व्यंग्य: फेंको तो लंबा फेंको


इस देश में बड़े-बड़े अर्थशास्त्री पैदा हुए, किताबें लिखी, हार्वर्ड, कैम्ब्रिज, कोलंबिया, ऑक्सफोर्ड, शिकागो, एम.आई.टी. जैसे नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे—लेकिन अफ़सोस, उन्हें यह अर्थसत्य कभी समझ में ही नहीं आया कि बजट एक साल का नहीं, इक्कीस साल का भी हो सकता है। मनमोहन जी जैसे मंजे हुए अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर तो बाकायदा दस साल तक देश के प्रधानमंत्री भी रहे; पर इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति उन्हें नहीं हुई।

लेकिन पहली बार आज़ाद भारत में ऐसा बजट पेश हुआ है, जो पेश तो 2026 में हुआ है, लेकिन जिसका मिशन वर्ष 2047 है। आलाकमान ने वह कर दिखाया है, जो न नेहरू कर पाए, न मनमोहन, न योजना आयोग, न नीति आयोग। वैसे यह आलाकमान के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनुकूल ही था; उनके हर काम में इतिहास की नवसृजना और चकाचौंध छुपी होती है।

हम अल्प बुद्धि लोग बजट को अगले एक वर्ष के वित्तीय लेखा-जोखा के रूप में देखने के आदी रहे हैं और आय-व्यय, टैक्स, सब्सिडी, छूट, सरकारी योजनाओं आदि आँकड़ों में ही उलझे रहते हैं। अब तक वित्तमंत्री और अर्थशास्त्री बजट तैयार करते वक्त गिरते रुपये, बढ़ती महँगाई, घटते रोज़गार, खेती की बदहाली, औद्योगिक मंदी, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे सुधारातीत विषयों पर माथापच्ची करते रहे हैं। नतीजा— न महँगाई कम हुई, न बेरोज़गारी घटी, न गरीबी दूर हुई। चाहे जितनी सब्सिडी दो, टैक्स छूट दो, जनता कभी संतुष्ट हुई? तरक़्क़ी बैलगाड़ी की तरह खिसकती रही—कृपा खजूर की ऊँची टहनी पर अटकी रही।

अब ज़रा सोचिए— क्या बजट जैसे महान दस्तावेज़ के साथ यह अन्याय नहीं है कि उसके दायरे को महज एक वर्ष तक सीमित कर दिया जाए? इतने विशाल देश के लिए एक साल की तुच्छ सोच! बड़ा देश है तो सोच भी बड़ी, लंबी और महान होनी चाहिए। जब तक सोच और लक्ष्य बड़े नहीं होंगे, उपलब्धि भला कैसे बड़ी हो सकती है?

अब जब इक्कीस वर्षीय बजट आ ही गया है, तो क्यों न इस क्रांतिकारी सोच को और आगे बढ़ाया जाए? मसलन, जीडीपी।
सालों से घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं, चाबुक घिस गए हैं— लेकिन जीडीपी है कि चौथे पायदान से ऊपर खिसक ही नहीं रही।

गंभीरता से विचार करना होगा। यह बड़ी सोच का समय है— हमें तीसरे पायदान और दूसरे पायदान जैसे छोटे लक्ष्य छोड़कर सीधे पहले नंबर पर नज़र गड़ा देनी चाहिए।

इसमें चौंकने जैसा कुछ नहीं है— यह बहुत कूल-कूल है। मात्र यह घोषणा करनी है कि वर्ष 2147 में, जब भारत आज़ादी के 200 साल पूरे करेगा, तब वह विश्व की सबसे बड़ी (नंबर-वन) अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अख़बारों में फुल पेज साइज, गौरव-गुदी संकल्प वाले रंगीन विज्ञापन ही तो छपवाने हैं! फिर देखिए—विपक्षियों और विरोधियों की कैसे वाट लगती है। उनकी रोज़-रोज की घोचेबाज़ी पर विराम लग जाएगा और देश के लीडरान अपेक्षाकृत अन्य महत्वपूर्ण प्रच्छन्न उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।

इक्कीस, पच्चीस या पचास वर्ष जितने दूरगामी लक्ष्य तय करने में कोई जोखिम नहीं है। और यक़ीन मानिए—एक कॉल पर बालकनी में आकर थाली बजाने वाली जनता, ऐसी महान घोषणा का तो सड़कों पर भांगड़ा, कत्थक, घूमर और डांडिया से लेकर सपेरा-डांस आदि करते हुए स्वागत करेगी।

वैसे यह बात नहीं है कि आलाकमान ने पहले लंबी अवधि के तीर नहीं चलाए। चलाए— और खूब चलाए! मसलन वर्ष 2016 में कहा कि 2022 तक किसानों की आय दुगुनी होगी! खूब वाह-वाही बटोरी गई। लेकिन इस तीर को लक्ष्य भेदने के लिए मात्र छह साल मिले। बदकिस्मती देखिए—दस साल बीत जाने के बाद भी यह राजधानी की सदाबहार धुंध में भटक रहा है। इसके अलावा पेट्रोल-डीज़ल के दाम, काले धन की वापसी, हर भारतवासी के खाते में 15-15 लाख, हर साल दो करोड़ रोज़गार— जैसे अनेक संकल्प बहुत ही पाक-साफ नीयत से लिये गए थे। चूक बस इतनी हुई कि लक्ष्यावधि कम रखी गई।

वफादार चिंतकचुल्लुओं और ज्ञानी गुरङगुल्लुओं ने इस प्रकार के आसमान-फाङक, धरती-धकेल लक्ष्यों की तटस्थ समीक्षा की तो पाया कि दुर्गति की असल वजह, लीडर लोगों द्वारा आगामी चुनाव से पूर्व अपने कर्मों के परिणाम जानने की लालसा है। चूँकि दो चुनावों के बीच समय अंतराल मात्र पाँच वर्ष का होता है, अत: शाही लक्ष्य-लेखकों के लिए एक मनोवैज्ञानिक दवाब बन जाता है और वे अधिक दूर तक फेंकने से परहेज करते हैं। लेकिन इस बजट ने इस उहापोह पर ढक्कन लगा दिया है।

बहुत सही किया। अब भला दस-पंद्रह साल, सत्ता में कोई ज़्यादा समय होता है? 50-60 प्रतिशत समय तो चुनावी रैलियों और जोड़-तोड़ में ही खप जाता है, कम से कम 10 प्रतिशत विदेशी दौरों में— 15-20 प्रतिशत समय सोने-खाने-जाने-नहाने के लिए भी तो चाहिए; चाहे बंदा अठारह-अठारह घंटे काम करने वाला ही क्यों न हो। फिर शेष समय बचा ही कितना!

विकसित भारत के लक्ष्य को बुलडोजर से उठाकर खाली सड़क पर घसीटते हुए 2047 मील-पत्थर के पास स्थापित पहले ही किया जा चुका था। यह बजट इसी विकसित भारत के सपनों को कंधा देने आया है। सब कुछ सेट हो जाएगा, लेकिन आम आदमी को कैसे समझाएं, जैसे ही चुनाव आते हैं— उसके नखरे शुरु हो जाते हैं। कर्मठ नेताओं को भी हर पाँच वर्ष बाद जनता की अदालत में खङा होना ही पङता है।

इन्हीं सब तथ्यों की रोशनी में, अब ज़रूरी हो गया है कि देश में आम चुनावों की अवधि पाँच की जगह बीस वर्ष कर दी जाए। पक्का इलाज!

इस परिकल्पना के पीछे एक और पहलू है। ज़रा सोचिए—एक गरीब देश में बार-बार चुनावों पर होने वाला खर्च! भाइयों-बहनों, माताओं-बुज़ुर्गों— देश के कीमती संसाधनों की बर्बादी रुकनी चाहिए कि नहीं? हाँ जी, हाँ— रुकनी चाहिए! वैसे भी सब जानते हैं—आएगा तो…!

आख़िर एक राजनेता के लिए पाँच साल भी कोई समय होता है? सम्राट अशोक ने 36 वर्ष राज किया, अकबर ने 49 वर्ष—तभी तो वे कुछ कर पाए और महान कहलाए। इसलिए बिला नागा, भविष्य में आम चुनावों की अवधि न्यूनतम बीस वर्ष कर देनी चाहिए—सीधे-सीधे 75 प्रतिशत समय, संसाधनों और पैसों की बचत! हींग लगे न फिटकरी—रंग चोखा आए! 2047 में भारत विकसित कैसे नहीं बनेगा— देखते हैं।

संभव है, इस दिशा में अंदरखाने कार्य ज़ोर-शोर से प्रगति पर हो! एक के बाद एक राज्यों में ताबड़तोड़ एस.आई.आर. क्या इशारा कर रही हैं? एक बार सारे राज्य लाइन पर आ जाएँ, फिर कुछ ऐसा बड़ा और अनूठा किया जा सकता है कि पंचवर्षीय चुनावी झंझट से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए!

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© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 9 फरवरी, 2026

Published in - मासिक व्यंग्य पत्रिका -अट्टाहास मार्च, 2026 . सत्य की मशाल -मार्च, 2026






 






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