व्यंग्य: हंगामा क्यों है बरपा



चिंतकचुल्लु की समझ से यह सर्वथा परे था। सदैव ताज़ा लौकी सी चमकती रहने वाली मुखमुद्रा आज अलसाए बैंगन की तरह बे-रौनक़ थीं।

यह हो कैसे गया? ठीक नाक के नीचे! अपनों के ही हाथों! अपनों के ही विरुद्ध! अपनों के ही राज में… घोर अनर्थ!

चाय के प्याले की अंतिम घूँट सटकने के उपरांत, चिंतकचुल्लु ने धुमटी का एक गहरा सुट्टा खींचा और छत की ओर धुएँ का सघन छल्ला उछाल दिया। औपचारिक आदान-प्रदान में जैसे ही धुमटी, गुरु—गुरङगुल्लु के हाथों में पहुँची, उसने चेले—चिंतकचुल्लु से भी गहरा कश लगाया। इतना कि तंबाकू सुर्ख होकर लपट छोड़ने लगा और चिंतन-कक्ष रोमानी गंध से महक उठा।

शांत भाव से धूम्रपान का आनंद लेते हुए, गुरङगुल्लु ने प्रश्न किया—“तुम्हें क्या लगता है?”

चिंतकचुल्लु— “इस प्रकार की आत्मघाती अधिसूचना कैसे जारी हो सकती है! हो न हो, यूजीसी में कोई स्लीपर सेल घुसा है।”

गुरङगुल्लु— “नहीं। ऐसी कोई संभावना नहीं है।”

चिंतकचुल्लु ने आँखें झपझपाईं, एक असहज करवट लेकर अपान वायु उन्मुक्त की और गुरङगुल्लु की ओर थोड़ा झुककर फुसफुसाया—

“कहीं एपस्टीन फ़ाइल… बड़े या छोटे साहब ब्लैकमेल हो रहे हों?”

गुरङगुल्लु ने गर्दन हिलाकर इस आशंका को भी खारिज कर दिया।

“हम्म…” एक और लंबा कश खींचने के बाद चिंतकचुल्लु ने दिमाग को दूसरी दिशा में दौड़ाना आरंभ किया। पार्टी के भीतर पनप रही असहमतियों की कुछ कड़ियों को जोड़-जाड़ कर उसने किसी भीतरघात की ओर शंका का रुख मोड़ना चाहा।

“ऐसा बोलकर तुम शीर्ष नेतृत्व के कठोर अनुशासन और चक्रवर्ती मिज़ाज पर उँगली उठा रहे हो—चिंतक।”

चेले ने चिंतित होकर सिर खुजलाया। इस गुत्थी को समझने में असमर्थ वह वाकई परेशान था। कुछ क्षणों बाद उसके दिमाग में एक नया विचार कौंधा।

“हो सकता है टैरिफ पर टैरिफ लगाने के बाद भी जब दाल न गली हो, तो खिसियाए दादा ने जॉर्ज सोरोश के ज़रिए कोई साज़िश रच दी हो। या फिर गूगल-माइक्रोसॉफ्ट वगैरह से हमारे खुफिया तंत्र में सेंध लगाकर यूजीसी के नोटिफ़िकेशन का मजमून बदल दिया हो—जैसे थ्री इडियट्स में रैंचो और फरहान ने रामलिंगम के साथ किया था।”

गुरङगुल्लु ने उसे घूरा और धुमटी का धुआँ सीधे उसके मुँह पर छोड़ दिया।

चिंतकचुल्लु का यह तीर भी खाली गया। उसने हाथ हिलाकर धुएँ को अपने चेहरे के सामने से हटाया और चंद पल सोचने के बाद एक नई थ्योरी दागी—

“अरे हाँ! शी जिनपिंग की ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था। हाल ही में उसने अपने शीर्ष सैन्य अधिकारियों की छुट्टी की है। सुना है वे तख़्ता-पलट के फ़िराक में थे। हो सकता है, इस घरेलू षड्यंत्र के पीछे उसे हिंदुस्तानी हाथ का भ्रम हो गया हो।”

“बकवास। क्या बे-सिर-पैर की हाँक रहे हो।”

“तो गुरुदेव, आप ही प्रकाश डालें।” चिंतकचुल्लु ने मैदान छोड़ते हुए कहा।

“अच्छा बताओ, पुराने ज़माने में जब चोर गाँव से पशु चुराने जाते थे, तो क्या करते थे?”

“क्या?...”

“जिस दिशा में चोर पशु हाँक कर ले जाते, उनका एक साथी उससे उलटी दिशा में घंटियाँ बजाता हुआ भागता था…”

“हाँ, वह तो जानता हूँ। लेकिन उस कहानी का इस हंगामे से क्या संबंध?”

“यह कहानी पुराने ज़माने की थी, अब प्रासंगिक नहीं रही।” गुरङगुल्लु ने धुमटी का अंतिम कश लेकर उसे मेज़ पर रख दिया। अपनी लंबी, घनी, काली दाढ़ी को दाहिने हाथ से संवारा और गला खंखारकर साफ किया। चिंतकचुल्लु एक अबोध बालक की भाँति गुरङगुल्लु के चेहरे पर नज़र गड़ाए सुन रहा था। गुरङगुल्लु ने फ़रमाया—

“नई कहानी इस प्रकार से है… अतृप्तकाल में चोरों की जगह एक पेशेवर गिरोह ने ले ली, जिसमें चोर, ठग और डाकू—तीनों की पार्टनरशिप थी। सर्वप्रथम चोर रात के अंधेरे में गाँव के पशुओं को खोलकर भगा देते हैं। तत्पश्चात कुछ ठग भद्र पुरुषों के वेश में गाँव में प्रवेश करते हैं और शोर मचाकर गाँव वालों को उठाते हैं। वे बताते हैं कि चोरों का एक गिरोह तुम्हारे पशुओं को ले जा रहा है। गाँव के सारे पुरुष अपने पशुओं को बचाने के लिए घंटियों की दिशा में लाठी-बल्लम लेकर दौड़ पड़ते हैं। उधर, रास्ता साफ होते ही ठग डाकुओं को इशारा कर देते हैं। घात लगाकर छिपे बैठे घुड़सवार डाकू इत्मीनान से गाँव में घुसते हैं, गहने-नक़दी आदि लूटते हैं और जवान स्त्रियों को उठाकर दूसरी दिशा से भाग जाते हैं।”

चिंतकचुल्लु की शंका का निवारण हो चुका था। उसने झुककर गुरङगुल्लु के पाँव स्पर्श किए और उँगलियों को माथे से लगाया।

“आप धन्य है गुरुदेव!” एक बार फिर से उसका चेहरा ताज़ा लौकी की तरह चमकने लगा।



© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 30.01.2026

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