पाठक प्रतिक्रिया: कटघरे में हम सब: कहानी संग्रह
लेखक श्री गोकुल सोनी
प्रकाशक:इंद्रा पब्लिशिंग हाउस- भोपाल



‘सारे बगुले संत हो गए’ नामक उत्कृष्ट एवं चर्चित व्यंग्य संग्रह के पश्चात ‘कटघरे में हम सब’ कहानी संग्रह’,श्री गोकुल सोनी जी का द्वितीय साहित्यिक अवदान है। कहानी, लेखन की सर्वाधिक पुरानी विधाओं में से है और हमारे चारों ओर बिखरी घटनाओं में तिरोभूत मानवीय अच्छाइओं-बुराइयों की खुराक से अंकुरित हो फलती फूलती है।

कहानी के पात्र जब तक पाठक के मन मस्तिष्क में अपनी विशेष छवि और पहचान स्थापित नहीं कर लेते तब तक वे बेतरतीबी से फैले सारहीन शब्दों के ढेर के अतिरिक्त कुछ नहीं।जब एक रचनाकर की संवेदना, मर्मस्पर्शी कथ्य के धरातल पर सूडोल शब्द शिल्प के संतुलित मिश्रण से आकार ग्रहण करती है तो वह एक मूर्त रचना बनती है। ‘अकल बड़ी या भैंस’ संग्रह की बहुत सी विशेषताओं में प्रथम विशेषता यह है कि सभी पात्र जीवित हैं और कहीं भी इनमें कृत्रिमता दृष्टव्य नहीं होती। भाषा का सरल स्वरूप और निर्बाध प्रवाह इस संग्रह की द्वितीय विशेषता है। वास्तविकता के अत्यंत समीप, जमीनी कथानक और एक सामाजिक संदेश व समाधान के साथ इति, इसकी तृतीय विशेषता है। कुछ ऐसी ही खूबियों से लबरेज इस कहानी संग्रह के अति साधारण पात्र, बड़े संदेश और सकारात्मक ऊर्जा का संचरण बिना किसी अतिरंजना के करने में सफल हुए हैं।

गरीब बहुधा दया के पात्र होते हैं या गरीब बहुधा चोर व ठग होते हैं, प्राय: ऐसे पूर्वाग्रह किसी दरिद्र के प्रति हमारी सोच को घनीभूत कर देते हैं लेकिन अनुभवोपरख,‘कुली’,‘तीर्थ यात्रा’,‘गरीब कौन’,‘आधुनिक खड़गसिंह’,‘मुआवजा’ और ‘मन्नत’ जैसी कहानियों में रचनाकार ने इन पूर्वाग्रहों को सहजतापूर्वक तोड़ा है। नारी शक्ति की सशक्त अभिव्यक्ति है ‘मंगला’। कर भला हो बुरा’ पंचतंत्र के संदेश ‘सीख बंदर को दीजिए घर बहिए का जाय’ को स्मरण कराती है। ‘गुरु गुड़ चेला शक्कर’ एक जागरूक ग्राहक द्वारा बैंककर्मियों की गैरकानूनी मनमर्जी पर अंकुश लगाने की कथा है।

भ्रष्टाचार पर केन्द्रित ‘पश्चाताप’,‘आज का वाल्मीकि’,‘ईमानदारी की कीमत’, धन्यवाद’, ‘तलाश’ सरीखी कहानियों में भ्रष्ट हो जाने के सच से धीरे-धीरे पर्दा उठता है। और पूरी तरह पर्दा हटने पर, सत्य के उजास में भ्रष्ट मानसिकता, स्वत: आत्म-परिष्कारोन्मुख हो, ईमानदारी को स्वीकारती भी है और पुनर्स्थापित भी करती है।

‘संबंध’ कहानी आज की तनाव पूर्ण ज़िंदगी में जी रहे आम आदमी की समस्याको पहचान कर एक सुंदर मनोवैज्ञानिक हल प्रस्तुत करती है। जीवन में सफलता के लिए मात्र किताबी ज्ञान ही नहीं, व्यवहारिक ज्ञान भी आवश्यक होता है;‘व्यावहारिक ज्ञान’ का चिंटू इस अवधारणा को अक्षरश: सिद्ध करता है। समय के साथ सामाजिक सम्बन्धों में घुलती कृत्रिमता और हावी होते स्वार्थ व छल-कपट को अनावृत करती है‘बदलते रिश्ते’ और ‘मौसेरे भाई’। इसी प्रकार ‘विश्वास’ पूर्वजों के लिए किए जाने वाले श्राद स्वरूपी आडंबरपर तीक्ष्ण चोट है। ‘वक्त का तकाजा’ नई और पुरानी पीढ़ी के पीढ़ी-अंतर के मूल कारण ‘अति भौतिकतावाद’ पर सटीक हमला करती है।

इस संग्रह की कहानियाँ, व्यापक सूझ बूझ के साथ समसामयिक घटनाओं का जहाँ शुक्ष्म विश्लेषण दर्शाती हैं वहीं लेखक की मूल व्यंग्य विधा और जीवन को सहज हास्य के साथ जीने की स्वाभाविक शैली की स्पष्ट छाप भी छोड़ती है। कहानीकार परिस्थितियों के हाथों कठपुतली बने पात्रों को अपने हाल पर नहीं छोड़ता वरन समाधान रूपी स्वच्छ हवा के झौंके से उसे घुटन से मुक्त करने का सफल प्रयास भी करता है। संस्कारों, नैतिक मूल्यों, ईमानदारी और मानवीयता की प्रासंगिकता व सास्वता को प्रतिष्ठित करने वाले प्रेरक कहानी संग्रह से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने के लिए श्री गोकुल जी सोनी को साधुवाद और अनंत शुभकमनाएं।

दयाराम वर्मा: कम्फर्ट गार्डन, चूना भट्टी, कोलार रोड, भोपाल (मध्यप्रदेश) 462016: दिनांक 27.10.2018 


श्री गोकुल सोनी


Publication: पुस्तक में पाठकीय प्रतिक्रिया के रूप में प्रकाशित 




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