रेशा-रेशा (समालोचना): श्री मधुर कुलश्रेष्ठ गुना (मध्यप्रदेश)
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लायंस पब्लिकेशन, ग्वालियर द्वारा अक्टूबर 2025 में प्रकाशित ‘रेशा-रेशा’, वरिष्ठ साहित्यकार एवं समालोचक मधुर कुलश्रेष्ठ जी की दूसरी समालोचना-कृति है। उल्लेखनीय है कि ‘ताना-बाना’ और ‘रेशा-रेशा’—दोनों पुस्तकों का प्रकाशन लगभग एक साथ हुआ है, जो समकालीन साहित्यिक विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण संयोग कहा जा सकता है।
भाग (2) रेशा-रेशा:
रेशा-रेशा में लेखक ने 17 समकालीन उपन्यासों, 13 कहानी-संग्रहों तथा 5 व्यंग्य-संग्रहों पर आधारित अपनी ताज़ा और सुसंगठित समीक्षाओं को संकलित किया है। पुस्तक के आत्मकथन में व्यक्त विचार, इस कृति की वैचारिक भूमिका को स्पष्ट करते हैं। मधुर कुलश्रेष्ठ जी लिखते हैं—
“एक लेखक अपना खून-पसीना बहाकर, परिवार का समय चुराकर, लेखन की तमाम वेदनाओं को सहते हुए वरिष्ठ-गरिष्ठ-कनिष्ठ साहित्यकारों को अपनी जान से प्यारी पुस्तक इस आशा में सप्रेम भेंट करता है कि पुस्तक-गृहीता उसे पढ़कर लंबी न सही, छोटी-सी प्रतिक्रिया अवश्य देगा… किंतु उसका यह इंतज़ार, प्रायः इंतज़ार ही रह जाता है। लिखित में तो दूर, दूरभाष पर भी पुस्तक पर दो शब्द कहना वे लोग उचित नहीं समझते। इसी पीड़ा को आत्मसात करते हुए मैंने क्रय की गई तथा सप्रेम प्राप्त पुस्तकों पर अपनी समझ के अनुसार टिप्पणी करने का संकल्प लिया। मेरा प्रयास यही रहता है कि पुस्तक के मर्म तक पहुँचकर ही उस पर लिखूँ—चाहे उसमें कितना भी समय क्यों न लग जाए।”
ये पंक्तियाँ केवल एक लेखक की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं हैं, बल्कि समकालीन साहित्यिक संस्कृति की उस विडंबना की ओर संकेत करती हैं, जहाँ रचना का स्वागत तो होता है, किंतु उस पर संवाद विरल हो गया है। मधुर कुलश्रेष्ठ जी यहाँ मात्र आलोचक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पाठक के रूप में उपस्थित होते हैं और अपने आचरण से यह स्थापित करते हैं कि किसी पुस्तक पर सार्थक प्रतिक्रिया देना एक साहित्यकार का नैतिक दायित्व भी है।
रेशा-रेशा में सम्मिलित समीक्षाएँ विविध कथ्य, शिल्प और वैचारिक धरातलों को समेटे हुए हैं। ‘वे लोग’ (सुमति सक्सेना लाल), ‘त्राहिमाम युगे-युगे’ (रामपाल श्रीवास्तव), ‘पतन’ (रवींद्र कांत त्यागी), ‘खेलै सगल जगत’ (डॉ. अजय शर्मा), ‘डॉ. अजय शर्मा का कथालोक’ (डॉ. पान सिंह), ‘पानी का पंचनामा’ (अरुण अर्णव खरे), ‘मैं भी भारत’ (अजय सिंह राणा), ‘अंशिका : द हीरोइन’ (नृपेंद्र कुलश्रेष्ठ), ‘चाणक्य के जासूस’ (त्रिलोकनाथ पांडेय), ‘साजिश… ज़िंदगी और मौत की जंग’ (अजय शर्मा), ‘श्रुति शाह कॉलिंग’ (हरीश बी. शर्मा), ‘आधी हकीकत’ (शैलेंद्र शांत), ‘दीमक’ (शशिकांत सिंह ‘शशि’), ‘छूटी गलियाँ’ (कविता वर्मा), ‘मुक्ति मठ’ (डॉ. मंजु शर्मा महापात्र) तथा ‘रेज़ा’ (डॉ. स्वर्ण सिंह रघुवंशी) जैसे उपन्यासों की समीक्षाएँ न केवल कथावस्तु का विवेचन करती हैं, बल्कि उनके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक सरोकारों को भी रेखांकित करती हैं। इन समीक्षाओं के मध्य वर्ष २०१८ में प्रकाशित मेरे उपन्यास ‘सियांग के उस पार’ को भी स्थान मिलना, मेरे लिए विशेष आत्मीयता का विषय है।
इस कृति की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि लेखक ने प्रत्येक समीक्षा को एक सटीक, भाव-संकेतक शीर्षक प्रदान किया है—जैसे ‘मानव के जटिल मन के वातायन में झाँकता हुआ उपन्यास’ (वे लोग), ‘भूख और गरीबी की जंग की अंतहीन दास्तान’ (मैं भी भारत), ‘योग्यता की उपेक्षा से नवयुवकों का अवसाद और अपराध की ओर बढ़ते कदम’ (साजिश… ज़िंदगी और मौत की जंग), ‘इंसान की मुक्ति किसी मठ में नहीं, उसके कर्म में निहित होती है’ (मुक्ति मठ), ‘निष्कपट, निश्चल और अल्हड़ प्रेमाभिव्यक्ति से भरा उपन्यास’ (रेज़ा), तथा ‘सियांग के उस पार—बहता भावनाओं का समंदर’ (सियांग के उस पार)। ये शीर्षक मात्र औपचारिक नहीं हैं, बल्कि पाठक को समीक्षा और पुस्तक—दोनों के भाव-सार तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।
समग्रतः ‘रेशा-रेशा’ एक ऐसी समालोचना-कृति है, जो पुस्तक-समीक्षा को औपचारिकता से निकालकर संवाद, संवेदना और दायित्व के धरातल पर प्रतिष्ठित करती है। यह कृति न केवल लेखकों के लिए, बल्कि गंभीर पाठकों और समीक्षकों के लिए भी एक आवश्यक पाठ के रूप में सामने आती है। श्री मधुर कुलश्रेष्ठ को इस सार्थक साहित्यिक योगदान के लिए पुन: हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
© दयाराम वर्मा, जयपुर(राज.) जनवरी 5, 2026
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