कविता: भैंसों का बंटवारा





ऐ भूरी ऐ काली जरा सुनो!
जोहङ के उस पार
रामलाल ने लगाई गुहार
निकल आओ पानी से बहुत हुई मस्ती
ढल गई साँझ चलो अब बस्ती!

भूरी ने कान फङफङाए
काली ने भी नथुने फुलाए
चच्चा अभी-अभी तो हम आए हैं
दिन भर की धूप गर्मी के सताए हैं
थोङी देर और नहाएंगे
हो जाए तनिक बदन ठंडा
फिर घर लौट जाएंगे!

सुनो पते की बात बतलाता हूँ
सच में खबर है गम्भीर
समझाता हूँ
तुम्हारी किस्मत फूटने वाली है
निकलो बाहर जोहङ से
वरना जोङी शीघ्र टूटने वाली है!

भूरी ने कजरारी आँखें खोली
बिना हिले बिना डुले काली बोली
क्यों डराते हो चच्चा
क्या समझते हो हमें बच्चा!

चच्चा ने बदला पैंतरा
उछाल दूर एक कंकर पानी में
डाला भय रोमांच कहानी में!
बंटवारा करेंगे तुम्हारा
नए निजाम ने ये है विचारा
कल्लू मियाँ एक हाँक ले जाएगा
पहले दुहेगा दूध
बूचङखाने फिर बेच खाएगा!

अन्यमनस्क भाव से
भूरी ने झटका सर कान हिलाया
काली ने बदली करवट
शीतल जल में
गोता गहरा मस्त लगाया!

चच्चा हम सब जानते हैं
तुम्हारे झूठ को खूब पहचानते हैं
अनाज नहीं तो क्या
पाँच किलो चारा हम भी खाते हैं
जब तक है हमारे थनों में दूध
हमदर्दी तब तक पाते हैं !

जिस रोज दूध हमारा सूख जाएगा
कसाई को तू तुरंत बुलवाएगा
खूँटा गङेगा तुम्हारे घर
या कल्लू मियाँ के यहाँ गङेगा
घंटा हमें फर्क पङेगा!

@ दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 04.05.2024


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