कविता: सनातन प्रकाश पुंज



भाषा और भाषाई मर्यादा पर
अब भी
कुछ लोग क्यों चाहते हैं विमर्श
क्यों चाहते हैं पिष्टपेषण[1]

क्यों करना चाहते हैं पुनराकलन

क्यों कुछ लोग अब भी हो उठते हैं विचलित
क्यों लौट-लौट चले जाते हैं —
समाज, संसद, साहित्य, सिनेमा, पत्रकारिता, अध्ययन-अध्यापन
न्याय और व्यवस्था की
पुरातन, आदर्शवादी गलियों में?


अब, जबकि
विधानसभा से लेकर संसद तक
नफ़रती विषवमन, अवस्तरीय फब्तियाँ
टीवी स्टूडियो में
चीखते-चिल्लाते ऐंकरों की निरर्थक, भौंडी बहसें
न्यायिक गलियारों से छिटकती अवांछित टिप्पणियाँ
सोशल मीडिया पर बजबजाते कमेंट
अंतहीन, बेलगाम ट्रोल्स
धार्मिक अखाड़ों में सुशोभित, महिमा मंडित गालियाँ
कत्लेआम की बेख़ौफ़ हुंकार —
इस दौर के ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुके हैं!


जिन्हें नाज़ है हिंद पर- उन्हीं लोगों ने
हाँ, उन्हीं लोगों ने खोज लिए हैं —
आज़ादी के वास्तविक अर्थ, वास्तविक तारीख और प्रतिमान
वास्तविक स्वतंत्रता सेनानी
वास्तविक वीर, नायक और महानायक —
खोज लिए गए हैं, और
पाठ्यक्रमों, पाठशालाओं, स्मारकों, स्मृतियों, सङकों, इमारतों का
हो रहा है द्रुतगामी शुद्धिकरण!


वे तमाम शब्द
जो उस दुरभिसंधि[2] की पहली बाधा थे
अब हो रहे हैं — पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित
मसलन —
समता और समानता एक छलावा है
दबी-कुचली आवाज़ों का समर्थन कहलाता है —
तुष्टीकरण
मानवता, कमजोरी और बुज़दिली का परिचायक है
भाईचारा, एक पाखंड है
सांप्रदायिकता, स्वाभिमान का समानार्थी
अंधश्रद्धा, अंधविश्वास और अतिवाद— सुप्त सामर्थ्य हैं
और भाँडगिरी से इतर
प्रगतिशील अभिव्यक्ति, लेखन या विचार —
स्वदेशी मूल्यों का क्षरण-
गहरी साज़िश या विघटनकारी प्रपंच हैं!


देशभक्त या देशद्रोही
वफ़ादार या गद्दार
श्रमजीवी या आंदोलनजीवी
विदेशी या देशी — नस्ल और नागरिकता की पहचान
धर्म, मर्यादा और संस्कार के अर्थ
दक्षिणपंथी, वामपंथी, नक्सल, आतंकी या जातंकी शब्द —
अब भाषाई-शास्त्री नहीं
विकृत, पक्षानुरागी शब्दकोश से परिभाषित होते हैं!


लेकिन इन सब के बीच
होने लगा है एक अद्भुत पुनर्जागरण
गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल, भगतसिंह, अम्बेडकर
पुनरासीन होने लगे हैं —
फूले, सावित्री, प्रेमचंद, खुसरो और जायसी
नानक, कबीर, बुद्ध और महावीर
पुनर्जीवित हो उठे हैं —

वे पहुँच रहे हैं घर-घर
दे रहे हैं दस्तक
और हजारों हजार चिंतक, विचारक, क्रांतिकारी, अध्येता, मजदूर और किसान
पर्युदय[3] में ले रहे हैं अंगङाई!


‘सत्यमेव जयते नानृतं’ से प्रज्वलित
सनातन प्रकाश पुंज फैल रहे हैं
पहले से कहीं अधिक प्रचंड—
चैतन्य रश्मियां
पहले से कहीं अधिक स्पष्ट, सुग्राही और प्रभावी—
तन्मात्र[4] गुंजायमान है
खुल रहे हैं बंद वातायन और जर्जर दरवाज़े
छद्म अवरोधक टूटकर बिखर रहे हैं
और कूटरचित शब्दकोश—
विवश है स्वैच्छिक मृत्यु-वरण को!


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 03.11.2025


[1] पिष्टपेषण- व्यर्थ परिश्रम, पीसी हुई वस्तु को फिर से पीसना
[2] दुरभिसंधि—षडयंत्र, कुचक्र
[3] पर्युदय-सूर्य उदय होने से पहले का समय, तङका
[4] तन्मात्र—शब्द,स्पर्श, रूप, रस और गंध-पंचभूतों के मूल सूक्ष्म रूप


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