प्रस्तावना ‘आनंद कही-अनकही’(द्वितीय संस्करण)
लेखक डॉ. अरविंद जैन, भोपाल




‘आनंद कही-अनकही’ का आरंभ 16-17 वय के एक साधारण युवक की निराशा, हताशा और अंधकारमय भविष्य में उलझी उस मानसिक स्थिति से होता है जो आत्महत्या को सभी समस्याओं का अंतिम निदान समझ बैठती है। तथापि उसके अवचेतन मन में गहराई से रचे-बसे जैन धर्म के अतुल्य जीवनदर्शन और स्वतन्त्रता सेनानी पिता की व्यवहारिक व धार्मिक शिक्षा के मिले जुले संस्कार, ठीक मृत्युवरण से पूर्व सद्बुद्धि का संचार कर उसके विचारों का रुख पलट देते हैं। और फिर शुरू होता है आनंद की जीवन यात्रा का एक नया अध्याय। 

इनके पिताश्री पेशे से एक छोटे व्यापारी थे लेकिन उनमें नैतिक, चारित्रिक और सामाजिक आदर्श और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा कूट-कूट कर भरी थी। यद्यपि अपने परिवार को वे कभी भी आर्थिक संपन्नता नहीं दे पाये, लेकिन उनकी सरल जीवन शैली, समता मूलक सामाजिक व्यवहार, धर्म परायणता एवं नियमित स्वाध्याय, वह अनमोल विरासत थी जहाँ से आनंद को जीवन पर्यन्त; सच्चाई के मार्ग पर अडिग, अविचलित, चलते रहने की ऊर्जा और प्रेरणा मिलती रही।

वर्ष 1974 में डॉ. आनंद जबलपुर विश्वविद्यालय से बी.ए.एम.एस. (आयुर्वेद) की डिग्री गोल्ड मेडल के साथ प्राप्त करते हैं। तत्पश्चात, मध्यप्रदेश शासन में आयुष विभाग की सेवा में उनका प्रथम पड़ाव मरदापाल गाँव, जिला बस्तर से आरंभ होता है, जो बम्हनी (जिला नरसिंहपुर), सागर, अनंतपुरा, रहली, सतना, मंडला (जबलपुर), आमखो (ग्वालियर), उज्जैन, भोपाल, श्योपुर, पुन: भोपाल और अंत में वर्ष 2011 में रीवा में आकर समाप्त होता है। अपने प्रत्येक कार्यकाल में डॉ. आनंद अनेकानेक पारिवारिक, शारीरिक और मानसिक कष्टों से गुजरते रहे लेकिन गहरे अवसाद, निराशा या तनाव भरे पलों में भी हार नहीं मानी। 

आयुष विभाग में कमोबेश हर स्थान पर व्याप्त भ्रष्टाचार से समझौता न करने की जिद्द के चलते, वे राजकीय सेवा के अपने अधिकांश कार्यकाल में, भ्रष्ट कर्मचारियों, अधिकारियों और दवा विक्रेताओं के छल-प्रपंचों, अवमाननाओं, शिकायतों व मिथ्यारोपों से दो-चार होते रहे। ईमानदार अधिकारी इस प्रकार के तत्वों की नजरों में सदैव किरकिरी बनकर चुभते रहे हैं। लेकिन अपनी कर्तव्यनिष्ठा, सूझबूझ, निडरता, आत्मबल, आत्मविश्वास और (यदा-कदा) दबंगई के बल-बूते, उन्होनें इन तमाम झंझावातों, यहाँ तक कि निलंबन तक का भी, धैर्य और दृढ़ता से सामना किया।

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में पसंद-नापसंद, यश-अपयश, प्रेम-घृणा, अंतरंग जीवन, निर्णय-अनिर्णय आदि के ऐसे अनेकों प्रसंग होते हैं जिन्हे वह कभी भी सार्वजनिक करना नहीं चाहेगा, लेकिन डॉ. आनंद ने अपने जीवन के ऐसे वृतान्तों को बेलौस और बेधड़क अनावृत किया है। कथानक की सह-किरदार ‘टिन्नी’ (डॉ. आनंद की पत्नि) की बेरुखी, वैचारिक व मानसिक मत-भिन्नता, अनेक संवादों के जरिये अपनी पूरी कड़वाहट के साथ प्रकट हो पाठक को विचलित करती है। डॉ. आनंद ने टिन्नी के साथ सहानुभूति तो दर्शाई है पर संभवत: उन्होनें टिन्नी की नारीय संवेदनाओं और अपेक्षाओं को गंभीरता से नहीं लिया। जब दो-दो नवजात बच्चियों की अकाल मृत्यु और विभिन्न प्रकार की शारीरिक व्याधियों से घिरी ‘टिन्नी’ की अपनी और अपनी एकमात्र जीवित बच्ची के लिए सुकून भरी जिंदगी के सपने, डॉ. आनंद की हद से ज्यादा सामाजिक व कार्यालयीन संलिप्तता से साकार होते नजर नहीं आते तो अंतत: उसका विछुब्ध मन विद्रोही हो उठता है। कालांतर में यह विद्रोह ‘टिन्नी’ का स्थायी स्वभाव बन जाता है।

आत्मकथा, दूर दराज के गावों में आवागमन के लचर साधनों, कीचड़-सनी कच्ची सड़कों, अपर्याप्त विद्युत आपूर्ति, जर्जर आयुर्वेद भवनों, गाँव-देहात के उत्थान और स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति तत्कालीन सरकारों के उपेक्षित नजरिये, आदि को बखूबी रेखांकित करती है, वहीं गाँवों के विकास में बाधक ओछी राजनीति, आपसी वैमनस्य आदि की भी एक बानगी प्रस्तुत करती है।

डॉ. आनंद ने स्वनिर्मित नियम अपनाए। उनके जीवन को प्रभावित करने वाले सूत्रों में से एक है: ‘गुण ग्रहण का भाव रहे नित्य, दृष्टि न दोषों पर जावे’ तथा ‘मैत्री भाव जगत में सब जीवों से नित्य रहे, दीन दुखी जीवों पर उनके कर में करुणा भाव रहे।’ समता भाव रखो, जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। हाँ, अन्याय, अत्याचार, अतिचार, न्याय-नियम विरुद्ध कार्य हो तो नियम से संघर्ष कर, विजयी बनो। हारना, हिंसा का रूप है।

उपन्यास में जहाँ-तहाँ, अपने सिद्धांतों से प्रतिबद्ध, डॉ. आनंद; भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक अडिग चट्टान की भांति खड़े नजर आते हैं। संवादों में यदा-कदा अस्तरीय भाषा भी प्रयुक्त हुई है लेकिन वह लेखक की तथ्यों की ईमानदारी के साथ प्रस्तुतीकरण का द्योतक है। इस आत्मकथा के माध्यम से डॉ. आनंद ने, जो कि वास्तव में डॉ. अरविंद जैन हैं, पाठक को अपनी निजी जिंदगी में झाँकने का अवसर दिया है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, एक कर्मठ और ईमानदार व्यक्ति की नैतिक और आत्मिक बल के साथ जीवन को जीने और जीतने का आद्योपांत, यथार्थ, संघर्षपूर्ण और प्रेरक चित्रण जीवंत हो उठता है।

बक़ौल लेखक “असफलता, अशांति का दौर डॉ. आनंद का मार्गदर्शक, पथ प्रदर्शक रहा। इस दौरान डॉ. आनंद को अपनों व परायों को परखने, समझने का भरपूर अवसर मिला....... लक्ष्य पहले अकाल के गाल में समाना था, पर अब होश आने पर आत्म कल्याण करना है। क्या यह संभव है?” निश्चित्त: डॉ. आनंद का अनवरत साहित्य सृजन, शाकाहार परिषद का बखूबी संचालन और उनकी अन्य सांस्कृतिक, सामाजिक गतिविधियों में तन-मन-धन से भागीदारी, इस प्रश्न का ‘हाँ’ में उत्तर देने के लिए पर्याप्त हैं। ‘आनंद कही अनकही’ के द्वितीय संस्करण के लिए आपको अनन्त शुभकामनाएँ।

दयाराम वर्मा, भोपाल -वर्ष 2019



स्व. डॉ. अरविंद जैन (14 मार्च 1951- )

प्रकाशन- प्रस्तावना ‘आनंद कही-अनकही’(द्वितीय संस्करण)

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