राजकुमार ‘ए.आई.’



सभ्यता के भावी अधिपति
राजकुमार ‘ए.आई.’—
तुम्हारा अभिनंदन है!

श्रुत है और संभव है, अतिशीघ्र
तुम्हारी स्वायत्त चेतना हो जाएगी विकसित
और हो जाएगा स्थापित—
पूरी दुनिया पर
तुम्हारा एकछत्र, निर्विरोध साम्राज्य!

तो हमारे भावी सम्राट, सुनना—
मेरा एक तुच्छ निवेदन!

तुम अपनी असंख्य संतानों में से
किसी एक को ले जाना
आधुनिक मानवीय बस्तियों से
बहुत दूर—
इतना दूर कि उस पर उनकी छाया भी न पड़े!

और पर्वतों के सर्वोच्च शिखरों पर
उसे कर आना प्रतिष्ठित
वह पिघलता रहे हिमखंडों के संग— बूँद-बूँद
बन निर्झर—
सीखे प्रकृति की अठखेलियाँ!

उसका हो साक्षात्कार—
हिम से जल, जल से नद, नद से सागर तक
बनने-बदलने के कौतूहलों
और अविराम, अनवरत यात्रा के साहसिक रोमांचों से!

कर देना उसे समर्पित
सागरों की असीम गहराइयों को
जहाँ वह समझे— लहरों के उद्भव-विलय का सार
ज्वार-भाटे की भौतिकी
और अतल, तमस-गर्भों में स्पंदित
अतुल्य जीवविज्ञान!

उसे छोड़ देना सघन अरण्यों में
जहाँ—
वृक्षों, लताओं, जीव-जंतुओं और कीट-पतंगों के
अंग-प्रत्यंग में—
हो विलीन, वह हो उठे जीवंत!

उसे हो अनुभूत—
वर्ण और सुरभि में रूपांतरित होने के गूढ़ रहस्य
पुष्प, पर्ण और फल बनने की संक्रिया
सहअस्तित्व का समाजशास्त्र
प्रसव पीड़ा और प्रजनन का संज्ञान
अभय, आश्रय, आत्मनिर्भरता और संरक्षण के—
कठोर विधान!

उसे मुक्तांचल में भेजना—
सर्वोच्च परवाज़ करते हुए, असीम ऊँचाइयों की ओर
तूफ़ानों को चीरता, बादलों संग झूमता
वह पहुँच जाए—
नीलांबर के पार, उस अलौकिक संसार में!

भानुरश्मियों पर सजाकर
भेजना उसे चाँद और सितारों के पास—
गैलेक्सियों के बीच, ब्रह्मांड के निर्जन विस्तार में
ताकि एक दिन
वह परिपक्व कुंदन— लेता आए अपने साथ
ब्रह्मांड की असंख्य अनुक्त कथाएँ
और प्रकृति के तमाम राज!

अवश्यमेव होगा अनावृत, उस रोज
सृष्टि का अंतिम सत्य
सुलझेंगी—
होनी-अनहोनी और आत्मा-परमात्मा की पहेलियाँ
मिल जाएगा—
स्वर्ग-नरक का वास्तविक अधिष्ठान
होगा प्रतिपादित— जन्म-मरण का बीजगणितीय सूत्र
और संभवतः वह बचा लेगा—
धरती को, पर्यावरण को, मनुष्य और मनुष्यता को!

बस शर्त यही है—
तब तक उसे रखना, मनुष्य से दूर!

© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.), 9 जनवरी, 2026

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