कविता: धत तेरे की



डरे-सहमे चूहे
अपने-अपने बिलों में दुबके
सिर्फ़ चूहा-गोष्ठियाँ किया करते थे!


शेरों ने छोङ दिया था दहाड़ना
हाथी भूल चूके थे चिंघाङना
भयाकुल कौओं ने मूंद लीं थीं आँखें
और घोड़ों ने सीख लिया था— चुपचाप बोझा ढोना!


कुत्तों ने भी त्याग दिया था अपना चौकसी-धर्म
भौंकने की जगह
अब वे केवल दुम हिलाते थे!


एक आकृति कर रही थी भयभीत— सभी को
उत्तरोत्तर विराट होती हुई
सब कुछ अपने आगोश में लेती हुई आकृति
उसने ढाँप लिया था—
ज़मीन, आसमान और समुद्र को
एक अनजानी-सी आशंका, एक अजीब-सा भय
जंगल में पसरा पङा था!


और तभी—
एक रोज इस घनीभूत तमस में
रेंगते हुए निकल पङे हजारों-लाखों कॉकरोच
चट्टानों से, दरारों से, सीलन भरे कोनों से, स्याह गुफाओं से
अँधेरे की समूची वंशावली से!


वे निकले बेखौफ़
वे निकले बेधङक
और देखते ही देखते फैल गए चारों तरफ!


और तब, उन्होंने देखा-
जंगल में, आसमान में, समुद्र में—कहीं कोई आकृति नहीं थी
केवल एक छाया थी
एक कुहासा था
फकत एक गलतफहमी थी
धत तेरे की!


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 21 जुलाई 2026

Publication -Satya Kee Mashal Bhopal-August-2026





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