कविता: अराजकता का व्याकरण



अचानक बधाई संदेशों की
बाढ़-सी आई है
शहर के तमाम अख़बारों में तुम्हारी ही ख़बर छाई है
सभा, सड़क और संसद तक तुम्हारा ही ज़िक्र है
विशेषकर लगता है, हुक्मरानों को
आज—
तुम्हारी सबसे ज़्यादा फ़िक्र है!


अरे हाँ
आज ही हुआ था तुम्हारा अवतरण
देश ने तुम्हें अपनाया था, सर-आँखों पर बैठाया था
किया था दिल-ओ-जान से तुम्हारा वरण!

तो मैं भी दे देना चाहता हूँ—
मेरे विधान, मेरे संविधान, तुम्हें बधाई
लेकिन मेरे रक्षक, मेरे संरक्षक, मेरे मात-पिता और भाई—
सावधान!
इस अप्रत्याशित हलचल में
पाखंड के दलदल में—
पहचानो
है कौन सखा, है कौन सौदाई[1]!

अचानक तुम्हारे सम्मुख
तुम्हारे शपथ-ग्रहिता हो रहे हैं नतमस्तक
आकाशवाणी सुनकर
पैदा हो गए हैं— फैसले करने वाले नव-प्रवर्तक
गाये जाने लगे हैं, तुम्हारे अनन्य स्तुतिगान
बनने, सजने, संवरने लगे हैं
तुम्हारे प्रतीक, चिन्ह और चित्र महान
सावधान!

इससे पहले कि
किसी पत्थर की मूर्ति को तराशकर
कर दी जाए—
उसमें तुम्हारी प्राण-प्रतिष्ठा
एक आराध्य या पैगंबर बनाकर
कर दिया जाए तुम्हें सदा-सदा के लिए
अंधेरी बंद कोठरी में कैद
इसलिए—
रहना मुस्तैद!

इससे पहले कि, बंद कर दी जाए
तुम्हारी चेतना, आत्मा और आवाज
एक स्वर्ण-मुखावरण में
और
दफ़न कर दिए जाएँ तुम्हारे विचार
प्रार्थना, नात[2] और पूजा-अर्चना के निनाद में
बढ़ रहे हैं वे—
बहुत सधे कदमों से, लक्ष्य की ओर
सोपान-दर-सोपान
सावधान!

इससे पहले कि
लटकाकर किसी सलीब पर
घोषित कर दिया जाए—तुम्हें आधुनिक मसीहा
टाँग दिए जाओ किसी सरकारी दीवार पर
द्विआयामी फ़ोटो-फ़्रेम में, और
सदियों से प्रतीक्षारत
अंतिम पायदान पर खङा व्यक्ति
हो जाए फिर से विलीन—‘अराजकता के व्याकरण’ में
सुनो संविधान, मेरा यह आह्वान

सावधान!


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 26 नवंबर, 2025


[1] सौदाई-पागल, दिवाना, सौदा करने वाला
[2] नात-पैगम्बर की स्तुति
 


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