कविता: मैदान-ए-जंग



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आभासी, अथाह-अंतहीन ब्रह्माण्ड में
चल रही है
हर रोज चौबीसों घंटे, एक जंग!

दशों दिशाओं से बरसते हैं अविरत[1]
तल्ख़ शाब्दिक बाण
और दनादन दागे जाते हैं
आरोप-प्रत्यारोप के आग्नेय प्रक्षेपास्त्र!

गरजते हैं मिथकीय जुम्ला-बम
उङ जाते हैं कर्णभेदी धमाकों के साथ परख़चे
बंधुता, विश्वास और सदाचार के
ढह जाते हैं क़दीमी[2] किले
ज्ञान, विज्ञान, सभ्यता और सुविचार के!

की-पैड पर
चलती हैं तङातङ
द्वेष-विद्वेष से प्रसाधित[3] गोलियां
बिछती हैं प्रतिपल, चरित्र-हंता[4] बारूदी सुरंगें
फैल जाती हैं चारों तरफ
अभिज्वाल्य[5], कुंठित गल्प[6] टोलियां!

प्रतिद्वंदियों पर
टूट पङती हैं ट्रोल आर्मी
विशाक्त मधुमक्खियों की भांति
और निर्रथक बहसों के, घने कुहासे में
खो जाती है ठिठुरती मनुष्यता!

इस जंग के कोई नियम नहीं है
कोई सीमा नहीं है
अशिष्ट, अमर्यादित, भाषा-आचरण-व्यवहार
छल-कपट, झूठ-फ़रेब, संत्रास[7]
इस जंग में सब कुछ युक्तिसंगत है
उन्मुक्त हैं, आजाद हैं!


[1] अविरत: लगातार
[2] कदीमी: पुरातन
[3] प्रसाधित: सुसज्जित
[4] चरित्र-हंता: किसी के चरित्र का अंत करने वाली
[5] अभिज्वाल्य: प्रज्वलित करने योग्य" या जलाया जा सकने वाला
[6] गल्प: मिथ्या प्रलाप
[7] संत्रास: भय, डर, त्रास

@ दयाराम वर्मा जयपुर 17.01.2024

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