व्यंग्य: मेरी भैंस को डंडा क्यों मारा

मगध के नंद वंश के अंतिम सम्राट धनानंद ने दानशाला की सभा में मुख्य अतिथि चाणक्य के साधारण पहनावे, उनके साँवले रंग और शारीरिक कुरूपता का न केवल मजाक उड़ाया, बल्कि उन्हें बलपूर्वक सम्मानित आसन से हटा दिया। इस धक्का-मुक्की में चाणक्य की शिखा खुल गई। कहते हैं, इस सार्वजनिक अपमान से अत्यंत क्रोधित चाणक्य ने भरे दरबार में अपनी खुली हुई शिखा को हाथ में लेकर प्रतिज्ञा की, “जब तक मैं इस अन्यायी और अहंकारी धनानंद के समूल नंद वंश का नाश नहीं कर दूँगा, तब तक अपनी इस शिखा (चोटी) में गाँठ नहीं बाँधूँगा।”
और फिर उन्होंने एक मेधावी बालक चंद्रगुप्त को एक योद्धा और भावी सम्राट के रूप में तैयार किया। आगे चलकर चंद्रगुप्त ने धनानंद को हराया। मगध से नंद वंश का समूल नाश हो गया और मौर्य वंश का परचम लहराने लगा।
इतिहास में चाणक्य के उपर्युक्त प्रसंग जैसे सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं, जो सिद्ध करते हैं कि आत्मसम्मान को बींधने वाले शब्द जब प्रतिशोध का रूप धारण करते हैं, तो वे इतिहास की धारा ही बदल देते हैं। विडंबना यह है कि इतिहास की चेतावनियों के बावजूद मनुष्य वही भूलें दोहराता रहता है। संभवतः प्रतिकूल परिस्थितियों में इतिहास के पुनर्लेखन की यह भी एक नैसर्गिक व्यवस्था है।
15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में वकालत के पेशे और कुछ युवा वकीलों से संबंधित एक मामला सुनवाई में था। उसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश महोदय सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी कर दी— “कुछ युवा कॉकरोच जैसे होते हैं, जिन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ आर.टी.आई. कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर सब पर हमला करना शुरू कर देते हैं।”
अब कोई ऐसा न सोचे कि बेरोजगारों के एक वर्ग विशेष के लिए इस नए विशेषण का उद्घोष करते समय उनके मन में ख्याल आया हो—“सरदार बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा…” और आज नहीं तो कल गोगोई साहब की तरह बढ़िया ‘इनाम’ भी! यह तो बस बातों-बातों में ‘ऐवें ही’ हो गया था। उन्हें इल्म नहीं था कि रीलें देखने और बनाने से उकता चुके बेरोजगार, अर्द्ध-बेरोजगार और छद्म-बेरोजगार इस विशेषण की गुलेल बना लेंगे। उन्हें सपने में भी अहसास नहीं हुआ होगा कि यह विशेषण सरदार और सरकार सब के गले की फाँस बनने वाला है।
हालाँकि अगले रोज सी.जे.आई. साहब ने रायता समेटने की कोशिश करते हुए स्पष्ट किया कि उनका मतलब सभी बेरोजगार युवाओं से नहीं, बल्कि कानून की फर्जी डिग्री के सहारे वकालत में प्रवेश करने वालों से था। लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। सफाई देते समय उन्होंने एक और दुखती रग पर हाथ रख दिया—‘फर्जी डिग्री’ वाली बात। हङबङी में सफाई करते समय कई बार घर का कीमती काँच का सामान गिर कर चकनाचूर हो जाता है। बहुत जोड़-तोड़ और कानूनी दाँव-पेंच लगाकर आदरजोग मोदी जी की तथाकथित ‘एंटायर पॉलिटिक्स’ की डिग्री पर पर्दा डाला गया था। कहीं ‘फर्जी डिग्री’ वाला तीर परदानशीन की ओर न मुङ जाए। यू नो, वैसे भी आजकल दीवारों के न केवल कान होते हैं, बल्कि आँख और नाक भी होती है।
लेकिन शुक्र है, निठल्ले कॉकरोचों का ध्यान इस ओर नहीं गया। दूसरी बात, निशाना बन गए ‘बेचारे’ केंद्रीय शिक्षा मंत्री महोदय-धर्मेंद्र प्रधान। वो लाख कहते रहे- ‘मैया मोरी मैंने कॉकरोच नाम नहीं धरायो!’ लेकिन तिलचट्टों ने एक न सुनी, वैसे भी भीङ कब, कहाँ, किसकी सुनती है।
इस एक ‘कॉकरोच’ शब्द ने उनके सब्र का बाँध तोड़ दिया। उनकी ढीठ भावना इस बार सच्ची-मुच्ची गंभीर रूप से आहत हो गई। उनकी सोई हुई अंतरात्मा एक झटके में बिस्तर छोङ खङी हो गई। हमें कॉकरोच कहा! ये न चलने वाला। ये न बरदाश्त होने वाला। अब तो आर-पार होकर ही रहेगा। अब सवाल मूँछों का है। इस बार मादा कॉकरोचों के तेवर भी उतने ही तीखे थे। वे भी सुर में सुर मिलाकर चिल्लाईं—हमारे भी पंखों की सुर्खी का सवाल है, अब और नहीं—बस!
ऐसी लाखों आहत भावनाओं के आर्तनाद ब्रह्मांड में विचरण करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे। इस आर्तनाद को वहाँ रहने वाले एक प्रवासी भारतीय अभिजीत दीपके ने सुना तो उसका दयालु हृदय मोम की तरह पिघल गया। उसके बस में इस अपमान का बदला लेने का कोई सीधा उपाय तो नहीं था; हाँ, उसने बेरोजगारों के गुस्से को व्यंजनापूर्ण अभिव्यक्ति देते हुए इंस्टाग्राम पर एक आभासी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’, यानी ‘सी.जे.पी.’ का गठन कर डाला।
अब कुदरत का करिश्मा देखिए या कहिए कि होनी को कौन टाल सकता है। चंद रोज में ही कॉकरोच जनता पार्टी इस कदर वायरल हुई कि इसके इंस्टाग्राम पर दो करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हो गए।
देशभर के तिलचट्टे अँधेरे कोनों से निकल-निकलकर खुले में एकजुट होने लगे। उनके साथ बहुत से मौकापरस्त खटमल, परजीवी और मक्खी-मच्छर भी हो लिए-जैसा कि अकसर हर भीङ के साथ होता है। आगे चलकर इस जमावड़े ने देश की परीक्षा प्रणाली की विभिन्न खामियों, विशेषकर ‘नीट पेपर लीक’ के मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल आरंभ कर दी। आइसा की नेहा बोरा और अन्य अनेक छात्रों के साथ इस दशक के छोटे अन्ना, ‘सोनम वांगचुक’ भी भूख हड़ताल पर बैठ गए। और 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसे पूरी दुनिया ने देखा। अंततः शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।
मात्र कुछ ही दिनों में किसी आभासी पटल पर गठित एक पार्टी के नेतृत्व में हिंदुस्तान में होने वाला यह पहला ऐतिहासिक युवा आंदोलन बन गया। किसी ने इसे जेन-जी का आंदोलन कहा तो किसी ने देशद्रोहियों का षडयंत्र! आगे जो भी हो, अंजाम जो भी हो—इस आंदोलन से दो बातें जरूर हुईं, पहली यह कि हर आम और खास के दिमाग में सत्ता का पहले वाला डर समाप्त हो गया; दूसरी यह कि झूठ व छद्म नैरेटिव आधारित मीडिया और आईटी सेल्स का साम्राज्य तिनकों की तरह बिखर गया।
लेकिन रुको जरा, खेल अभी खत्म नहीं हुआ। जिस प्रकार जेन-जी के बाद जेन-अल्फा के आंदोलनों की खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि हिंदुस्तान की जनता जिन जन क्रांतियों को भूल चुकी थी, एक बार फिर कहीं ये आंदोलन उनका प्रस्थान बिंदु सिद्ध न हो जाए।
इब्तिदाए इश्क़ है, रोता है क्या?
आगे-आगे देखिए होता है क्या।
लब्बोलुआब यह है कि न ‘कॉकरोच’ वाला ताना सी.जे.आई. साहब मारते, न सी.जे.पी. बनती, न उसके आभासी पटल पर करोड़ोंकॉकरोच फॉलोअर्स बनते, न बात आगे बढ़ती और न प्रधान जी की प्रधानगिरी और न सरकार की इज्जत दाँव पर लगती।
खैर जो हुआ सो हुआ, बाज लोग अब भी बाज नहीं आ रहे। कारण, ख़ुराफ़ात एक लाइलाज चर्म रोग है। अब भी कुछ अति-उत्साहित चिंतकचुल्लु और घनभक्त गुरुड़गुल्लु न खुद चैन से बैठते हैं, न किसी को बैठने देते हैं। सुना है ऐसी ही किसी कसमसायी आत्मा ने प्रधान तिलचट्टे अभिजीत दीपके से उसकी अमेरिका में हुई पढ़ाई पर खर्चे का हिसाब माँगा है। बदले में दीपके ने भी कह दिया है, “मैं तो दिखा दूँगा, लेकिन क्या मोदी जी अपनी डिग्री दिखाएंगे।”
लो जिस बात का डर था, घूम फिर कर बात वहीं आ गई। अरे धरती-धकेल चिंतकचुल्लुओ और गुरुड़गुल्लुओ! दीपके का कुछ बिगड़े या न बिगड़े—कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जहाँ तक सी.जे.आई. साहब की बात है, उनका तो नाम अमर हो गया। जैसे ताजमहल के साथ शाहजहां का नाम जुङा है, कोणार्क सूर्य मंदिर के साथ राजा नरसिंह देव प्रथम और हवा महल के साथ महाराज सवाई प्रताप सिंह का नाम जुङा है; सी.जे.आई. सूर्यकांत का नाम भी कॉकरोच जनता पार्टी के साथ सदैव जुङा रहेगा।
माना तुम्हारा भी कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन सरदार और सरदार के चाणक्य? क्या बिगाड़ा है उन्होंने तुम्हारा, कुछ तो ख्याल करो। इस नाजुक वक्त में क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हो? जाओ जाकर कोई और काम करो। देखते नहीं बीस जुलाई के बाद पंद्रह दिन से डबल इंजन संसद एक्सप्रेस दोनों ड्राइवरों की अनुपस्थिति में एक जगह ही खङी है।
“और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा”
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 05 अगस्त, 2026