कविता: देहाती हाट


गरीब, असभ्य और अविकसित लोगों के
छोटे-छोटे देहाती हाट
लगते हैं खुले आसमान तले
लकङी के तख्तों और जूट की बोरियों पर
सजते हैं सङक किनारे
कपङे, जूते, हस्तशिल्प, सस्ती साड़ियां
रंग बिरंगे गुब्बारे
बच्चों के ट्रैक्टर और लारियाँ!

हाट की हवा में तैरती है
पसीने की बू और कच्चे मांस की गंध
वहाँ बिकते हैं
ताजा झींगे, केकड़े और मछलियाँ
मुर्गे-मुर्गियां, भेङ, बकरियाँ
बाँस, केन और जूट के थैले, टोपियाँ, टोकरियाँ
धान, गेहूँ, आलू, गोभी, बैंगन, मिर्च
ककड़ी, केले, संतरे ..!

फैले रहते हैं बेतरतीबी से
खुरपी, दरांती, हल, हंसिया वगैरह-वगैरह
घर और खेत, ढोर-डंगर, बदन और पेट
सभी की जरूरत का सामान
छोटी-छोटी खुशियाँ
मिल जाती हैं
गरीब, असभ्य और अविकसित लोगों के
छोटे-छोटे देहाती हाट में!

लेकिन
वहाँ नहीं मिलते
इंसानो के किफायती मशीनी विकल्प
फसल बोने से लेकर
काटने तक के स्वचालित उपकरण
एक साथ, हजारों लोगों के श्रम और रोजगार को
निगल जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स
और कृत्रिम-मेधा संपन्न रोबोट्स!

वहाँ नहीं मिलती
विलासिता, चकाचौंध, चमक-दमक, बनावट
नहीं बिकती
लूट-खसोट की योजनाएं
बर्बादी और तबाही की मिसाइलें
भय, आतंक, लालसा, वर्चस्व और विस्तार के
रक्त पिपासु बारूदी हथियार!

ये मिलते हैं तथाकथित
अमीर, सभ्य और विकसित मुल्कों के
विशाल आधुनिक बाजारों में!

© दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.) 03 अप्रैल, 2025

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