संस्मरण: फिर तीन घंटे
प्राइवेट रूम खाली न होने के कारण मुझे वार्ड में भर्ती
होने की सलाह दी गई। भर्ती स्टाफ़ ने आश्वासन दिया कि जैसे ही प्राइवेट रूम खाली
होगा, मुझे वहाँ स्थानांतरित कर देंगे। अस्पताल
के नियमों के अनुसार प्राइवेट रूम में अधिकांश शुल्क डेढ़ गुना और डीलक्स रूम में
दोगुने तक हो जाते हैं। लेकिन पहली रात वार्ड में बिताने के बाद लगा कि दो-तीन दिन
के लिए यह जगह बुरी नहीं है। नाहक डेढ़ गुना खर्च क्यों बढ़ाया जाए!
जयपुर का यह एक पुराना और मशहूर
अस्पताल था। इसके सामान्य शल्य-चिकित्सा वार्ड में इस समय लगभग बारह मरीज़ भर्ती
थे। सामने वाले बेड पर एक अधेड़ व्यक्ति का इलाज चल रहा था। कुछ दिन पहले जब वह
अपनी पत्नी के साथ मोटरसाइकिल से अजमेर रोड पर कहीं जा रहे थे तो एक अज्ञात वाहन ने
उन्हें टक्कर मार दी थी। दोनों को गंभीर चोटें आईं। उसके दोनों पैर गाड़ी के
पहियों के नीचे कुचल गए थे। पैरों की हड्डियाँ टूट गईं थीं और आँतें भी गंभीर रूप
से क्षतिग्रस्त हो गई थीं। उसकी पत्नी को अपेक्षाकृत कम चोटें आई थीं, इसलिए उसे अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी थी।
दिनभर उसके पास आने-जाने वालों की
भीड़ रहती। माँ-बाप, बहन, बेटा, दोस्त आदि सेवा में जुटे रहते। रोज़ एक चल एक्स-रे मशीन से उसकी जाँच
होती। कभी-कभी खून भी चढ़ाया जाता। चूँकि वार्ड में मरीज़ के साथ एक ही व्यक्ति को
रहने की अनुमति थी, इसलिए प्रायः नर्सिंग स्टाफ़ और गार्ड से
परिजनों की कभी विनती तो कभी बहस होती रहती।
पहले दिन मेरे पास समय ही समय था।
इसी का फायदा उठाते हुए मैंने अर्नेस्ट हेमिंग्वे की पुस्तक ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’
आद्योपांत पढ़ डाली। कुल बहत्तर पृष्ठों का यह छोटा और अद्भुत उपन्यास एक लंबी
कहानी जैसा है।
वार्ड के मध्य में एक गोल मेज के
पीछे तीन-चार नर्सें और वार्ड इंचार्ज बैठती थीं। उनके सामने मरीज़ों की केस-शीट, टी.पी.आर. चार्ट और अन्य जानकारी वाली फाइलों के ढेर लगे थे।
दिन में स्थानीय नर्सिंग कॉलेज की छात्राएँ भी ड्यूटी पर आती थीं। ऑपरेशन से पहले
मरीज़ के सारे कपड़े उतरवाकर अस्पताल का सफ़ेद गाउन पहना दिया जाता, आईवी कैन्युला लगा दिया जाता और एक हाथ में मरीज़ का नाम, मोबाइल नंबर तथा संबंधित डॉक्टर का नाम लिखा हुआ रिस्ट बैंड बाँध दिया
जाता।
ऑपरेशन के बाद अर्धचेतन अवस्था
में पड़े, ऑक्सीजन मास्क लगाए मरीजों को स्ट्रेचर पर
सीधे वार्ड में लाया जाता। उनके एक ओर ड्रिप की बोतल तो दूसरी ओर प्रायः कैथेटर से
जुड़ी पेशाब की थैली लटकी रहती। तीन-चार लोग मिलकर मरीज़ को सावधानी से चादर सहित
उठाकर बेड पर शिफ़्ट कर देते। मेरे साथ भी यही सब होने वाला था। कुछ पलों के लिए
मैं उस स्थिति की कल्पना करता, लेकिन क्योंकि यह ऑपरेशन का मेरा
दूसरा अनुभव था इस कारण किसी प्रकार की घबराहट नहीं थी।
ऑपरेशन के दिन मरीज़ को ओ.टी. (ऑपरेशन
थिएटर) में ले जाने से ठीक पहले एक अस्थायी वार्ड में लाया जाता है। यहाँ किसी
भी परिजन को आने की अनुमति नहीं होती। इस वार्ड में मास्क पहने दर्जन भर डॉक्टर, मेडिकल इंटर्न, नर्सें और अन्य कर्मचारी
होते हैं, उनकी आवाज़ें होती हैं, वार्ड
की सफ़ेद छत और सफ़ेद दीवारें होती हैं।
यहाँ आने के पश्चात राजा-रंक, अमीर-गरीब, काला-गोरा, छूत-अछूत, स्त्री-पुरुष… सभी तरह के भेद समाप्त हो
जाते हैं। सफ़ेद गाउन में लिपटा हर मरीज़ यहाँ केवल एक ‘ऑब्जेक्ट’
रह जाता है। अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए कभी-कभार कुछ मरीज़ चीर-फाड़
के आसन्न भय से घबराकर चीखने-चिल्लाने लगते हैं या कातर स्वर में अपने परिजनों और
डॉक्टर को अपने पास आने के लिए गुहार करने लगते हैं।
लगभग आधा घंटा इसी वार्ड में रखने
के बाद मुझे ऑपरेशन थिएटर में स्थानांतरित कर दिया गया। ऑपरेशन टेबल पर जल्द ही
मुझे पूरी तरह बेहोश कर दिया गया। लगभग चार घंटे बाद जब मैं होश में आया तो मेरे
चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगा था और मैं तकलीफ़ के साथ साँस लेने की चेष्टा कर रहा
था। कोई बार-बार मुझसे पूछ रहा था—“अब आप कैसा फील कर रहे हैं?”… “कैसा फील कर रहे हैं आप?”
मैं आँखें खोलने की स्थिति में
नहीं था। फिर भी पूरी कोशिश करके फुसफुसाते हुए बस इतना कह पाया—"बैटर…”
बस इतना सुनते ही उन्होंने
स्ट्रेचर सहित मुझे बाहर इंतज़ार कर रहे परिजनों और वार्ड के अटेंडेंट के हवाले कर
दिया। उस रोज़ मेरे कुछ परिचित देर शाम तक वार्ड में साथ रहे। धीरे-धीरे मैं
सामान्य अवस्था में लौटने लगा, लेकिन
हिलना-डुलना बिल्कुल मना था और चाहकर भी मैं ऐसा नहीं कर सकता था।
यद्यपि भर्ती के समय डॉक्टर साहब
ने आश्वासन दिया था कि ऑपरेशन के अगले दिन छुट्टी दे देंगे, लेकिन अगले दिन जब वे राउंड पर आए तो मेरा हाल देखकर बोले,
“एक दिन और रुक जाइए, ताकि एंटीबायोटिक और
बाकी दवाएँ ठीक से शरीर में पहुँच जाएं।”
“जी, उचित है।” मैं
स्वयं भी बिस्तर छोड़ने की स्थिति में नहीं था। अच्छा हुआ जो डॉक्टर साहब ने रुकने
के लिए बोल दिया।
अगला दिन रविवार था। सुबह से ही
डॉक्टर साहब का इंतज़ार होने लगा। ऑपरेशन के लगभग अड़तालीस घंटे बाद आज पहली बार
मैं दो व्यक्तियों के सहारे बिस्तर से उतरकर बाथरूम तक गया। उठने-बैठने में दाहिनी
ओर ऑपरेशन की जगह से पीठ तक ऐसा तेज़ दर्द उठा कि एक बार तो आँखें बंद हो गईं।
दर्द को सामान्य होने में आधा घंटा लग गया। शरीर का संदेश साफ़ था: बिस्तर से हिलो, पर अत्यधिक सावधानी से; पेट के निचले
हिस्से पर कोई तनाव, ज़ोर या झटका नहीं पड़ना चाहिए।
बारह बजे डॉक्टर साहब राउंड पर
आए। जाँचा-परखा और बोले, “सब ठीक है, मांसपेशियों
में तनाव की वजह से दर्द हो जाता है।” उन्होंने कुछ हिदायतों के साथ मेरे
डिस्चार्ज की पर्ची ड्यूटी पर तैनात नर्सिंग स्टाफ़ को थमा दी। बस, अब टी.पी.ए. ऑफिस से बिल क्लियर करवाना था और छुट्टी।
मेरे स्वास्थ्य बीमा की पॉलिसी के
तहत इस अस्पताल में मुझे ‘कैशलेस’ इलाज की सुविधा थी, इसलिए भर्ती के वक़्त हमसे नाममात्र का शुल्क, लगभग तीन हजार रुपये जमा करवाया गया। लेकिन अब जब मेरे सामने एक लाख
तिहत्तर हज़ार रुपये का बिल रखा गया तो मैं हतप्रभ रह गया। डॉक्टर साहब ने सामान्य
वार्ड का खर्च एक लाख तीस हज़ार और प्राइवेट रूम का अनुमानित खर्च लगभग एक लाख
अस्सी हज़ार रुपये बताया था। और मैं तो सामान्य वार्ड में ही था।
दोपहर एक बजे मेरे मोबाइल पर बीमा
कंपनी का एस.एम.एस. आया—“अस्पताल से आपका बीमा दावा प्राप्त हुआ है। आपको तीन घंटे
में अपडेट किया जाएगा।”
तीन घंटे?
घर लौटने की आस लगाए मरीज़ के लिए
इतना लंबा इंतज़ार कुछ असामान्य और असहज करने वाला था। उधर दरियादिली दिखाते हुए
ड्यूटी नर्सिंग स्टाफ़ ने मुझे अस्पताल का सफ़ेद गाउन उतारकर अपने कपड़े पहनने की
इजाज़त दे दी। अपने कपड़े पहनते ही बीमार आदमी पचास प्रतिशत यूँ ही स्वस्थ दिखने
लगता है। दोपहर के भोजन में आज दाल-चावल और सलाद वाला ठोस खाना भी मिला। दो दिन की
लगातार तरल खुराक के बाद यह किसी दावत से कम न था।
बगल के बेड पर हड्डियों का ढाँचा
भर रह गई एक युवा स्त्री थी। फीडिंग ट्यूब की वजह से अक्सर उसे उल्टियाँ आने लगतीं, जिससे पेट पर तनाव व ऐंठन बढ़ जाती और ऑपरेशन के स्थान पर
दर्द तेज़ होने लगता। आज सुबह उसकी नाक से फीडिंग ट्यूब निकाल दी गई थी। इस कारण
वह बेहद खुश थी। सारी तकलीफ़ों के बावजूद उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई थी। अब वह
खुलकर आंटी से बात कर रही थी।
देखभाल के लिए उसका पति रवि उसके
साथ था। उसने बताया कि साल भर पहले रेवाड़ी शहर के किसी निजी अस्पताल में उसका गर्भाशय
ऑपरेशन से निकाला गया था। कुछ माह बाद ही उसे बुखार, उल्टी आदि की शिकायत रहने लगी। दोबारा जाँच करवाई तो पता चला कि ऑपरेशन के
समय डॉक्टर की लापरवाही से उसकी आँतों में तीन जगह छेद हो गए थे, जिनसे अपशिष्ट का संक्रमण शरीर में फैल रहा था। किसी की सलाह पर वे इस
अस्पताल में आए। तब से तीन बार सर्जरी हो चुकी थी। इस बार के ऑपरेशन के बाद वे पिछले
एक सप्ताह से यहाँ भर्ती थे।
रवि खेती-बाड़ी करता है। उसके पास
ट्रैक्टर और कुछ लोडिंग गाड़ियाँ भी हैं, जो
किराए पर चलती हैं। दो छोटे बच्चे हैं। घर, पशुधन और खेत की
ज़िम्मेदारी बूढ़े माँ-बाप पर आ पड़ी है। पत्नी की लंबी बीमारी के चलते अधिकांश
पशुधन बेचना पड़ा। इलाज पर कई लाख रुपये खर्च हो चुके थे और कर्ज़ का बोझ भी बढ़ता
जा रहा था। लेकिन उसे इन सबकी परवाह नहीं थी। उसकी एकमात्र चिंता थी—किसी भी तरह
उसकी पत्नी स्वस्थ हो जाए।
“पैसा क्या है अंकल। आदमी ही कमाता
है, आदमी ही नहीं रहेगा तो पैसे का क्या करना”।
उसने सहज भाव से जीवन का एक गहरा सत्य कह दिया।
भोजन के बाद मैं फिर बिस्तर पर
लेट गया। नींद खुली तो घड़ी की सुइयाँ चार बजा रही थीं। मैंने फ़ौरन ईमेल और
एस.एम.एस. चेक किए। बीमा कंपनी का अप्रूवल आ चुका था; कुल बिल में से मरीज़ यानी मुझे सत्तावन हज़ार रुपये चुकाने
थे। सामान्य वार्ड में इलाज कराने के बाद भी इतना बड़ा झटका? पॉलिसी के हिसाब से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी, पर अब
क्या हो सकता था।
मैंने निर्मला को टी.पी.ए. ऑफिस
भेजा, जो बगल की बिल्डिंग के भूतल पर था, ताकि मेरे हिस्से के पैसे जमा करवाकर क्लियरेंस ले ली जाए। उधर हमारे
मित्र, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी के पूर्व शाखा प्रबंधक श्री
सतीश, हमें लेने के लिए अपने घर से निकल पड़े थे।
थोड़ी देर बाद श्रीमती जी ने
लौटकर बताया कि बीमा कंपनी का अप्रूवल सही नहीं आया; बिल में कुछ गड़बड़ थी, इसलिए टी.पी.ए. ने उसे फिर
से अपलोड किया है।
मेरा माथा ठनका। गई भैंस पानी में!
मोबाइल खोला तो उसमें चार बजे का एक और एस.एम.एस. दिखाई दिया—“प्रिय ग्राहक, हमें अस्पताल से आपके नकदी-रहित दावे के वृद्धिकरण का निवेदन
प्राप्त हुआ है। दावे पर अद्यतन सूचना तीन घंटे में उपलब्ध करवाई जाएगी।”
फिर तीन घंटे!
यानी शाम के सात बजे तक! हद है!
मैंने टी.पी.ए. ऑफिस के दूरभाष नंबर पर फ़ोन लगाया। पता चला कि पोर्टल पर बीमा
कंपनी ने कुल बिल की राशि गलती से एक लाख पैंसठ हज़ार रुपये दर्ज कर ली है। इसे
दुरुस्त करने के लिए टी.पी.ए. द्वारा फिर से रिक्वेस्ट डाली गई है।
“देखिए, मैं सुबह से
इंतज़ार कर रहा हूँ। अब और तीन घंटे इंतज़ार करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है।”
“सर, हमने तो सही बिल
अपलोड किया था। बीमा कंपनी ने ग़लत पास किया तो हम क्या करें? अगर आपको जल्दी है तो अपने बीमा एजेंट से बात करें।”
इस प्रकार के रूखे जवाब की मुझे
उम्मीद नहीं थी। खैर, मैंने स्वास्थ्य बीमा कंपनी के स्थानीय
एजेंट से बात की, सारी स्थिति समझाई, अस्पताल
के बिल और बीमा कंपनी के अप्रूवल की प्रतियाँ व्हाट्सएप पर भेजीं और निवेदन किया
कि इस प्रक्रिया को जल्द निपटाने के लिए कुछ करें। पर एजेंट महोदय का जवाब निहायत
ही पल्ला झाड़ने जैसा था—
“सर, हम ज़्यादा कुछ
नहीं कर सकते। मैंने इसे कॉरपोरेट ग्रुप में शेयर कर दिया है, कंपनी देख रही है। आपको इंतज़ार करना होगा।”
“अगर आप सीधे अपने वरिष्ठ से बात नहीं कर
सकते तो मुझे संबंधित अधिकारी का फ़ोन नंबर दे दीजिए, मैं
बात कर लेता हूँ।”
“माफ़ कीजिए सर, मेरे
पास ऐसा कोई नंबर नहीं है।”
कुल मिलाकर इशारा यही था कि आप
जानो, आपका काम जाने। पाँच बजने को थे। मुझे लगा
कि यहाँ बैठे-बैठे प्रतीक्षा करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। अतएव मैंने प्रधान
नर्स से कहा, “मुझे व्हीलचेयर पर टी.पी.ए. ऑफिस ले चलिए,
मैं ख़ुद बात करके देखता हूँ।”
“नहीं, ऐसा नहीं हो
सकता। मरीज़ को वार्ड से बाहर जाने की अनुमति नहीं है।”
“सिस्टर, मैं सुबह दस
बजे से छुट्टी के लिए बैठा हूँ। मेरी पत्नी को बीमा-दावों की ज़्यादा जानकारी नहीं
है। मुझे जाने दीजिए। चाहें तो किसी गार्ड या वार्ड बॉय को साथ भेज दीजिए, मैं भाग नहीं जाऊँगा। मेरी टी.पी.ए. से बातचीत ज़रूरी है।”
“अपने साथ वाले को भेज दीजिए या यहीं से फ़ोन
पर बात कर लीजिए।”
“सिस्टर, आप समझने की
कोशिश कीजिए। मैं फ़ोन पर बात कर चुका हूँ, मेरी पत्नी भी दो
बार उनके ऑफिस जाकर बात कर चुकी है। मुझे जाना ही होगा।”
इस बार मेरे स्वर में तल्ख़ी थी।
मेरे उग्र तेवर देखकर प्रधान नर्स
ने अपने वरिष्ठ को फ़ोन किया और बताया कि बेड नंबर पंद्रह का मरीज़ टी.पी.ए. ऑफिस
जाने की ज़िद कर रहा है। जैसा कि अपेक्षित था, वहाँ
से भी अनुमति नहीं मिली। यह मेरे सब्र की इंतिहा थी। मेरे हाथ में अब भी कैन्युला लगा था और कलाई पर अस्पताल का आई.डी. बैंड बँधा था। मैं उठकर वार्ड से
बाहर चल पड़ा और तेज़ स्वर में नर्स से बोला,
“मैं जा रहा हूँ। व्हीलचेयर का इंतज़ाम कीजिए,
वार्ड बॉय को साथ भेजिए। आप मुझे इस तरह रोक नहीं सकतीं!”
वार्ड में कुछ देर के लिए
अफ़रातफ़री मच गई। निर्मला ने भी मुझे रोकने की कोशिश की, पर मैं नहीं माना। अंततः नर्सिंग स्टाफ़ को मेरी बात माननी
पड़ी। मुझे व्हीलचेयर पर बैठाकर वार्ड बॉय चल पड़ा, पीछे-पीछे
निर्मला थीं। पहली मंज़िल से लिफ़्ट द्वारा नीचे उतरकर हमने मुख्य द्वार पार किया
और सामने की बिल्डिंग के टी.पी.ए. ऑफिस में पहुँच गए।
वहाँ एक युवा महिला और पुरुष
अपने-अपने कंप्यूटर के कीबोर्ड पर उँगलियाँ दौड़ा रहे थे। कैन्युला लगे मरीज़
को अचानक सामने देखकर उनका चौंकना लाज़िमी था, पर
मैं सीधे मुद्दे पर आ गया। थोड़ी बहस हुई, थोड़ी गरमागरमी
भी। अपने को सही साबित करने के लिए उन्होंने कंप्यूटर की स्क्रीन मेरी ओर घुमा दी।
मैंने देखा, टी.पी.ए. ने सही राशि का ही बिल अपलोड किया था।
“लेकिन इसमें मेरा क्या दोष है, मैडम?” मैंने निवेदन किया। “मैं सुबह दस बजे से
छुट्टी की उम्मीद में बैठा हूँ और अपने हिस्से का बिल देने को भी तैयार हूँ। सवा
पाँच बज चुके हैं। कंपनी सात बजे तक बताएगी, तब तक क्या मैं
यूँ ही बैठा रहूँ? और सात बजे के अप्रूवल में भी कोई त्रुटि
निकली तो मैं क्या करूँगा? दो दिन पहले ही मेरे दोनों
हर्निया का एक साथ ऑपरेशन हुआ है। मैं अधिक देर तक बैठ नहीं सकता। आपको बीमा कंपनी
से बात करनी चाहिए।”
इतने में सतीश जी भी पहुँच गए।
उन्हें वस्तुस्थिति समझाई गई। चूँकि वे स्वयं बीमा कंपनी में रह चुके थे, इसलिए दावा-निस्तारण की गलियाँ हमसे बेहतर जानते थे। उन्होंने
मोर्चा सँभाला। संयोग से मेरी स्वास्थ्य बीमा कंपनी के प्रांत के एक वरिष्ठ
अधिकारी से उनकी जान-पहचान निकल आई। उनसे संपर्क साधा गया और मामला यथाशीघ्र
निपटाने के लिए हस्तक्षेप का अनुरोध किया गया। बातचीत संतोषजनक रही। उन्होंने हमें
आश्वस्त किया, “मैं बात करता हूँ, आप
निश्चिंत रहिए।”
हमारे पास दूसरा रास्ता यह था कि
सत्तावन हज़ार के अतिरिक्त वास्तविक बिल और बीमा कंपनी द्वारा स्वीकृत राशि के बीच
के अंतर को, जो कि लगभग आठ हज़ार रुपये था, जमा करवाकर अप्रूवल ले लें। बाद में कंपनी का अंतिम अप्रूवल आने पर जो भी
राशि हमें देय होती, टी.पी.ए. वह लौटा देता। हम इस विकल्प पर
विचार कर ही रहे थे कि बीमा कंपनी का संशोधित अप्रूवल आ गया।
अरे, यह क्या? हम सब एक साथ चौंक पड़े। इस
अप्रूवल के अनुसार मरीज़ को सिर्फ़ छह हज़ार रुपये देने थे! सत्तावन हज़ार से सीधे
छह हज़ार; मेरी तो जैसे लॉटरी निकल आई।
लेकिन इस अप्रूवल में भी एक लोचा
था। इस बार कंपनी ने कुल बिल एक लाख अठहत्तर हज़ार रुपये मान रखा था, जबकि वास्तविक बिल था—एक लाख तिहत्तर हज़ार रुपये!
मैंने और सतीश जी ने प्रश्नवाचक
निगाहों से टी.पी.ए. मैडम को देखा। व्यावसायिक बेरुख़ी के स्थान पर अब उनके चेहरे पर
खेद और स्वर में नरमी थी। वे बोलीं, “सर,
इस विसंगति को दूर करने के लिए मुझे एक बार फिर बीमा कंपनी के पास
संशोधन का अनुरोध भेजना पड़ेगा। बस दस मिनट और इंतज़ार कर लेते हैं। अगर दस मिनट
में भी जवाब नहीं आया तो हम इसी को अंतिम अप्रूवल मान लेंगे।”
“ठीक है मैडम। इतना समय बीत गया तो दस मिनट
और सही।” सतीश जी ने सहमति जताई।
मैडम द्वारा बीमा कंपनी के पोर्टल
पर संशोधन का अनुरोध डालने के कुछ समय बाद मेरे मोबाइल में फिर से वही
स्टीरियोटाइप्ड संदेश आ गया—“प्रिय ग्राहक, हमें
अस्पताल से आपके नकदी-रहित दावे के संशोधन का निवेदन प्राप्त हुआ है। दावे पर
अद्यतन सूचना तीन घंटे में उपलब्ध करवाई जाएगी।”
फिर वही तीन घंटे!
लेकिन इस बार हमारे लिए केवल दस
मिनट की ही बाध्यता थी। एक बार फिर इंतज़ार शुरू हो गया। दस मिनट, पंद्रह मिनट… अगले बीस मिनट तक भी बीमा कंपनी की ओर से कोई
जवाब नहीं आया। अब सबका धैर्य चुक चुका था। लिहाज़ा मुझसे मेरे हिस्से के शेष तीन
हज़ार रुपये जमा करवाकर टी.पी.ए. ने क्लियरेंस थमा दिया। हम वार्ड में लौटे,
कैन्युला और अस्पताल का रिस्ट बैंड हटवाया और पड़ोसी मरीज़ों
तथा रवि आदि से विदा ली। घर पहुँचते-पहुँचते रात के साढ़े आठ बज गए।
रात दस बजे बीमा कंपनी ने मेल के
माध्यम से तीसरा संशोधित अप्रूवल भेजा। बिल की कुल राशि में संशोधन करने के बाद
मरीज़ के हिस्से में लगभग उनतीस हज़ार रुपये की अदायगी दिखाई गई थी। मुझे लगा, कल अर्थात् सोमवार को स्वास्थ्य बीमा कंपनी वाले संपर्क
करेंगे और तकनीकी भूल आदि का हवाला देकर मुझसे अतिरिक्त राशि चुकाने के लिए दबाव
बनाएँगे, पर ऐसा नहीं हुआ।
अगले दिन शाम को बीमा कंपनी का
चौथा और अंतिम अप्रूवल ई-मेल आया। इसके मुताबिक़ मुझे लगभग छह हज़ार रुपये चुकाने
थे। यह ठीक वही राशि थी जो मैं अस्पताल में जमा करवा चुका था। बिल की शेष रकम बीमा
कंपनी ने वहन कर ली।
इस पूरे प्रकरण में बीमा कंपनी ने
अपने अप्रूवल को चार बार संशोधित किया। हर बार स्वीकृत राशि, छूट के मानदंड और मरीज के हिस्से की देय राशि बदलती रही।
अंततः इस पूरे नाटकीय घटनाक्रम का मेरे पक्ष में सुखद पटाक्षेप हुआ। लेकिन मन में
एक सवाल अब भी बना हुआ है—क्या हर मरीज के पास अपनी बात मनवाने के लिए इतना समय,
धैर्य और जानकारी उपलब्ध होते हैं?
विशेषकर वे गरीब, किसान और कम पढ़े-लिखे लोग,
जो पहले ही बीमारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे होते हैं।
बहरहाल, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद इस पूरे अनुभव को शब्दबद्ध
करने में मुझे फिर तीन घंटे ही लगे!
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 06 नवंबर 2026
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