनी ही सशक्त होती जाती है।

 ज्ञान का स्वाभाविक फल विनय है। जहाँ अहंकार है, वहाँ विद्या केवल सूचना बनकर रह जाती है। उपलब्धियाँ तब तक सार्थक हैं, जब तक वे व्यक्ति को विनम्र बनाती हैं; अन्यथा वे उसके पतन का आधार बन जाती हैं। असहमति कभी शब्दों में व्यक्त होती है, कभी मौन में, किंतु मन का असंतोष देह-भाषा में स्वयं प्रकट हो जाता है। जब निकटवर्ती संबंधों में शीतलता आने लगे, तो दोष बाहर नहीं, भीतर खोजा जाना चाहिए।

महानता किसी असाधारण कर्म में नहीं, बल्कि साधारण आचरण में प्रकट होती है। समय पर सोना-जागना, शरीर और मन की स्वच्छता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता, संयमित भोजन—ये सब जीवन के छोटे-छोटे अनुशासन नहीं, बल्कि चरित्र के सूक्ष्म संकेत हैं। जो व्यक्ति इनसे विमुख है, वह बड़े आदर्शों की बात करने का नैतिक अधिकार भी खो देता है।

वाणी मन का आईना है। उसमें मधुरता हो तो संवाद पुल बनता है, कटुता हो तो दीवार। सुनने की क्षमता बोलने से बड़ी साधना है, और मौन कई बार सबसे प्रखर उत्तर होता है। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहता है—चाहे वह घर हो, सड़क हो या मंच—वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहा होता है कि उसे भरोसा केवल स्वयं पर है, संबंधों पर नहीं।

परिवर्तन का कोई निर्धारित काल नहीं होता। “जब जागो, तब सवेरा”—यह केवल कहावत नहीं, जीवन-दर्शन है। अपनी भूल को स्वीकार कर लेना ही आत्मोन्नति की प्रथम शर्त है। जो व्यक्ति यह कहने का साहस रखता है कि “मैं गलत हो सकता हूँ”, वही वास्तव में सीखने के योग्य होता है।

 रिश्ते मनुष्य को नैतिक बल देते हैं। यह अनुभूति कि कोई हमारी चिंता करता है, हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करती है। परंतु यह अर्थ तभी स्थायी होता है, जब हम भी उसी संवेदना के साथ उत्तर दे सकें। संबंध माँग से नहीं, उपस्थिति और संवाद से जीवित रहते हैं।

 तोड़ना सहज है, जोड़ना कठिन। इसलिए परिपक्वता का अर्थ है—तत्काल प्रतिक्रिया के स्थान पर विचारशील उत्तर। उम्र बढ़ने के साथ यदि धैर्य, नम्रता और विवेक नहीं बढ़ रहे, तो समझिए जीवन केवल बीत रहा है, विकसित नहीं हो रहा।

मनुष्य सब कुछ चाहता है—स्वास्थ्य, धन, मान, प्रेम, संबंध—पर सब कुछ उसे मिलता नहीं। कारण साधारण है: वह सम्मान करना नहीं जानता। जीवन में जो भी स्थायी रूप से प्राप्त होता है, वह सम्मान और कृतज्ञता की नींव पर ही टिकता है। स्वास्थ्य दिनचर्या के सम्मान से, धन परिश्रम और संयम के सम्मान से, प्रतिष्ठा मूल्यों के सम्मान से और प्रेम परस्पर आदर के सम्मान से जन्म लेता है।

अंततः जीवन का सार यही है—कृतज्ञता के बिना प्राप्ति अधूरी है, और सम्मान के बिना संबंध खोखले। इसलिए रुकिए, सोचिए और स्वयं से पूछिए—क्या आज का दिन परिवर्तन का प्रारंभ हो सकता है? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो यही क्षण सार्थक है।

 © दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 23 जून, 2025

 

 

 

 

  Article published in 'I AM GREATFUL' a collection of 151 articles on gratitude  Gratitude means giving thanks for pleasant experie...