कविता: मैदान-ए-जंग



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एक्स, फ़ेसबुक
आभासी, अथाह-अंतहीन ब्रह्माण्ड में
चल रही है
हर रोज चौबीसों घंटे, एक जंग!

दशों दिशाओं से बरसते हैं अविरत[1]
तल्ख़ शाब्दिक बाण
और दनादन दागे जाते हैं
मुत्तहम-परस्ती के आग्नेय प्रक्षेपास्त्र!

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[1] अविरत: लगातार
[2] कदीमी: पुरातन
[3] प्रसाधित: सुसज्जित
[4] चरित्र-हंता: किसी के चरित्र का अंत करने वाली
[5] अभिज्वाल्य: प्रज्वलित करने योग्य" या जलाया जा सकने वाला
[6] गल्प: मिथ्या प्रलाप
[7] संत्रास: भय, डर, त्रास

@ दयाराम वर्मा जयपुर 17.01.2024


प्रकाशन 1. चिंग तम अमत्तनि (कविता संग्रह) अगस्त 2026

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