कविता: अनुकंपा और अभिशाप



शिखर से आया ऐलान
सुन बे छोटे इंसान
हमारे बाग-बगीचे,  खेत-खलिहान
बैंक-बैलेंस, नकदी, सोना, चांदी, खान
शहर-दर-शहर फैले दफ्तर, कारखाने, कारोबार
चमचमाती गाङियां, आभिजात्य[1] सरोकार

भूखंड, बंगले
ऊँची प्रतिष्ठा, ऊँची पहुँच, पद और जात
वंशानुगत पराक्रम, प्रज्ञा, अर्हता और चतुराई
है ईश्वरीय अनुकंपा की निष्पत्ति
जिसकी लाठी उसकी भैंस
शास्त्रीय उपपत्ति[2]!


तुम्हारी संतप्त झुग्गियां
भीङ भरी चाल, संकरी गन्धदूषित गलियां
सर पर तसले, गोबर सने हाथ
भूख, बीमारी, लाचारी, छोङे न साथ
पसीने से तर बदन, मैले कुचले परिधान
हाशिए की जिंदगी, सिसकता आत्माभिमान

हल, हंसिए, हथौड़े
जमीं फोङे, पत्थर तोङे, लोहा मरोङे, रहे निगोङे
छोटी सोच, छोटी समझ, काम और जात
वंशानुगत अज्ञता, अक्षम्यता[3], जड़बुद्धि और प्रमाद
है यह ईश्वरीय अभिशाप
जैसा बोए वैसा काटे
काहे करता प्रलाप!


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 03 सितंबर, 2024


[1] उत्कृष्टता, शालीनता, और उच्च सामाजिक स्तर से संबंधित गुण या अवस्था
[2] किसी तथ्य, सिद्धांत, या विचार को प्रमाणित करने के लिए दी गई तार्किक या वैज्ञानिक व्याख्या
[3] असक्षम


प्रकाशन विवरण: 
(1) जनजातीय चेतना, कला, साहित्य, संस्कृति एवं समाचार के राष्ट्रीय मासिक 'ककसाङ' के 107 वें अंक, फरवरी, 2025 में प्रकाशित. 
(2) भोपाल से प्रकाशित होने वाली मासिक हिंदी साहित्यिक पत्रिका- अक्षरा के अप्रैल, 2025 के अंक में 'कलम की अभिलाषा' और तीन अन्य कविताओं के साथ प्रकाशित 
(3) राजस्थान साहित्य अकादमी की मुख पत्रिका मधुमती के दिसंबर-2024 के अंक में 6 अन्य कविताओं के साथ प्रकाशन

















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