कविता: दिमाग़ी नक्सल





पहले उन्होंने मुसलमानों को ‘गद्दार’ कहा
और मैं चुप रहा—क्योंकि मैं मुसलमान नहीं था!

फिर उन्होंने वामपंथियों को ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग कहा
मैं चुप रहा, मैं वामपंथी नहीं था!

किसान आंदोलनकारियों को उन्होंने ‘खालिस्तानी’ कहा
प्रदर्शनकारी विरोधियों को ‘आंदोलनजीवी’
मैं तब भी चुप रहा, मैं किसान नहीं था
मैं प्रदर्शनकारी भी नहीं था!

आगे चलकर उन्होंने—
तर्क और सवाल करने वाले लेखकों, बुद्धिजीवियों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा
मैं चुप रहा, मैं उनमें भी न था!

उन्होंने बेरोजगारों को ‘कॉकरोच’ कहा
तब भी मैं तमाशबीन बना रहा!

और अब
सत्ता से हर असहमति को
विवेक, तथ्य और तर्क पर अवलंबित हर तल्ख सवाल को
ठीक लाल किले की प्राचीर से
घोषित कर दिया गया है— ‘दिमाग़ी नक्सल’!

अरे— यह तो मैं भी ...
अचानक मुझे अहसास हुआ
मैं घबराया और मुड़कर पीछे देखा
और देखा, उनके द्वारा परिभाषित सभी दिमाग़ी नक्सल—
गद्दार, टुकङे-टुकङे गैंग, खालिस्तानी, आंदोलनजीवी, अर्बन नक्सल, कॉकरोच
सब के सब, हो रहे थे एकजुट
एक प्लेटफॉर्म पर, एक साथ, एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामे!


© दयाराम वर्मा, 17 अगस्त 2026 डबलिन (आयरलैंड)


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