आलेख: वरदान से अभिशाप की ओर


वर्ष 1995 की बात है। मैं बैंकिंग सेवा भर्ती बोर्ड, दिल्ली में परिवीक्षाधीन अधिकारी के पद के लिए साक्षात्कार दे रहा था। बोर्ड के एक सदस्य ने पूछा, "आपके प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण विकास कार्य कौन-सा है?" मेरा सहज और स्वाभाविक उत्तर था—राजस्थान नहर, जिसे आज इंदिरा गांधी नहर के नाम से जाना जाता है। राजस्थान जैसे अल्पवर्षा वाले मरुस्थलीय प्रदेश में पानी से बड़ा वरदान भला और क्या हो सकता था?

पश्चिमी राजस्थान के इतिहास में यदि किसी एक परियोजना ने सर्वाधिक व्यापक और दूरगामी परिवर्तन का सूत्रपात किया है, तो वह निस्संदेह इंदिरा गांधी नहर परियोजना ही है। इसने केवल लाखों लोगों की पेयजल समस्या का समाधान ही नहीं किया, बल्कि सहस्राब्दियों से प्यासे पड़े मरुस्थल की प्यास भी बुझाई। इसके जल ने रेतीले धोरों के हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को हरे-भरे खेत-खलिहानों में रूपांतरित कर दिया; जहाँ कभी तपती बालू और विरल वनस्पति थी, वहाँ आज छायादार वृक्ष, समृद्ध कृषि और विकसित जैव-विविधता का संसार दिखाई देता है। यह परिवर्तन केवल भौगोलिक नहीं था, बल्कि इस क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी आधार बना।

पश्चिमी राजस्थान की साइलेंट जनरेशन (जन्म 1928–1945), बेबी बूमर्स (जन्म 1946–1964) और जनरेशन एक्स (जन्म 1965–1980) इस ऐतिहासिक परिवर्तन की प्रत्यक्ष साक्षी रही हैं। इन पीढ़ियों ने अपनी आँखों के सामने घास-फूस की झोंपड़ियों और कच्चे मकानों को पक्के, आधुनिक आवासों में बदलते देखा है; कच्ची पगडंडियों और धूलभरी सड़कों को सीमेंट-कंक्रीट के सुदृढ़ मार्गों में परिवर्तित होते देखा है। उन्होंने बैलगाड़ी और ऊँट की धीमी गति से लेकर साइकिल, मोटरसाइकिल, बस, जीप, कार, ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि उपकरणों तक की यात्रा स्वयं अपने जीवनकाल में तय की है।

किन्तु वर्ष 2025–26 आते-आते एक ऐसा प्रश्न मेरे सामने खड़ा हो गया, जिसने वर्ष 1995 में इस परियोजना के प्रति मेरे मन में बनी उसकी सर्वोच्च उपलब्धि की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मात्र तीन दशकों के भीतर ही इसकी ऐतिहासिक उपलब्धि संदेह के घेरे में घिर गई! नहर के जल की गिरती गुणवत्ता, प्रदूषण के बढ़ते स्तर, उससे जुड़ी जमीनी वास्तविकताएँ और दूषित जल के कारण फैलती बीमारियों की चिंताजनक रिपोर्टें इस गौरवगाथा पर धुंध की परत चढ़ाने लगी हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य भी हो जाता है—क्या पश्चिमी राजस्थान के विकास का पर्याय बनी यह जीवनदायिनी इंदिरा गांधी नहर धीरे-धीरे करोड़ों लोगों के लिए स्वास्थ्य संकट का स्रोत बनती जा रही है?

हालिया वर्षों में हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर और विशेषकर रावतसर क्षेत्र में कैंसर, हड्डियों तथा त्वचा संबंधी रोगों के बढ़ते मामलों ने लोगों को विचलित किया है। रावतसर निवासी मेरे बड़े भाई का निधन इसी वर्ष (2026) मई माह में कैंसर के कारण हो गया। शोक-संवेदना के उन दिनों कस्बे के अनेक गणमान्य नागरिकों, किसानों, व्यापारियों, चिकित्सकों, पत्रकारों और वरिष्ठ साहित्यकार श्री रूपसिंह राजपुरी से बातचीत का अवसर मिला। लगभग हर चर्चा में आसपास के क्षेत्र में कैंसर के मामलों में हो रही असामान्य वृद्धि चिंता का प्रमुख विषय थी।

उनका कहना था कि केवल रावतसर ही नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी नहर के किनारे बसे वे सभी क्षेत्र, जहाँ यही जल पेयजल के रूप में उपयोग होता है, कैंसर, हड्डियों और त्वचा संबंधी रोगों की बढ़ती समस्या से जूझ रहे हैं। यह भी स्पष्ट बहुमत था कि पंजाब के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट तथा नगरों का अनुपचारित सीवर अंततः सतलुज-ब्यास के माध्यम से इंदिरा गांधी नहर में पहुँच रहा है।

क्या इन आशंकाओं को जन सामान्य की अटकलें या भ्रांति मानकर खारिज किया जा सकता है? वर्ष 2014 में हनुमानगढ़ के किसानों ने इसी मुद्दे को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था। वर्ष 2024 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी स्वीकार किया कि फिरोजपुर फीडर का पानी बिना उपचार के पीने योग्य नहीं है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के अध्ययन तथा विभिन्न वैज्ञानिक जाँचों में पंजाब के जल स्रोतों में सीसा, कैडमियम, आर्सेनिक, क्रोमियम, पारा और यूरेनियम जैसी भारी धातुओं की उपस्थिति दर्ज की गई है। ये तथ्य किसी भी जिम्मेदार समाज को चिंतित करने के लिए पर्याप्त हैं।

एक वयस्क व्यक्ति के शरीर में 60% जल होता है, यानि एक 70 किलोग्राम वजन वाले व्यक्ति के शरीर में 42 किलोग्राम तो पानी ही है! बच्चों में यह प्रतिशत तो और भी अधिक 70-80% तक होता है। इसके बावजूद पेयजल की गुणवत्ता के प्रति सामूहिक लापरवाही हैरान और विचलित कर देने वाली है।

विडंबना यह है कि सरकारी एजेंसियाँ नियमित जाँच में पानी को सुरक्षित बताती रहती हैं और कैंसर के मामलों का नहरी जल से प्रत्यक्ष संबंध स्वीकार नहीं करतीं। यदि ऐसा है, तो फिर एक ही भौगोलिक पट्टी में गंभीर बीमारियों की बढ़ती घटनाओं का वैज्ञानिक कारण क्या है? सरकारों की जिम्मेदारी केवल आरोपों का खंडन करना नहीं, बल्कि जनता के इस प्रश्न का विश्वसनीय उत्तर देना भी है।

इस संदर्भ में श्री गंगानगर निवासी सेवानिवृत्त सहायक अभियंता श्री श्रवण कुमार का एक महत्त्वपूर्ण अवलोकन भी विचारणीय है। उनके अनुसार पहले नहरों और वितरक नालों का तल कच्चा होता था। लंबी दूरी तक बहते हुए मिट्टी अनेक हानिकारक तत्वों को प्राकृतिक रूप से सोख लेती थी और एक प्राकृतिक फिल्टर का कार्य करती थी। बाद में अधिकांश नहरों और नालों के पक्के हो जाने से यह प्राकृतिक छनन समाप्त हो गई। उसी दौरान नगरों का सीवर और घरेलू अपशिष्ट भी बिना पर्याप्त शोधन के सीधे नदियों और नहरों में छोड़ा जाने लगा। परिणामस्वरूप प्रदूषण अब बिना किसी प्राकृतिक अवरोध के सैकड़ों किलोमीटर दूर तक पहुँच रहा है।

स्थिति की गंभीरता केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। जलभराव और मिट्टी की बढ़ती लवणता ने हजारों हेक्टेयर भूमि की उत्पादकता को भी अत्यधिक प्रभावित किया है। अर्थात जिस परियोजना ने मरुस्थल को उपजाऊ बनाया था, वही अब पर्यावरणीय संतुलन और स्वास्थ्य को सर्वोच्च चुनौती दे रही है।

यह प्रश्न राजनीति का नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का है, वर्तमान और भावी पीढ़ियों के अस्तित्व का है। यह केवल पंजाब या राजस्थान का नहीं, बल्कि दोनों राज्यों की साझा जिम्मेदारी है। औद्योगिक अपशिष्ट का प्रभावी शोधन, आधुनिक सीवर ट्रीटमेंट संयंत्रों की स्थापना, जल की स्वतंत्र एवं पारदर्शी वैज्ञानिक जाँच तथा प्रभावित क्षेत्रों में दीर्घकालिक स्वास्थ्य अध्ययन अब टाले नहीं जा सकते।

इंदिरा गांधी नहर लगभग 7,500 गाँवों और लगभग 1.75 करोड़ लोगों की जीवनरेखा है। यदि इसके जल की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं, तो उन्हें विरोधाभासी सरकारी रिपोर्टों के पीछे छिपाया नहीं जा सकता। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह संकट के विकराल होने की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि उसके प्रारंभिक संकेतों पर ही सचेत हो जाता है।

जिस नहर को हमने कभी राजस्थान का सबसे बड़ा वरदान कहा था, उसे अभिशाप बनने से रोकना आज हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हमने समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला तो आने वाली पीढ़ियाँ इस लापरवाही के लिए कभी भी हमें क्षमा नहीं करेंगी।

©  दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 9 जुलाई 2026





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