कविता: सामंती-जीन




जब तक आम आदमी
झुक-झुककर, डर-डरकर
सफ़र जिंदगी का तय करता रहता
चुपचाप सहता
दमन, प्रताङना, अपमान, अन्याय, अत्याचार
शासक, प्रशासक
संस्था, संप्रदाय, समाज, टी.वी. या अखबार
दो टका, बाँटते खैरात
जतला देते हमदर्दी तीन टका, कभी कभार
पचानवे टका नहीं रखते कोई सरोकार!


लेकिन जिस रोज
सर उठाकर, आँख मिलाकर
कर बैठता आम आदमी, बुलंद स्वर में पुकार
हो जाता खङा पैरों पर
और लगता मांगने, इंसाफ़-हक-अधिकार!


हो उठता जीवंत, सामंती-जीन
भृकुटियाँ तन जाती
बात उसूल की, मगर ठन जाती
आया कैसे बराबरी का इसे ख्याल
हिमाकत तो देखो
खङा अकङ कर, करता हमसे सवाल?
सीख लिया कहाँ से इसने, इज़्ज़त से जीना
चलने लगा तानकर पिचका सीना!


© दयाराम वर्मा, जयपुर 27 मार्च, 2025








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