व्यंग्य: आगे की सोच -गड्ढों में




“पेंदी भैया, सुन रहे हो.”

“अरे ओ पेंदी भैया! क्या मुझे सुन पा रहे हो?”

सूखे कुएँ में घंटा प्रसाद की आवाज की प्रतिध्वनि गूँजने लगी. तीन चार बार पुकारे जाने के पश्चात, गहराई से एक खुरखुराता सा जवाब आया. “होवओ..होवअ…”

“आ जाओ बाहर. भोजन कर लो. आज सरसों का साग और मक्की की रोटी भेजी है भाभी ने.”

थोङी देर में, धूल-मिट्टी से सनी एक डरावनी सी काया कुएँ के बाहर निकली. उलझे हुए खिचङी बाल, बेतरतीब फैली दाढ़ी मूंछ, पिचका हुआ पेट….केवल आवाज से ही उसे पहचाना जा सकता था. भूख तेज थी अत: वह तुरंत भोजन पर टूट पङा. जब पेंदी लाल ने दो-तीन रोटियां उदरस्थ कर लीं तो अनुज, घंटा प्रसाद ने साहस जुटाया.

“भाई, दस साल हो गए खोदते-खोदते. कुछ भी तो हासिल नहीं हुआ. उलटे सारा खेत बर्बाद हो चुका है.”

“इसे तुम बर्बाद होना कह रहे हो? जानते नहीं यह कितना महान कार्य है!”

“लेकिन पेट भरने के लिए अनाज जरूरी है भाई.”

“यही तो अफ़सोस है, इस सोच से आगे निकलो. अपनी विरासत और इतिहास पर गर्व और गौरव करना सीखो, घंट्टू (घंटा प्रसाद का घर का यही नाम था).”

“लेकिन………..?”

पेंदी लाल, ने उसके हस्तक्षेप को नजर अंदाज करते हुए अपनी बात जारी रखी. “प्रातः स्मरणीय, चिर वंदनीय, परम श्रद्धेय, स्वनामधन्य, सूरमा वक्त्रवास ने अपनी नारंगी किताब में साफ़-साफ़ लिखा है, सैंकङों साल पहले हमारे पुरखों की बाहर से आए आतताइयों के साथ इसी जमीन पर जंग हुई थी. यद्यपि उस खूनी जंग में हमारे पुरखे हार गए थे, लेकिन वे बहादुरी से लङे, उनकी विरासत, उनकी हड्डियाँ, उनके गहरे राज यहीं गङे हैं. किताब में इस बात की ओर इशारा है.”

“इशारा?”

“महापुरुषों की कुछ बातें इशारों में होती है.”

“लेकिन भैया, उस किताब को पढ़ा तो मैंने भी है. सूरमा वक्त्रवास ने उसमें किसी शिलालेख, पुरानी इबारत, ताङ-पत्र, ताम्र-पत्र या किसी शोधार्थी या पुरातत्व विज्ञानी आदि का हवाला तो दिया नहीं?”

घंटा प्रसाद, कॉलेज के पुस्तकालय में कभी-कभार, इतिहास और विज्ञान की पुस्तकें पढ़ लेता था. पेंदी लाल ने खाना समाप्त कर एक लंबी डकार ली और किसी जंगली झाङ की तरह उग आई खिचङी दाढी पर हाथ फिराते हुए बोला.

“देख, घंट्टू. ये सच है कि तू पढ़ लिख गया, लेकिन तुम्हारी सोच वही है, जो पाजी इतिहासकारों ने दिमाग में ठूँस रखी है. हमारे पूजनीय पिता छेदी लाल और परम पूजनीय पितामह सौंदी लाल क्या पागल थे? उनका भी यही मत था. मैं तो उसको अमली जामा पहना रहा हूँ. देखना एक न एक दिन हम अपने अतीत का सच खोज निकालेंगे.” इसके साथ ही बिना प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए पेंदी लाल, बंदर जैसी फुर्ती से रस्सी के सहारे कुएँ में उतर गया.

घंटा प्रसाद ने जूठे बर्तन समेटे और लगभग बंजर में तब्दील हो चुके अपने खेत पर एक व्यथित दृष्टि डाली. चारों तरफ सैंकङों छोटे-बङे गड्ढे-सूखे कुएँ और मिट्टी के ढेर …! वह मन मसोस कर रह गया. पङोस के खेतों में दूर-दूर तक सरसों की फसल लहलहा रही थी. पीले फूलों की मनमोहक खुशबू, उन पर मंडराते कीट-पतंगे, पक्षियों की चहचहाहट…. सब कितना दिलकश और जीवंत था! एक ठंडी आह भरते हुए, भारी कदमों से वह लौट पङा.



© दयाराम वर्मा, जयपुर. 26 मार्च 2025

Publication details: 
सत्य की मशाल-भोपाल के अप्रैल-2025



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