व्यंग्य: हिंदुस्तानी गधे का पासपोर्ट

हाल ही में सऊदी अरब के ऊँटों को पासपोर्ट जारी किया गया। यह खबर हिंदुस्तान के पशु-जगत में भी तेज़ी से वायरल होने लगी और जैसलमेर, बीकानेर, जयपुर से होते हुए दिल्ली, लखनऊ और झूमरी तलैया तक जा पहुँची। यद्यपि खबर ऊँटों की थी, विदेशी धरती की थी, लेकिन यहाँ के घोड़े, गधे, कुत्ते और साँड़ आदि सभी चौपायों में यह मुद्दा कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया।
जब मैंने यह खबर सुनी तो मेरे कान
भी नब्बे डिग्री के कोण पर खड़े हो गए। बचपन से ही मेरी तमन्ना थी कि कभी
विदेश-भ्रमण का मौका मिले। लेकिन मेरे जैसे गधों को पासपोर्ट कौन देगा—यह सोचकर मन
मसोसकर रह जाता था। यद्यपि हिंदुस्तान से हर साल अवैध रूप से हजारों लोग 'डंकी-रूट' से अमेरिका और यूरोप के देशों
में जाते रहते हैं; लेकिन मैं ठहरा खानदानी, नेकदिल, ईमानदार और देशभक्त गधा, भला अवैध तरीके कैसे अपना सकता हूँ। लिहाज़ा, ऊँटों
के पासपोर्ट की खबर मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थी।
विस्तृत जानकारी के लिए जब मैं
अल-जज़ीरा और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे विदेशी अख़बार टटोल रहा था तो एक और चौंकाने
वाली खबर सामने आ गई। खबर यह थी कि चीन और पाकिस्तान के बीच गधों के आयात-निर्यात
को लेकर एक समझौता हुआ है, जिसके मुताबिक चीन प्रतिवर्ष पाकिस्तान से
तीन लाख गधे खरीदेगा। जैसे ही यह समझौता हुआ, पाकिस्तान में
तीस हज़ार वाला गधा डेढ़ से दो लाख तक में बिकने लगा। वाह क्या बात है, एक ओर मालिकों की चाँदी, दूसरी ओर गधों को चीन की
सैर करने का मौका!
खबर वाकई दिलचस्प थी। लेकिन जब
मैंने इसकी गहराई से पड़ताल की तो दिल बैठ गया। मालूम पड़ा कि गधों की खाल से अपनी
पारंपरिक दवा 'एजियाओ' बनाने के लिए
चीन उन्हें खरीद रहा है। धत्त तेरे की! स्पष्ट था—पाकिस्तानी गधों का स्वागत चिनकू
लोग सीधे अपने बूचड़खानों में कर रहे हैं। मैंने तुरंत प्रभाव से चीन-भ्रमण के
अपने बाल्यकाल के स्वप्न को दिल-ओ-दिमाग़ से खुरचकर निकाल फेंका। जान है तो जहान
है।
यद्यपि आबादी के लिहाज़ से
हिंदुस्तान में पाकिस्तान से कई गुना ज़्यादा गधे हैं, फिर भी गनीमत है कि हमारी सरकार ने गधों के निर्यात का कोई
व्यापारिक समझौता चीन के साथ नहीं किया। इसके अलावा, नारे
लगाने, डीजे के सामने कूल्हे मटकाने, हुड़दंग
और तमाशों से लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग जैसी तमाम तरह की व्यवस्थाएं और अंशकालीन
एवं पूर्णकालीन रोजगार, निठल्ले लेकिन देशभक्त गधों के लिए पैदा
किए हैं।
यदि अरब देश ऊँटों को पासपोर्ट दे
सकते हैं तो हिंदुस्तान अपने काबिल और मेहनती गधों को क्यों नहीं दे सकता—यह सवाल
मेरे मन को बार-बार कचोट रहा था। यकीन मानिए, बाहर
जाकर वे विदेशी मुद्रा देश में भेजेंगे, जिसकी देश के विकास
के लिए सख्त ज़रूरत है। वैसे भी देशभक्ति, स्वामी-भक्ति,
मेहनत और बाअदबी का जो जज़्बा हिंदुस्तानी गधों में होता है,
शायद ही किसी और प्रजाति में हो। विश्वास न हो तो आप किसी भी देश
में उन्हें भेजकर आज़मा लीजिए; देश का डंका न बजवा दिया तो
कहना। आपकी जानकारी के लिए बताता चलूँ, ‘डंकी’ अर्थात गधे जब
विदेशी मंचों पर अपनी काबिलियत के झंडे गाड़ते हैं; उसे ही
तो डंका बजना कहते हैं।
रहा सवाल मेरा, मैं अपनी काबिलियत का अपने मुँह से क्या बखान करूँ। आप इस बात
से अंदाज़ा लगा लीजिए कि मेरे खानदान में एक से बढ़कर एक देशभक्त, मेहनती और कर्तव्यपरायण गधों ने जन्म लिया है। मेरे परदादा की संघर्षपूर्ण
जीवनी से प्रेरित होकर कथाकार कृश्नचंदर ने 'एक गधे की
आत्मकथा' लिखी और साहित्य-जगत में छा गए। सन् 1962 में मेरे दादा मरहूम 'सुल्तान' बाराबंकी की तस्वीर 'द टाइम्स ऑफ़ लंदन' में छपी, जिसने स्वर्गीय रघु राय की फ़ोटोग्राफी के
करियर की नींव रखी और कालांतर में वे एक महान फ़ोटोग्राफर बन गए। मेरे मरहूम पिता 'शहंशाह' ने खाजूवाला बॉर्डर पर तस्करों के एक बड़े
नेटवर्क का पर्दाफाश किया और बी.एस.एफ. के जाने कितने अधिकारियों को सम्मान और
पदोन्नति दिलवाई। ऐसे सैकड़ों किस्से हैं मेरे खानदान के।
खैर! दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत
के बाद मैं और मेरी मंगेतर 'धन्नो' रात्रि में भट्टा बस्ती में एक घूरे पर लेटकर आराम फरमाने लगे। चीन-भ्रमण
की योजना रद्द होने से धन्नो बेहद ख़फ़ा थी। किसी तरह अपने होने वाले बच्चों की
कसम खाकर मैंने उसे विश्वास दिलाया कि पासपोर्ट जारी होते ही उसे स्विट्ज़रलैंड,
बैंकॉक या पटाया जैसी किसी खूबसूरत जगह हनीमून पर ले जाऊँगा। जब
उसका मिज़ाज थोड़ा सुधरा तो तारों भरे नीले आसमान के नीचे धीरे-धीरे हमारा इश्क़
परवान चढ़ने लगा।
ठीक उसी वक़्त सूअरों का एक
परिवार मुँह मारता हुआ वहाँ आ पहुँचा। सूअर, सूअरानी
और उनके एक दर्जन बच्चों की घुर्र-घुर्र ने हमारे रंग में भंग डाल दिया। सभी को
नहाए-धोए, क्रीम-पाउडर लगाए देख हम चौंक उठे। सूअर के बच्चे
तो इतने गोरे-चिट्टे, प्यारे और मुलायम थे कि धन्नो उन्हें
अपनी गोद में उठाकर प्यार करने के लिए मचलने लगी।
"वाह शूकरमल जी, बड़े
सज-धज रहे हो! किसी की शादी में गए थे क्या?" जिज्ञासा
वश मैंने पूछ लिया।
शूकरमल ने अपनी मिचमिची आँखें
झपकाईं और अकड़ते हुए बोले—"तुम्हें मालूम नहीं क्या?" इस अप्रत्याशित उत्तर से मेरी हैरानी और बढ़ गई।
"नहीं जनाब, आप ही बताइए।"
शूकरमल ने थूथनी से बाएँ-दाएँ
दो-तीन बार सूँघा, घूरे के बिखरे कचरे पर एक हिकारत-भरी नज़र
डाली और गंभीर स्वर में बोले—
"देखिए मिस्टर, आगे
से हमें 'सूअर' और 'भाईजान' वगैरह कहना बंद कीजिए। हिंदुओं की ओर से हमारी
थोक में माँग आ रही है। वे हमें श्वानों की भाँति पालने लगे हैं। मालपुए खिलाए जा
रहे हैं, साफ़-सुथरे बिस्तरों पर सुलाया जा रहा है।"
सूअरमल की बातें सुनकर अनायास ही
मेरी हँसी छूट गई। हो न हो, इसका दिमाग़ सटक गया है। नालियों में मुँह
मारने वाले, सिर से पाँव तक गंदगी में पलने वाले सूअर को
हिंदू अपने घरों में पाल रहे हैं? असंभव!
"लेकिन यह चमत्कार कैसे हो गया, शूकरमल जी?"
"दरअसल, इस
मोहल्ले में हिंदुओं का धार्मिक पुनर्जागरण चल रहा है। उनके एक पहुँचे हुए बाबा को
आकाशवाणी हुई है कि वराह-देव यानी हम शूकर-जात को यदि घरों में पाला जाए, सेवा-शुश्रूषा की जाए और प्यार से मॉर्निंग-इवनिंग वॉक करवाई जाए, तो आसपास के म्लेच्छ भाग खड़े होंगे। बस, तभी से
हमारे पौ-बारह हैं।"
शूकरमल ने हम दोनों के हैरान
चेहरों पर एक रहस्यमयी मुस्कान डाली और मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना शान से
अपने कुनबे के साथ घुर्र-घुर्र करते हुए दूसरी दिशा में निकल गए।
धन्नो और मेरी प्यार-भरी बातों
में खलल पड़ चुका था। शूकरमल की बातों से मेरी चिंता और अधिक बढ़ गई। देश में
धार्मिक नफ़रत अब इस खतरनाक मोड़ पर आ पहुँची है—यह सचमुच भयावह है।
दूसरी ओर सूअरों से ईर्ष्या भी हो
रही थी। सूअर कहीं के… कितने भाग्यशाली हैं! काश हमारा भी किसी देव-कुल से कोई
नाता होता—भले ही बोझा ढोने वाले के रूप में! तो आज हम भी थोड़ा खुश हो लेते। हमसे
तो इस मामले में चूहा, साँप, उल्लू, शेर, गाय आदि सभी भाग्यशाली हैं। सांकेतिक ही सही,
इंसानों के देवताओं के साथ उनकी फोटो तो छपती है।
सोचते-विचारते मुझे इल्म हुआ कि
गधे सदैव सेक्युलर रहे हैं। और इस दौर में सेक्युलर होना ही अपने आप में एक अपराध
है। ऐसे में कोई हमें अपने किसी आराध्य से जोड़ेगा—असंभव!
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी।
आसमान में सप्त-ऋषि तारा मंडल पश्चिम की ओर झुकने लगा था। मुझे बेचैन देख धन्नो ने
अपने नरम ओठों से मेरे गाल और गर्दन को सहलाया और मादक स्वर में
फुसफुसाई—"किस चिंता में डूबे हो जानू, रात
बहुत अधिक बीत चुकी है। सवेरे जल्द ही मालिक भट्टे पर ईंट ढोने लगा देगा। प्लीज़,
अब सो जाओ।"
एक तो पासपोर्ट की चिंता, दूसरे धन्नो का प्यार भरा स्पर्श और मिश्री से मीठे बोल! नींद
आए भी तो कैसे? मैंने उसका दिल रखने के लिए आँखें मूँद लीं।
लेकिन मन में भाँति-भाँति के विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। आसमान में एक उल्का-पिंड
टूटा और तेज़ी से रोशनी बिखेरता हुआ कहीं विलीन हो गया; इसी
के साथ मेरे मन में भी उल्का-पिंड सा एक धांसू आइडिया चमका—यदि म्लेच्छों को दूर
रखने में सूअर इतने ही प्रभावी हैं, तो क्यों न इन्हें
बांग्लादेश और पाकिस्तान की सरहदों और कश्मीर के कुपवाड़ा, पुंछ,
राजौरी जैसे सीमावर्ती इलाकों में तैनात कर दिया जाए— शूकर सुरक्षा
बल!
सूअरों के सुरक्षा चक्र को बेधकर
म्लेच्छ आतंकी और बांग्लादेशी घुसपैठियों की क्या मजाल जो भारत के अंदर झांक भी
सके। इनकी विशाल सैन्य वाहिनी की छाया देखकर ही वे भाग खड़े होंगे। इस प्रकार न
केवल हमारी सीमाएँ सुरक्षित हो जाएँगी, बल्कि
अर्द्धसैनिक बलों और फ़ौज पर खर्च होने वाला अरबों रुपये का राजस्व भी बच जाएगा।
इस कमाल के आइडिया के साथ मैंने पूरी रात करवट बदल-बदलकर बिताई। अब इसे लिखित में
सरकार को भिजवा रहा हूँ, उम्मीद है इस पर गंभीरता पूर्वक
विचार किया जाएगा। मेरी केवल एक ही इल्तिजा है कि यदि सरकार को यह सुझाव पसंद आ जाए
तो इनाम के तौर पर हमारे पासपोर्ट जारी कर दिया जाएं।
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 30 अप्रैल, 2026
गज़ब का व्यंग है सर।
जवाब देंहटाएंजी धन्यवाद
हटाएंBahut hi sundar aur vyangatamk. Great 💯
जवाब देंहटाएंजी धन्यवाद
हटाएंक्या कमाल की कल्पना की है, आदरणीय दयाराम वर्मा जी ने! उनकी कल्पनाशीलता को नमन। इस व्यंग्य लेख को पढ़ कर मुझे जॉर्ज ऑरवेल की कालजयी कृति एनिमल फ़ार्म की याद आ गई जहाँ सुअर जानवरों में मनुष्य के विरुद्ध बगावत का सुर बुलंद करते हैं और क्रांति के थिंक टैंक बन पूरे जानवर समाज का नेतृत्व या यूँ कहा जाए शोषण करते हैं । यही विडम्बनात्मकता वर्मा जी की रचना की सबसे बड़ी खूबी बन उभरती है । उन्हें अनेकोंनेक साधुवाद ।
जवाब देंहटाएंजी धन्यवाद
हटाएं