कविता: प्यारे रफ़ूगर




प्यारे रफ़ूगर!
तुम्हारे दिल-दिमाग-दृष्टि को
बहुत होशियारी से, बहुत समझदारी और चालाकी से
वर्षों वर्ष ढाला गया एक सांचे में
जहाँ सोच और समझ सिमट जाती है एक बंद कैप्सूल में
कुएँ के मेंढक की तरह
इस विद्या को सम्मोहन कहते हैं
बाज लोग, काला जादू का नाम भी दे सकते हैं
आंग्ल भाषा का ‘ब्रेनवॉशिंग’ इसी का समानार्थी है
तुम्हारी पहचान अब किसी की बंधक है
हो चुका है समाप्त, तुम्हारा अपना स्वतंत्र वजूद!

आस्था, धर्म और राष्ट्रवाद के नकली रंगों से सजे
जिस विशाल बोसीदा[1] शामियाने को
तुम और तुम्हारे जैसे हजारों रफ़ूगर
थामे खङे हैं, जानते हो
इसके हर टुकङे की सिलाई में हुए हैं प्रयुक्त
झूठ और फ़रेब के महीन मखमली धागे
जो दिखाई पङते हैं
केवल खुली आँखों से!

अजब बात है
नफरती जर्जर खंबों के अवलंबन पर
खङा है यह अजूबा
और इसके नीचे, अपने हाथों में सुई-धागा पकङे
तुम हो तैनात बङी मुस्तैदी से
इसके हर फटे को रफ़ू करने को उद्यत, बेचैन!

वह जो बहरूपिया है
वह जो मदारी है
वह मंजा हुआ अभिनेता और कलाकार
जब भी मुँह खोलता है
अपने हाथ नचा-नचाकर बोलता है
संप्रदायों के बीच, विष वैमनस्य घोलता है

उसका हर आलाप और प्रलाप
उसका हर बोल, यहाँ तक की उसका मौन
तुम्हारे लिए है अलौकिक दैवीय आकाशवाणी
उसके हर पैंतरे पर, दांव पेंच पर
हर कलाबाजी पर
बज उठती हैं यंत्रवत् तुम्हारी तालियाँ
दुनिया हंसती है, मगर तुम्हें
उसकी भाव भंगिमाएं विस्मित करती हैं!

विज्ञान, अध्यात्म, भौतिकी या रसायन पर
उसके हास्यास्पद तर्कों से हो जाते हैं
शामियाने में सुराख
और खुले आसमान से जब प्रकाश पुंज
तुम्हारे चारों ओर व्यावृत्त[2]
वैचारिक तमस को करने प्रद्युतित
होने लगते हैं प्रविष्ट!

गणित और अर्थशास्त्र पर
उसकी अंडबंड परिकल्पनाएं और नवाचार
बेमौसम के झंझावात की मानिंद
लगती हैं हिलाने-डुलाने, उखाङने और फाङने
शामियाने की दर-ओ-दीवार
बाहर की ताजी हवा
जब सीलन भरे माहौल में भरने लगती हैं
ताजगी का अहसास!


ठीक उसी वक्त, तुम जुट जाते हो
एक समर्पित, अधैविश्वासी[3], सुधारातीत[4]
मुरीद की तरह, उन सुराखों को रफ़ू करने
और जब तक
नहीं कर देते बंद आखिरी छेद, दम नहीं लेते
पुन: थाम लेते हो, और अधिक मजबूती से
लड़खड़ाते लकङी के खंबों और
फङफङाते पल्लों को!

जानते हो
इस बेमिसाल सेवा में
शामियाने के पैबंद लगाते-लगाते
तुम्हारी पगङी को चीरा गया छोटे-छोटे चिथङों में 
तत्पश्चात
फाङे गए तुम्हारे उत्तरीय और अधोवस्त्र
तुम्हारे बदन के तमाम वस्त्र, अभीष्ट की रक्षार्थ
एक के बाद एक
बलिवेदी पर होते गए शहीद!

और अब
तुम्हारा अंतिम अंतर-वस्त्र भी उतर चुका है
तुम नंगे हो चुके हो रफ़ूगर!
राजा नंगा नहीं है, केवल तुम, केवल तुम रफ़ूगर
शामियाने से बाहर निकल कर देखो
सचमुच हो चुके हो नंगे!


[1] बोसीदा- पुराना, सड़ा गला, कमज़ोर, फटा-पुराना, जर्जर, पुराने चलन का
[2] व्यावृत्त-आच्छादित
[3] अधैविश्वासी-हठी, दुराग्रही
[4] सुधारातीत-जो सुधर न सके 


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 19 फरवरी, 2025

Publication details: 
सत्य की मशाल-भोपाल के अप्रैल-2025





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