कविता: सर्वद्रष्टा इतिहास

 




मिटाने चले हो तुम इतिहास
स्वयं से, स्वयं का
यह कैसा उपहास!

जानते हो
इति+ह+आस
ऐसा ही-निश्चित रूप से था!

........................................

....................................

नहीं, केवल सत्य
कटु-सत्य का सपाट दर्पण
है इतिहास!
अतीत का निरपेक्ष, निर्लिप्त[4] तर्पण
है इतिहास!

@ दयाराम वर्मा जयपुर 06.01.2024


[1] भस्मीभूत: जलकर पूरी तरह से नष्ट होना
[2] आवेष्टित: छिपा हुआ
[3] प्रहसन: नाटक, परिहास
[4] निर्लिप्त: लगाव न रखने वाला

प्रकाशन विवरण:

1. राजस्थान साहित्य अकादमी की मुख पत्रिका मधुमती के दिसंबर-2024 के अंक में 6 अन्य कविताओं के साथ प्रकाशन

2. चिंग-तम अमत्तनि (कविता संग्रह) अगस्त 2026





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