व्यंग्य: जन-गण की बात




जाने कितने वैद्य, हकीम और डॉक्टरों को दिखाया, भांति-भांति की दवाइयाँ लीं, कड़वा काढ़ा गटका, परहेज़ रखा-लेकिन उसकी सेहत दिन-ब-दिन बिगड़ती ही गई। थक हारकर, उसके चंद विश्वस्त मित्रों ने नामवर चिमटा बाबा के यहाँ उसे ले जाने पर विचार किया।

चिमटा बाबा, बाबा गिरी से पहले एक मंचीय हास्य कवि था, लेकिन तीखा सच बोलने के कारण साहित्य के मैदान में ज्यादा टिक नहीं पाया। जबकि मंत्र साधना ने कम समय में ही उसके वारे न्यारे कर दिए; देखते ही देखते उसकी प्रसिद्धि देश भर में फ़ैल गई। दूर-दराज़ से दुखी और निराश लोग उनके पास अपनी समस्या लेकर आते और झोली में खुशियाँ भरकर लौट जाते। शुभचिंतकों के बारंबार अनुनय विनय के आगे झुकते हुए, अंततः मरीज़ ने सहमती प्रदान कर दी। अन्यथा पीर, पैग़ंबर, बाबा आदि के चमत्कार उसकी वैज्ञानिक सोच से कतई मेल नहीं खाते थे।

एक छोटे से पहाङी गाँव के समीप कल-कल बहती स्वच्छ नदी के किनारे, बाबा की कुटिया के सामने भक्तों की लंबी लाइन लगी थी। दोपहर तक उन्हें अपनी बारी का इंतिज़ार करना पङा। शुभचिंतकों ने कमज़ोर मरीज़ को सहारा देकर बाबा के सामने ज़मीन पर बैठाया।

मख़मली आसन पर चौकड़ी मारकर बैठे बाबा के माथे पर चंदन का बड़ा तिलक, पीठ पर बे-तरतीबी से फ़ैली-उलझी भूरी जटाएं, चेहरे पर लंबी घनी खिचड़ी दाढ़ी, गेरुएं वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की कई मालाएँ और बाएं हाथ में एक चिमटा था। उनके दाहिनी ओर जल से भरे तांबे के कई छोटे-बड़े पात्र और बाईं ओर लाल कपड़े में लिपटा, रूई से भरा- एक डरावनी शक्ल वाला गुड्डा रखा था, नाम था-लटूरा लाल।

लोबान का धुआँ आसपास की हवा में घुलकर वातावरण में रूमानी खुशबू बिखेर रहा था। यत्र-तत्र देवी-देवताओं की तस्वीरें, त्रिशूल,और झंडे आदि टंगे थे। कुल मिलाकर रहस्य और रोमांच से भरपूर माहौल था। जैसे ही मरीज़ ने झुककर बाबा को प्रणाम किया, पूरी वादी बाबा के जोरदार अट्टहास से गूंज उठी-

“हा...हा...हा... आ गया तू! मुझे मालूम था... हा...हा...हा...”

ठहाका लगाते समय बाबा का थुलथुला शरीर आगे-पीछे लयबद्ध हिल रहा था। मरीज़ और उसके साथ आए शुभचिंतकों के चेहरों पर सन्नाटा सा खिंच गया। बाबा ने अपनी लाल-लाल आँखों से मरीज़ को घूरा।

“पहले अपना नाम बताओ, ना घबराओ-ना शरमाओ, लटूरा लाल पर ध्यान लगाओ!”

“प्रजा... प्रजातंत्र, बाबा,” मरीज़ ने काँपते स्वर में जवाब दिया।

बाबा ने मंत्रोच्चार आरंभ किया और चिमटे से लटूरा लाल को पीटना आरंभ कर दिया। जैसे ही लटूरा लाल से चिमटा टकराता, उस पर लगे घुंघरू बज उठते छन्न….छन्न….छन्न……

“बङे भारी ख़तरे में है तू प्रजातंत्र,
फूँकना पड़ेगा बाबा को महामंत्र!
घोर संकट छाया है, बुरी आत्माओं का साया है…”

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतराय, अमृत कलश हस्ताय, सर्व माया विनाशाय, त्रैलोक नाथाय, श्री महाविष्णवे नमः” सभी श्रद्धालु, साँस रोककर बाबा के कर्मकांड को देख रहे थे।

“हुआ लटूरे को ये इल्हाम[1], करता नहीं तू कोई काम।
बड़बड़ाता रहता सुबह-शाम,
नींद नहीं आती है, कमजोरी नहीं जाती है!”

चेले-चपाटों ने लगभग समाप्त हो चुकी लोबान के स्थान पर नई लोबान सुलगा दी। लटूरा लाल पर नजरें गङाए, प्रजातंत्र मन ही मन सोचने पर विवश था कि बाबा बिल्कुल सही दिशा में जा रहे हैं। धन्वंतरि मंत्र का दूसरा दौर आरंभ हुआ। चिमटा एक बार फिर लटूरा लाल पर बरस पड़ा।

छन्न… छन्न… छन्न…

“मधुमेह, उच्च रक्तचाप, चिंताओं ने घेरा,
विषाद, प्रमाद ने डाला तेरे दर पर डेरा।
रहता है तू डरा-डरा सा, है ज़िंदा लेकिन मरा-मरा सा,

... ओम् फट्ट!”

प्रजातंत्र और उसके साथी घोर आश्चर्य में डूब गए। किसी एक्सरे फिल्म की तरह, बाबा उसकी हर बीमारी को अनावृत कर रहे थे। श्रद्धानवत, प्रजातंत्र बाबा के चरणों में गिर पङा।

“आपने सब सच कहा है बाबा। बहुत निराश हो चला हूँ। अकेलापन महसूस करता हूँ। ऐसा लगता है मानो जीवन का कोई उद्देश्य ही नहीं बचा। कभी-कभी लगता है-इससे तो मर जाना ही अच्छा.” चिमटा बाबा ने आँखें खोलीं और मुस्कराते हुए ना की मुद्रा में गर्दन हिलाई। तत्पश्चात दाएँ हाथ में लटूरा लाल को लेकर मंत्रोच्चार करने लगे-

“कोठी-बंगले, नौकर-गाड़ी छोड़ना होगा,
नाता ऐश-आराम से तोड़ना होगा।
जुड़ कर जड़ों से वसुंधरा को चूमना होगा, गली-मोहल्ले घूमना होगा।
निकलना होगा सड़कों पर-सर्दी-गर्मी, दिन और रात;
करनी होगी जन-गण की बात!
दुख-दर्द-रोग, भय-भूत-प्रेत, अवसाद निकट नहीं तब आएगा;
कहे लटूरा लाल-काया अजर-अमर निरोगी तू पाएगा!”

इधर मंत्र की समाप्ति हुई और उधर प्रजातंत्र की पीठ पर चिमटे का एक ज़ोरदार प्रहार हुआ-छन्न…। उसके बदन में एड़ी से चोटी तक एक बिजली सी कौंधी. सकारात्मक उर्जा से परिपूर्ण, दिव्य प्रकाश पुंजों से उसका दिल और दिमाग रोशन हो उठा। उसकी दुर्बल, लड़खड़ाती टाँगों में जान लौटने लगी। कुछ ही पलों में वह बिना किसी का सहारा लिए, अपने पैरों पर खड़ा हो गया और दौड़ पड़ा।

अब उसके दिमाग में गूँज रही थी तो केवल- छन्न…छन्न…छन्न…की आवाज और बाबा का अंतिम मंत्र-“करनी होगी जन-गण की बात!”

© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 06 अप्रैल, 2025

[1] इल्हाम- देववाणी, आकाशवाणी

Publication- सीकर दर्पण- पीएएनबी सीकर सर्कल ऑफिस की छमाही ई पत्रिका (अक्टूबर 24 से मार्च 25) 




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