नरसंहार

 

(1)
यह ग़ज़ा है

इसके अस्त-व्यस्त अस्पताल के एक बेड पर
बुरी तरह घायल, पाँच वर्षीय साफ़िया
उसके बाएँ पैर की टाँग घुटने तक काट दी गई है
क्यों?… उसे नहीं पता
उसे याद है-अभी तीन दिन पहले
जब दूर आसमान में चाँदनी छिटकी हुई थी

घर की बालकनी में चुंधियाती रोशनी के साथ एक भीषण धमाका
और बस!

 

फ्रॉक की जगह
उसके पूरे बदन पर लाल धब्बों वाली सफ़ेद पट्टियाँ बँधी हैं
रोम-रोम से रिसता क्रूर, असहनीय दर्द
भयानक चीख़ों से लिपटकर
आज़ाद होने की असफल कोशिशें करता है
अस्पताल के गूँगे गलियारों से प्रतिध्वनित उसका क्रंदन
अन्ततः थक-हारकर
बेहोशी की चादर में गुम हो जाता हैं!

कभी जब उसे होश आता है
एक पल के लिए देखती है ठीक सामने-माँ
माँ-उसकी प्यारी माँ
दुनिया की सबसे सुंदर सौगात-उसकी माँ
दोनों हाथ फैलाए आ रही है दौड़ती हुई-उसकी ओर
माँ… माँ…”
लेकिन साफ़िया के हाथ… साफ़िया के पाँव…
नहीं उठते, नहीं उठ पाते
मेरे हाथ-मेरे पाँव क्यों… क्यों…क्यों…?”
अस्फुट आवाज में उलझे उसके लङखङाते सवाल
केवल सवाल, कोई जवाब नहीं!

उसके ठीक ऊपर
सफ़ेद छत तेजी से घूम रही है
काश, यह रुक जाए अभी की अभी
हरे लबादे में लिपटी एक आकृति झुकती है-उसके बदन पर
एक सुई कहीं चुभती है
वह सिहर उठती है-कराह उठती है
एक नई पीड़ा को जन्म देता-डॉक्टर का स्पर्श
माँ की धुँधली छवि-अश्रुओं की बूँदों में घुलकर बह निकलती है
कोई तो नहीं है
यहाँ उसके आसपास-है तो केवल दर्द
भयानक दर्द-जिस्म के हर हिस्से को पिघलाता हुआ
चीरता हुआ, जलाता हुआ!


(2)
जहाँ तक नज़र जाती है —
इमारतों के मलबे के ढेर, टूटी सड़कें, बिखरा असबाब
खाना और पानी की तलाश में भटकते लोग
इन्हीं में से एक है नासिर
लगभग सात वर्षीय नासिर
नंगे पाँव, अर्ध-नग्न, मैला-कुचैला बदन
बदहवास-हाथ में एक कटोरा थामे वह दौड़ रहा है
वहाँ सामने खाना बँट रहा है!

वह झौंक देता है

अपने कमजोर शरीर की पूरी ताकत
भीड़ में कभी आगे, कभी पीछे धकेला जाता है
खिचड़ी की तेज़ खुशबू
पाँच दिन से भूखे नासिर को आक्रामक बना देती है
अपने से छोटे, कमजोर बच्चों को धकियाते हुए
जैसे तैसे वह कामयाब हो जाता है!

 

ज्योंही तरल खिचड़ी का एक घूँट
उतरता है उसके हलक से नीचे
भूख किसी भेड़िये की तरह  गुर्राने लगती है
लेकिन वह जब्त करता है
वहाँ दूर, मलबे के दूसरे ढेर के पास
उसे लौटना है

और वह दौड़ पड़ता है!

 

लेकिन तभी-तड़-तड़-तड़…
गोलियों की आवाज़ों के साथ चीख-पुकार
बच्चे, बड़े, औरतें-सब भाग रहे हैं, गिर रहे हैं
एक बच्चा चीखता हुआ
ठीक उसके ऊपर आ गिरता है
नासिर के गिरने के साथ ही उसका कटोरा भी छूटकर
जा गिरता है — धूल में!

 

मृत बच्चे को अपने बदन से हटाकर वह खड़ा होता है
दोनों खून से सने हैं, लेकिन शुक्र है
मृतक के हाथ का कटोरा अब भी सुरक्षित है
अंतिम पलों तक
उसने भोजन को संभाले रखा  
नासिर उसी कटोरे को उठाकर फिर दौड़ पड़ता है!

चीखने-चिल्लाने की मार्मिक आवाज़ें
उसका पीछा करती हैं
लेकिन उसे पहुँचना है-जल्द से जल्द अपने घर
तंबू में चिथड़ों में लिपटी उसकी माँ
हफ्तों से भूखी, बुखार में तपती, जीर्ण-शीर्ण
अब केवल माँ ही तो बची है!

माँ… माँ… माँ…
देखो, मैं खिचड़ी लाया हूँ!
माँ उठो, कुछ खा लो- माँ… माँ…
तंबू में घुसते ही नासिर चिल्लाता है
लेकिन माँ के शरीर में कोई हलचल नहीं है
उसकी पुतलियाँ स्थिर हैं, हाथ-पाँव ठंडे पड़ चुके हैं
तो क्या? माँ भी…
उसके बदन में एक झुरझुरी-सी दौड़ जाती है
उसका दिमाग सुन्न हो जाता है!


चारों ओर पसरा है डरावना सन्नाटा
धीरे-धीरे नासिर के तमाम दर्द, भय, क्रोध भावशून्य हो जाते हैं
और पेट की बेरहम, बेशर्म भूख
कटोरे पर झुक जाती है!

 

© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 13 जुलाई, 2025

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