समीक्षा ‘खण्ड-खण्ड बुन्देलखण्ड’ 
लेखक : शिव भूषण सिंह गौतम ‘भूषण’ छतरपुर (म.प्र.),
प्रकाशक: जे.टी.एस. पब्लिकेशन्स दिल्ली



हाल ही में वरिष्ठ साहित्यकार-कवि श्री शिव भूषण सिंह गौतम की ‘खण्ड-खण्ड बुन्देलखण्ड’ काव्य-रचना प्राप्त हुई. जैसे ही पाठक इसके पन्ने पलटता है तो तुरंत भान हो जाता है कि यह कृति एक लोकप्रिय साहित्य न होकर एक गम्भीर शोधपरक साहित्य है. लिहाजा इसे पढने के लिए वैसा ही दृष्टीकोण भी आवश्यक है.

छंद-बद्ध रचनाओं के विद्वान कवि इस जमाने में विरले ही होंगे. यद्यपि इस दौर में आधुनिक कविता का अतुकांत-लेखन या छंद मुक्त प्रचलन बढ गया है, तथापि यह रचना साहित्य की छंद परम्परा के वैभव को बहुत सुंदर ढंग से उद्घाटित करती है. शिवपुरी के सेवा निवृत्त प्राचार्य डॉ. लखन लाल खरे ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘खण्ड-खण्ड बुन्देलखण्ड’ की प्रकृति प्रारम्भ से अंत तक अभिधात्मक है. इसका पृष्ठ-पृष्ठ रक्तरंजित है. इसका शब्द-शब्द तलवारों-भालों और वाणों की नोकों से गढा गया है. द्वेष, ईर्ष्या, मिथ्या दम्भ, कपट, षङयंत्र, और उससे प्रसूत अविवेक की काली स्याही से इसका अक्षर-अक्षर निर्मित है.

विभिन्न शास्त्रीय छंदों में युद्ध से जुङी घटनाओं का ओजस्वी निरूपण पाठक को कविता के आदिकाल (वीरगाथा काल) में ले जाता है. कवि ने गौरहरी की रार, तिंदवारी की लङाई, तरहुँआ की तकरार, पङोहरी की लङाई, दुर्गाताल की लङाई, गठेवरा समर-(3 दिवसीय युद्ध का हाल जिसमें अर्जुन सिंह को विजयीश्री मिलती है), छाछरिया की लङाई, अजयगढ का युद्ध और चरखारी की चढाई, कुल 9 प्रमुख लङाइयों को इस काव्य रचना का आधार बनाया है. राजा क्षत्रसाल के देहावसान के पश्चात बुन्देलखण्ड के ई.सन 1765 से लेकर ई.सन 1793 तक के इन युद्धों का विशुद्ध काव्यात्मक शैली में ‘आँखों देखा हाल’ सरीखा चित्रण है. “खुले दहाने तोप के, बत्ती दिया लगाय. गोले बरसे आग के, कान दिये ना जाय. पहर एक तोपें चली, अंधाधुंध दोउ ओर. धुंध चढी आकाश में, सूझत ओर न छोर.”

कवि ने ‘इतिहास से सीख लेने’ को रचना के लेखन का प्रमुख उद्देश्य बताया है जो उपसंहार में लिखे इस दोहे से भी स्पष्ट है.

छत्रसाल के बाद का, बुंदेली इतिहास.
आपस की तकरार का, देता है आभास.
एक रहे तब नेक थे, हरे-भरे आबाद.
टुकङे-टुकङे हो गये, बँट कर बरबाद.

बुंदेली इतिहास के कुछ विस्मृत अध्याय.
उद्घाटन का ताहि के, है यह एक उपाय.

शिक्षायें इतिहास की, भी देती हैं ज्ञान .
भूलें दोहरायें नहीं, वर्तमान दे ध्यान.

जो कुछ है गौरवमयी, लें उसका संज्ञान.
संततियों के वास्ते, हो जिससे अभिमान.

मूलत: बुंदेली में रचित, काव्य की भाषा को खङी बोली और मुहावरों से समृद्ध किया गया है. परिशिष्ट 1 में कवि ने कृति में प्रयुक्त 20 मात्रिक और 18 वार्णिक छंदों से अवगत कराया है. इतिहास के कुछ हिस्से को काव्यात्मक दृष्टि से भेदती ‘खण्ड-खण्ड बुन्देलखण्ड’, को शास्त्र-सम्मत छंदों की एक कालजयी रचना कहना अतिशयोक्ति न होगा.

लेकिन काव्य की उपादेयता के लिहाज से डॉ. कुंजी लाल पटेल का कथन कि ‘यह काव्यकृति, इतिहास, हिंदी और संस्कृत के स्नातकोत्तर कक्षाओं के छात्रों को अंवेषण के लिये मार्गदर्शी मील का पत्थर होगी’- एक सटीक टिप्पणी प्रतीत होती है. इस प्रकार की रचना के लिए एक संवेदनशील कवि हृदय होने के साथ-साथ, शास्त्रीय छंदों का उच्चस्तरीय ज्ञान और इतिहास का निरपेक्ष एवं गहन अध्ययन अपेक्षित होता है, और किसी एक व्यक्ति विशेष में एक साथ इन तीनों विषेशताओं का समावेश अपवाद स्वरूप ही हो सकता है. लेकिन कवि ‘भूषण’ ने इस रचना के माध्यम से अपनी इन तीनों अंतर्निहित विशेषताओं को उजागर ही नहीं बल्कि सिद्ध भी किया है. 

समीक्षक- दयाराम वर्मा, जयपुर (राज.)


                        शिव भूषण सिंह गौतम ‘भूषण’


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