व्यंग्य: चारों धाम- सेवा तीर्थ

विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक रोमियो और जूलियट में नायिका जूलियट अपने प्रेमी से कहती है—
यहाँ जूलियट अपने प्रेमी को नाम की पहचान से मुक्त होकर
प्रेम को प्राथमिकता देने का आग्रह कर रही है। उसका तर्क है— नाम बदलने से
व्यक्तित्व नहीं बदलता।
लेकिन यह कथन सोलहवीं सदी का है। तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। यह कहाँ लिखा है कि साहित्य और समाज में सदैव गुलाब का ही दबदबा रहेगा? कमल भी तो है—फूलों का महाफूल। कमल का कमाल यह है कि वह कीचड़ में खिलता है। यह उसका बड़प्पन है, उसका समाजवादी और समावेशी चित्रण है! भले ही गुलाब उसे कीचड़ का शोषक बताकर उसका सामंती निरूपण करें। लब्बोलुआब यह है कि नाम बदलने से गुलाब को फर्क पड़े या न पड़े औरों को पड़ सकता है। अब जैसे यह उदाहरण देखिए।
उत्तर कोरिया में पिछले दशक में माँ-बाप अपने बच्चों को नरम और सरल नाम देने लगे थे, जैसे ‘ए रि’, ‘सु मि’ जिनका शाब्दिक अर्थ होता है— प्यारा/प्यारी और सुंदर। जब यह बात किम जोंग के संज्ञान में आई तो उनका पारा गर्म होना स्वाभाविक ही था। वे भला अपने प्यारे देश की संस्कृति को प्यारे और सुंदर नामों से अपसंस्कृत होते हुए कैसे सहन करते!
फौरन दिशा-निर्देश जारी किए गए— देश के बच्चों के नाम ‘वैचारिक’ और ‘क्रांतिकारी’ हों जैसे ‘चुंग सिम’ जो निष्ठा (स्वामी भक्ति) को दर्शाता है या ‘पोक-II’ जो एक बम का नाम है। और जैसा कि हम सब जानते हैं, वहाँ की जनता कितनी आज्ञाकारी है। इस आदेश के बाद जन्म लेने वाले बच्चों के नाम ‘पोक-II’ से लेकर ‘चोंग’ (बंदूक), ‘सो-चोंग’ (राइफल), ‘क्वोन चोंग’ (पिस्तौल), ‘पोग-याक’ (विस्फोटक) जैसे बारूदी नाम रखने की होड़ मच गई।
फिलहाल हमारे यहाँ गली, मोहल्लों, गाँव, शहरों और सरकारी संस्थाओं, कार्यालयों आदि के नाम बदल कर उन्हें जोश, गर्व और गौरव की ड्रिप चढ़ाई जा रही है, व्यक्तिगत नामों पर अगले चरण में विचार किया जाएगा। तो इस अभियान को विस्तार देते हुए शाही नवरत्न, बहुत मंथन के उपरांत ‘सेवा तीर्थ’ जैसा धाँसू शब्द खोज ले आए। इस शब्द में संकल्प, प्रकल्प, कायाकल्प आदि के भाव वैसे ही गूँथे हुए हैं जैसे ‘कर्तव्य पथ’, ‘लोक कल्याण मार्ग’, ‘कर्तव्य भवन’ आदि नामों में थे।
नाम पढ़-सुनकर ही काम की संतुष्टि हो जाती है। जैसे मन की बात सुनने के बाद काम की बात करने का मन ही नहीं करता! यदि नाम का ऐसा प्रताप हो सकता है तो फिर काम पर व्यर्थ पैसा और समय क्यों बर्बाद किया जाए?
बाज़ लोगों को, जिनमें
पिछली सरकारें बाय डिफॉल्ट शामिल हैं, नहीं मालूम कि तीर्थ
की उपमा किसे दी जानी चाहिए। अब नेहरू जी को हो लीजिए! उनकी निगाह में तो भाखड़ा
नांगल डेम, भिलाई स्टील प्लांट, भारत
हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड जैसे प्रोजेक्ट्स ही आधुनिक भारत के तीर्थ थे। कौन
समझाए!
तीर्थ उस स्थान को कहा जाता है जो पवित्र है, जहाँ मुख्य देवता और अन्य देवगणों की पावन उपस्थिति हों। जहाँ भक्ति और श्रद्धा से परिपूर्ण वातावरण हो, चढ़ावा चढ़ता हो, प्रसाद बँटता हो, वंदन-गान गाए जाते हों।
अब किसी बाँध, स्टील या बिजली के कारखाने को तीर्थ कहना—लाहौल-विला-कुव्वत। कोई अल्पज्ञ ही ऐसी कल्पना कर सकता है? यह मानना होगा कि नाम बदलना सबसे महत्वपूर्ण शासकीय कामों में से एक है। नाम ऐसा होना चाहिए कि सुनते ही कानों में संगीत बज उठे, दिल कहे इलु-इलु! दो शब्दों के संयोजन से निर्मित सेवा तीर्थ, ऐसा ही एक भावोत्तेजक, सुविचारित और कर्णप्रिय नाम है।
और, पीएमओ को सेवा तीर्थ का नाम देना बिल्कुल युक्तियुक्त है, तर्कसंगत है, व्यावहारिक है, समसामयिक है, संस्कारी है और सब पर भारी है। इसमें एक तीर्थ स्थल जैसी तमाम अर्हताएँ पाई जाती हैं। यहाँ न केवल देवों के अधिपति स्वयं विराजमान हैं बल्कि पूरी देव-नगरी मौजूद है। साफ-सफाई, हरे-भरे बगीचे, झरनों जैसे फव्वारे, गर्मी में सर्दी और सर्दी में गर्मी का अहसास—यह सब आप यहाँ महसूस कर सकते हैं।
अब जबकि अमृतकाल आया हुआ है या यूँ कहें कि घनघोर छाया हुआ है, तो इस पुण्य काल में देव, महादेव सब सशरीर सेवा-तीर्थ में मौजूद हैं, अमृत पिया जा रहा है, अमृत पिलाया जा रहा है। ऐसे में दान, पूजा, भेंट, परिक्रमा आदि की व्यवस्था न हो— ऐसा तो सपने में भी सोचा नहीं जा सकता।
रही बात सेवा की तो जिसकी जैसी श्रद्धा वैसी सेवा की जा सकती है। और जैसी होगी सेवा वैसा मिलेगा मेवा। भक्त ध्रुवदास ने सेवा और भक्ति की महिमा कुछ इस प्रकार से समझाई है—‘सेवा अरु तीरथ-भ्रमन, फलतेहि कालहि पाइ। भक्तन-संग छिन एक में, परमभक्ति उपजाइ।’ सेवा तीर्थ के संदर्भ में इस दोहे का भावार्थ यह लिया जा सकता है कि भक्तों की संगति में एक क्षण में ही परमभक्ति के पद पर पहुँचा जा सकता है।
इस नामोत्तेजक वातावरण में कुछ सुझाव निःशुल्क पेश हैं, यथा—पुलिस चौकी का नाम ‘सेवा मठ’, तहसील
कार्यालय का ‘भू-सेवा धाम’, आयकर विभाग का ‘अर्थ अखाड़ा’,
ईडी का ‘वज्रपात पीठ’। संभावनाएँ असीमित हैं—थोड़ा योगदान आप भी दे
सकते हैं।
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 15 फरवरी, 2026
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