ताना-बाना (समकालीन साहित्य की समालोचना) : श्री मधुर कुलश्रेष्ठ (गुना-मध्यप्रदेश)

वर्ष 2025 विदा की दहलीज़ पर खड़ा होकर कुछ ऐसी सौगातें सौंप गया, जिनका मूल्य समय के साथ और बढ़ता जाएगा। इन्हीं में दो विशेष उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं— ‘मिस्ट्री मर्डर’ और ‘काहे के अन्नदाता’ जैसे चर्चित उपन्यासों के सृजक, वरिष्ठ साहित्यकार एवं समालोचक श्री मधुर कुलश्रेष्ठ की नवीनतम समीक्षा-कृति ‘ताना-बाना’ और ‘रेशा-रेशा’ ।
भाग (1) ताना-बाना:
लायंस पब्लिकेशन, ग्वालियर द्वारा प्रकाशित ‘ताना-बाना’ पुस्तक समकालीन हिंदी साहित्य के बहुरंगी वितान को सहेजने का एक गंभीर और सजग प्रयास है।
इस संग्रह में कुलश्रेष्ठ जी ने 37 साहित्यिक कृतियों तथा 5 पत्रिकाओं की समकालीन समीक्षाओं को समाहित किया है। इनमें मेरे यात्रा-वृत्तांत ‘ब्रह्मपुत्र से सांगपो : एक सफ़रनामा’ को भी स्थान मिलना, मेरे लिए आत्मीय संतोष का विषय है। समीक्षित कृतियों का प्रकाशन-काल 2021 से 2025 के मध्य का है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक की दृष्टि अतीत में नहीं, बल्कि समसामयिक हिंदी साहित्य की जीवंत धड़कनों पर केंद्रित है।
किसी रचना की निष्पक्ष, संतुलित और विवेकसम्मत समीक्षा—यह कार्य वही कर सकता है, जिसके भीतर सृजन और संवेदना दोनों समान रूप से परिपक्व हों। सात उपन्यासों, चार कहानी-संग्रहों, दो व्यंग्य-संग्रहों, दो समीक्षा-पुस्तकों और एक ई-बुक के रचनाकार के रूप में मधुर कुलश्रेष्ठ इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं।
‘ताना-बाना’ की समीक्षाएँ शब्दाडंबर से मुक्त, किंतु अर्थ-गहन हैं। इन पंक्तियों से गुजरते हुए पाठक के मन में रचना का एक विश्वसनीय, सजीव और संतुलित चित्र उभरता चला जाता है। यद्यपि इस संग्रह में अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाकारों की उत्कृष्ट कृतियाँ शामिल हैं, फिर भी उदाहरणस्वरूप केवल दो संदर्भ पर्याप्त होंगे।
कवि रामस्वरूप दीक्षित के काव्य-संग्रह ‘तुम्हारी आवाज’ पर टिप्पणी करते हुए कुलश्रेष्ठ जी लिखते हैं—
“यह दिल में छिपा हुआ प्रेम ही होता है, जो विसंगतियों से विप्लवित होता है, और इसी हलचल से उत्पन्न संवेग मस्तिष्क के माध्यम से व्यंग्य, कहानी, कविता या लेख का रूप ले लेते हैं। अर्थात सृजन का मूलाधार प्रेम ही है।”
यह कथन न केवल कृति का, बल्कि संपूर्ण सृजन-प्रक्रिया का भी सार प्रस्तुत करता है।
इसी प्रकार वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रकाशक माया मृग जी के कविता-संग्रह ‘एक चुप्पे की डायरी’ को आप जिस भावगर्भित दृष्टि से देखते हैं, वह समीक्षा को रचनात्मक ऊँचाई प्रदान करती है—
“प्रेम, वात्सल्य, स्नेह, उमंग, तरंग, सपने, यथार्थ, सफलता, असफलता और उदासी के इंद्रधनुषी तथा आभासी रंगों को समेटे यह डायरी मात्र एक पुस्तक नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव-जीवन का रूपक है। इसमें गंगाजल की पावन बूँदें हैं, कर्मजल से लहराता सागर है, सपनों का आकाश है, टूटन का आभास है, जीवन का मधुमास है—मानवीयता का आग्रह है, प्रेरणाओं के धागे हैं और माया मृग का इंद्रजाल है।”
‘ताना-बाना’ की प्रत्येक समीक्षा यह प्रमाणित करती है कि समीक्षक ने रचना के उजले पक्ष को केंद्र में रखते हुए अनावश्यक आलोचनात्मक आक्रामकता से सचेत दूरी बनाए रखी है। पुस्तक में अंतर्निहित लेखकीय संवेदना, शब्द-बिंबों की गहराई, संवादों में रची-बसी जमीनी सच्चाइयाँ, सामाजिक सरोकार और साहित्यिक उद्देश्य—इन सभी को सरल, संयत और प्रभावी भाषा में, बिना अतिशयोक्ति और बिना दुरूह भाषाई जार्गन के प्रस्तुत किया गया है।
निस्संदेह, ‘ताना-बाना’ हिंदी साहित्य के गंभीर पाठकों, शोधार्थियों और समीक्षात्मक अध्ययन में रुचि रखने वालों के लिए एक महत्त्वपूर्ण, संग्रहणीय और उपयोगी कृति है। श्री मधुर कुलश्रेष्ठ को इस सार्थक साहित्यिक योगदान के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। क्रमश: …
© दयाराम वर्मा, जयपुर(राज.) जनवरी 5, 2026
.jpeg)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें