.jpeg)
.jpg)

.jpeg)
.jpg)


.jpeg)



“अरे-रे, ठहरो! कहाँ घुसे आ
रहे हो?”
सिपाही रामदीन ने डाँटते हुए तेजी से अंदर आ रहे नंग-धङंग
व्यक्ति को थाने के प्रवेश द्वार पर ही रोक लिया।
“हवलदार साहब, मेरे साथ बहुत
अन्याय हुआ है… दया करो।”
हाथ जोड़कर खङे नंगे आदमी ने याचना की। हवलदार के संबोधन ने
रामदीन के शरीर में एक गुदगुदी सी पैदा कर दी। उसका सीना अनायास ही इतना फूला कि
कमीज़ का ऊपरी बटन खुल गया। लहजे में थोड़ी नरमी लाते हुए उसने पूछा।
“हूँ… पहले ये बताओ तुम हो कौन और यहाँ किस लिए आए हो?”
“हुजूर, मैं ‘आम' आदमी हूँ… चोरी की रपट लिखवाने आया
हूँ।” मारे ठंड के दुबले-पतले अधेङ व्यक्ति के दाँत बज रहे थे। शायद वह काफ़ी समय
से नंगा था।
द्वार पर ऊँची आवाजें सुनकर दरोगा
एस.एन. त्रिपाठी अपने कार्यालय से बाहर निकल आए—“क्या बात है रामदीन? कौन है?”
“साहब, कोई ‘आम’ आदमी है… चोरी की रपट लिखवाने आया
है।”
थाने के परिसर में सर से पैर तक नग्न एक व्यक्ति को देखकर दरोगा
त्रिपाठी का दिमाग चकराया।
“तुम तो स्वयं नंगे हो, तुम्हारा कोई
क्या चुराएगा?”
“हुजूर, मैं नंगा नहीं था।
आपकी तरह मेरे शरीर पर भी कपड़े थे, लेकिन चोरी हो
गए!” आम आदमी ने साहस बटोर कर जवाब दिया।
“कपङे चोरी हो गए!... कैसे?”
“दरोगा साहब, दरअसल बात
यह है कि हमारे जौनपुर में पाँच साल में एक बार ‘लोक उत्सव’ आता है। एक विशेष ड्रेस कोड वाले कपङे पहन कर ही स्थानीय नामजद लोग इसमें
प्रवेश कर सकते हैं। लेकिन, इस बार बहुत सारे हुड़दंगी उत्सव
स्थल पर जमा हो गए हैं। वे मेरे जैसे ‘आम’ आदमी की पहचान-विशेष ड्रेस चुराते हैं, लूटते हैं और उसे पहनकर खुद उत्सव में घुस जाते हैं” ।
“पूरी वारदात बताओ—तुम कब, कहाँ और कैसे नंगे हुए?”
“जी मैं नंगा हुआ नहीं, मुझे नंगा कर
दिया गया।”
“ठीक है, ठीक है, खोलकर समझाओ।”
काँपते हुए ‘आम’ आदमी ने दोनों पैरों के घुटने जोङकर अपनी नग्नता
को हथेलियों से ढाँपने की नाकाम सी कोशिश की, "अब और .... क्या खोलकर समझाऊँ साहब?"
दरोगा ने उसकी दुविधा भाँप ली, बोले, “मेरा कहने का मतलब है—
वारदात को तफ़्सील से बयान करो।”
सूर्यास्त होते ही ठंड, नंगे बदन में अधिक चुभने लगी। ‘आम’
आदमी के लिए नग्नता से कहीं ज़्यादा सर्दी असहनीय हो चली थी। रुंधे
स्वर में उसने बतलाना आरंभ किया—
“हुजूर, हमेशा की तरह हम
तैयार होकर ‘लोक उत्सव’ में पहुँचे। इसके लिए बड़े चाव से नया मखमली कुर्ता, पाजामा और शेरवानी तैयार करवाई थी, लेकिन …. ।” वह कुछ पल के लिए रुका और अपनी दोनों हथेलियों को
आपस में रगड़कर गर्मी पैदा करने की कोशिश करने लगा।
“बोलते रहो, बोलते रहो।”
“जी, तभी वहाँ कुछ बदमाश आ गए। मेरे सारे कपड़े
छीन लिए… यहाँ तक कि बनियान और कच्छा भी! एक बदमाश ने तो देखते ही देखते, मेरे कपड़े पहने और उत्सव में घुस गया। मेरी रपट दर्ज करो हुजूर… मुझे इंसाफ दिलवाओ।”
चोरी, छीनाझपटी, डकैती, रंगदारी जैसे हर किस्म के अपराधों से दरोगा त्रिपाठी का प्राय:
वास्ता पङता रहता था, लेकिन बदन से ‘वस्त्र
चोरी’ जैसा मामला तो उनकी पूरी नौकरी में पहला था।
रामदीन ने अपना दिमाग चलाया—“साहब!
मुझे तो यह चोरी नहीं… लूट-खसोट का मामला लग रहा है।”
दरोगा ने बिना उसकी बात पर ध्यान
दिए नंगे आदमी से अगला सवाल किया—
“क्या तुम अपराधियों को पहचान सकते हो?”
“हाँ जी, क्यों नहीं!
हमारे क्षेत्र के प्रधान जी—‘ख़ास’ सेवक और उनके साथी थे। उन्हीं
की गाड़ी में बैठकर वो सब लोग आए थे”।
‘ख़ास’ सेवक का नाम
सुनते ही दरोगा और सिपाही दोनों को जैसे लकवा मार गया।
वह तो इलाके का सबसे बड़ा बाहुबली था। उसके नाम से पुलिस, प्रशासन, कर्मचारी, गुंडे, मवाली—सब डरते थे। सब उससे बच कर
रहने में ही अपनी भलाई समझते थे। यहाँ तक कि उसके गुर्गों के खिलाफ भी कोई ज़ुबान
खोलने की हिम्मत नहीं करता था। और यह नंगा आदमी ‘ख़ास’ सेवक के विरुद्ध रिपोर्ट
लिखवाने चला आया! नादान! तुरंत दरोगा त्रिपाठी ने अपना पैंतरा बदला—
“तुम्हारे पास क्या सबूत है कि वही लोग थे?”
“हुजूर, मैं पहचानता सकता हूँ।
वहाँ कैमरे भी लगे हैं… सब रिकॉर्ड हुआ है। उत्सव के कर्मचारी भी वहीं मौजूद थे। दूसरे
लोग भी थे, सारी वारदात उनकी आँखों के सामने घटित हुई।
आप उनसे पूछताछ कर सकते हैं। और सबसे बड़ा सबूत—मैं खुद… इस ठंड में नंगा, आपके सामने खड़ा हूँ!”
दरोगा ने खीझते हुए कहा—“देखो मिस्टर आम, ‘ख़ास’ सेवक
बहुत बड़े आदमी हैं। उन पर ‘वस्त्र चोरी’ जैसे घटिया इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं। कोई भी
यक़ीन नहीं करेगा। हो सकता है यह उन्हें बदनाम करने की तुम्हारी साज़िश हो।”
“हुजूर मेरी ऐसी क्या औक़ात जो मैं ‘ख़ास’ सेवक के खिलाफ
साज़िश करूँ।”
रामदीन ने दरोगा की बात को आगे बढ़ाया—“ख़ास सेवक तो राजा
हैं इस इलाके के। जो पसंद आ जाए, उठा लेते हैं, उन्हें चोरी करने की क्या ज़रूरत?”
“चोरी नहीं तो हुजूर… इसे आप लूट मान लीजिए।”
“देखो मिस्टर आम, हमारे मानने
से कुछ नहीं होता! तुम्हें शपथ-पत्र देना होगा।” दरोगा के स्वर में अब रूखापन था।
बाहर अंधेरा घिर आया था। आम आदमी
की हड्डियों तक में ठंड प्रवेश कर चुकी थी। धूजते स्वर में वह बङी कठिनाई से बोला—“शपथ-पत्र? कैसा शपथ-पत्र, हुजूर?”
“विधिवत नोटराइज़्ड स्टाम्प पेपर पर लिखकर देना होगा कि
तुम्हारे आरोप सत्य हैं और तुम्हारे पास पर्याप्त साक्ष्य हैं। इसके बाद हम रपट
लिखेंगे और जाँच करेंगे। लेकिन ध्यान रहे, यदि तुम आरोप
सिद्ध न कर पाए तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 229 के तहत झूठा शपथ-पत्र देने के आरोप में तुम्हें सात साल तक की सज़ा हो सकती
है। मानहानि का मामला भी अलग से चल सकता है। समझे!”
शपथ-पत्र की आत्मघाती शर्त सुनकर ‘आम’ आदमी का बचा-खुचा धैर्य जवाब दे गया।
ऊपर से सजा की बात ने उसे बुरी तरह से डरा दिया था। न्याय की धुँधली उम्मीद सर्द
हवा में ठिठुर कर जम गई।
वह ‘ख़ास’ सेवक की लूट को कैसे सिद्ध करेगा?
उसे कैमरों की फुटेज कौन देगा?
कर्मचारी क्यों उसके लिए गवाही
देंगे?
सब अनिश्चित था… और उसके लिए तो लगभग असंभव। और फिर…
मानहानि! सात साल की कैद! नहीं… नहीं!
“क्या सोचने लगे, जल्दी बताओ।
हमें और भी बहुत काम हैं।” दरोगा ने ज़ोर देकर पूछा।
नंगा आदमी सिसक उठा—“हुजूर, हम ठहरे ‘आम’ आदमी। ये सब नहीं कर पाएंगे। बस एक कृपा कर दो… कुछ पहनने को दे दो। ठंड
से शरीर बर्फ़ बन गया है; प्राण निकले जा रहे हैं। मुझे नहीं
लिखवानी कोई रपट-वपट।”
दरोगा के चेहरे पर एक कुटिल
मुस्कान दौङ गई। उसने रामदीन को एक ओर ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा, “तहख़ाने वाले स्टोर में जो कंबल रखे हुए हैं, उनमें से एक ले आओ”।
“लेकिन वह माल तो ‘ख़ास’ साहब के लिए है …”। रामदीन ने फुसफुसाते
हुए आँखें फैलाईं।
“हाँ, हाँ, मुझे पता है। उन्होंने भी तो घर-घर
जाकर यही करना है”। दरोगा त्रिपाठी ने गर्दन को दरवाज़े की ओर हल्का झटका देकर,
इशारों में उसे अंदर जाने का आदेश दिया।
थोड़ी ही देर में सिपाही रामदीन
एक कंबल के साथ लौट आया; जिसे लगभग झपटते हुए नंगे आदमी ने तुरंत अपने
पूरे बदन पर कसकर लपेट लिया। हल्की गरमाहट मिलते ही उसकी जान में जान आई।
“पूरे दस हज़ार का है! किस्मत अच्छी है तुम्हारी—कुछ दिन
पहले एक सरकारी गोदाम की लूट का माल जब्त हुआ था। अपनी ‘लोक उत्सव’ वाली ड्रेस को भूल जाओ—जान है
तो जहान है।” दरोगा ने समझाया।
आम आदमी की आँखें भीग गईं। इस
‘नेकी’ के लिए उसने दरोगा को करबद्ध धन्यवाद दिया।
देश में ऐसे लोक-उत्सव धूमधाम से आयोजित-प्रायोजित हो रहे हैं।
सब लोग खुश हैं।
आम आदमी खुश है; उत्सव के बहाने
उसे कंबल का संबल मिल जाता है।
दरोगा खुश है; उसे ‘ख़ास’ सेवक की ‘विशेष
सेवा’ करते हुए तंत्र की बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल
जाता है।
‘ख़ास’ सेवक खुश है; सब निर्धारित रणनीति के अनुरूप ही हो रहा है।
‘ख़ास’ सेवक के गुर्गे
खुश हैं;
‘आम’ आदमी के लूटे हुए वस्त्र
पहनकर ‘लोक-उत्सव’ का भरपूर लुत्फ़ जो उठा
रहे हैं।
चारों तरफ़ खुशहाली है।
.jpg)

नरसंहार

(1)
यह ग़ज़ा है
इसके अस्त-व्यस्त अस्पताल के एक बेड पर
बुरी तरह घायल, पाँच वर्षीय साफ़िया
उसके बाएँ पैर की टाँग घुटने तक काट दी गई है
क्यों?… उसे नहीं पता
उसे याद है-अभी तीन दिन पहले
जब दूर आसमान में चाँदनी छिटकी हुई थी
घर की बालकनी में चुंधियाती रोशनी के साथ एक भीषण धमाका
और बस!
फ्रॉक की जगह
उसके पूरे बदन पर लाल धब्बों वाली सफ़ेद पट्टियाँ बँधी हैं
रोम-रोम से रिसता क्रूर, असहनीय दर्द
भयानक चीख़ों से लिपटकर
आज़ाद होने की असफल कोशिशें करता है
अस्पताल के गूँगे गलियारों से प्रतिध्वनित उसका क्रंदन
अन्ततः थक-हारकर
बेहोशी की चादर में गुम हो जाता हैं!
कभी जब उसे होश आता
है
एक पल के लिए देखती है ठीक सामने-माँ
माँ-उसकी प्यारी माँ
दुनिया की सबसे सुंदर सौगात-उसकी माँ
दोनों हाथ फैलाए आ रही है दौड़ती हुई-उसकी ओर
“माँ… माँ…”
लेकिन साफ़िया के हाथ… साफ़िया के पाँव…
नहीं उठते, नहीं उठ पाते
“मेरे हाथ-मेरे पाँव क्यों… क्यों…क्यों…?”
अस्फुट आवाज में उलझे उसके लङखङाते सवाल
केवल सवाल, कोई जवाब नहीं!
उसके ठीक ऊपर
सफ़ेद छत तेजी से घूम रही है
काश, यह रुक जाए अभी की अभी
हरे लबादे में लिपटी एक आकृति झुकती है-उसके बदन पर
एक सुई कहीं चुभती है
वह सिहर उठती है-कराह उठती है
एक नई पीड़ा को जन्म देता-डॉक्टर का स्पर्श
माँ की धुँधली छवि-अश्रुओं की बूँदों में घुलकर बह निकलती है
कोई तो नहीं है
यहाँ उसके आसपास-है तो केवल दर्द
भयानक दर्द-जिस्म के हर हिस्से को पिघलाता हुआ
चीरता हुआ, जलाता हुआ!
(2)
जहाँ तक नज़र जाती है —
इमारतों के मलबे के ढेर, टूटी सड़कें, बिखरा असबाब
खाना और पानी की तलाश में भटकते लोग
इन्हीं में से एक है नासिर
लगभग सात वर्षीय नासिर
नंगे पाँव, अर्ध-नग्न, मैला-कुचैला
बदन
बदहवास-हाथ में एक कटोरा थामे वह दौड़ रहा है
वहाँ सामने खाना बँट रहा है!
वह झौंक देता है
अपने कमजोर शरीर की पूरी ताकत
भीड़ में कभी आगे, कभी पीछे धकेला जाता है
खिचड़ी की तेज़ खुशबू
पाँच दिन से भूखे नासिर को आक्रामक बना देती है
अपने से छोटे, कमजोर बच्चों को धकियाते हुए
जैसे तैसे वह कामयाब हो जाता है!
ज्योंही तरल खिचड़ी का एक घूँट
उतरता है उसके हलक से नीचे
भूख किसी भेड़िये की तरह गुर्राने
लगती है
लेकिन वह जब्त करता है
वहाँ दूर, मलबे के दूसरे ढेर के पास
उसे लौटना है
और वह दौड़ पड़ता है!
लेकिन तभी-तड़-तड़-तड़…
गोलियों की आवाज़ों के साथ चीख-पुकार
बच्चे, बड़े, औरतें-सब
भाग रहे हैं, गिर रहे हैं
एक बच्चा चीखता हुआ
ठीक उसके ऊपर आ गिरता है
नासिर के गिरने के साथ ही उसका कटोरा भी छूटकर
जा गिरता है — धूल में!
मृत बच्चे को अपने
बदन से हटाकर वह खड़ा होता है
दोनों खून से सने हैं, लेकिन शुक्र है
मृतक के हाथ का कटोरा अब भी सुरक्षित है
अंतिम पलों तक
उसने भोजन को संभाले रखा
नासिर उसी कटोरे को उठाकर फिर दौड़ पड़ता है!
चीखने-चिल्लाने की
मार्मिक आवाज़ें
उसका पीछा करती हैं
लेकिन उसे पहुँचना है-जल्द से जल्द अपने घर
तंबू में चिथड़ों में लिपटी उसकी माँ
हफ्तों से भूखी, बुखार में तपती, जीर्ण-शीर्ण
अब केवल माँ ही तो बची है!
माँ… माँ… माँ…
देखो, मैं खिचड़ी लाया हूँ!
माँ उठो, कुछ खा लो- माँ… माँ…
तंबू में घुसते ही नासिर चिल्लाता है
लेकिन माँ के शरीर में कोई हलचल नहीं है
उसकी पुतलियाँ स्थिर हैं, हाथ-पाँव ठंडे पड़
चुके हैं
तो क्या? माँ भी…
उसके बदन में एक झुरझुरी-सी दौड़ जाती है
उसका दिमाग सुन्न हो जाता है!
चारों ओर पसरा है डरावना सन्नाटा
धीरे-धीरे नासिर के तमाम दर्द, भय, क्रोध भावशून्य हो जाते हैं
और पेट की बेरहम, बेशर्म भूख
कटोरे पर झुक जाती है!
© दयाराम वर्मा,
जयपुर (राज.) 13 जुलाई, 2025



.jpeg)
.jpeg)
.jpeg)

.jpeg)

.jpeg)

.jpeg)
.jpeg)

.jpeg)
.jpeg)




व्यंग्य: चारों धाम- सेवा तीर्थ विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक रोमियो और जूलियट में नायिका जूलियट अपने प्रेमी से कहती है— “ नाम...