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आलेख: आज-परिवर्तन दिवस
मनुष्य का जीवन सीखने की एक सतत प्रक्रिया है। बचपन से वृद्धावस्था तक वह अनुभवों के आलोक में स्वयं को गढ़ता रहता है—कभी अपनी भूलों से, कभी दूसरों के आचरण से और कभी प्रकृति के मौन अनुशासन से। किंतु सीख को केवल त्रुटि तक सीमित कर देना अधूरी दृष्टि है। वास्तविक शिक्षा प्रत्येक अनुभव के निष्पक्ष आत्मावलोकन से जन्म लेती है। भूल का दोहराव विवेक का क्षरण है, और विवेक का क्षरण व्यक्ति को स्वयं से ही विमुख कर देता है।
“मैं ही सही हूँ”—यह वाक्य जितना छोटा है, उतना ही घातक। जैसे-जैसे यह भाव स्थायी स्वभाव बनता है, वैसे-वैसे संवाद सिकुड़ता जाता है और संबंध शुष्क हो जाते हैं। आत्मकेंद्रित चेतना पहले व्यक्ति को अकेला करती है, फिर उसे भ्रम देती है कि यह एकांत उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है। समाज में यह भ्रम अधिक समय तक नहीं टिकता; क्योंकि समाज शक्ति नहीं, संतुलन को स्वीकार करता है।
दूसरों से अपेक्षा रखने से पूर्व यह प्रश्न अधिक मौलिक है कि हम स्वयं अपेक्षा के योग्य हैं या नहीं। जीवन किसी एक की आकांक्षाओं का विस्तार नहीं, बल्कि अनेक इच्छाओं का समन्वय है। इसलिए मध्य मार्ग ही जीवन का धर्म है—अति न साध्य है, न शाश्वत। ‘मैं’ का आग्रह जितना घटता है, ‘हम’ की संभावना उतनी ही सशक्त होती जाती है।
ज्ञान का स्वाभाविक फल विनय है। जहाँ अहंकार है, वहाँ विद्या केवल सूचना बनकर रह जाती है। उपलब्धियाँ तब तक सार्थक हैं, जब तक वे व्यक्ति को विनम्र बनाती हैं; अन्यथा वे उसके पतन का आधार बन जाती हैं। असहमति कभी शब्दों में व्यक्त होती है, कभी मौन में, किंतु मन का असंतोष देह-भाषा में स्वयं प्रकट हो जाता है। जब निकटवर्ती संबंधों में शीतलता आने लगे, तो दोष बाहर नहीं, भीतर खोजा जाना चाहिए।
महानता किसी असाधारण कर्म में नहीं, बल्कि साधारण आचरण में प्रकट होती है। समय पर सोना-जागना, शरीर और मन की स्वच्छता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता, संयमित भोजन—ये सब जीवन के छोटे-छोटे अनुशासन नहीं, बल्कि चरित्र के सूक्ष्म संकेत हैं। जो व्यक्ति इनसे विमुख है, वह बड़े आदर्शों की बात करने का नैतिक अधिकार भी खो देता है।
वाणी मन का आईना है। उसमें मधुरता हो तो संवाद पुल बनता है, कटुता हो तो दीवार। सुनने की क्षमता बोलने से बड़ी साधना है, और मौन कई बार सबसे प्रखर उत्तर होता है। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहता है—चाहे वह घर हो, सड़क हो या मंच—वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहा होता है कि उसे भरोसा केवल स्वयं पर है, संबंधों पर नहीं।
परिवर्तन का कोई निर्धारित काल नहीं होता। “जब जागो, तब सवेरा”—यह केवल कहावत नहीं, जीवन-दर्शन है। अपनी भूल को स्वीकार कर लेना ही आत्मोन्नति की प्रथम शर्त है। जो व्यक्ति यह कहने का साहस रखता है कि “मैं गलत हो सकता हूँ”, वही वास्तव में सीखने के योग्य होता है।
रिश्ते मनुष्य को नैतिक बल देते हैं। यह अनुभूति कि कोई हमारी चिंता करता है, हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करती है। परंतु यह अर्थ तभी स्थायी होता है, जब हम भी उसी संवेदना के साथ उत्तर दे सकें। संबंध माँग से नहीं, उपस्थिति और संवाद से जीवित रहते हैं।
तोड़ना सहज है, जोड़ना कठिन। इसलिए परिपक्वता का अर्थ है—तत्काल प्रतिक्रिया के स्थान पर विचारशील उत्तर। उम्र बढ़ने के साथ यदि धैर्य, नम्रता और विवेक नहीं बढ़ रहे, तो समझिए जीवन केवल बीत रहा है, विकसित नहीं हो रहा।
मनुष्य सब कुछ चाहता है—स्वास्थ्य, धन, मान, प्रेम,
संबंध—पर सब कुछ उसे मिलता नहीं। कारण साधारण है: वह सम्मान करना
नहीं जानता। जीवन में जो भी स्थायी रूप से प्राप्त होता है, वह
सम्मान और कृतज्ञता की नींव पर ही टिकता है। स्वास्थ्य दिनचर्या के सम्मान से,
धन परिश्रम और संयम के सम्मान से, प्रतिष्ठा
मूल्यों के सम्मान से और प्रेम परस्पर आदर के सम्मान से जन्म लेता है।
अंततः जीवन का सार यही है—कृतज्ञता के बिना प्राप्ति अधूरी है, और सम्मान के बिना संबंध खोखले। इसलिए रुकिए, सोचिए और स्वयं से पूछिए—क्या आज का दिन परिवर्तन का प्रारंभ हो सकता है? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो यही क्षण सार्थक है।
© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 23 जून, 2025
प्रकाशन: सत्य की मशाल -मार्च 2026
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“अरे-रे, ठहरो! कहाँ घुसे आ
रहे हो?”
सिपाही रामदीन ने डाँटते हुए तेजी से अंदर आ रहे नंग-धङंग
व्यक्ति को थाने के प्रवेश द्वार पर ही रोक लिया।
“हवलदार साहब, मेरे साथ बहुत
अन्याय हुआ है… दया करो।”
हाथ जोड़कर खङे नंगे आदमी ने याचना की। हवलदार के संबोधन ने
रामदीन के शरीर में एक गुदगुदी सी पैदा कर दी। उसका सीना अनायास ही इतना फूला कि
कमीज़ का ऊपरी बटन खुल गया। लहजे में थोड़ी नरमी लाते हुए उसने पूछा।
“हूँ… पहले ये बताओ तुम हो कौन और यहाँ किस लिए आए हो?”
“हुजूर, मैं ‘आम' आदमी हूँ… चोरी की रपट लिखवाने आया
हूँ।” मारे ठंड के दुबले-पतले अधेङ व्यक्ति के दाँत बज रहे थे। शायद वह काफ़ी समय
से नंगा था।
द्वार पर ऊँची आवाजें सुनकर दरोगा
एस.एन. त्रिपाठी अपने कार्यालय से बाहर निकल आए—“क्या बात है रामदीन? कौन है?”
“साहब, कोई ‘आम’ आदमी है… चोरी की रपट लिखवाने आया
है।”
थाने के परिसर में सर से पैर तक नग्न एक व्यक्ति को देखकर दरोगा
त्रिपाठी का दिमाग चकराया।
“तुम तो स्वयं नंगे हो, तुम्हारा कोई
क्या चुराएगा?”
“हुजूर, मैं नंगा नहीं था।
आपकी तरह मेरे शरीर पर भी कपड़े थे, लेकिन चोरी हो
गए!” आम आदमी ने साहस बटोर कर जवाब दिया।
“कपङे चोरी हो गए!... कैसे?”
“दरोगा साहब, दरअसल बात
यह है कि हमारे जौनपुर में पाँच साल में एक बार ‘लोक उत्सव’ आता है। एक विशेष ड्रेस कोड वाले कपङे पहन कर ही स्थानीय नामजद लोग इसमें
प्रवेश कर सकते हैं। लेकिन, इस बार बहुत सारे हुड़दंगी उत्सव
स्थल पर जमा हो गए हैं। वे मेरे जैसे ‘आम’ आदमी की पहचान-विशेष ड्रेस चुराते हैं, लूटते हैं और उसे पहनकर खुद उत्सव में घुस जाते हैं” ।
“पूरी वारदात बताओ—तुम कब, कहाँ और कैसे नंगे हुए?”
“जी मैं नंगा हुआ नहीं, मुझे नंगा कर
दिया गया।”
“ठीक है, ठीक है, खोलकर समझाओ।”
काँपते हुए ‘आम’ आदमी ने दोनों पैरों के घुटने जोङकर अपनी नग्नता
को हथेलियों से ढाँपने की नाकाम सी कोशिश की, "अब और .... क्या खोलकर समझाऊँ साहब?"
दरोगा ने उसकी दुविधा भाँप ली, बोले, “मेरा कहने का मतलब है—
वारदात को तफ़्सील से बयान करो।”
सूर्यास्त होते ही ठंड, नंगे बदन में अधिक चुभने लगी। ‘आम’
आदमी के लिए नग्नता से कहीं ज़्यादा सर्दी असहनीय हो चली थी। रुंधे
स्वर में उसने बतलाना आरंभ किया—
“हुजूर, हमेशा की तरह हम
तैयार होकर ‘लोक उत्सव’ में पहुँचे। इसके लिए बड़े चाव से नया मखमली कुर्ता, पाजामा और शेरवानी तैयार करवाई थी, लेकिन …. ।” वह कुछ पल के लिए रुका और अपनी दोनों हथेलियों को
आपस में रगड़कर गर्मी पैदा करने की कोशिश करने लगा।
“बोलते रहो, बोलते रहो।”
“जी, तभी वहाँ कुछ बदमाश आ गए। मेरे सारे कपड़े
छीन लिए… यहाँ तक कि बनियान और कच्छा भी! एक बदमाश ने तो देखते ही देखते, मेरे कपड़े पहने और उत्सव में घुस गया। मेरी रपट दर्ज करो हुजूर… मुझे इंसाफ दिलवाओ।”
चोरी, छीनाझपटी, डकैती, रंगदारी जैसे हर किस्म के अपराधों से दरोगा त्रिपाठी का प्राय:
वास्ता पङता रहता था, लेकिन बदन से ‘वस्त्र
चोरी’ जैसा मामला तो उनकी पूरी नौकरी में पहला था।
रामदीन ने अपना दिमाग चलाया—“साहब!
मुझे तो यह चोरी नहीं… लूट-खसोट का मामला लग रहा है।”
दरोगा ने बिना उसकी बात पर ध्यान
दिए नंगे आदमी से अगला सवाल किया—
“क्या तुम अपराधियों को पहचान सकते हो?”
“हाँ जी, क्यों नहीं!
हमारे क्षेत्र के प्रधान जी—‘ख़ास’ सेवक और उनके साथी थे। उन्हीं
की गाड़ी में बैठकर वो सब लोग आए थे”।
‘ख़ास’ सेवक का नाम
सुनते ही दरोगा और सिपाही दोनों को जैसे लकवा मार गया।
वह तो इलाके का सबसे बड़ा बाहुबली था। उसके नाम से पुलिस, प्रशासन, कर्मचारी, गुंडे, मवाली—सब डरते थे। सब उससे बच कर
रहने में ही अपनी भलाई समझते थे। यहाँ तक कि उसके गुर्गों के खिलाफ भी कोई ज़ुबान
खोलने की हिम्मत नहीं करता था। और यह नंगा आदमी ‘ख़ास’ सेवक के विरुद्ध रिपोर्ट
लिखवाने चला आया! नादान! तुरंत दरोगा त्रिपाठी ने अपना पैंतरा बदला—
“तुम्हारे पास क्या सबूत है कि वही लोग थे?”
“हुजूर, मैं पहचानता सकता हूँ।
वहाँ कैमरे भी लगे हैं… सब रिकॉर्ड हुआ है। उत्सव के कर्मचारी भी वहीं मौजूद थे। दूसरे
लोग भी थे, सारी वारदात उनकी आँखों के सामने घटित हुई।
आप उनसे पूछताछ कर सकते हैं। और सबसे बड़ा सबूत—मैं खुद… इस ठंड में नंगा, आपके सामने खड़ा हूँ!”
दरोगा ने खीझते हुए कहा—“देखो मिस्टर आम, ‘ख़ास’ सेवक
बहुत बड़े आदमी हैं। उन पर ‘वस्त्र चोरी’ जैसे घटिया इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं। कोई भी
यक़ीन नहीं करेगा। हो सकता है यह उन्हें बदनाम करने की तुम्हारी साज़िश हो।”
“हुजूर मेरी ऐसी क्या औक़ात जो मैं ‘ख़ास’ सेवक के खिलाफ
साज़िश करूँ।”
रामदीन ने दरोगा की बात को आगे बढ़ाया—“ख़ास सेवक तो राजा
हैं इस इलाके के। जो पसंद आ जाए, उठा लेते हैं, उन्हें चोरी करने की क्या ज़रूरत?”
“चोरी नहीं तो हुजूर… इसे आप लूट मान लीजिए।”
“देखो मिस्टर आम, हमारे मानने
से कुछ नहीं होता! तुम्हें शपथ-पत्र देना होगा।” दरोगा के स्वर में अब रूखापन था।
बाहर अंधेरा घिर आया था। आम आदमी
की हड्डियों तक में ठंड प्रवेश कर चुकी थी। धूजते स्वर में वह बङी कठिनाई से बोला—“शपथ-पत्र? कैसा शपथ-पत्र, हुजूर?”
“विधिवत नोटराइज़्ड स्टाम्प पेपर पर लिखकर देना होगा कि
तुम्हारे आरोप सत्य हैं और तुम्हारे पास पर्याप्त साक्ष्य हैं। इसके बाद हम रपट
लिखेंगे और जाँच करेंगे। लेकिन ध्यान रहे, यदि तुम आरोप
सिद्ध न कर पाए तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 229 के तहत झूठा शपथ-पत्र देने के आरोप में तुम्हें सात साल तक की सज़ा हो सकती
है। मानहानि का मामला भी अलग से चल सकता है। समझे!”
शपथ-पत्र की आत्मघाती शर्त सुनकर ‘आम’ आदमी का बचा-खुचा धैर्य जवाब दे गया।
ऊपर से सजा की बात ने उसे बुरी तरह से डरा दिया था। न्याय की धुँधली उम्मीद सर्द
हवा में ठिठुर कर जम गई।
वह ‘ख़ास’ सेवक की लूट को कैसे सिद्ध करेगा?
उसे कैमरों की फुटेज कौन देगा?
कर्मचारी क्यों उसके लिए गवाही
देंगे?
सब अनिश्चित था… और उसके लिए तो लगभग असंभव। और फिर…
मानहानि! सात साल की कैद! नहीं… नहीं!
“क्या सोचने लगे, जल्दी बताओ।
हमें और भी बहुत काम हैं।” दरोगा ने ज़ोर देकर पूछा।
नंगा आदमी सिसक उठा—“हुजूर, हम ठहरे ‘आम’ आदमी। ये सब नहीं कर पाएंगे। बस एक कृपा कर दो… कुछ पहनने को दे दो। ठंड
से शरीर बर्फ़ बन गया है; प्राण निकले जा रहे हैं। मुझे नहीं
लिखवानी कोई रपट-वपट।”
दरोगा के चेहरे पर एक कुटिल
मुस्कान दौङ गई। उसने रामदीन को एक ओर ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा, “तहख़ाने वाले स्टोर में जो कंबल रखे हुए हैं, उनमें से एक ले आओ”।
“लेकिन वह माल तो ‘ख़ास’ साहब के लिए है …”। रामदीन ने फुसफुसाते
हुए आँखें फैलाईं।
“हाँ, हाँ, मुझे पता है। उन्होंने भी तो घर-घर
जाकर यही करना है”। दरोगा त्रिपाठी ने गर्दन को दरवाज़े की ओर हल्का झटका देकर,
इशारों में उसे अंदर जाने का आदेश दिया।
थोड़ी ही देर में सिपाही रामदीन
एक कंबल के साथ लौट आया; जिसे लगभग झपटते हुए नंगे आदमी ने तुरंत अपने
पूरे बदन पर कसकर लपेट लिया। हल्की गरमाहट मिलते ही उसकी जान में जान आई।
“पूरे दस हज़ार का है! किस्मत अच्छी है तुम्हारी—कुछ दिन
पहले एक सरकारी गोदाम की लूट का माल जब्त हुआ था। अपनी ‘लोक उत्सव’ वाली ड्रेस को भूल जाओ—जान है
तो जहान है।” दरोगा ने समझाया।
आम आदमी की आँखें भीग गईं। इस
‘नेकी’ के लिए उसने दरोगा को करबद्ध धन्यवाद दिया।
देश में ऐसे लोक-उत्सव धूमधाम से आयोजित-प्रायोजित हो रहे हैं।
सब लोग खुश हैं।
आम आदमी खुश है; उत्सव के बहाने
उसे कंबल का संबल मिल जाता है।
दरोगा खुश है; उसे ‘ख़ास’ सेवक की ‘विशेष
सेवा’ करते हुए तंत्र की बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल
जाता है।
‘ख़ास’ सेवक खुश है; सब निर्धारित रणनीति के अनुरूप ही हो रहा है।
‘ख़ास’ सेवक के गुर्गे
खुश हैं;
‘आम’ आदमी के लूटे हुए वस्त्र
पहनकर ‘लोक-उत्सव’ का भरपूर लुत्फ़ जो उठा
रहे हैं।
चारों तरफ़ खुशहाली है।
व्यंग्य: हिंदुस्तानी गधे का पासपोर्ट हाल ही में सऊदी अरब के ऊँटों को पासपोर्ट जारी किया गया। यह खबर हिंदुस्तान के पशु-जगत में भी तेज़ी...