कविता: उठो, और भरो हुंकार

हद है
तुम्हें अब भी यकीन है
यकीन है कि पत्थर पिघलेंगे
बादल फट जाएंगे
तुम्हारी कातर पुकार से
पसीज उठेगा व्याघ्र का कलेजा
सर्प छोङ देंगे डसना
शर्मिंदा होकर पीछे हट जाएंगे भेड़िए!
हद है
खुली आँखों से भी तुम देख नहीं सकते
आसमान में मंडराते बाज, चील, कौवे और गिद्ध
पेङों की शाखाओं पर हूऽ... हूऽ... करते
असंख्य उल्लू
और घात लगाए, छुपकर बैठे सियार!
उठो
अब भी समय है, उठो
इससे पहले कि सूर्यास्त हो जाए
आख़िरी दीपक की लौ कहीं खो जाए, उठो
और इस कदर उठो कि
तुम्हारे साथ उठ खड़े हों वे सब—
जो सोए हैं सदियों से गहरी नींद में!
उठो
और भरो हुंकार—
ऐसी हुंकार कि थर्रा उठें चारों दिशाएँ
जलाओ एक साथ, सैकड़ों-हजारों मशालें
लंबी, अंतहीन रात से पहले
शिकारी की आख़िरी चाल, शह और मात से पहले
इससे पहले कि देर हो जाए—उठो
वर्तमान के लिए उठो
भविष्य के लिए उठो
उठो!
उठो
और अनुनय-विनय में जुङी हथेलियों को
बना लो कसकर वज्रमुष्टि[1]
उठो
और प्रजातंत्र की सड़कों पर रच डालो नया इतिहास—
हुक्मरानों की ही भाषा में, शैली में, लिपि में
और शब्दावली में
उनके ही आइन[2] के दायरों में!
गांधी के हत्यारों से
तुम केवल गांधीगिरी से जीत नहीं सकते!
[1] वज्रमुष्टि — अत्यंत दृढ़ और शक्तिशाली मुट्ठी
[2] आइन- संविधान
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 16 जुलाई 2026
Publication -Satya Kee Mashal Bhopal-August-2026

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