चिंग-तम अमत्तनि (कविता संग्रह)
नोशन प्रेस चेन्नई प्लेटफार्म पर निर्मित
प्रकाशन की तिथी: 26 अगस्त, 2026
प्रस्तावना:
चिंग-तम अमत्तनि: मनुष्यता के पक्ष में एक निर्भीक हस्तक्षेप
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हर कविता अपने समय की संतान होती है; किन्तु कुछ कविताएँ अपने समय की केवल संतान नहीं, उसकी अंतरात्मा और उसका प्रतिवाद भी होती हैं। वे केवल शब्दों का विन्यास नहीं करतीं, अपितु अपने युग की आत्मा में उठ रहे प्रश्नों, अंतर्द्वंद्वों और मानवीय आकांक्षाओं को स्वर प्रदान करती हैं। ऐसे सृजक समय की सतह पर घटित घटनाओं का मात्र विवरण नहीं लिखते; वे उसके भीतर बह रही उस अदृश्य धारा को पहचानते हैं, जो मनुष्य को उसकी मनुष्यता से जोड़ती है। दयाराम वर्मा का यह प्रथम काव्य-संग्रह ऐसी ही सृजनधर्मी प्रज्ञा का साक्ष्य है। यह किसी आत्मान्वेषी आग्रह का घोषणापत्र नहीं, बल्कि मनुष्य, समाज और समय के बीच निरंतर चल रहे संवाद का एक संवेदनशील दस्तावेज़ है।
साहित्य का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि प्रत्येक युग अपनी पहचान केवल राजाओं, साम्राज्यों, युद्धों अथवा राजनीतिक घोषणाओं से नहीं बनाता; वह अपने समय के साहित्य से भी पहचाना जाता है। इतिहास घटनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है, जबकि साहित्य उन घटनाओं के भीतर स्पंदित मानव-अंतःकरण का वृत्तांत रचता है। इतिहास यह बताता है कि क्या घटित हुआ; काव्य यह बताता है कि उसके घटित होने से मनुष्य के भीतर क्या टूटा, क्या बचा और क्या अब भी बचाया जा सकता है। यही कारण है कि जब भी सभ्यता किसी मूल्यनिष्ठ संकट के दोराहे पर खड़ी होती है, काव्य केवल एक साहित्यिक विधा नहीं रह जाता; वह मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज़ बन जाता है।
आज का समय अभूतपूर्व उपलब्धियों का कालखण्ड है। विज्ञान ने असंभव को संभव कर दिखाया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, संचार-क्रांति और तकनीकी विकास ने मनुष्य की क्षमताओं को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। किन्तु इसी परिदृश्य में मनुष्य का अंतर्जगत अनेक विडंबनाओं से भी घिरा हुआ है। धर्म के नाम पर विभाजन, जातीय असमानता, वैचारिक असहिष्णुता, पर्यावरण का निरंतर क्षरण, लोकतांत्रिक मूल्यों पर उठते प्रश्न और संवेदना का क्रमशः क्षीण होना—ये सब इस युग की ऐसी सच्चाइयाँ हैं, जिनसे कोई भी सजग रचनाकार स्वयं को पृथक नहीं रख सकता। ऐसे परिवेश में कविता का दायित्व केवल सौंदर्य का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि मनुष्य के पक्ष में खड़े होने का नैतिक साहस भी है। दयाराम वर्मा का यह काव्य-संग्रह इसी नैतिक साहस की सशक्त अभिव्यक्ति है।
इन रचनाओं को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि सृजक ने अपने समय को दूर खड़े होकर नहीं देखा; उसने उसे जिया है, भोगा है और उसके अंतर्विरोधों को भीतर तक महसूस किया है। यही कारण है कि उसकी काव्याभिव्यक्ति किसी पूर्व निर्धारित बौद्धिक आग्रह का घोषणापत्र नहीं बनती, बल्कि मनुष्य की नियति के प्रति गहरी चिंता का दस्तावेज़ बनकर सामने आती है। वे किसी एक विषय के कवि नहीं हैं। उनकी दृष्टि वहाँ भी जाती है, जहाँ मनुष्य धर्म के नाम पर मनुष्य से अलग किया जा रहा है; वहाँ भी, जहाँ किसान अपनी ही सभ्यता में उपेक्षित खड़ा है; वहाँ भी, जहाँ प्रकृति अपने अस्तित्व की अंतिम पुकार लगा रही है; और वहाँ भी, जहाँ भविष्य का कृत्रिम बुद्धिमान मनुष्य वर्तमान के संवेदनशून्य मनुष्य से अधिक मृदुहृदय होने की संभावना जगाता है।
दयाराम वर्मा की कविताओं का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उनकी मानवतावादी जीवन-दृष्टि है। उनके लिए मनुष्य की पहचान किसी जाति, धर्म, भाषा अथवा वर्ग से नहीं, उसकी मनुष्यता से होती है। यही कारण है कि ‘पोस्टमार्टम’ जैसी कविता में वे एक अत्यंत सरल, किन्तु असाधारण प्रश्न उठाते हैं—
“लाल रक्त, सफ़ेद अस्थियाँ, हृदय, फेफड़े या पसलियाँ—
कहीं कोई भेद नहीं
फिर वह कौनसा अंग है
चुन देता है मज़हबी दीवारें
बाँट देता है—
मानव से मानवता, इंसान से इंसान को
शहर से बस्ती, खेत से खलिहान को”
यह प्रश्न केवल कविता का प्रश्न नहीं है; यह हमारे समय की सबसे बड़ी मानवोचित चुनौती है। रचनाकार उत्तर देने की जल्दी में नहीं है। वह चाहता है कि यह प्रश्न पाठक के भीतर उतरे, उसे विचलित करे और उसकी प्रज्ञा में दीर्घकाल तक गूँजता रहे। एक सच्चे कवि की यही पहचान है कि वह उत्तरों की अपेक्षा प्रश्नों को अधिक जीवित रखता है।
इस संग्रह की दूसरी बड़ी विशेषता समकालीन यथार्थ से उसका निर्भीक साक्षात्कार है। दयाराम वर्मा अपने समय की विसंगतियों को किसी आवरण में छिपाकर प्रस्तुत नहीं करते; वे उन्हें उसी तीखेपन के साथ अभिव्यक्त करते हैं, जैसा उन्होंने अनुभव किया है। उल्लेखनीय यह है कि उनकी निर्भीकता आक्रामकता नहीं बनती और उनका प्रतिरोध कटुता में परिवर्तित नहीं होता। उनके यहाँ असहमति का आधार वैमनस्य नहीं, बल्कि मूल्यनिष्ठ विवेक है। इसीलिए उनकी कविता किसी विचारधारा की परिधि में कैद नहीं होती; वह मनुष्य की गरिमा और सामाजिक सह-अस्तित्व के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।
यह विश्वास उनकी अनेक कविताओं में प्रतिध्वनित होता है। चाहे ‘जाति कबहूँ न जाती’, ‘अनेक थे, नेक थे’ अथवा ‘कलम की अभिलाषा’—हर जगह रचनाकार विभाजन नहीं, संवाद और विमर्श की तलाश करता दिखाई देता है। वह जानता है कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है, उसके विखंडन में नहीं।
दयाराम वर्मा की कविताओं में करुणा और प्रतिरोध का एक अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे केवल व्यवस्था की आलोचना नहीं करते; वे उन मौन चेहरों की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं, जो प्रायः इतिहास और समाचारों के हाशिए पर छूट जाते हैं। इसी कारण उनकी कविता में किसान है, नदी है, पहाड़ है, जंगल है, बच्चा है, स्त्री है, संविधान है, शब्द हैं और अंततः संपूर्ण मानव-संसार है। इन सबको जोड़ने वाली अदृश्य कड़ी है—संवेदना।
उनकी कविता का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह भी है कि वह निराशा के बीच भी आशा का दीप जलाए रखती है। जब वे लिखते हैं—
"साफ-स्वच्छ हमें रखना, अरे ओ कृतघ्न इंसान
मात्र पूजना नहीं
सीखो सहेजना —
है यही विनती, यही मेरी अंतिम देशना”
तो यह केवल नदी की व्यथा नहीं रह जाती; यह मनुष्य और प्रकृति के सनातन सह-अस्तित्व का सात्त्विक उद्घोष बन जाती है।
उनकी भाषा दिखावटी अलंकरणों से बोझिल नहीं है। उसमें विचार की स्पष्टता, भाव की गरिमा और अभिव्यक्ति की ऊर्जा एक साथ विद्यमान हैं। वे तत्सम, तद्भव, उर्दू, लोक-प्रयोग और समकालीन शब्दावली का स्वाभाविक प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में वक्तव्य की दृढ़ता है, पर वह कविता की संवेदनशीलता को कहीं भी विस्मृत नहीं करती। कहीं-कहीं उनकी पंक्तियाँ घोषणात्मक प्रतीत होती हैं, किन्तु उनके भीतर धड़कती मानवीय करुणा उन्हें पुनः काव्य में रूपांतरित कर देती है।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे कविता को मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते अपितु उसे सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व का माध्यम मानते हैं। फलत: उनकी कविता का अनुनाद केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक मानुषिक सरोकारों का प्रतिनिधि बन जाता है। ‘कलम की अभिलाषा’ की ये पंक्तियाँ—
" लिखूँ संघर्ष मृग का
शिकारी व्याघ्र नहीं महान
दबे-कुचले, विस्मृत, तिरस्कृत, शोषित, वंचित की
बन जाऊँ मैं बुलंद जुबान"
—केवल एक सृजक की निजी आकांक्षा नहीं, बल्कि प्रत्येक सजग रचनाकार के सामाजिक दायित्व की उद्घोषणा हैं। वस्तुतः यही आकांक्षा इस पूरे काव्य-संग्रह की आत्मा है।
कवि दयाराम वर्मा की रचनाओं का एक उल्लेखनीय गुण यह है कि वह किसी पूर्व निर्धारित निष्कर्ष से आरम्भ नहीं होती। वह जीवन के बीचों-बीच उतरती है और वहीं से अपने प्रश्न उठाती है। उनकी रचनाओं में चिंतन अवश्य है, किन्तु वह कविता पर आरोपित नहीं लगता; वह अंतश्चेतना से स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होकर आता है। यही कारण है कि उनकी कविताएँ पाठक से सहमति की अपेक्षा नहीं करतीं, अपितु उसे सोचने के लिए विवश करती हैं। किसी भी सार्थक साहित्य की यही सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
इस संग्रह को पढ़ते हुए सहज ही अनुभव होता है कि कवि ने अपने समय की घटनाओं को केवल देखा नहीं, भीतर तक जिया है। मणिपुर की विभीषिका हो, किसानों का असंतोष, जातीय विडम्बनाएँ, लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति चिंता, पर्यावरण का संकट अथवा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य को लेकर उठते प्रश्न—इन सबके बीच कवि का मन बार-बार उसी मूल प्रश्न पर लौट आता है कि मानव अपनी मानवता को किस प्रकार सुरक्षित रखे।
विविध विषयों पर लिखी गई ये कविताएँ अंततः एक ही भावभूमि पर आकर मिल जाती हैं—मनुष्य और उसकी गरिमा की रक्षा की भावभूमि पर।
लेखक की रचनात्मक दृष्टि का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी नीति-सम्मत निर्भीकता है। वे कठिन प्रश्न पूछने से नहीं हिचकते। उनकी रचनाएँ सत्ता से भी प्रश्न करती है, समाज से भी, परम्परा से भी और स्वयं मनुष्य से भी। यह प्रश्नाकुलता किसी नकारात्मक आग्रह से प्रेरित नहीं है; इसके मूल में यह गहरा विश्वास निहित है कि मनुष्य अभी भी बेहतर हो सकता है और समाज अधिक न्यायपूर्ण बन सकता है। इसी विश्वास के कारण उनकी कविता प्रतिरोध के भीतर भी आशा का दीप सुरक्षित रखती है।
भाषिक विन्यास की दृष्टि से भी यह कृति इसलिए उल्लेखनीय है कि रचनाकार ने अपनी अभिव्यक्ति को अनावश्यक अलंकरणों से नहीं सजाया। उनकी भाषा में सहजता है, पर उस सहजता के भीतर विचार की गहराई भी है। वे संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग करते हैं तो वहीं उर्दू के शब्द भी उतनी ही स्वाभाविकता से उनकी कविता में प्रवेश करते हैं। कहीं लोकभाषा की माटी की गंध है, तो कहीं आधुनिक विज्ञान, लोकतंत्र और संविधान की शब्दावली। यह भाषिक विविधता बनावटी नहीं लगती, क्योंकि उसके पीछे जीवन का व्यापक अनुभव और रूपायन पर स्वाभाविक अधिकार है।
इन कविताओं का एक और आकर्षक पक्ष उनकी बिम्ब-सृष्टि है। पहाड़ बोलते हैं, नदी अपनी पीड़ा कहती है, शब्द स्वयं अपना चरित्र उद्घाटित करते हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी एक विवेकसम्मत प्रश्न बनकर सामने आती है। यह मानवीकरण केवल काव्य-शिल्प नहीं, बल्कि उस व्यापक अनुकम्पामय दृष्टि का परिणाम है जो समस्त सृष्टि को एक साझा नियति में देखती है।
निस्संदेह, दयाराम वर्मा की कविताएं अपने समय के प्रश्नों से गहरे स्तर पर जुड़ती है। इसलिए स्वाभाविक है कि अनेक स्थानों पर उसकी व्यंजना तीखी भी हो जाती है; किन्तु यह तीखापन कभी विद्वेष का रूप नहीं लेता। उसके भीतर करुणा की ऊष्मा और मानव-मर्यादा के प्रति अटूट आस्था विद्यमान रहती है। उनकी कविता विरोध के लिए विरोध नहीं करती; वह मानवोचित मूल्यों के पक्ष में खड़ी होकर अपने समय से विमर्श करती है।
साहित्य का अंतिम मूल्य इस बात से निर्धारित नहीं होता कि उसने अपने समय की कितनी घटनाओं का उल्लेख किया, बल्कि इस बात से होता है कि उसने मनुष्य के भीतर कितनी देर तक प्रकाश जलाए रखा। इस संग्रह की कविताएँ इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण हैं। वे हमें असहज करती हैं, क्योंकि वे हमें हमारे समय से परिचित कराती हैं; वे हमें उद्वेलित करती हैं, वे हमारे भीतर सोई हुई सहृदयता को पुकारती हैं; और अंततः यह विश्वास भी जगाती हैं कि जब तक मनुष्य के पक्ष में बोलने वाली कविता जीवित है, तब तक आशा भी जीवित है।
संग्रह की अंतिम कविता ‘ढाई आखर’ मानो पूरे काव्य-संसार का निष्कर्ष बनकर सामने आती है। अनेक जटिल सामाजिक, राजनीतिक और चिंतनोन्मुख प्रश्नों से होकर गुजरने के बाद कवि अंततः प्रेम को ही मनुष्य की अंतिम भाषा के रूप में स्वीकार करता है—
" कभी झाँकना उन आँखों में
और डूबकर बाँचना
जहाँ लिखे होते हैं— केवल ढाई आखर
प्रेम, इश्क़, प्यार के शब्द”
यही 'ढाई आखर' इस पूरे संग्रह का केंद्रीय भाव है। यही वह सूत्र है जो विविध विषयों, विविध सरोकारों और विविध अनुभवों को एक मानवीय कड़ी में पिरो देता है।
आज जब कविता के सामने त्वरित लोकप्रियता का आकर्षण, अवधारणात्मक ध्रुवीकरण का दबाव और बाज़ार की चकाचौंध एक साथ उपस्थित हैं, ऐसे समय में लेखक का यह प्रथम काव्य-संग्रह इस विश्वास को पुष्ट करता है कि सच्ची कविता अंततः अपने समय की अंतरात्मा से ही जन्म लेती है। वह किसी सत्ता की प्रवक्ता नहीं होती, न किसी विचारधारा की प्रचारक; वह मनुष्य की अंतर्दृष्टि की सतर्क प्रहरी होती है। उसका कार्य अंतिम उत्तर देना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को जीवित रखना है जिनके बिना कोई भी सभ्यता अपनी नैतिक ऊर्जा को सुरक्षित नहीं रख सकती।
कवि की पहली पहचान उसकी भाषा नहीं, उसकी संवेदना होती है। भाषा समय के साथ और अधिक परिमार्जित होती रहती है, शिल्प नए आयाम ग्रहण करता है; किन्तु यदि संवेदना प्रामाणिक हो तो वही किसी रचना की सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है। ‘चिंग-तम अमत्तनि’ की कविताओं का सबसे विश्वसनीय पक्ष यही है कि वे अपने पाठक पर यत्रसाध्य प्रभाव आरोपित नहीं करतीं, अपितु उसके साथ आत्मीय संवाद स्थापित करती हैं। वे पाठक को निर्देश नहीं देतीं; उसके भीतर एक बेचैनी, एक प्रश्न और आत्मसंवाद का एक दीर्घ अनुगुंजन छोड़ जाती हैं।
यद्यपि इस संग्रह की अनेक कविताएँ अपने समय की विशिष्ट घटनाओं से प्रेरित हैं, तथापि उनका आशय किसी एक कालखंड तक सीमित नहीं रह जाता। मनुष्य, प्रकृति, समानता, न्याय, प्रेम और सह-अस्तित्व जैसे शाश्वत प्रश्न इन्हें समय की सीमाओं से ऊपर उठाकर व्यापक मानुषिक संदर्भ प्रदान करते हैं। इसी कारण यह संग्रह केवल आज का दस्तावेज़ नहीं, आने वाले समय के लिए भी एक विचारोत्तेजक पाठ सिद्ध होने की क्षमता रखता है।
जब समय मनुष्य से उसकी संवेदना छीन लेने पर आमादा हो, तब कविता केवल साहित्य नहीं रह जाती; वह मानवता की अंतिम शरण बन जाती है। दयाराम वर्मा की ये कविताएँ उसी शरण की ओर ले जाने वाली अर्थवान पदचाप हैं। एक सच्चे रचनाकार की यात्रा किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि निरंतर आत्म-विस्तार की ओर अग्रसर होती है। मुझे विश्वास है कि यह काव्य-संग्रह उस सार्थक यात्रा का सुदृढ़ और आश्वस्तिपूर्ण प्रारम्भ सिद्ध होगा और केवल पढ़ा ही नहीं जाएगा, बल्कि अपने पाठकों की प्रज्ञा में दीर्घकाल तक अनुगुंजित होता रहेगा।
अंततः, मैं दयाराम वर्मा को उनके प्रथम काव्य-संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देती हूँ। आशा है कि वे अपनी वैचारिक निष्ठा, मानवतावादी दृष्टि और रचनात्मक निर्भीकता को भविष्य में भी अक्षुण्ण रखेंगे।
डॉ. दीप्ति गुप्ता
पूर्व प्रोफेसर, पूर्व शिक्षा सलाहकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (भारत सरकार)
सम्प्रति: पूर्णतया साहित्य सृजन को समर्पित
पुणे: 411006 (महाराष्ट्र)
मो: 9890633582
आत्मकथ्य:
उपन्यास ‘सियांग के उस पार’ और यात्रा-वृत्तांत ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो: एक सफ़रनामा’ के उपरांत प्रकाशित होने वाली यह मेरी तीसरी साहित्यिक कृति है।
मेरा विश्वास है कि कविता किसी मत, विचारधारा, पंथ या सत्ता की उपासक, बंधक, पोषक अथवा प्रचारक नहीं हो सकती। उसका धर्म किसी वैचारिक अनुशासन या राजनीतिक निष्ठा का अनुचर बनना नहीं, बल्कि मनुष्य की सामूहिक चेतना को परिमार्जित, विस्तृत और ऊर्ध्वमुखी बनाने वाली एक स्वायत्त सृजन-शक्ति के रूप में निरंतर अभिव्यक्त होते रहना है।
जो कविताएँ विषम परिस्थितियों में जन्म लेती हैं, वे परिवर्तन और पुनर्निर्माण के वट-बीज भी संजोए रखती हैं। उम्मीद की मशाल थामे कवि जावेद आलम ख़ान अपनी कृति ‘स्याह वक्त की इबारतें’ में इस विचार को स्वर देते हुए लिखते हैं—
“तुम देखना चाँद!
एक दिन कविताओं से उठा ज्वार
अपने साथ बहा ले जाएगा
दुनिया का तमाम बारूद…”
हर अन्याय, हर शोषण और परीक्षा की हर घड़ी मनुष्य के सामने तीन विकल्प रखती है—किसी एक पक्ष या विचार के साथ सहमति और समर्थन, असहमति और विरोध, अथवा तटस्थता। यद्यपि कहने को तीन विकल्प हैं, लेकिन व्यवहारिक रूप से ये दो ही हैं। तटस्थता कोई तीसरा पक्ष नहीं, बल्कि एक सुविधाजनक चुप्पी या भयाकुल सहमति है, जो स्वतः ही झूठ और अन्याय के पाले में गिर जाती है। साहित्य से भी यही सवाल पूछा जाना चाहिए—“उस समय तुम किसके साथ थे?”
आज के दौर में, चारों ओर सूचनाएं आंधी, तुफान और बाढ़ की तरह बह रही हैं; अतएव इसे ‘सूचना का सुनामी काल’ कहना गलत न होगा। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती, सच और झूठ के बीच अंतर कर पाना है। यही पहचान किसी पक्ष या विचार के प्रति हमारी सहमति अथवा असहमति का आधार बनती है और अंततः यह भी तय करती है कि हम किसके साथ खड़े हैं, कहाँ खड़े हैं।
‘चिंग-तम अमत्तनि’ किसके साथ है? सुधी पाठक इस प्रश्न का निरपेक्ष उत्तर दे सकते हैं। वही उत्तर इन कविताओं के साहित्यिक औचित्य और अवदान का मूल्यांकन करेगा।
इसी विश्वास और अनंत सद्भावनाओं के साथ मैं अपना प्रथम काव्य-संग्रह आपके समक्ष समर्पित कर रहा हूँ।
और अंत में, इस काव्य-संग्रह की संवेदनापूर्ण, विचार-समृद्ध और मर्मवेधी प्रस्तावना लिखने के लिए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. दीप्ति गुप्ता तथा इस पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रकाशक ‘नोशन प्रेस-चेन्नई’ का हृदय की गहराइयों से आभार, धन्यवाद।
दयाराम वर्मा
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लेखक परिचय:
दयाराम वर्मा का जन्म 17 जुलाई 1966 को राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले की भादरा तहसील के ग्राम महराणा में हुआ। आपने विज्ञान में स्नातक, लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर तथा सी.ए.आई.आई.बी. की शिक्षा प्राप्त की। लगभग एक दशक तक भारतीय वायु सेना में रेडियो तकनीशियन के रूप में सेवाएँ देने के उपरांत ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स तथा पंजाब नेशनल बैंक में अधिकारी के रूप में कार्य किया। मुख्य प्रबंधक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद, सितंबर 2023 से आप पूर्णकालिक स्वतंत्र लेखन को समर्पित हैं।
आपकी पूर्व प्रकाशित कृतियों में ‘सियांग के उस पार’ (उपन्यास, 2018) तथा ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो : एक सफ़रनामा’ (यात्रा-वृत्तांत, 2022) प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त आप कविता, व्यंग्य, आलेख, संस्मरण तथा अन्य साहित्यिक विधाओं में भी नियमित लेखन करते हैं। उपन्यास ‘सियांग के उस पार’ पर राजीव गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, दोईमुख (अरुणाचल प्रदेश) में वर्ष 2020 में एम.फिल. स्तर का शोध भी हुआ है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। पंजाब नेशनल बैंक ने आपके यात्रा-वृत्तांत ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो : एक सफ़रनामा’, कविता ‘चिंग-तम अमत्तनि’ और ‘अनेक थे नेक थे’ को राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर पुरस्कृत किया है। आपने संयुक्त अरब अमीरात, थाईलैंड, आयरलैंड, स्कॉटलैंड और ब्रिटेन की विदेश यात्राएँ भी की हैं।
संपर्क:
विला संख्या: 77, महिमा शुभ निलय, चिमनपुरा, अजमेर रोड, जयपुर–302026 (राजस्थान)
मोबाइल: +91 8989015120
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