कविता: धत तेरे की


(Part of the poem)

डरे-सहमे चूहे
अपने-अपने बिलों में दुबके
सिर्फ़ चूहा-गोष्ठियाँ किया करते थे!


शेरों ने छोङ दिया था दहाड़ना
हाथी भूल चूके थे चिंघाङना
भयाकुल कौओं ने मूंद लीं थीं आँखें
और घोड़ों ने सीख लिया था— चुपचाप बोझा ढोना!


कुत्तों ने भी त्याग दिया था अपना चौकसी-धर्म
भौंकने की जगह
अब वे केवल दुम हिलाते थे!

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© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21 जुलाई 2026

Publication: 

1. सत्य की मशाल मासिक पत्रिका भोपाल August -2026
2. काव्य संग्रह 'चिंग-तम अमत्तनि' नोशन प्रेस प्लेटफार्म -2026





1 टिप्पणी:

  1. वाह सर वाह। क्या बात है। चूहे शेर कुत्ते हाथी सभी को या तो सरकार ने खरीद लिया या बांध दिया। काक्रोच न तो खरीदे जा सकते न बांधे जा सकते। बस कांग्रेस नेहरू इमरजेंसी पाकिस्तान हिंदू मुस्लिम करते रहो। शासन करते रहो।

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