कविता: मुद्दों के सुपरस्टार




महंगाई ने, बेरोजगारी ने, भ्रष्टाचार ने
चतुर्दिक पसरे अत्याचार, व्यभिचार, पाखंड और अनाचार ने
रुग्ण स्वास्थ्य, लावारिस पर्यावरण, दिग्भ्रमित व्यापार ने
आशंकित, भयभीत बाजार ने
थके-हारे, बेबस, मेहनतकश, मजदूर और भूमिहार ने
पूछा, बनेगा कौन इस माह मुद्दों का सुपरस्टार
हुआ गंभीर मंथन, विमर्श और विचार
सही-गलत, छोटा-बङा, खोटा-खरा, सार-निस्सार
जूरी ने तब फैसला ये सुनाया
इस बार का खिताब शहंशाह ‘औरंगजेब’ ने है पाया!


डूबते शेयर बाजार ने
डॉलर से पिटते रोज, रूपये लाचार ने
मुरझाती जीडीपी, मंदी की चौतरफा मार ने
फंसे थे जो सब अबूझ मझधार में
कहा, इस हफ्ते मुद्दों का सुपरस्टार किसे बनाना है
चौबीसों घंटे मीडिया में उसे छाना है
देखा इधर-उधर, दाएं और बाएं
ठीक पीछे खङे थे जवाहर लाल नेहरू और संभाजी महाराज
अविलंब, निर्विरोध, सहर्ष चयन हुआ स्वीकार
इस महीने के संभाजी तो वर्ष पर्यंत, चाचा नेहरू सुपरस्टार!


वर्तमान ने, भविष्य ने
बैसाखियों पर घिसटती शिक्षा, अभावग्रस्त दीक्षा
घासलेटी साहित्यकारों ने, कागजी नवाचारों ने, व्हाट्सएपिए हरकारों ने
बङी बैठकों में, तुच्छ दिमाग खपाया
मुद्दा कौन सा है काबिल-ए-गौर, है जो धमाकेदार
छापे पहले पन्ने पर, हर रिसाला[1]-हर अखबार
अचानक, जाने कहां से डॉ. भीमराव हुए मंच पर नमूदार[2]
एंकर उछला, कूदा, चिल्लाया- ब्रेकिंग न्यूज
मिल गए, इस हफ्ते के सुपरस्टार
बाबा अंबेडकर विश्वाधार[3]!


राज दरबार में
वर्तमान और भावी मुद्दों का अब स्थान नहीं है
मात्र संयोग है या है विवेचित प्रयोग, शायद आपको ध्यान नहीं है
विशाल भंवर-गुफा में बैठा है जमकर भूत
लिए कुदाल-फावड़ा, प्रेत-सा डोलता
गङे मुर्दे टटोलता है
हजारों मंदिर-मस्जिद-मजार, मरघट, कब्रिस्तान
सैंकङों शहर-स्टेशन-सङकें, गली-कूचे, बोलते उनके नाम
जिन्ना, सावरकर, गांधी, पटेल, सुभाष, शिवाजी, अकबर, मुगल, पठान…
एक अंतहीन शृंखला का अविमृष्ट[4] बखान!


बंद दरवाजों के पीछे
जिंदा मुद्दे, सिसकते हैं, कसमसाते हैं, तिलमिलाते हैं
रेंगते सवालों पर लटक कर
कभी कभार, भूले भटके, सियासी सङकों पर निकल आते हैं
लेकिन हुई जरा सी तेज जो धूप
हुई जरा सी ठंड, या घन-गर्जन और बूंदा बांदी
किसी अंधेरे कोने में फिर से छुप जाते हैं
ऐसे में इतिहास में दफ़न
कहानी-किस्से, यलगार[5] और किरदार सामने आते हैं
कभी हफ्ते, कभी महीने तो कभी साल भर, सुपरस्टार बन जाते हैं!



© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 14 मार्च, 2025



[1] रिसाला-संदेश या पत्र
[2] नमूदार-प्रकट
[3] विश्वाधार-परमेश्वर
[4] अविमृष्ट-सोच विचार रहित, अनिश्चित
[5] यलगार-आक्रमण, हमला




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