नरसंहार

(1)
यह ग़ज़ा है
इसके अस्त-व्यस्त अस्पताल के एक बेड पर
बुरी तरह घायल, पाँच वर्षीय साफ़िया
उसके बाएँ पैर की टाँग घुटने तक काट दी गई है
क्यों?… उसे नहीं पता
उसे याद है-अभी तीन दिन पहले
जब दूर आसमान में चाँदनी छिटकी हुई थी
घर की बालकनी में चुंधियाती रोशनी के साथ एक भीषण धमाका
और बस!
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वह सिहर उठती है-कराह उठती है
एक नई पीड़ा को जन्म देता-डॉक्टर का स्पर्श
माँ की धुँधली छवि-अश्रुओं की बूँदों में घुलकर बह निकलती है
कोई तो नहीं है
यहाँ उसके आसपास-है तो केवल दर्द
भयानक दर्द-जिस्म के हर हिस्से को पिघलाता हुआ
चीरता हुआ, जलाता हुआ!
(2)
जहाँ तक नज़र जाती है —
इमारतों के मलबे के ढेर, टूटी सड़कें, बिखरा असबाब
खाना और पानी की तलाश में भटकते लोग
इन्हीं में से एक है नासिर
लगभग सात वर्षीय नासिर
नंगे पाँव, अर्ध-नग्न, मैला-कुचैला
बदन
बदहवास-हाथ में एक कटोरा थामे वह दौड़ रहा है
वहाँ सामने खाना बँट रहा है!
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चारों ओर पसरा है डरावना सन्नाटा
धीरे-धीरे नासिर के तमाम दर्द, भय, क्रोध भावशून्य हो जाते हैं
और पेट की बेरहम, बेशर्म भूख
कटोरे पर झुक जाती है!
प्रकाशन: चिंग-तम अमत्तनि (कविता संग्रह) अगस्त, 2026