कविता: ★ इंसानी भूख ★






विस्तारवाद की भूख
सत्ता पर- चिर आधिपत्य की भूख
संसाधनों पर- स्वामित्व की भूख
कारोबार और बाज़ार पर- एकाधिकार की भूख
जिस्मानी भूख से इतर
तमाम तरह की ‘इंसानी’ भूख!

निगल चुकी है बारी-बारी
इंसानियत के सारे अंग-प्रत्यंग
उदारता, दया, प्रेम, करुणा, सहानुभूति, संयम, सहिष्णुता …
निस्पंद हृदय की धमनियों में
जम चुकी हैं संवेदनाएँ
और निस्तेज पुतलियों के भीतर
निःशेष है दृष्टि!

आओ पढ़ते हैं मर्सिया[1]
करते हैं अंतिम अरदास, कहते हैं ‘रेस्ट-इन-पीस’
और सजाते हैं अर्थी!

बारूदी शहरों में
चतुर्दिक धधकती चिताओं पर लेटी है इंसानियत!

मुखाग्नि देने को आतुर
बैठे हैं कतारबद्ध, युग-प्रवर्तक-महामानव
रूस, चीन, अमेरिका, इज़राइल, कोरिया, अफगानिस्तान, म्यांमार…….
फेहरिस्त लंबी है!

संभव है
इसकी अंत्येष्टि के पश्चात
हो सकेंगे सभी द्वंद्व समाप्त
वर्चस्व, आन-बान-शान और अभिमान की
सभी लङाइयाँ तोङ देंगी दम, और खत्म हो जाएगी
‘इंसानी’ भूख!


[1] मर्सिया-किसी मृत व्यक्ति की स्मृति में लिखा हुआ शोक-गीत, मृत व्यक्ति का गुणगान, शोक-काव्य


© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 09 जनवरी, 2025

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