कविता: भीम भगवान




अल्लाह नहीं था, गॉड नहीं था
न था भगवान, वह कोई अवतार नहीं था
करोङों दिलों में बसने वाला, भीम मसीहा मानवता का
था शाश्वत, महज किताबी किरदार नहीं था!


जो भी है यहीं है, कल्पित है परलोक
मिटे जब भेदभाव-शोषण, बने स्वर्ग इहलोक
कहे कानून भीम का, सब जन बराबर के हकदार
राजा-रंक, स्वर्ण-अवर्ण, एक समान मत-मताधिकार!


पास नहीं था उसके कोई दिव्यास्त्र
न था चक्र सुदर्शन सा, न गदा न ब्रह्मास्त्र
नहीं सुझाई उसने पूजा-पाठ, दान-पुन की युक्ति
नमाज-प्रार्थना-अर्चना दिलवाते पाप-कर्म से मुक्ति!


भीम बाण चला, हुआ नामुमकिन, मुमकिन
भस्म हुईं तालाब-कुँओं की बाङें तमाम कुलीन
हुए तृप्त वंचित-शंकित, विवश थे पीने को नीर मलीन
जल-जमीन-जंगल, अधिकार हमारा, अभिभूत सर्वहारा!


नहीं निकाली जटाओं से गंगा
न भभूत से, शरीर उसने कभी था रंगा
न बांटे जन्म-जन्मांतर के आभासी स्वर्ग प्रवेश-पत्र
नहीं लगाई प्रस्तर प्रतिमा अहिल्या को ठोकर!

सहस्राब्दियों से चल रही, नफरत पल रही
जातीय उत्पीङन, वर्जना:, बंदिशें और अत्याचार
उतरन पहनो, झूठन खाओ, दूर गाँव से बस्ती बसाओ
बना स्पर्श अपराध अक्षम्य, पाते कैसे शिक्षा-दीक्षा-संस्कार!

संविधान में ऐसे अधिकार दिए
अबला बनी सबला, हक-हुकूक़ समान लिए
मिला दबे-कुचलों को भीम-मुक्तिदाता तारणहार
पतित नहीं पावन हैं, करना पङा अभिजात्यों को स्वीकार!


नहीं थी पास उसके, कोई वानर सेना
न मिला सुग्रीव सा सखा, हनुमान सा खली
न मिला धनुर्धर अर्जुन, न मिला भीष्म महाबली
मात्र शिक्षा ही बनी भुजा दाहिनी, शक्ति-सैन्य वाहिनी!


समता मूलक समाज का था भीम आधार
इंसानियत का सच्चा हितैषी, इंसाफ का पैरोकार
खुद ही सेना, खुद ही सेनापति, तूफानों से जा टकराता
भीङ से भिङ जाता, तर्कों से हराता, डरता नहीं-था डराता!

अप दीपो भव- दर्शन अपनाया
‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ समझाया
न्याय मिले, जीने का अधिकार मिले, मिले आत्मसम्मान
हुआ होगा धरती पर अगर भगवान कोई, होगा भीम समान!


© दयाराम वर्मा, जयपुर 27 दिसंबर, 2024

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