कविता: दिमाग़ी नक्सल




(Part of the poem)

पहले उन्होंने मुसलमानों को ‘गद्दार’ कहा
और मैं चुप रहा—क्योंकि मैं मुसलमान नहीं था!

फिर उन्होंने वामपंथियों को ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग कहा
मैं चुप रहा, मैं वामपंथी नहीं था!

किसान आंदोलनकारियों को उन्होंने ‘खालिस्तानी’ कहा
प्रदर्शनकारी विरोधियों को ‘आंदोलनजीवी’
मैं तब भी चुप रहा, मैं किसान नहीं था
मैं प्रदर्शनकारी भी नहीं था!

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© दयाराम वर्मा, 17 अगस्त 2026 डबलिन (आयरलैंड)

Published : 

1. सत्य की मशाल मासिक पत्रिका भोपाल सितंबर, -2026
2. काव्य संग्रह 'चिंग-तम अमत्तनि' नोशन प्रेस प्लेटफार्म -2026










3 टिप्‍पणियां:

  1. सामयिक और मनुष्यता को जागृत करने की दिशा में सार्थक पहल। लेखक को साधुवाद। ।

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  2. सामयिक है। मनुष्यता को जागृत करने की दिशा में लेखक की एक सार्थक पहल। लेखक को साधुवाद।

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  3. बहुत ही शानदार लेखन

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